Modi Ka Vikasnama
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श्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप गुजरात को आदर्श राज्य बनाने के लिए काम किया तथा सफलता हासिल की, और वह भी मात्र बारह-तेरह साल की अवधि में। शासन के विभिन्न मोरचों पर आधुनिक एवं नवीन प्रयास तथा रणनीतियाँ शुरू करके उन्होंने गुजरात राज्य का चेहरा ही बदल दिया और उसे भारत के सभी राज्यों में शीर्ष स्थान पर ला दिया। नरेंद्र मोदी के विकास कार्यों को कसौटी पर कसने के दौरान लेखक को कुछ प्रश्नों ने उद्वेलित किया— —क्या भारत विकसित देश बन सकता है? —हमारी मातृभूमि प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, फिर हम क्यों लड़खड़ा रहे हैं? —हम भ्रष्टाचार में क्यों डूबे हैं? —बड़ी संख्या में भारतीय गरीबी में क्यों फँसे हैं? लेखक को उपर्युक्त सब प्रश्नों के उत्तर अपनी तलाश के दौरान मिल गए। मोदी के प्रयास न केवल हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं, बल्कि यह भी विश्वास दिलाते हैं कि भारत विश्व के देशों के बीच पूर्ण विकसित राष्ट्र बन सकता है। प्रतिबद्ध नेतृत्व यदि निश्चित भविष्यगामी सोच के साथ योजनाएँ और परियोजनाएँ बनाएगा, तो इन प्रश्नों का समाधान मिलेगा, उनका निदान होगा। ‘मोदी का विकासनामा’ पुस्तक न तो नरेंद्र मोदी की जीवनी है, न कोई चुनाव घोषणा-पत्र और न ही प्रायोजित लेखन। आँकड़ों की बाजीगरी से ऊपर उठकर ठोस और यथार्थ पर आधारित नरेंद्र मोदी के विकासक्रम की प्रेरक कहानी।
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श्री नरेंद्र मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप गुजरात को आदर्श राज्य बनाने के लिए काम किया तथा सफलता हासिल की, और वह भी मात्र बारह-तेरह साल की अवधि में। शासन के विभिन्न मोरचों पर आधुनिक एवं नवीन प्रयास तथा रणनीतियाँ शुरू करके उन्होंने गुजरात राज्य का चेहरा ही बदल दिया और उसे भारत के सभी राज्यों में शीर्ष स्थान पर ला दिया।
नरेंद्र मोदी के विकास कार्यों को कसौटी पर कसने के दौरान लेखक को कुछ प्रश्नों ने उद्वेलित किया—
—क्या भारत विकसित देश बन सकता है?
—हमारी मातृभूमि प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर है, फिर हम क्यों लड़खड़ा रहे हैं?
—हम भ्रष्टाचार में क्यों डूबे हैं?
—बड़ी संख्या में भारतीय गरीबी में क्यों फँसे हैं? लेखक को उपर्युक्त सब प्रश्नों के उत्तर अपनी तलाश के दौरान मिल गए। मोदी के प्रयास न केवल हमें भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं, बल्कि यह भी विश्वास दिलाते हैं कि भारत विश्व के देशों के बीच पूर्ण विकसित राष्ट्र बन सकता है। प्रतिबद्ध नेतृत्व यदि निश्चित भविष्यगामी सोच के साथ योजनाएँ और परियोजनाएँ बनाएगा, तो इन प्रश्नों का समाधान मिलेगा, उनका निदान होगा।
‘मोदी का विकासनामा’ पुस्तक न तो नरेंद्र मोदी की जीवनी है, न कोई चुनाव घोषणा-पत्र और न ही प्रायोजित लेखन। आँकड़ों की बाजीगरी से ऊपर उठकर ठोस और यथार्थ पर आधारित नरेंद्र मोदी के विकासक्रम की प्रेरक कहानी।
Book Details
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ISBN9789350486016
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Pages128
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Avg Reading Time4 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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- Description: झारखंड संघर्ष की धरती रही है। यहाँ के आदिवासियों ने अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता की पहली लड़ाई लड़ी थी। ‘झारखंड में विद्रोह का इतिहास’ नामक इस पुस्तक में 1767 से 1914 तक हुए संघर्ष का जिक्र है। धालभूम विद्रोह के संघर्ष से कहानी आरंभ होती है। उसके बाद चुआड़ विद्रोह, तिलका