Hindi Sahitya Ka Samagra Itihas
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हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास’ पुस्तक नए अनुसन्धानों, विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में समाज सापेक्षता तथा कला-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत की गई है। इसमें हिन्दी भाषी प्रान्तों के अलावा अन्य प्रान्तों में रहनेवाले, हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता लेखकों एवं कवियों की रचनाओं को समाहित किया गया है। नई विधाओं जैसे हिन्दी गज़ल, नवगीत, अनुगीत, हाइकू के रचना-शिल्प पर समुचित प्रकाश डाला गया है। स्वतंत्रता के बाद के ऐसे रचनाकारों की रचनाओं पर विचार किया गया है जो आन्दोलनों से न जुड़कर स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। रचनाकारों तथा रचनाओं का मूल्यांकन दुराग्रहमुक्त होकर निष्पक्ष भाव से किया गया है। हिन्दी और उर्दू का गहरा रिश्ता है, अतः हिन्दी के अध्येताओं को उर्दू साहित्य से भी परिचित होना चाहिए, इसी दृष्टि से उर्दू साहित्य का अति संक्षिप्त इतिहास दर्शाया गया हैं। समकालीन अनेक रचनाओं को शामिल किया गया है जो साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं किन्तु साहित्येतिहासों में जिनकी उपेक्षा की गई है। आधुनिक युग में ब्रज तथा अवधी साहित्य की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला गया है। विवेचन की भाषा-शैली स्पष्ट, सुबोध तथा निष्पक्ष है। हिन्दी साहित्य के समग्र इतिहास में काव्य-प्रवृतियों का अभिनव दृष्टि से मूल्यांकन किया गया है। नए विमर्शों तथा पुनर्पाठ की दृष्टि से नई सामग्री का समावेश भी किया गया है। हिन्दी ग़ज़ल, हाइकू, बोलियों के साहित्य को भी यथास्थान अंकित किया गया है।
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हिन्दी साहित्य का समग्र इतिहास’ पुस्तक नए अनुसन्धानों, विमर्शों के परिप्रेक्ष्य में समाज सापेक्षता तथा कला-मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत की गई है। इसमें हिन्दी भाषी प्रान्तों के अलावा अन्य प्रान्तों में रहनेवाले, हिन्दीतर भारतीय भाषाओं के प्रयोक्ता लेखकों एवं कवियों की रचनाओं को समाहित किया गया है।
नई विधाओं जैसे हिन्दी गज़ल, नवगीत, अनुगीत, हाइकू के रचना-शिल्प पर समुचित प्रकाश डाला गया है।
स्वतंत्रता के बाद के ऐसे रचनाकारों की रचनाओं पर विचार किया गया है जो आन्दोलनों से न जुड़कर स्वतंत्र लेखन कर रहे थे। रचनाकारों तथा रचनाओं का मूल्यांकन दुराग्रहमुक्त होकर निष्पक्ष भाव से किया गया है।
हिन्दी और उर्दू का गहरा रिश्ता है, अतः हिन्दी के अध्येताओं को उर्दू साहित्य से भी परिचित होना चाहिए, इसी दृष्टि से उर्दू साहित्य का अति संक्षिप्त इतिहास दर्शाया गया हैं। समकालीन अनेक रचनाओं को शामिल किया गया है जो साहित्यिक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं किन्तु साहित्येतिहासों में जिनकी उपेक्षा की गई है। आधुनिक युग में ब्रज तथा अवधी साहित्य की प्रवृत्तियों पर प्रकाश डाला गया है। विवेचन की भाषा-शैली स्पष्ट, सुबोध तथा निष्पक्ष है। हिन्दी साहित्य के समग्र इतिहास में काव्य-प्रवृतियों का अभिनव दृष्टि से मूल्यांकन किया गया है। नए विमर्शों तथा पुनर्पाठ की दृष्टि से नई सामग्री का समावेश भी किया गया है। हिन्दी ग़ज़ल, हाइकू, बोलियों के साहित्य को भी यथास्थान अंकित किया गया है।
Book details
- Format
- Paperback
- Publisher
- Rajkamal Prakashan Samuh
- Edition
- 2nd
- Publication year
- 2019
- Weight
- 475 grams
- ISBN-13
- 9789388211338
- Pages
- 487
- Reading time
- ~16 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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यह किताब कश्मीर के उथल-पुथल भरे इतिहास में कश्मीरी पंडितों के लोकेशन की तलाश करते हुए उन सामाजिक-राजनैतिक प्रक्रियाओं की विवेचना करती है जो कश्मीर में इस्लाम के उदय, धर्मान्तरण और कश्मीरी पंडितों की मानसिक-सामाजिक निर्मिति तथा वहाँ के मुसलमानों और पंडितों के बीच के जटिल रिश्तों में परिणत हुईं। साथ ही, यह किताब आज़ादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुए उन अन्तर्विरोधों की भी पहचान करती है जिनसे आज़ाद भारत में कश्मीर, जम्मू और शेष भारत के बीच बने तनावपूर्ण सम्बन्धों और इस रूप से कश्मीर घाटी के भीतर पंडित-मुस्लिम सम्बन्धों ने आकार लिया। नब्बे के दशक में पंडितों के विस्थापन के लिए ज़िम्मेदार परिस्थितियों की विस्तार से विवेचना करते हुए यह किताब विस्थापित पंडितों के साथ ही उन कश्मीरी पंडितों से संवाद स्थापित करती है जिन्होंने कभी कश्मीर नहीं छोड़ा, और उनके वर्तमान और भविष्य के आईने में कश्मीर को समझने की कोशिश करती है। धारा 370 हटाए जाने से पहले और बाद में, दोनों स्थितियों में, घाटी में रह रहे पंडितों के आख्यान को शामिल करनेवाली यह पहली किताब है जिसके लिए लेखक ने कश्मीर के विभिन्न इलाक़ों में यात्राएँ की हैं और पंडित परिवारों से विस्तार से बातचीत की है।
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
Ashok Kumar Pandey
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
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महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Bharat Ka Samvidhan : Sankshipt Parichay
- Author Name:
Subhash Kashyap
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लोकतंत्र में हर नागरिक को अपने देश के संविधान को जानना चाहिए और समझना चाहिए कि वह किस प्रकार शासित हो रहा है। संविधान के मूल कर्तव्य सम्बन्धी भाग के अनुसार हर नागरिक का सबसे पहला कर्तव्य है संविधान का पालन करना। परन्तु उसका पालन करने के लिए संविधान को जानना ज़रूरी है। दुर्भाग्यवश हमारे देश में आज भी भयंकर संवैधानिक निरक्षरता है। ऐसी स्थिति में संविधान के बारे में जानकारी के प्रचार-प्रसार के लिए जो भी किया जा सके देश हित में होगा। इसी भावना के साथ सरल और सुगम शब्दों में लिखी गई यह संक्षिप्त पुस्तिका हमारे संविधान का संक्षिप्त परिचय देती है।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है। इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते? इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है। साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
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