Poorvi Africa Ka Praveshdwar Uganda
(0)
Author:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'Publisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
300
240 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
"युगांडा अफ्रीका का नैसर्गिक सुंदरता और जैव-विविधता से परिपूर्ण देश है जिसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने ‘अफ्रीका का मोती’ तक कहा है। यह नील नदी का स्रोत है, जो दुनिया की दूसरी सबसे लंबी नदी है। रंग-बिरंगी तितलियों से लेकर पहाड़ी गोरिल्ला, लुप्तप्राय प्रजातियों के घर के रूप में और एक वैश्विक पर्यटक केंद्र के रूप में युगांडा आकर्षक गंतव्य है। युगांडा के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह दुनिया भर के शरणार्थियों का स्वागत अत्यंत खुले मन से करता है। उत्तम बात यह है कि जहाँ शरणार्थी सामाजिक सेवाओं का आनंद लेते हैं, वही वह स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकते हैं और काम कर सकते हैं। एक राष्ट्र के रूप में युगांडा ने अपनी चुनौतियों से मुकाबला कर, अपने मुश्किलों से भरे हुए अतीत को छोड़ते हुए देश को एक सक्षम, समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। एक अनुशासित, मेहनतकश राष्ट्र के रूप में युगांडा ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने लोगों को एक नई पारी के लिए न केवल तैयार किया, बल्कि एक नई जीवन-शैली के लिए प्रेरित किया। यह पुस्तक इस देश के विषय में समग्र जानकारी देती है। इसमें युगांडा की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, रीति-रिवाज, इतिहास, भूगोल से लेकर वहाँ के पर्यटक स्थलों, शैक्षिक तंत्र, धार्मिक विविधता, भाषा, जैव-विविधता, राजनैतिक व्यवस्था की जानकारी सरल-सुबोध भाषा में दी है।
Read moreAbout the Book
"युगांडा अफ्रीका का नैसर्गिक सुंदरता और जैव-विविधता से परिपूर्ण देश है जिसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने ‘अफ्रीका का मोती’ तक कहा है। यह नील नदी का स्रोत है, जो दुनिया की दूसरी सबसे लंबी नदी है। रंग-बिरंगी तितलियों से लेकर पहाड़ी गोरिल्ला, लुप्तप्राय प्रजातियों के घर के रूप में और एक वैश्विक पर्यटक केंद्र के रूप में युगांडा आकर्षक गंतव्य है।
युगांडा के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह दुनिया भर के शरणार्थियों का स्वागत अत्यंत खुले मन से करता है। उत्तम बात यह है कि जहाँ शरणार्थी सामाजिक सेवाओं का आनंद लेते हैं, वही वह स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ सकते हैं और काम कर सकते हैं।
एक राष्ट्र के रूप में युगांडा ने अपनी चुनौतियों से मुकाबला कर, अपने मुश्किलों से भरे हुए अतीत को छोड़ते हुए देश को एक सक्षम, समृद्ध राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। एक अनुशासित, मेहनतकश राष्ट्र के रूप में युगांडा ने तमाम कठिनाइयों के बावजूद अपने लोगों को एक नई पारी के लिए न केवल तैयार किया, बल्कि एक नई जीवन-शैली के लिए प्रेरित किया।