माझी का संषर्घ, कोल विद्रोह, भूमिज विद्रोह, संथाल विद्रोह, बिरसा मुंडा का उलगुलान आदि सभी संघर्ष-विद्रोहों के बारे में इस पुस्तक में विस्तार से चर्चा की गई है। संथाल विद्रोह के तुरंत बाद ही, यानी 1857 में झारखंड क्षेत्र में भी सिपाही विद्रोह हुआ। झारखंड के वीरों ने इस विद्रोह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। राजा अर्जुन सिंह, नीलांबर-पीतांबर, ठाकुर विश्वनाथ शाही, पांडेय गणपत राय, उमरांव सिंह टिकैत, शेख भिखारी आदि उस विद्रोह के नायक थे। इस पुस्तक में उनके संघर्ष के बारे में विस्तार से वर्णन किया गया है। पुस्तक में चानकु महतो, तेलंगा खडि़या, सरदारी लड़ाई, टाना भगतो के आंदोलन, गंगानारायण सिंह, बुली महतो से संघर्ष का भी जिक्र है। बिरसा मुंडा के एक सहयोगी गया मुंडा और उनके परिवार के संघर्ष का जीवंत विवरण दिया गया है। प्रयास है कि झारखंड के वीरों और उनके संघर्ष की जानकारी जन-जन तक पहुँचे और किसी भी विद्रोह का इतिहास छूट न जाए। इस पुस्तक की खासियत यह है कि सभी विद्रोहों-संघर्षों का प्रामाणिक विवरण एक जगह दिया गया है। झारखंड में जल-जंगल-जमीन का अधिकार, अपनी अस्मिता और भारत मुक्ति आंदोलन की लड़ाई को भी समाहित किया गया है, ताकि पुस्तक का क्षेत्र और व्यापक हो जाए।
1857 : Awadh Ka Muktisangram
- Author Name:
Akhilesh Mishra
- Book Type:

- Description: यशस्वी पत्रकार और विद्वान लेखक अखिलेश मिश्र की यह पुस्तक एक लुटेरे साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ अवध की जनता के मुक्ति-युद्ध की दस्तावेज़ है। अवध ने विश्व की सबसे बड़ी ताक़त ब्रिटेन का जैसा दृढ़ संकल्पित प्रतिरोध किया और इस प्रतिरोध को जितने लम्बे समय तक चलाया, उसकी मिसाल भारत के किसी और हिस्से में नहीं मिलती। पुस्तक 1857 की क्रान्ति में अवध की साँझी विरासत हिन्दू-मुस्लिम एकता को भी रेखांकित करती है। इस लड़ाई ने एक बार फिर इस बात को उजागर किया था कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की बुनियादें बहुत गहरी हैं और उन्हें किसी भेदनीति से कमज़ोर नहीं किया जा सकता। आन्दोलन की अगुवाई कर रहे मौलवी अहमदुल्लाह शाह, बेगम हजरत महल, राजा जयलाल, राणा वेणीमाधव, राजा देवी बख्श सिंह में कौन हिन्दू था, कौन मुसलमान? वे सब एक आततायी साम्राज्यवादी ताक़त से आज़ादी पाने के लिए लड़नेवाले सेनानी ही तो थे। इस मुक्ति-संग्राम का चरित प्रगतिशील था। न केवल इस संग्राम में अवध ने एक स्त्री बेगम हजरत महल का नेतृत्व खुले मन से स्वीकार किया, बल्कि हर वर्ग, वर्ण और धर्म की स्त्रियों ने इस क्रान्ति में अपनी-अपनी भूमिका पूरे उत्साह से निभाई, चाहे वह तुलसीपुर की रानी राजेश्वरी देवी हों अथवा कुछ वर्ष पूर्व तक अज्ञात वीरांगना के रूप में जानी जानेवाली योद्धा ऊदा देवी पासी। अवध के मुक्ति-संग्राम की अग्रिम पंक्ति में भले ही राजा, ज़मींदार और मौलवी रहे हों, लेकिन यह उनके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर लड़ रहे किसानों और आम जनता का जुझारूपन था जिसने सात दिनों के भीतर अवध में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया था। यह पुस्तक 1857 के जनसंग्राम के कुछ ऐसे ही उपेक्षित पक्षों को केन्द्र में लाती है। आज 1857 के जनसंग्राम को याद करना इसलिए ज़रूरी है कि इतिहास सिर्फ़ अतीत का लेखा-जोखा नहीं, वह सबक भी सिखाता है। आज भूमंडलीकरण के इस दौर में जब बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की लूट का जाल आम भारतीय को अपने फन्दे में लगातार कसता जा रहा है, ईस्ट इंडिया कम्पनी से लोहा लेनेवाले, उसे एक संक्षिप्त अवधि के लिए ही सही, पराजित करनेवाले वर्ष 1857 से हम बहुत कुछ सीख सकते हैं।
Bharat Ke Ateet Ki Khoj
- Author Name:
Virendra Kumar Pandey
- Book Type:

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Description:
भारतीय धर्म ग्रंथ यह स्पष्ट संदेश देते हैं कि आधुनिक इतिहासकार जिन्हें भारतीय आर्य कहते हैं वे प्रथमत: हिमालय के उस पार के पर्वतीय अंचल में रहते थे। सीमित संसाधन और बढ़ते जन-घनत्व के कारण यहाँ के लोग हिमालय के इस पार आने और बसने लगे। ये लोग मुख्य रूप से दो शाखाओं में बँटकर दो भिन्न कालों में आये। एक शाखा कश्मीर में (हिमालय के आर-पार) बसी और दूसरी शाखा सरस्वती एवं सिन्धु के मैदानी भागों में जगह-जगह आबाद हुई। इन्हीं लोगों ने तथाकथित सिन्धु घाटी सभ्यता को जन्म दिया।
पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार 3200-3100 ई.पू. में कश्मीर मंडल में एक महाप्रलय आया और बड़ी संख्या में लोग विस्थापित हुए। उनमें से एक समूह सरस्वती के पार कुरुक्षेत्र में अपना राज्य स्थापित किये। समय के साथ इनका राज्य पूरे भारत में फैल गया। इन्हीं लोगों ने सर्वप्रथम अपने को आर्य घोषित किया और इसी वंश के एक प्रतापी राजा भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। इस प्रकार आर्य और भारत दोनो समानार्थी शब्द हैं।
अतएव शब्द आर्य भारत की शाब्दिक सम्पत्ति है, इसे भारतीयों ने जन्म दिया, कभी प्रजाति के अर्थ में प्रयोग नहीं किया, इसे केवल श्रेष्ठता के अर्थ में प्रयोग किया जाता रहा है और इतिहास को इसी अर्थ में इसे संरक्षित करना चाहिए। इसलिए किसी अन्य देश का इसपर कोई दावा नहीं बनता है और न ही किसी इतिहासकार द्वारा किसी भी अन्य देश में आर्यों के मूल स्थान को ढूँढ़ने का आधार प्रदान करता है।
The DMK Years: Ascent, Descent, Survival
- Author Name:
R. Kannan
- Book Type:

- Description: On 17 September 1949, C.N. Annadurai (Anna) founded the DMK after his split with Periyar E.V. Ramaswamy. The DMK slowly but surely caught the imagination of the Tamil masses. In 1962, faced with the prospect of a ban, the party shed its separatist agenda and in 1967, the DMK attained power for the first time in Tamil Nadu. Since then, it has remained a potent political force, first under M. Karunanidhi and recently under M.K. Stalin, who succeeded him. Weathering many a political storm, including the 1972 split when its mascot, M.G. Ramachandran (MGR) broke away levelling corruption charges, its ejection from power in 1976 during the Emergency, the second dismissal in 1991 for its alleged dalliance with the Tamil Tigers of Sri Lanka, and the debilitating split in 1993, the party has proved resilient. It was voted back to power in Tamil Nadu in 2021. The DMK’s pioneering public distribution system and welfare populism have been a model for other states. Of late, the party has touted its ‘Dravidian Model’ of development as a viable national alternative. Its renewed emphasis on Tamil cultural nationalism and cooperative federalism aims to counter the current majoritarian political narrative. Yet, seventy-five years later, the DMK is more than ever under assault from caste and ultra-nationalist elements and persisting charges of unjust enrichment and dynastic politics. At this pivotal moment in history, as the ethos of Indianness is being redefined, veteran political observer and commentator R. Kannan explores the trajectory of the DMK and its future direction. Drawing on a substantial body of first-hand accounts, The DMK Years narrates the story of the party objectively and in its entirety, making this volume essential to understanding the contours of Tamil Nadu politics.
