Poorv Madhyakalin Samaj
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प्रस्तुत पुस्तक में पूर्वमध्यकालीन सामाजिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, क्योंकि पूर्वमध्यकाल प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल के दौरान राजनीतिक मंच पर ही केवल उतार-चढाव नहीं आए, अपितु सामाजिक और आर्थिक धरातल पर भी अनेक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं। परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक संरचना नया रूप ग्रहण करती है। इसी कारण पूर्वमध्यकालीन सामाजिक आर्थिक धरातल पर निहित व्यावसायिक समुदायों का अर्थपूर्ण विवेचना करने का पूर्ण प्रयास किया गया है और समाजार्थिक घटक के रूप में मान्य कृषि, व्यापार, उद्योग तथा अन्य विविध व्यवसायों से सम्बन्धित व्यावसायिक समुदायों का गहराई के साथ अध्ययन करना ही हमारा मुख्य केन्द्र रहा है। साथ-ही-साथ पेशेवर समुदायों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का निरूपण तत्कालीन अभिलेखीय एवं साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर किया है और उनकी विविध व्यावसायिक गतिविधियों का विश्लेषण करना हमारा मुख्य ध्येय रहा है। जैसाकि स्पष्ट है कि भारतीय सामाजिक आर्थिक जीवन में पेशेवर समुदायों के स्थान-निर्धारण बिना सामाजिक जीवन का चित्रण एकांगी रह जाएगा।
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प्रस्तुत पुस्तक में पूर्वमध्यकालीन सामाजिक संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है, क्योंकि पूर्वमध्यकाल प्राचीन भारतीय इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण काल माना जाता है। इस काल के दौरान राजनीतिक मंच पर ही केवल उतार-चढाव नहीं आए, अपितु सामाजिक और आर्थिक धरातल पर भी अनेक परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं। परिणामस्वरूप भारतीय सामाजिक संरचना नया रूप ग्रहण करती है। इसी कारण पूर्वमध्यकालीन सामाजिक आर्थिक धरातल पर निहित व्यावसायिक समुदायों का अर्थपूर्ण विवेचना करने का पूर्ण प्रयास किया गया है और समाजार्थिक घटक के रूप में मान्य कृषि, व्यापार, उद्योग तथा अन्य विविध व्यवसायों से सम्बन्धित व्यावसायिक समुदायों का गहराई के साथ अध्ययन करना ही हमारा मुख्य केन्द्र रहा है। साथ-ही-साथ पेशेवर समुदायों की सामाजिक आर्थिक स्थिति का निरूपण तत्कालीन अभिलेखीय एवं साहित्यिक साक्ष्यों के आधार पर किया है और उनकी विविध व्यावसायिक गतिविधियों का विश्लेषण करना हमारा मुख्य ध्येय रहा है। जैसाकि स्पष्ट है कि भारतीय सामाजिक आर्थिक जीवन में पेशेवर समुदायों के स्थान-निर्धारण बिना सामाजिक जीवन का चित्रण एकांगी रह जाएगा।
Book Details
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ISBN9789386863577
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Pages212
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Avg Reading Time7 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: ‘निम्नवर्गीय प्रसंग’ एक ऐसी रचना है जिसमें निम्न वर्ग अर्थात् आम जनता—ग़रीब किसान, चरवाहा, कामगार, स्त्री समाज, दलित जातियों—के संघर्षों और विचार को बहुत क़रीब से समझने का प्रयास किया गया है। यह रचना अभिजन के दायरे से बाहर जाकर निम्न वर्ग की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को परखने के साथ–साथ, अभिजन और निम्न जन की प्रक्रियाओं को दो अलग–अलग पटरियों पर न धकेलकर, इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध, आश्रय और द्वन्द्व के आधार पर उपनिवेश काल की हमारी समझ को गतिशील करती है। दरअसल निम्नवर्गीय इतिहास एक सफल और चौंका देनेवाला प्रयोग है जिसके तहत भारतीय समाज में प्रभुत्व और मातहती के बहुआयामी