British Samrajyavad ke Sanskritik Paksha Aur 1857
Author:
Vandita VermaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 300
₹
375
Unavailable
1857 के डेढ़ सौ से ज़्यादा वर्ष बीत जाने के बाद आज इतिहास के इस पड़ाव को सही सन्दर्भों में स्थापित किया जाना नितान्त आवश्यक है।</p>
<p>गम्भीरता से जाँचा-परखा जाए तो यह पड़ाव मात्र एक रोमांचकारी अनुभूति देनेवाला न होकर हिन्दुस्तान के इतिहास की तमाम ऐसी प्रवृत्तियों का संवर्द्धन करनेवाला और उनका उद्गम स्रोत भी दिखाई देता है जिनका नाता उस उत्तर-औपनिवेशिकता से भी बनता दिखता है जिसकी कल्पना बीसवीं शताब्दी के मध्य में आकर ही विश्व के विचारकों द्वारा की जा सकी।</p>
<p>सांस्कृतिक साम्राज्यवाद यदि उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ से ही पश्चिमी विश्व की एक सुविचारित विचारधारा का स्वरूप ग्रहण कर चुका था तो उपनिवेशवाद के प्रारम्भिक स्वरूप का गवाह रहा हिन्दुस्तान, और वहाँ सांस्कृतिक दिशा में प्रवृत्त साम्राज्यवादी नीतियों की प्रतिक्रियाएँ भी उसी स्तर के प्रतिरोध पैदा करने में पूर्ण सक्षम थीं।</p>
<p>भारत में आनेवाले आधुनिक प्रभाव यहाँ की ज़मीन के लिए सहज तो थे ही नहीं, बल्कि कई अर्थों में बिलकुल भिन्न भी थे। फिर ये विचार पश्चिमी आधुनिकता का डंका पीटनेवालों और हर अन्य सभ्यता व संस्कृति को हेय दृष्टि से देखनेवाले पश्चिम के ईसाई विश्व द्वारा लाए जा रहे थे। किन्तु इन सबके साथ सबसे महत्त्वपूर्ण यह था कि ये उन औपनिवेशिक हुक्मरानों द्वारा लाए जा रहे थे जो इसे ज़बर्दस्ती लागू करने की मंशा और क्षमता दोनों ही रखते थे। यह परिदृश्य भारत में आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को एक तरफ़ अन्तर्द्वन्द्वों में जकड़ता गया, साथ-साथ उसके इन दंभी हुक्मरानों को अनायास एक अदृश्य, अप्रत्याशित संकट की ओर भी खींचता चला गया।</p>
<p>गहराइयों तक पहुँचकर ही हम वे सारी सम्भावनाएँ तलाश सकते हैं जिन्होंने 1857 के इस पड़ाव को निर्मित किया। एक ऐसा पड़ाव जो युद्ध के रूप में सामने आया, और जिसका नायक एक सिपाही बना। वह सिपाही जो हिन्दुस्तान के आम आदमी, किसान और उच्च जाति, सबका प्रतिनिधि था और अंग्रेज़ सरकार के कार्यकलापों का साक्षी भी। इस सिपाही के द्वारा किए गए विद्रोह के अर्थ निश्चित रूप से गम्भीर थे।</p>
<p>अपने तमाम ऐतिहासिक पड़ावों से गुज़रती एक ज़रूरी और महत्त्वपूर्ण पुस्तक है ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद के सांस्कृतिक पक्ष और 1857’।</p>
<p>
ISBN: 9788126717347
Pages: 224
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: आदिवासी समाज को ज्यादातर रोमांटिक दृष्टि से देखा गया है। सिर्फ उनके हितैषी गैर-आदिवासी कार्यकर्ताओं और विद्वानों द्वारा ही नहीं, बल्कि खुद कुछ आदिवासियों द्वारा भी। कुछ आदिवासी साहित्यकार अपने विमर्श में आदिवासी समाज का जैसा सुन्दर, सर्वांगपूर्ण चित्र खींचते हैं, उस चित्र का खुद उन्हीं के द्वारा लिखी हुई कहानियों और उपन्यास में व्यक्त यथार्थ से कोई मेल नहीं बैठता; दोनों के बीच दूरी और अन्तर्विरोध दिखाई देता है। विमर्श में यह दावा किया जाता है कि दुनिया की सारी समस्याओं का हल आदिवासी समाज दर्शन से ही निकलेगा जबकि आदिवासी खुद कई समस्याओं से घिरे हुए हैं और अपनी ही समस्याओं को हल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसा आदिवासी-विमर्श भी एक अतिवाद ही है। जैसे एक अतिवाद यह है कि हमें आदिवासियों का उद्धार करना है, वैसे ही दूसरा अतिवाद यह है कि आदिवासी से ही सबका उद्धार होगा। आदिवासी दर्शन के प्रवक्ता आदिवासी समाज की उन वास्तविकताओं को नहीं देखते, उन कमजोरियों को नहीं देखते जिनके खिलाफ लड़कर आदिवासियों को सचेत करने की जरूरत है। उलटे कभी-कभी ये कमियाँ भी उनकी नजर में गौरवपूर्ण बन जाती हैं। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक क्षतिपूर्ति है। उदाहरण के लिए कुछ लोग कहते हैं कि श्रम आदिवासी जीवन का बहुत बड़ा मूल्य है। यह बात दलितों के प्रसंग में भी कुछ विद्वानों ने कही है। सचाई यह है कि आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से जितने भी कमजोर और पिछड़े हुए समाज हैं—जिनमें आदिवासी और दलित भारत में मुख्य हैं—उन सबमें श्रम करने का लगभग सारा बोझ स्त्रियों के सिर पर डाल दिया गया। श्रम उनके पुरुषों को भी करना पड़ता है, लेकिन पुरुषों के जिम्मे सिर्फ कुछ एक महत्त्वपूर्ण काम होते हैं तथा उनका बहुत-सा समय सोने, तमाखू पीने, दारू पीने, जुआ खेलने या स्थानीय राजनीति करने जैसे कामों में खर्च होता है। चाहे बर्मा की सीमा पर बसे मिजो आदिवासियों का समाज हो अथवा तिब्बत की सीमा पर बसे भोटियों का समाज हो—सभी आदिवासी समाजों में स्त्रियों को ज्यादा-से-ज्यादा काम करना पड़ता है। —इसी पुस्तक से
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पिछली सदी के चौथे दशक में प्रगतिशील आन्दोलन ने जिन मूल्यों और सरोकारों को लेकर साहित्य–कला–जगत में हस्तक्षेप किया, उनकी अद्यावधि निरन्तरता को देखने के लिए किसी दिव्यदृष्टि की ज़रूरत नहीं। साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, वर्गीय शोषण तथा हर तरह की ग़ैरबराबरी के ख़िलाफ़ एक सुसंगत जनपक्षधर विवेक और नए सौन्दर्यबोध के साथ लिखी जानेवाली कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों और समालोचना की एक अटूट परम्परा सन् 36 के बाद देखने को मिलती है। साहित्य के साथ–साथ चित्रकला, शिल्प, रंगकर्म, संगीत और सिनेमा में भी प्रगतिशील कलाबोध की संगठित अभिव्यक्ति चौथे–पाँचवें दशक में सामने आने लगी थी। तब से कई उतार–चढ़ावों के बीच इस दृष्टि ने मुख़्तलिफ़ कलारूपों में, कहीं कम कहीं ज़्यादा, अपनी मानीख़ेज़ उपस्थिति बनाए रखी है।
आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी या संरक्षित पूँजीवादी विकास से नहीं, नवउदारवादी भूमंडलीकरण, निजीकरण और वित्तीय पूँजी के हमले से रूबरू हैं। बदले हुए वस्तुगत हालात बदली हुई साहित्यिक एवं कलात्मक अनुक्रियाओं–प्रतिक्रियाओं की माँग करते हैं। लिहाज़ा, इन आठ दशकों के दौरान अगर रचनात्मक अभिव्यक्ति की शक्ल और अन्तर्वस्तु में बदलाव न आते तो स्वयं निरन्तरता ही अवमूल्यित होती, इसलिए परिवर्तन, नए वस्तुगत हालात के बीच जनपक्षधर विवेक का नई तीक्ष्णता और त्वरा के साथ इस्तेमाल, यथार्थ की पहचान पर बल देनेवाले प्रगतिशील आन्दोलन की निरन्तरता का ही एक साक्ष्य बनकर सामने आता है।
प्रस्तुत पुस्तक प्रगतिशील आन्दोलन की इसी निरन्तरता पर भी केन्द्रित है। सांगठनिक धरातल पर आन्दोलन के विकास की रूपरेखा बताने तथा सम्भावनाएँ तलाशनेवाले लेखों के साथ–साथ कुछ महत्त्वपूर्ण समकालीन रचनाकारों व रंगकर्मियों के द्वारा अपने–अपने सांस्कृतिक कर्म में प्रगतिशील आन्दोलन का प्रभाव बतानेवाले आत्मकथ्य भी हैं।
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