Jee...Vittamantri Jee...!
- Author Name:
Prakash Biyani
- Book Type:

- Description: Jee...Vittamantri Jee...!
Azadi Ke Apurva Anubhav
- Author Name:
Sachchidanand Sinha
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक मानव स्वतंत्रता का एक अध्ययन है। इस स्वतंत्रता सम्बन्धी विचार का विकास विभिन्न मुद्दों को लेकर चल रहे संघर्षों और उनके संस्थानीकरण से हुआ है। प्रारम्भ बिन्दु तो वह विचार ही है जो यह बतलाता है कि आज़ादी जीवन का एक आधारभूत सिद्धान्त है, इसलिए यह मनुष्य के लिए बिलकुल नैसर्गिक चीज़ है, इसे दबाया नहीं जा सकता। इस पुस्तक का लक्ष्य स्वतंत्रता का समावेशी इतिहास लिखना नहीं है, बल्कि इसके विकास की अत्यन्त संक्षिप्त रूपरेखा प्रस्तुत करना है। इसलिए उन कुछ लिपिबद्ध घटनाओं का वर्णन है जो इसके लक्ष्यों में से कुछेक की सिद्धि के रास्ते में निशान बनाती हैं तथा कुछ उन मूल विचारों का वर्णन है जिनके कारण मानवीय सोच इस दिशा में साकार हो सकी। और इस प्रक्रिया में तथ्यों के साथ विचार को प्रकट करने के लिए फ्रांस की क्रान्ति जैसी इतिहास की सबसे महत्त्वपूर्ण घटनाओं में से कुछेक को केवल स्वीकृत सन्दर्भों के रूप में लिया गया है कि तारतम्य बना रहे। पुस्तक में उन घटनाओं पर भी विचार किया गया है जिन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं के लिए तथा उनकी सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के निमित्त आधारवस्तु तैयार की।
इस अध्ययन में यूरोपीय देशों में ख़ासकर ब्रिटेन के अनुभवों की विस्तृत चर्चा है। इसका एक कारण यह है कि यूरोप के विकासों का दस्तावेज़ पूरी तरह से लिपिबद्ध है। इसका एक दूसरा कारण भी है कि दुनिया के अनेक हिस्सों में मुक्ति के संघर्ष तो हुए, लेकिन आगे बढ़ने की चाह रखनेवाली मुक्तिधाराओं में से ज़्यादातर धाराएँ काल की रेत में खो गईं। एकमात्र धारा जो आज तक विद्यमान है तथा एक शक्तिशाली नदी का रूप धारण कर चुकी है, वह वही धारा है जिसका उद्भव यूरोप में हुआ था। यही स्रोत कि दूसरे लोगों ने भी यूरोपीय विचारों की रोशनी में ग़ुलामी के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई और अपनी आज़ादी की फिर से खोज की।
आज हम देखते हैं कि उस आज़ादी के संघर्ष को मानवाधिकारों के संयुक्त राष्ट्र चार्टर के द्वारा संकेतित किया गया है। यह चार्टर स्वयं घटनाओं की वक्रगति की पराकाष्ठा है तथा इसने पूरी तरह सत्ताओं की इच्छा के विपरीत वैसा रूप धारण कर लिया है जो इसके सृजन के लिए जवाबदेह थे। निस्सन्देह, यह पुस्तक वैश्विक परिदृश्य में आज़ादी के संघर्ष को विभिन्न काल-खंडों में देखने-समझने की जिस वैचारिक ज़मीन की रचना करती है, वह अपनी प्रक्रिया में अपूर्व अनुभवों की अपूर्व कथा की तरह है।
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