Daleeya Ghere Ke Bahar : Young Indian ke sampadkiya
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भारत में ऐसे राजनेता बहुत कम रहे हैं जिन्होंने अपने विचारों को लिखित रूप में लगातार अपने समकालीनों और पाठकों तक पहुँचाया और इस प्रकार न सिर्फ़ अपना पक्ष स्पष्ट किया बल्कि लोगों को शिक्षित भी किया। चन्द्रशेखर उनमें अग्रणी हैं। वे लम्बे समय तक ‘यंग इंडियन’ का सम्पादन-प्रकाशन करते रहे, और देश, राजनीति और समाज को प्रभावित करनेवाली हर घटना पर बिना किसी पूर्वग्रह और स्वार्थ के लिखते रहे। यह साप्ताहिक ‘यंग इंडियन’ में उनके लिखे सम्पादकीय का संग्रह है। इस खंड में 1971 से 2001 तक की तीन दशकों की अवधि में लिखी सम्पादकीय टिप्पणियों को शामिल किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरा दौर भारतीय राजनीति में बड़ी घटनाओं और फेर-बदल का समय रहा है। इसी दौर में भारत-पाक युद्ध और तदुपरान्त बांग्लादेश का अभ्युदय हमने देखा, इंदिरा गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ आन्दोलन इसी दौर में चला; 1971 के लोकसभा चुनावों में उनकी जीत, उसके बाद जनता पार्टी सरकार, उसका भंग होना और पुन: इंदिरा गांधी की वापसी इसी कालखंड में हुई।</p> <p>जिन मुद्दों और घटनाओं पर राजनेता और विचारक चन्द्रशेखर के विचार आप यहाँ पढ़ेंगे, उनमें उपरोक्त के अलावा आपातकाल, इंदिरा गांधी की हत्या, उसके बाद राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, बोफोर्स मामले के बाद उनका सत्ता से हटना और वी.पी. सिंह का प्रधानमंत्री बनना, स्वयं चन्द्रशेखर का अल्पकालिक प्रधानमंत्रित्व, राजीव हत्याकांड और नरसिम्हा राव शासन का आरम्भिक दौर आदि शामिल हैं। बतौर नेता और राजनीतिक चिन्तक चन्द्रशेखर को स्वतंत्र विचार के लिए जाना जाता है। इस पूरे दौर को उन्होंने निष्पक्ष भाव से देखते हुए, क्या सोचा और देशहित में क्या चाहा, उस सबका निरूपण वे लगातार अपने सम्पादकीय में करते रहे। इन सम्पादकीय लेखों से गुज़रना सिर्फ़ चन्द्रशेखर के विचारों से ही नहीं, उस दौर के इतिहास से भी गुज़रना है।
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About the Book
भारत में ऐसे राजनेता बहुत कम रहे हैं जिन्होंने अपने विचारों को लिखित रूप में लगातार अपने समकालीनों और पाठकों तक पहुँचाया और इस प्रकार न सिर्फ़ अपना पक्ष स्पष्ट किया बल्कि लोगों को शिक्षित भी किया। चन्द्रशेखर उनमें अग्रणी हैं। वे लम्बे समय तक ‘यंग इंडियन’ का सम्पादन-प्रकाशन करते रहे, और देश, राजनीति और समाज को प्रभावित करनेवाली हर घटना पर बिना किसी पूर्वग्रह और स्वार्थ के लिखते रहे। यह साप्ताहिक ‘यंग इंडियन’ में उनके लिखे सम्पादकीय का संग्रह है। इस खंड में 1971 से 2001 तक की तीन दशकों की अवधि में लिखी सम्पादकीय टिप्पणियों को शामिल किया गया है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यह पूरा दौर भारतीय राजनीति में बड़ी घटनाओं और फेर-बदल का समय रहा है। इसी दौर में भारत-पाक युद्ध और तदुपरान्त बांग्लादेश का अभ्युदय हमने देखा, इंदिरा गांधी का ‘ग़रीबी हटाओ’ आन्दोलन इसी दौर में चला; 1971 के लोकसभा चुनावों में उनकी जीत, उसके बाद जनता पार्टी सरकार, उसका भंग होना और पुन: इंदिरा गांधी की वापसी इसी कालखंड में हुई।</p>
