Das Saal : Jinse Desh Ki Siyasat Badal Gai
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Author:
Sudeep ThakurPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
299
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भारत ने 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेज़ी राज से मुक्त होने के बाद संसदीय लोकतंत्र का रास्ता चुना और 1970 का दशक इस यात्रा का एक अहम पड़ाव था जिसका दूरगामी असर देश की सियासत, शासन पद्धति और कुल मिलाकर देश की जनता पर पड़ा।</p> <p>सत्तर के दशक को ‘इन्दिरा का दशक’ भी कहा जा सकता है। वह 1971 में गरीबी हटाओ के सियासी नारे के साथ पूरे दमखम सत्ता में लौटीं थीं। बांग्लादेश युद्ध में मिली कामयाबी ने इन्दिरा गांधी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया और फिर वह एक-एक कर साहसिक फैसले करती चली गईं, जिनमें प्रिवी पर्स की समाप्ति और कोयले का राष्ट्रीयकरण शामिल हैं। इसी दौर में जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की अगुआई में हुए छात्र आन्दोलन ने इन्दिरा के लिए अभूतपूर्व चुनौतियाँ पेश की, जिसकी परिणति देश ने आपातकाल के रूप में देखी। आपातकाल ने नागरिक आजादी को संकट में डाल दिया था। इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नए सिरे से उभार भी दिखा।</p> <p>आजादी के पचहत्तरवें साल में प्रकाशित यह किताब सत्तर के दशक के ऐसे ही पन्नों को खोलती है और उन पर नई रोशनी डालती है। अनुभवी पत्रकार सुदीप ठाकुर की यह शोधपरक किताब रोचकता से भरपूर है; और निष्पक्षता से हमारे लोकतंत्र के एक अहम दशक की पड़ताल करती है, जब कमोबेश वैसे ही सवाल आज हमारे सामने खड़े हैं।
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भारत ने 15 अगस्त, 1947 को अंग्रेज़ी राज से मुक्त होने के बाद संसदीय लोकतंत्र का रास्ता चुना और 1970 का दशक इस यात्रा का एक अहम पड़ाव था जिसका दूरगामी असर देश की सियासत, शासन पद्धति और कुल मिलाकर देश की जनता पर पड़ा।</p>
<p>सत्तर के दशक को ‘इन्दिरा का दशक’ भी कहा जा सकता है। वह 1971 में गरीबी हटाओ के सियासी नारे के साथ पूरे दमखम सत्ता में लौटीं थीं। बांग्लादेश युद्ध में मिली कामयाबी ने इन्दिरा गांधी को लोकप्रियता के शिखर पर पहुँचा दिया और फिर वह एक-एक कर साहसिक फैसले करती चली गईं, जिनमें प्रिवी पर्स की समाप्ति और कोयले का राष्ट्रीयकरण शामिल हैं। इसी दौर में जयप्रकाश नारायण और मोरारजी देसाई की अगुआई में हुए छात्र आन्दोलन ने इन्दिरा के लिए अभूतपूर्व चुनौतियाँ पेश की, जिसकी परिणति देश ने आपातकाल के रूप में देखी। आपातकाल ने नागरिक आजादी को संकट में डाल दिया था। इसी दौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नए सिरे से उभार भी दिखा।</p>
<p>आजादी के पचहत्तरवें साल में प्रकाशित यह किताब सत्तर के दशक के ऐसे ही पन्नों को खोलती है और उन पर नई रोशनी डालती है। अनुभवी पत्रकार सुदीप ठाकुर की यह शोधपरक किताब रोचकता से भरपूर है; और निष्पक्षता से हमारे लोकतंत्र के एक अहम दशक की पड़ताल करती है, जब कमोबेश वैसे ही सवाल आज हमारे सामने खड़े हैं।
Book Details
-
ISBN9789394902107
-
Pages232
-
Avg Reading Time8 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘‘कवि कमलेश हमारे समय के सबसे पढ़े-लिखे व्यक्ति थे, हालाँकि उन्होंने कभी विद्वता का कोई दावा नहीं किया। उनकी रुचि साहित्य के अलावा संस्कृति और विचार के अनेक अनुशासनों जैसे—दर्शन, मनोविज्ञान, नृतत्त्व आदि में थी। महान् रूसी कवियों और उनके माध्यम से रूसी संस्कृति की उद्भव-गाथा और उसके विनाश की शोक-कथा प्रस्तुत करनेवाली यह अनूठी पुस्तक है। इसमें कवियों का सिर्फ़ वैचारिक विश्लेषण भर नहीं है—कविताओं का हिन्दी अनुवाद भी है। किसी विदेशी भाषा के इतने सारे महान् कवियों और उनके माध्यम से किसी देश की संस्कृति के अध्ययन का ऐसा कोई दूसरा उदाहरण हिन्दी में तो क्या शायद किसी अन्य भारतीय भाषा में भी न होगा। इस अद्वितीय पुस्तक को रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।
—अशोक वाजपेयी
Khandhar Bolte Hai
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

