Dravida Rajneeti : Periyar Se Jayalalithaa Tak
(0)
Author:
Praveen Kumar JhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
350
₹ 280 (20% off)
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दुनिया में ऐसा जन-समूह शायद ही कोई हो जिसकी आनुवंशिकी मिश्रित न हो। भारत में ही ख़ानाबदोश समाज से लेकर अनेक तरह के सैन्य और व्यापारिक आवागमन होते रहे जिनसे रक्त और भाषा दोनों का मिश्रण हुआ। देखें तो ये विषय विज्ञान के हैं लेकिन तमाम आर्थिक और सामाजिक कारणों से राजनीति का विषय हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर उन्नीसवीं सदी में आर्य और द्रविड़ नस्लों का विभाजन जो आज़ादी के बाद आज तक कभी भाषा और कभी संस्कृति के विवादों में सामने आ जाता है। द्रविड़ राजनीति को आरम्भ से लेकर लगभग वर्तमान तक देखती-समझती यह पुस्तक इसी नस्ली विभाजन से अपनी बात शुरू करती है और थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना को इसका पूर्व-बिन्दु मानते हुए, कांग्रेस के गठन, दक्षिण में गांधी जी के हिन्दी प्रचार की शुरुआत और उसी दौरान पेरियार के रूप में एक ब्राह्मण-विरोधी व्यक्तित्व के उदय को द्रविड़ आन्दोलन की पहली निर्णायक घटना मानती है। उसके बाद दक्षिण बनाम उत्तर का समीकरण सामने आया। जब कांग्रेस ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ कह रही थी तब पेरियार ने ‘आर्यो, बाहर जाओ’ का नारा दिया और 1946 में ‘द्रविड़ कड़गम’ का झंडा तैयार हुआ। फिर अन्नादुरइ ने पेरियार से अलग अपने दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की घोषणा की। स्वतंत्रता पूर्व इतिहास की इन पेचीदा गलियों से होती हुई द्रविड़ राजनीति की यह समीक्षा, एम.जी.आर., करुणानिधि, जयललिता, तमिल ईलम, राजीव गांधी की हत्या से होते हुए उत्तर और दक्षिण के ध्रुवीकरण की पड़ताल भी उसी गहराई से करती है और कोशिश करती है कि यह विरोध न रहे, भाषाओं का द्वन्द्व न हो, श्रेष्ठ और हीन का झगड़ा न हो। इतिहास और राजनीति पर केन्द्रित होते हुए भी इस किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ की विशेषता ये है कि यह अत्यन्त तथ्य-संकुल पाठ को भी एकदम बोलचाल की भाषा और संवादधर्मी शैली में पाठक के सामने रखती है, ताकि वह इस मसले पर अपने निजी विषय की तरह सोच सके।
Read moreAbout the Book
दुनिया में ऐसा जन-समूह शायद ही कोई हो जिसकी आनुवंशिकी मिश्रित न हो। भारत में ही ख़ानाबदोश समाज से लेकर अनेक तरह के सैन्य और व्यापारिक आवागमन होते रहे जिनसे रक्त और भाषा दोनों का मिश्रण हुआ। देखें तो ये विषय विज्ञान के हैं लेकिन तमाम आर्थिक और सामाजिक कारणों से राजनीति का विषय हो जाते हैं। मिसाल के तौर पर उन्नीसवीं सदी में आर्य और द्रविड़ नस्लों का विभाजन जो आज़ादी के बाद आज तक कभी भाषा और कभी संस्कृति के विवादों में सामने आ जाता है।
द्रविड़ राजनीति को आरम्भ से लेकर लगभग वर्तमान तक देखती-समझती यह पुस्तक इसी नस्ली विभाजन से अपनी बात शुरू करती है और थियोसोफ़िकल सोसायटी की स्थापना को इसका पूर्व-बिन्दु मानते हुए, कांग्रेस के गठन, दक्षिण में गांधी जी के हिन्दी प्रचार की शुरुआत और उसी दौरान पेरियार के रूप में एक ब्राह्मण-विरोधी व्यक्तित्व के उदय को द्रविड़ आन्दोलन की पहली निर्णायक घटना मानती है।
उसके बाद दक्षिण बनाम उत्तर का समीकरण सामने आया। जब कांग्रेस ‘अंग्रेजो, भारत छोड़ो’ कह रही थी तब पेरियार ने ‘आर्यो, बाहर जाओ’ का नारा दिया और 1946 में ‘द्रविड़ कड़गम’ का झंडा तैयार हुआ। फिर अन्नादुरइ ने पेरियार से अलग अपने दल द्रविड़ मुनेत्र कड़गम की घोषणा की।
स्वतंत्रता पूर्व इतिहास की इन पेचीदा गलियों से होती हुई द्रविड़ राजनीति की यह समीक्षा, एम.जी.आर., करुणानिधि, जयललिता, तमिल ईलम, राजीव गांधी की हत्या से होते हुए उत्तर और दक्षिण के ध्रुवीकरण की पड़ताल भी उसी गहराई से करती है और कोशिश करती है कि यह विरोध न रहे, भाषाओं का द्वन्द्व न हो, श्रेष्ठ और हीन का झगड़ा न हो।