<p>जिन मुद्दों और घटनाओं पर राजनेता और विचारक चन्द्रशेखर के विचार आप यहाँ पढ़ेंगे, उनमें उपरोक्त के अलावा आपातकाल, इंदिरा गांधी की हत्या, उसके बाद राजीव गांधी का प्रधानमंत्री बनना, बोफोर्स मामले के बाद उनका सत्ता से हटना और वी.पी. सिंह का प्रधानमंत्री बनना, स्वयं चन्द्रशेखर का अल्पकालिक प्रधानमंत्रित्व, राजीव हत्याकांड और नरसिम्हा राव शासन का आरम्भिक दौर आदि शामिल हैं। बतौर नेता और राजनीतिक चिन्तक चन्द्रशेखर को स्वतंत्र विचार के लिए जाना जाता है। इस पूरे दौर को उन्होंने निष्पक्ष भाव से देखते हुए, क्या सोचा और देशहित में क्या चाहा, उस सबका निरूपण वे लगातार अपने सम्पादकीय में करते रहे। इन सम्पादकीय लेखों से गुज़रना सिर्फ़ चन्द्रशेखर के विचारों से ही नहीं, उस दौर के इतिहास से भी गुज़रना है।
Book Details
-
ISBN9789389577426
-
Pages440
-
Avg Reading Time15 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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राजशाही में व्यक्ति और समाज के पास कोई अधिकार था, तो सिर्फ़ इतना कि वह सत्तावर्ग की आज्ञा का चुपचाप पालन करे। राजा निरंकुश था, सर्वशक्तिमान। उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था, न उसे किसी चीज़ के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता था। औद्योगिक क्रान्ति तथा उदारवाद के आगमन और लोकतांत्रिक शासन पद्धतियों के प्रारम्भ के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा आई। इसके बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रजातांत्रिक देशों में भी शासनतंत्र में ‘गोपनीयता’ एक स्वाभाविक चीज़ बनी रही। विभिन्न दस्तावेज़ों में क़ैद सूचनाओं को ‘गोपनीय’ अथवा ‘वर्गीकृत’ करार देकर नागरिकों की पहुँच से दूर रखा गया। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के बावजूद राजनेताओं एवं अधिकारियों में स्वयं को ‘शासक’ या ‘राजा’ समझने की प्रवृत्ति हावी रही। यही शासकवर्ग आज भारतीय लोकतंत्र का असली मालिक है। नागरिक का पाँच साल में महज़ एक वोट डाल आने का बेहद सीमित अधिकार इतना निरुत्साहित करनेवाला है कि चुनावों में बोगस वोट न पड़ें तो मतदान का प्रतिशत तीस-चालीस फ़ीसदी भी न पहुँचे। यही कारण है कि अक्टूबर 2005 से लागू सूचनाधिकार लोकतांत्रिक राजा की सत्ता के लिए गहरे सदमे के रूप में आया है। राजनेता और नौकरशाह हतप्रभ हैं कि इस क़ानून ने आम नागरिक को लगभग तमाम ऐसी चीज़ों को देखने, जानने, समझने, पूछने की इजाज़त दे दी है, जिन पर परदा डालकर लोकतंत्र को राजशाही अन्दाज़ में चलाया जा रहा था। इस पुस्तक में संकलित उदाहरणों में आप देख पाएँगे कि किस तरह लोकतांत्रिक राजशाही तेज़ी से अपने अन्त की ओर बढ़ रही है। साथ ही इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कैसे करें।
Vedic Kaal
- Author Name:
S. Irfan Habib +3
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‘भारत के लोक इतिहास’ श्रृंखला के इस खंड का विषय 1500 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के बीच का काल-खंड है जिसके तहत ऋग्वेद और उसके बाद के ग्रन्थों को क्रमशः व्यवस्थित किया गया है और उस युग के भूगोल, प्रव्रजन, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और समाज के साथ-साथ धर्म और दर्शन आदि पहलुओं का अन्वेषण किया गया है। लेखकों की कोशिश रही है कि उक्त आदिग्रन्थों के माध्यम से तत्कालीन जन-जीवन की पुनर्रचना कर आम पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाया जाए। इस प्रक्रिया में लैंगिक और वर्ग-आधारित सामाजिक विभाजनों को ख़ास तौर पर देखने की कोशिश की गई है। पुस्तक के एक अध्याय में पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर प्रमुख क्षेत्रीय संस्कृतियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है। इतिहास में लोहे का आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना है जो इसी युग में सम्पन्न हुई थी, सो उसका वर्णन किंचित् विस्तार से हुआ है। साथ ही जाति व्यवस्था के आरम्भ पर भी इस पुस्तक में अपेक्षित प्रकाश डाला गया है। मूल ग्रन्थों के उद्धरणों, तार्किक व्याख्याओं और विश्लेषणों, अनेक प्रामाणिक चित्रों और नक़्शों से समृद्ध यह पुस्तक न सिर्फ़ रुचिकर, बल्कि पाठकों को विचारोत्तेजक भी लगेगी।