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किसी देश के इतिहास और सांस्कृतिक विकास-क्रम को जानने-समझने में अन्य स्रोतों के साथ ऐतिहासिक इमारतों और क़िलों का भी ख़ासा योगदान होता है। वे हमारे लिए अतीत का साक्षात् आईना होते हैं।
इतिहास, पुरातत्त्व, पुरालिपि और मुद्राशास्त्र के उद्भट विद्वान और विज्ञान को सरल भाषा में सामान्य पाठक के लिए सुगम बनानेवाले जनप्रिय लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक हमें उन खँडहरों की यात्रा पर ले जाती है, जिनमें हमारे इतिहास की लोमहर्षक गाथाएँ छिपी हैं।
कौन-सा क़िला कब अस्तित्व में आया, उसका निर्माण किसने कराया, वह किन युद्धों का साक्षी रहा, इन सब तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी के साथ यह पुस्तक तत्कालीन राजवंशों के चित्रों, उस समय प्रयोग में आनेवाले अस्त्रों, क़िलों की बनावट, निर्माण कला और हवेलियों आदि का भी सम्यक् ब्यौरा उपलब्ध कराती है। बीच-बीच में नक़्शों के द्वारा भी विषय को स्पष्ट किया गया है।
कहना न होगा कि इतिहास के रोमांचक गलियारों का रहस्य खोलती यह पुस्तक न सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
Chandrashekhar Ke Bare Mein
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

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Description:
‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है।
संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है।
नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
Hinduon Ki Sangharsh Gatha
- Author Name:
Laxmi Narain Agarwal
- Book Type:

- Description: "वास्तव में पाकिस्तान न कोई देश है और न राष्ट्र; यह केवल हिंदू विरोधी उग्र इस्लामी मानसिकता का गढ़ है। सन् 1947 में हुआ बँटवारा कोई दो भाइयों के बीच हुआ जमीन का बँटवारा नहीं था, यह हिंदुओं के प्रति इस्लाम के अनुयायी कट्टरपंथी मुल्लाओं की तीव्र घृणा का परिणाम था। आज समय की आवश्यकता तो यह है कि स्वयं मुस्लिम भी इस्लाम की गिरफ्त से बाहर निकलें, लेकिन यह मुस्लिम समुदाय में बहुत बड़ी क्रांति से ही संभव है, पर जब तक यह नहीं होता, तब तक हिंदुओं को समझ लेना चाहिए कि इस्लाम के सीधे निशाने पर केवल हिंदू हैं। आज यह बात ठीक से समझ लेने की जरूरत है कि इस्लाम का जन्म ही मूर्तिपूजा और बहुदेववाद को नष्ट करने के लिए हुआ है। उसके धर्मांध अनुयायियों ने भी मूर्तिपूजकों को जड़ से समाप्त करने का बीड़ा उठा रखा है। दुनिया में ईसाई और मुसलिम एक ही परंपरा की उपज हैं, इसलिए लाख शत्रुता के बाद भी एक-दूसरे के लिए उनके दिल में स्थान है। इसीलिए हिंदू दोनों के ही निशाने पर है। प्रस्तुत पुस्तक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इस्लाम का परिचय कराने के साथ-साथ हिंदुओं के संघर्ष को इस तरह पेश करती है कि सामान्य पाठक भी उसे सहज ही समझ ले। इस्लाम का यथातथ्य पूरी बेबाकी के साथ परिचय करानेवाली हिंदी की यह शायद पहली पुस्तक है। इसमें काफी साहसपूर्ण ढंग से अनेक ऐसे सत्य उद्घाटित किए गए हैं, जिनको जानना किसी भी जागरूक भारतीय के लिए आवश्यक है।"
1971 Bharat Pak Yuddha
- Author Name:
Lt Gen K K Nanda
- Book Type:

- Description: 1971 का भारत-पाक युद्ध सन् 1971 के अंत तक याह्या खाँ पूरी तरह से विश्वस्त हो चुके थे कि भारत के साथ पूर्व में युद्ध करना अनिवार्य हो चुका है। वे इस बात को लेकर भी विश्वस्त थे कि उनके लिए भारतीय सेनाओं को पराजित करना संभव नहीं है तथा वे पूर्वी पाकिस्तान का बलिदान करने के लिए तैयार थे। वहीं उन्हें यह भी विश्वास था कि वे पश्चिम में एक विशाल क्षेत्र पर कब्जा करके पूर्वी पाकिस्तान की क्षतिपूर्ति कर लेंगे तथा इसके द्वारा ‘वे न केवल भारत को नीचा दिखाने और अपना सम्मान बनाए रखने में सफल रहेंगे, अपितु युद्ध के अंत में अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में होंगे।’ परंतु सन् 1971 में भारत के जाँबाज सैनिकों ने पाकिस्तान के नब्बे हजार सैनिकों को बंदी बनाकर ऐसा करिश्मा कर दिखाया, जो सारी दुनिया में बेजोड़ था। इस पुस्तक में 1971 की शानदार विजय की गौरव गाथा के साथ-साथ उड़ी क्षेत्र में सन् 1947-48 तथा 1965 के दौरान 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड एवं अन्य सैन्य टुकड़ियों के द्वारा उनके नियंत्रण-क्षेत्रों में उनके द्वारा किए गए सैन्य अभियानों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया है। लेफ्टिनेंट जनरल के.के. नंदा ने अपनी 161 इन्फैंट्री ब्रिगेड का नेतृत्व करते हुए रक्षात्मक युद्ध लड़ा और अपनी बहादुरी एवं दूरदर्शिता से भारत की एक इंच भूमि भी दुश्मन के कब्जे में नहीं जाने दी। प्रस्तुत पुस्तक का अपना सामरिक महत्त्व है। भविष्य में युद्धों की योजना बनाते समय विभिन्न स्तरों के कमांडर इसके विवरणों से भरपूर लाभ उठाएँगे तथा भारत की सीमाओं की रक्षा में प्राणपण से सफल होंगे।
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