रूप सामने आते हैं। वर्ग-संघर्ष और आर्थिक द्वन्द्व को कोरी आर्थिकता (Economism) के कठघरे से आज़ाद कर उसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिरूपों और विशिष्टताओं का इसमें गहराई के साथ विवेचन किया गया है। इस पुस्तक में स्वतंत्रता संग्राम, गांधी का माहात्म्य, किसान आन्दोलन, मज़दूर वर्ग की परिस्थितियाँ, आदिवासी स्वाभिमान और आत्माग्रह, निचली जातियों के सामाजिक–राजनीतिक और वैचारिक विकल्प जैसे अहम मुद्दों पर विवेकपूर्ण तर्क और निष्कर्षों से युक्त अद्वितीय सामग्री का संयोजन किया गया है। ‘निम्नवर्गीय प्रसंग : भाग-2’ आम जनता से सम्बन्धित नए इतिहास को लेकर चल रही अन्तरराष्ट्रीय बहस को आगे बढ़ाने का प्रयास है। 1982 में भारतीय इतिहास को लेकर की गई यह पहल, आज भारत ही नहीं, वरन् ‘तीसरी दुनिया’ के अन्य इतिहासकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए एक चुनौती और ध्येय दोनों है। हाल ही में सबॉल्टर्न स्टडीज़ शृंखला से जुड़े भारतीय उपनिवेशी इतिहास पर केन्द्रित लेखों का अनुवाद स्पैनिश, फ़्रेंच और जापानी भाषाओं में हुआ है। प्रस्तुत संकलन के लेख आम जनता से सम्बन्धित आधे-अधूरे स्रोतों को आधार बनाकर, किस प्रकार की मीमांसाओं, संरचनाओं के ज़रिए एक नया इतिहास लिखा जा सकता है, इसकी अनुभूति कराते हैं। रणजीत गुहा का निबन्ध ‘चन्द्रा की मौत’ 1849 के एक पुलिस-केस के आंशिक इक़रारनामों की बिना पर भारतीय समाज के निम्नस्थ स्तर पर स्त्री-पुरुष प्रेम-सम्बन्धों की विषमताओं का मार्मिक चित्रण है। ज्ञान प्रकाश दक्षिण बिहार के बँधुआ, कमिया-जनों की दुनिया में झाँकते हैं कि ये लोग अपनी अधीनस्थता को दिनचर्या और लोक-विश्वास में कैसे आत्मसात् करते हुए ‘मालिकों’ को किस प्रकार चुनौती भी देते हैं। गौतम भद्र 1857 के चार अदना, पर महत्त्वपूर्ण बागियों की जीवनी और कारनामों को उजागर करते हैं। डेविड आर्नल्ड उपनिवेशी प्लेग सम्बन्धी डॉक्टरी और सामाजिक हस्तक्षेप को उत्पीड़ित भारतीयों के निजी आईनों में उतारते हैं, वहीं पार्थ चटर्जी राष्ट्रवादी नज़रिए में भारतीय महिला की भूमिका की पैनी समीक्षा करते हैं। इस संकलन के लेख अन्य प्रश्न भी उठाते हैं। अधिकृत ऐतिहासिक महानायकों के उद्घोषों, कारनामों और संस्मरण पोथियों के बरक्स किस प्रकार वैकल्पिक इतिहास का सृजन मुमकिन है? लोक, व्यक्तिगत, या फिर पारिवारिक याददाश्त के ज़रिए ‘सर्वविदित' घटनाओं को कैसे नए सिरे से आँका जाए? हिन्दी में नए इतिहास-लेखन का क्या स्वरूप हो? नए इतिहास की भाषा क्या हो? ऐसे अहम सवालों से जूझते हुए ये लेख हिन्दी पाठकों के लिए अद्वितीय सामग्री का संयोजन करते हैं।
Karmayogi Sannyasi Yogi Adityanath
- Author Name:
Rahees Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Arya Evam Hadappa Sanskritiyon Ki Bhinnata
- Author Name:
Ramsharan Sharma
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक आर्य एवं हड़प्पा सभ्यता का एक गहन अध्ययन है। इसमें प्रो. शर्मा ने आर्यों के मूल स्थान की खोज की कोशिश के साथ-साथ ज़्यादा ज़ोर इन सभ्यताओं के सांस्कृतिक पहलू पर दिया है।
लेखक ने अपने अध्ययन के दौरान इस पुस्तक में आर्य एवं हड़प्पा संस्कृतियों की भिन्नता को दर्शाया है। लेखक का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता नगरी है लेकिन वैदिक सभ्यता में नगर का कोई चिह्न नहीं है। कांस्य युग का हड़प्पा सभ्यता में प्रमाण मिलता है। हड़प्पा में लेखन-कला प्रचलित थी लेकिन वैदिक युग में लेखन-कला का कोई प्रमाण नहीं है।
अपनी सूक्ष्म विश्लेषण-दृष्टि और अकाट्य तर्कशक्ति के कारण यह कृति भी लेखक की पूर्व-प्रकाशित अन्य कृतियों की तरह पठनीय और संग्रहणीय होगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Hitopadesh Ki Kahaniyan