यह पुस्तक इस देश के विषय में समग्र जानकारी देती है। इसमें युगांडा की संस्कृति, अर्थव्यवस्था, रीति-रिवाज, इतिहास, भूगोल से लेकर वहाँ के पर्यटक स्थलों, शैक्षिक तंत्र, धार्मिक विविधता, भाषा, जैव-विविधता, राजनैतिक व्यवस्था की जानकारी सरल-सुबोध भाषा में दी है।
Book Details
-
ISBN9789390366651
-
Pages144
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Pragatisheel Sanskritik Aandolan
- Author Name:
Murli Manohar Prasad Singh
- Book Type:

-
Description:
पिछली सदी के चौथे दशक में प्रगतिशील आन्दोलन ने जिन मूल्यों और सरोकारों को लेकर साहित्य–कला–जगत में हस्तक्षेप किया, उनकी अद्यावधि निरन्तरता को देखने के लिए किसी दिव्यदृष्टि की ज़रूरत नहीं। साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, वर्गीय शोषण तथा हर तरह की ग़ैरबराबरी के ख़िलाफ़ एक सुसंगत जनपक्षधर विवेक और नए सौन्दर्यबोध के साथ लिखी जानेवाली कविताओं, कहानियों, उपन्यासों, नाटकों और समालोचना की एक अटूट परम्परा सन् 36 के बाद देखने को मिलती है। साहित्य के साथ–साथ चित्रकला, शिल्प, रंगकर्म, संगीत और सिनेमा में भी प्रगतिशील कलाबोध की संगठित अभिव्यक्ति चौथे–पाँचवें दशक में सामने आने लगी थी। तब से कई उतार–चढ़ावों के बीच इस दृष्टि ने मुख़्तलिफ़ कलारूपों में, कहीं कम कहीं ज़्यादा, अपनी मानीख़ेज़ उपस्थिति बनाए रखी है।
आज हम औपनिवेशिक ग़ुलामी या संरक्षित पूँजीवादी विकास से नहीं, नवउदारवादी भूमंडलीकरण, निजीकरण और वित्तीय पूँजी के हमले से रूबरू हैं। बदले हुए वस्तुगत हालात बदली हुई साहित्यिक एवं कलात्मक अनुक्रियाओं–प्रतिक्रियाओं की माँग करते हैं। लिहाज़ा, इन आठ दशकों के दौरान अगर रचनात्मक अभिव्यक्ति की शक्ल और अन्तर्वस्तु में बदलाव न आते तो स्वयं निरन्तरता ही अवमूल्यित होती, इसलिए परिवर्तन, नए वस्तुगत हालात के बीच जनपक्षधर विवेक का नई तीक्ष्णता और त्वरा के साथ इस्तेमाल, यथार्थ की पहचान पर बल देनेवाले प्रगतिशील आन्दोलन की निरन्तरता का ही एक साक्ष्य बनकर सामने आता है।
प्रस्तुत पुस्तक प्रगतिशील आन्दोलन की इसी निरन्तरता पर भी केन्द्रित है। सांगठनिक धरातल पर आन्दोलन के विकास की रूपरेखा बताने तथा सम्भावनाएँ तलाशनेवाले लेखों के साथ–साथ कुछ महत्त्वपूर्ण समकालीन रचनाकारों व रंगकर्मियों के द्वारा अपने–अपने सांस्कृतिक कर्म में प्रगतिशील आन्दोलन का प्रभाव बतानेवाले आत्मकथ्य भी हैं।
Gandhi-Darshan : Alochnatmak Adhyayan
- Author Name:
Hemant Kukreti
- Book Type:

-
Description:
गांधी के नाम के आगे और बाद में लगे तमाम विशेषण—महात्मा, महामानव, अतिमानव इत्यादि उनके विराट व्यक्तित्व और कृतित्व के सामने अधूरे और अपर्याप्त हैं। उन्होंने भारत जैसे महादेश ही नहीं, समूची दुनिया को अपने जीवनकाल में गहरे प्रभावित किया और जीते-जी निजंधरी नायक बन गए। गांधी को हुए डेढ़ सदी बीत गई और कई सदियाँ बीत जाएँगी—गांधी का गांधीत्व बरकरार रहेगा और लगातार विकसित होता रहेगा। गांधी ने विधिवत् कुछ नहीं लिखा लेकिन भारत की राजनीति, अर्थनीति, संस्कृति, स्त्री और दलित-विमर्श, शिक्षा-नीति, दर्शन—कहना न होगा, जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को गहरे प्रभावित किया है। आज उनके कहे और लिखे शब्दों के माध्यम से गांधी-दर्शन आकार ले चुका है। दुनिया-भर में उनके काम की प्रासंगिकता की पड़ताल हो रही है। ऐसा ही कुछ काम इस किताब में हेमंत कुकरेती ने किया है। वे प्रसिद्ध कवि हैं। हिन्दी साहित्य के इतिहासकार हैं। सुधी आलोचक हैं। साहित्य के मर्मज्ञ अध्यापक हैं। उन्होंने एक पाठक के नज़रिए से गांधी को समझने और समझाने की कोशिश की है। यह हमारे समय के एक सुकवि का सुललित, सुगठित और सुचिन्तित गद्य है। इसलिए वैचारिक विश्लेषण होने के बावजूद इसमें अद्भुत पठनीयता है।
हेमंत कुकरेती ने गांधी-दर्शन की आलोचनात्मक कमेंट्री करते हुए गांधी की राष्ट्र-परिकल्पना, स्वराज, स्वदेशी, सत्याग्रह, अहिंसा, ग्रामोद्योग, रामराज्य जैसी अवधारणाओं के आधार पर गांधी के अर्थदर्शन, राजनीतिक सोच, उनकी दलित चिन्ता, शिक्षा का वर्तमान परिदृश्य, वर्ण-व्यवस्था, स्त्री-जीवन के सवाल यानी गांधीवाद को जिस बौद्धिक संवेदनशीलता के साथ परखा है, वह गांधी और उनके दर्शन को आसानी से समझा देता है। इस नज़रिए से यह किताब आकार में दीर्घकाय न होने के बाद भी साधारण पाठ्य-पुस्तक से आगे बढ़कर गांधी विषयक सन्दर्भ-ग्रन्थ बन गई है। —प्रताप सहगल
Kingmakers
- Author Name:
Rajgopal Singh Verma
- Book Type:

-
Description:
अठारहवीं सदी में भारत ने राजनैतिक अव्यवस्था, प्रशासनिक दुर्बलता, आर्थिक अवनति और सांस्कृतिक पतन की अकल्पनीय परिस्थितियों का सामना किया। उस दौर के कई बादशाह विलासी और निहायत अदूरदर्शी रहे। ऐसे में व्यभिचार एवं भ्रष्टाचार के मामलों में वृद्धि हुई, जबकि जनकल्याण की अवधारणा पृष्ठभूमि में चली गई थी।
ऐसे समय में सैयद बन्धुओं—सैयद अब्दुल्ला ख़ान और सैयद हुसैन अली ख़ान का उत्कर्ष हुआ। अपने पराक्रम और वीरता के लिए विख्यात ये दोनों भाई मुग़लों के वफ़ादार थे। उनको अपनी विवशता का वास्ता देकर, सत्ता-संघर्ष में भावनात्मक रूप से शहज़ादे फ़र्रूखसियर ने उन्हें अपने पक्ष में कर लिया था। अगले सात सालों तक इन भाइयों का ऐसा सिक्का चला कि बादशाह से कहीं बेहतर स्थिति उनकी रही। शाही विरासत के फ़ैसलों के साथ ही रोज़मर्रा के कामों में भी उनकी निर्णायक दख़ल रही। वस्तुत: वे मुल्क की बादशाहत को बनाने और बिगाड़ने वाले बन बैठे थे।
लेकिन इतना शक्ति सम्पन्न होने पर भी सैयद बन्धुओं को क्या मिला? एक की धोखे से हत्या कर दी गई जबकि दूसरे को ज़हर दे दिया गया। शाही सेना की अग्रिम पंक्ति में रहकर, शत्रुओं से टक्कर लेने वाले वे दोनों भाई, मुग़ल बादशाहों के महलों की राजनीति का शिकार तो नहीं हो गए थे? गलतियाँ तो उनकी भी रही होंगी!