इतिहास और राजनीति पर केन्द्रित होते हुए भी इस किताब ‘द्रविड़ राजनीति : पेरियार से जयललिता तक’ की विशेषता ये है कि यह अत्यन्त तथ्य-संकुल पाठ को भी एकदम बोलचाल की भाषा और संवादधर्मी शैली में पाठक के सामने रखती है, ताकि वह इस मसले पर अपने निजी विषय की तरह सोच सके।
Book Details
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ISBN9789347265099
-
Pages224
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: महान् स्वतंत्रता सेनानी, धार्मिक सद्भाव के प्रणेता, संप्रदायवाद के विरोधी तथा राष्ट्र के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर देनेवाले क्रांतिकारी नेता लाला लाजपतराय स्वप्नदर्शी नहीं थे। उन्होंने जिन योजनाओं की रूपरेखा बनाई, उन्हें पूर्ण करने के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। लालाजी शांतिपूर्ण उपायों से स्वराज्य-प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील रहे। लेकिन उन्होंने आतंक और अत्याचार के सामने कभी सिर नहीं झुकाया। लालाजी राष्ट्रीय विचारों के प्रणेता थे। उनके लिए पूर्ण स्वराज्य आदर्श था और धर्म भी। सामाजिक जीवन में फैली निराशा और विकृत मनोवृत्तियों को समाप्त करने के उद्देश्य से लालाजी ने आर्यसमाज का आश्रय ग्रहण किया। उन्होंने शोषण को किसी रूप में स्वीकार नहीं किया, शोषण चाहे ब्रिटिश शासन का हो अथवा सबल जाति का निर्बल के प्रति। लालाजी शिक्षा को राष्ट्रीय स्वरूप देना चाहते थे। उनके अनुसार शिक्षा का प्रथम उद्देश्य स्वतंत्रता की अनुभूति कराना होना चाहिए। ऐसे महान् राजनीतिज्ञ, समाज-सुधारक, विचारक, स्वराज्य के उद्घोषक, आदर्शें के प्रति निष्ठावान् और सांप्रदायिक एकता के समर्थक लाला लाजपतराय की चिंतनधारा से अपने देश के भावी कर्णधारों को परिचित कराने का शुभ-संकल्प लेकर यह संकलन युवा पीढ़ी को समर्पित है।
Naxalwad Aur Samaj
- Author Name:
K. Satyanarayana
- Book Type:

- Description: प्रस्तुत पुस्तक, नक्सलवाद और समाज पर लेखक के नक्सलियों और उनके परिवारों के भावपूर्ण अध्ययन का परिणाम है। यह अध्ययन एक पुलिस अधिकारी के रूप में उनके अनुभवों और बचपन की उनकी यादों से फलीभूत हुआ है। लेखक का जन्मस्थान नक्सलवाद के कुख्यात केंद्र के निकट हुआ; अत: बाल्यकाल से हुए अनुभव के आधार पर लिखी इस पुस्तक में उन्होंने नक्सलवाद और एक नक्सली के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर भी प्रकाश डाला है। नक्सलवाद के विभिन्न पहलुओं को समझने में इसने काफी मदद की है। एक प्रकार से इसे नक्सलवाद एनाटॉमी कहा जा सकता है।
Common Man's Pm Narendra Modi
- Author Name:
Kishor Makwana
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Jinna : Ek Punardrishti
- Author Name:
Virendra Kumar Baranwal
- Book Type:

- Description: साधारण भारतीयों के मन में जिन्ना की छवि एक निहायत नीरस, अन्तर्मुखी, तार्किक, अधार्मिक, भावना-शून्य, मनहूस, हिसाबी, सिर से पैर तक पश्चिमी सभ्यता में रँगे, चोटी के वकील के साथ एक अपराजेय राजनीतिक सौदेबाज़ की रही है। जिन्ना के व्यक्तित्व की इन विशेषताओं को झुठलाना जहाँ निहायत दुश्वार है, वहीं मात्र इन्हीं विशेषताओं में उन्हें सीमित करना वस्तुतः सच्चाई से मुँह मोड़ना होगा। जिन्ना के जीवन और व्यक्तित्व के कुछ ऐसे पहलू हैं, जो बहुत कम उजागर हो पाए हैं। फलस्वरूप अक्सर उनका एकांगी मूल्यांकन ही हो पाया है। इतिहास मात्र घटनाओं का संकुल और महत्त्वाकांक्षियों की नियति के उतार-चढ़ाव का दस्तावेज़ ही नहीं है। उसके विराट मंच पर उभरे काल-प्रेरित अभिनेताओं के मनोजगत की उथल-पुथल से संरचित व्यक्तित्वों के समझौते-टकराव और घात-प्रतिघात उसकी धारा को प्रभावित करने में निर्णयात्मक भूमिका निभाते हैं। कुछ इसी