- Author Name:
Shyamji Verma
- Book Type:

- Description: "मानवजाति के विकास का मूल अधिकार ही मानवाधिकार है। मानवाधिकारों के विश्वव्यापी घोषणा-पत्र में नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा सांस्कृतिक अधिकारों पर 30 अनुच्छेद हैं। भारत के संविधान के अंतर्गत मानवीय मूल्यों का विकास और मानव के सम्मान की रक्षा हो सके, यह मानवाधिकार आयोग के कार्यक्षेत्र में है। विश्व समुदाय में शांति, सद्भाव, भाईचारा बना रहे और वह अपनी निजता के साथ अपने नैसर्गिक अधिकारों का उपयोग कर सके, इस बात को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर, 1948 को मानवाधिकारों के विश्वव्यापी घोषणा-पत्र को स्वीकार किया गया। ऐसे सभी अधिकार, जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता एवं प्रतिष्ठा से जुड़े हैं, भारतीय संविधान के भाग-3 में मूलभूत अधिकारों के रूप में वर्णित हैं। इसके अतिरिक्त ऐसे अधिकार, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा मान्यता प्राप्त है, मानवाधिकार कहा गया है। मानवाधिकारों का सही ढंग से संरक्षण हो और उसका उल्लंघन करनेवालों को दंडित किया जाए, इस उद्देश्य से मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया है। आयोग को मुख्यत: मानवाधिकारों के संरक्षण, प्रशासन व्यवस्था में सुधार आदि की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पीड़ित व्यक्ति आयोग के माध्यम से अपने अधिकारों का संरक्षण कर सकता है। मानवाधिकार आयोग समाज में मानवाधिकारों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता जाग्रत् करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। प्रस्तुत पुस्तक आम जन को इस विषय में विस्तृत जानकारी देने का विनम्र प्रयास है। "
Vishwa Itihas Ki Bhumika
- Author Name:
Ramsharan Sharma
- Book Type:

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Description:
पृथ्वी की आयु चार अरब साठ करोड़ वर्ष से ज़्यादा मानी गई है और पृथ्वी तल पर जीवन की उत्पत्ति कोई तीन अरब पचास करोड़ वर्ष पहले। 15-20 लाख वर्ष पहले पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका में प्रथम मानव कहे जानेवाले ‘होमो हैविलिस’ का आविर्भाव हुआ तथा ‘होमो सेपीयन्स’ का दक्षिणी अफ्रीका में जन्म 1,15,000 वर्ष पूर्व हुआ। आधुनिक मनुष्य का उद्भव इसी से माना जाता है, जिसका इतिहास पुरापाषाण युग (6 लाख वर्ष ई.पू. से 10 हजार ई.पू.) से आरम्भ होता है, और हम तक आता है।
प्रख्यात इतिहासकार रामशरण शर्मा और कृष्णकुमार मंडल की यह पुस्तक हमें इस पूरी इतिहास-यात्रा का संक्षिप्त, लेकिन सारगर्भित और सप्रमाण ब्यौरा उपलब्ध कराती है। आदिम सभ्यता से लेकर यूरोप के धर्मसुधार के समय तक चरणबद्ध रूप में लिखा गया यह इतिहास सिर्फ़ राजनीतिक घटनाओं तक सीमित नहीं है, इसमें विज्ञान, समाज और दर्शन के क्षेत्र में होनेवाले वैचारिक परिवर्तनों तथा उद्भावनाओं के रास्ते से भी विश्व की प्रगति को समझा गया है।
इतिहास के जिन महत्त्वपूर्ण चरणों का विवरण इस पुस्तक में समाहित है, वे हैं : आदिम सभ्यता, प्राचीन मिस्र की सभ्यता, शहरी सभ्यताओं का उदय, पहली सहस्राब्दी ई.पू. के धर्मसुधार-आन्दोलन, यूनान, रोम और प्राचीन भारत की सभ्यता, इस्लाम का उदय और प्रसार, सामन्त प्रथा और मध्यकालीन यूरोप, यूरोप का रेनेसाँ और धर्मसुधार।
पुस्तक की विशेषता है रोचक उपशीर्षकों के माध्यम से प्रत्येक कालखंड के क्रम-विकास का रेखांकन जिससे इसे न सिर्फ़ पढ़ना रुचिकर हो जाता है, बल्कि सम्बन्धित विषय की जानकारी तक भी सुगमतापूर्वक पहुँचा जा सकता है। इतिहास के जिज्ञासुओं तथा विद्यार्थियों के लिए अत्यन्त उपयोगी पुस्तक।
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