Sindhu Sabhyata
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
- Book Type:

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‘भारत का लोक इतिहास’ शृंख्ला की यह दूसरी पुस्तक सिन्धु सभ्यता के बारे में है। इसे इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘प्रागैतिहास’ की अगली कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता के और विस्तृत विवरण के अलावा इसमें अन्य समकालीन और उसके बाद की संस्कृतियों का सर्वेक्षण भी किया गया है। साथ ही भारत के मुख्य भाषा परिवारों के उद्भव पर विमर्श भी इसमें शामिल है। सिन्धु घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आरम्भिक कांस्य युग और उसके सांस्कृतिक पहलू तथा सिन्धु सभ्यता की व्यापकता, जनसंख्या, कृषि, हस्तशिल्प, व्यापार, क़स्बों और शहरों की बनावट के साथ इसमें जनता, समाज और राज्यसत्ता आदि का भी प्रमाण-आधारित विश्लेषण किया गया है। तालिकाओं, चित्रों और विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थ सूचियों के साथ यह पुस्तक शृंखला की अन्य पुस्तकों की ही तरह संग्रहणीय और पठनीय सिद्ध होगी।
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
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जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
Manushya Aur Paryavaran
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
- Book Type:

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विगत दशकों में पारिस्थितिकी और उससे जुड़े मसलों के प्रति विशेष रुचि दिखाई पड़ी है, ख़ास तौर पर जलवायु-परिवर्तन को लेकर होनेवाली बहसों के सन्दर्भ में इस तरफ़ सुधीजन का ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन पारिस्थितिकी का विमर्श सिर्फ़ जलवायु तक सीमित नहीं है। इसमें जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के साथ मनुष्य के रिश्तों के अलावा मनुष्य जाति के सम्मुख प्रकृति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का अध्ययन भी शामिल होता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ इस पुस्तक में पारिस्थितिकी के इतिहास को देखा-समझा गया है।
‘भारत का लोक इतिहास’ परियोजना के तहत प्रकाशित यह पुस्तक भी इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह गहन अध्ययन और प्रामाणिक सामग्री पर आधारित है। मूल स्रोतों के उद्धरणों तथा पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, वन विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास पर विशेष टिप्पणियों से समृद्ध इस पुस्तक में विषय से सम्बन्धित अन्य उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख भी किया गया है जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित होंगे।
सूचनाओं की सटीकता को बरकरार रखते हुए, पुस्तक को अतिरिक्त तकनीकी विवरणों से मुक्त रखा गया है ताकि इतिहास के छात्रों के अलावा यह सामान्य पाठकों के लिए भी रुचिकर सिद्ध हो।
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva +1
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अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
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