विश्वास के फलस्वरूप जिन्ना के जीवन पर विहंगम दृष्टि डालते हुए उन्हें उनके महत्त्वपूर्ण समकालीनों के साथ-साथ अलग-अलग समझने-परखने की कोशिश इस किताब में मिलेगी। उनकी पत्नी रत्ती की गहन संवेदनशीलता, तीक्ष्ण मेधा, व्यक्तित्व का अप्रतिम सम्मोहन, समस्त प्राणी-जगत के लिए करुणा विगलित हृदय, गहरे राजनीतिक-सामाजिक सरोकार और धार्मिक बाह्याडम्बर के प्रति वितृष्णा जैसे गुण उन्हें अपने समय का एक अत्यन्त विशिष्ट व्यक्तित्व सिद्ध करते हैं। इस पुस्तक में उनके विषय में भी एक विस्तृत अध्याय रखा गया है। ध्यान देने योग्य है कि पाकिस्तान के राष्ट्रपिता बनने के पहले जिन्ना हिन्दुस्तान की धरती के एक महान और सुयोग्य पुत्र थे। उनके लगभग आधी सदी के राजनीतिक जीवन में समय-समय पर उभरे सोच में आज भी ऐसा बहुत कुछ समावेशी और रचनात्मक है, जो अप्रासंगिक नहीं हुआ है। इसमें दो राय नहीं कि गांधी और नेहरू की तरह जिन्ना भी भारतीय उपमहाद्वीप में समय-समय पर एक पुनर्दृष्टि की माँग करते रहेंगे। इतिहास के अपने ढंग के एक अद्वितीय व्यक्तित्व के नाते यह उनका हक़ है।
Aadi Turk Kaleen Bharat (1206-1290)
- Author Name:
Saiyad Athar Abbas Rizvi
- Book Type:

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Description:
आदि तुर्क वंश के इस इतिहास में 1206 ई. से 1290 ई. तक समस्त प्रमुख फ़ारसी तथा अरबी इतिहास ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद है। इसमें मिनहाज सिराज की ‘तबक़ाते नासिरी’ तथा ज़ियाउद्दीन बरनी की ‘तारीख़े फ़ीरोज़शाही’ को मुख्य आधार माना गया है।
दूसरे भाग में समकालीन इतिहासकारों की कृतियों का अनुवाद है। इनमें फ़ख़रे मुदब्बिर की ‘तारीख़े फ़ख़रुद्दीन मुबारकशाह’, ‘आदाबुल हर्ब वश्शुजाअत’, सद्रे निजशमी की ‘ताजशुल मआसिर’, अमीर ख़ुसरो के ‘दीवाने वस्तुल हयात’ एवं क़ेरानुस्सादैन के संक्षिप्त तथा परमावश्यक अंशों का अनुवाद भी सम्मिलित है। बाद के भी दो प्रमुख इतिहासकारों की रचनाओं के अनुवाद किए गए हैं—एसामी की ‘फ़ुतूहुस्सलातीन’ का और अरबी में लिखी हुई इब्ने बतूता की यात्रा के वर्णन का।
मध्यकालीन भारतीय इतिहास पर प्रामाणिक रोशनी डालनेवाले इन ग्रन्थों का अनुवाद कुछ विद्वानों ने अंग्रेज़ी में भी किया था, लेकिन उनमें पारिभाषिक शब्दों के अंग्रेज़ी अनुवादों में दोष रह गए हैं। इस कारण अनेक भ्रम-पूर्ण रूढ़ियों को आश्रय मिल गया है। इस प्रकार की त्रुटियों से बचने के उद्देश्य से प्रस्तुत ग्रन्थ में पारिभाषिक और मध्यकालीन वातावरण के परिचायक शब्दों को मूल रूप में ही ग्रहण किया गया है और उन शब्दों की व्याख्या पाद-टिप्पणियों में कर दी गई है।
Uttar Pradesh Ka Swatantrata Sangram : Sant Kabir Nagar
- Author Name:
Ajay K. Pandey
- Book Type:

- Description: संत कबीर नगर की भौगोलिक व सांस्कृतिक सीमा के अंतर्गत प्राचीनकाल से लेकर मध्यकाल और विशेष रूप से स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन के दौरान ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक घटनाएँ हुई हैं जिनका विवरण इस पुस्तक में दिया गया है। 1857 से लेकर 1947 तक इस क्षेत्र ने देश की आजादी के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में उल्लेखनीय भूमिका निभाई। इसके अलावा देश की सांस्कृतिक अस्मिता के लिहाज से भी इस जनपद का विशेष स्थान है। इस क्षेत्र में शृंगार के कवि रंग नारायण पाल 'रंगपाल' और रामदेव सिंह 'कलाधर' जैसी साहित्यिक विभूतियाँ भी रही हैं जिनकी विस्तृत जानकारी इस पुस्तक में दी गई है। इसके अलावा यहाँ के औद्योगिक तथा वाणिज्यिक परिदृश्य को भी इस अध्ययन में शामिल किया गया है ताकि स्वतंत्रता आंदोलन की गतिविधियों का संपूर्ण परिप्रेक्ष्य स्पष्ट हो सके। प्राचीन मंदिर और उनसे जुड़ी जनश्रुतियाँ भी इस परिदृश्य का अभिन्न अंग हैं।
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