Dastan Mughal Badshahon Ki
(0)
Author:
Heramb ChaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
250
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इतिहास के समकालीन पन्ने भी सामान्य पाठक और हिन्दी माध्यम वाले छात्रों के लिए खुलें तो इतिहास के अवसान की घोषणा करनेवालों की आवाज़ मन्द ही नहीं पड़ेगी, अपितु बन्द ही हो जाएगी। इतिहास नई ताज़गी के साथ जीवित रहे, उसके लिए भी वापस उसी विषय की निगाह से उसे फिर देखा जाए, जिसके साथ वह 19वीं सदी तक चलता रहा था, जब तक इसका वर्गीकरण इस प्रकार से नहीं हुआ था। मॉमसेन के विषय में हम सब जानते हैं जिस इतिहासकार को उसकी कृति रोम के इतिहास पर 20वीं सदी के पहले दशक के अन्त में साहित्य का ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला था, उसी तरह का इतिहास दिलचस्प भी होगा और अपने तथ्यों के साथ ईमानदार भी होगा।
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इतिहास के समकालीन पन्ने भी सामान्य पाठक और हिन्दी माध्यम वाले छात्रों के लिए खुलें तो इतिहास के अवसान की घोषणा करनेवालों की आवाज़ मन्द ही नहीं पड़ेगी, अपितु बन्द ही हो जाएगी। इतिहास नई ताज़गी के साथ जीवित रहे, उसके लिए भी वापस उसी विषय की निगाह से उसे फिर देखा जाए, जिसके साथ वह 19वीं सदी तक चलता रहा था, जब तक इसका वर्गीकरण इस प्रकार से नहीं हुआ था। मॉमसेन के विषय में हम सब जानते हैं जिस इतिहासकार को उसकी कृति रोम के इतिहास पर 20वीं सदी के पहले दशक के अन्त में साहित्य का ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला था, उसी तरह का इतिहास दिलचस्प भी होगा और अपने तथ्यों के साथ ईमानदार भी होगा।
Book Details
-
ISBN9789388211482
-
Pages183
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Shravasti
- Author Name:
Pawan Bakshi
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Description:
श्रावस्ती कोसल का प्रमुख नगर था। इसे बुद्धकालीन भारत के छह महानगरों—चंपा, राजगृह, श्रावस्ती, साकेत, कोशांबी और वाराणसी में से एक माना जाता था।
आज से डेढ़ सौ वर्ष पूर्व यह क्षेत्र अत्यंत वनाच्छादित था जिसके चलते स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती एक प्रमुख पड़ाव हुआ करता था और आंदोलनकारियों के लिए विशेष रूप से सुरक्षित माना जाता था। इस कारण और यहाँ के सामान्य जन की स्वातंत्र्य-चेतना के कारण आजादी के आंदोलन में इसकी महती भूमिका रही। 1857 में अंग्रेजों को बहराइच में कड़ा विरोध झेलना पड़ा। यहाँ के सभी छोटे ताल्लुकेदार खुलकर उनके विरुद्ध खड़े हो गए थे। इकौना रियासत का योगदान इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों में दर्ज है। वीरांगना रानी ईश्वरी देवी का संघर्ष भी एक उल्लेखनीय घटना थी।
इस पुस्तक में स्वतंत्रता आंदोलन में श्रावस्ती जिले की भूमिका को तथ्यों के साथ स्पष्ट किया गया है। साथ ही यहाँ के भौगोलिक व सांस्कृतिक महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।
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