Rebels Against the Raj
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Rebels Against the Raj tells the story of seven people who chose to struggle for a country other than their own: foreigners to India who across the late 19th to late 20th century arrived to join the freedom movement fighting for independence from British colonial rule. Of the seven, four were British, two American, and one Irish. Four men, three women. Before and after being jailed or deported they did remarkable and pioneering work in a variety of fields: journalism, social reform, education, the emancipation of women, environmentalism. This book narrates their stories, each renegade motivated by idealism and genuine sacrifice; each connected to Gandhi, though some as acolytes where others were often infuriated by his views ; each understanding they would likely face prison sentences for their resistance, and likely live and die in India; each one leaving a profound impact on the region in which they worked, their legacies continuing through the institutions they founded and the generations and individuals they inspired. Through these entwined lives, wonderfully told by one of the world's finest historians, we reach deep insights into relations between India and the West, and India's story as a country searching for its identity and liberty beyond British colonial rule.
Read moreAbout the Book
Rebels Against the Raj tells the story of seven people who chose to struggle for a country other than their own: foreigners to India who across the late 19th to late 20th century arrived to join the freedom movement fighting for independence from British colonial rule.
Of the seven, four were British, two American, and one Irish. Four men, three women. Before and after being jailed or deported they did remarkable and pioneering work in a variety of fields: journalism, social reform, education, the emancipation of women, environmentalism.
This book narrates their stories, each renegade motivated by idealism and genuine sacrifice; each connected to Gandhi, though some as acolytes where others were often infuriated by his views
; each understanding they would likely face prison sentences for their resistance, and likely live and die in India; each one leaving a profound impact on the region in which they worked, their legacies continuing through the institutions they founded and the generations and individuals they inspired.
Through these entwined lives, wonderfully told by one of the world's finest historians, we reach deep insights into relations between India and the West, and India's story as a country searching for its identity and liberty beyond British colonial rule.
Book Details
-
ISBN9780143464372
-
Pages496
-
Avg Reading Time17 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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2014 और 2019 के चुनाव नतीजे संघ को सुकून दे रहे थे, क्योंकि तीन पीढ़ी खपाने के बाद उसकी वैचारिक उड़ान को पंख लग गए थे। इस मुकाम तक पहुँचने के लिए संघ को 1998- 2004 में अपनी ही सरकार से टकराव मोल लेना पड़ा था। आर्थिक और राजनैतिक मसलों पर वाजपेयी सरकार के समय लड़ाई सार्वजनिक थी। असमंजस के माहौल में हुए 2004 के आम चुनाव में भाजपा सत्ता से बाहर हो गई; अगले एक दशक तक पार्टी में जबरदस्त कोहराम मचा। तमाम झंझावातों के बाद 2009 में आडवाणी पी.एम. इन वेटिंग बने। लेकिन कलह ऐसी थी, मानो 15वीं नहीं 16वीं लोकसभा की लड़ाई हो रही हो। इसी बीच संघ में पीढ़ी परिवर्तन हुआ और मोहन भागवत सरसंघचालक बने, फिर विचार-परिवार में भी पीढ़ी परिवर्तन का खाका बना। भाजपा में दूसरी पीढ़ी में जद्दोजहद के बाद विचारधारा के प्रहरी के तौर पर नरेंद्र मोदी उभरे । संघ की सलाह पर पार्टी मोदी युग में प्रवेश कर गई। उसके बाद विचार-परिवार ने समन्वय का ऐसा खाका खींचा कि अटल सरकार की कड़वाहट सदा के लिए अतीत के पन्नों में समा गई। संवाद और समन्वय विचार-परिवार का मंत्र बना, तो मोदी ने भी संवाद का मैकेनिज्म बना समन्वय को गति दी। नतीजा हुआ कि अनुकूल सरकार का लाभ उठा, संघ और भाजपा दोनों ने अपना सामाजिक आधार बढ़ाया। यह पुस्तक संघ, सरकार और समन्वय की उन सभी कहानियों की बारीकियों को परत-दर-परत सामने रखती है। 2014 से संघ-भाजपा के बीच समन्वय एक मिसाल है, जिसने दोनों का न सिर्फ आधार बढ़ाया, बल्कि 2014 से भी बड़ी जीत की जमीन तैयार करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई ।
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7 मार्च, 2011 को मैनहैटन के एक आला दर्जे के रेस्टोरेंट में विशेष लंच का आयोजन था। संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून और उनकी पूरी ए-टीम मौजूद थी। जल्दी ही स्पष्ट हो गया कि चर्चा का मुख्य विषय लीबिया था, जहाँ कथित रूप से मुअम्मर गद्दाफी की सेना विद्रोहियों के गढ़ बेंगाजी की ओर पूरे विपक्ष को कुचलने के लिए तेजी से बढ़ रही थी। प्रति व्यक्ति 80 डॉलर के इस लंच पर सुरक्षा परिषद् में प्रतिनिधित्व करनेवाले देशों के दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण कूटनीतिज्ञों का एक छोटा समूह बल प्रयोग पर चर्चा कर रहा था, जो कहने को तो नागरिकों की सुरक्षा के लिए था, लेकिन वास्तव में उसका मकसद सत्ता-परिवर्तन करना था। बात आगे बढ़ी और महज दस दिन बाद परिषद् की मंजूरी मिल गई, और फिर सबकुछ बेकाबू हो गया। संयुक्त राष्ट्र में भारत के तत्कालीन राजदूत, हरदीप पुरी परिषद् के मनमाने फैसले लेने के ढंग और इसके कुछ स्थायी सदस्यों में बिना सोचे-समझे दखलंदाजी की मची रहनेवाली बेचैनी का खुलासा करते हैं। संकटपूर्ण हस्तक्षेप दिखाता है कि केवल लीबिया और सीरिया ही नहीं, बल्कि यमन और क्रीमिया में बल प्रयोग के फैसले विनाशकारी रूप से गलत साबित हुए। वरिष्ठ राजनयिक हरदीप पुरी इस प्रवृत्ति पर प्रकाश डालते हैं, जिसके अंतर्गत हस्तक्षेप करनेवाले देश अपने हित को साध लेने के बाद मुँह मोड़ लेते हैं। वह हस्तक्षेपों और सत्ता-परिवर्तन के प्रयासों के विरुद्ध चेतावनी देने की भारत की भूमिका को भी स्पष्ट करते हैं। संयम और सावधानी के पथ पर चलते हुए, संकटपूर्ण हस्तक्षेप दुनिया के ताकतवर देशों को उनके बुरे कर्मों की याद दिलाती है और वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था में सुधार की माँग करती है।
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