इतिहास के उत्तर मुग़लकालीन इन अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर तलाशने की कोशिश करती यह पहली किताब है, जिसमें ‘किंगमेकर्स’ के रूप में मशहूर सैयद भाइयों के व्यक्तित्व और कृतित्व, उनके उत्कर्ष और पराभव की परतों को उघाड़ने के साथ ही मुग़ल वंश के पतन की स्थितियों पर भी पर्याप्त प्रकाश तथ्यसंगत डाला गया है। यह किताब भारतीय इतिहास के उस कालखंड का एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसकी अभी तक प्राय: अनदेखी की गई है। लेखक ने इस किताब को उपन्यास जैसी रोचक शैली में लिखा है, परन्तु इतिहास की प्रामाणिकता और विश्वसनीयता भी बनाए रखी है।
—प्रो. शशि प्रभा
Hamara Sanskritik chintan
- Author Name:
Suresh Bhayyaji Joshi
- Book Type:

- Description: मृत्युंजय भारत क्या होता है? मृत्युंजय भारत वह वास्तविक रूप से सारे दुनिया को सही दिशा देनेवाला, कभी भी समाप्त न होनेवाला, ऐसा अगर कोई राष्ट्र है तो वह भारत राष्ट्र है। इसका कई प्रकार के शब्दों में वर्णन किया गया है। भारत का चिंतन क्या है, विकास के संदर्भ में हमारी सोच क्या है, एक बात ध्यान में आती है कि सभी ने केंद्र में किसे रखा है? विकास का विचार करते हैं तो सभी ने मनुष्य को केंद्र में रखा है। जब हम सुख-समृद्धि, समाधान की बात करते हैं, तो उसमें व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह, यह उसके केंद्र में, उसके चिंतन में मौजूद है। उसके विकास की कोई सीमा ही नहीं है, वह असीमित है। हम भूमि की पूजा करते हैं, हम नदियों की पूजा करते हैं, हम भवायु के रूप में भगवान् की पूजा करते हैं, हम पेड़-पौधों की पूजा करते हैं। यह क्या है सब। पागलपन नहीं है। इस पूजा भाव के साथ हमारे यहाँ संस्कार देने की बात आती है कि इनकी बड़ी कृपा है हमारे ऊपर।
Chashme Wale Masterji
- Author Name:
Prakash Manu
- Book Type:

- Description: "बरसों तक ‘नंदन’ के संपादन से जुड़े रहे प्रकाश मनु बच्चों के चहेते कथाकार हैं। उन्होंने बच्चों के लिए खूब लिखा है— एक-से-एक सुंदर गीत, कहानियाँ, नाटक और उपन्यास, जिन्हें बच्चे चाव से पढ़ते और उनके साथ-साथ हँसते-गाते, चहकते, खिलखिलाते हैं। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ प्रकाश मनु की पिछले कुछ अरसे में लिखी गई ताजा बाल कहानियों का संग्रह है। इसमें नन्हे-मुन्नों के नन्हे सपनों की कहानियाँ हैं, तो दूसरी ओर किस्सागोई से भरपूर ऐसी दिलचस्प कहानियाँ भी, जो बच्चों को एक निराली दुनिया में ले जाएँगी। ये ऐसी बाल कहानियाँ हैं, जिनमें बचपन का हर रंग, हर अंदाज है और नटखटपन से भरी कौतुकपूर्ण छवियाँ भी, जो बच्चों के साथ-साथ बड़ों को भी मुग्ध करती हैं। इनमें बच्चे हैं, बच्चों के सुख-दु:ख और सपने हैं तो उनके छोटे से संसार की बड़ी मुश्किलें भी हैं, और इन्हें लिखा गया है बेहद चुस्त, सधे, खिलंदड़े अंदाज में। कुछ कहानियों में बच्चों को एक भोले और अलमस्त बच्चे कुक्कू की नटखट शरारतें, खेल और मस्ती की रेल-पेल लुभाएगी तो कुछ में वे निक्का, तान्या, निक्की, साशा, मीशा, खुशी और मिली के संग खूब हँसेंगे, खिलखिलाएँगे और खेल-खेल में बहुत कुछ सीखेंगे भी। साथ ही अपनी मुश्किलों से निकलने की राह पाएँगे। ‘चश्मेवाले मास्टरजी’ पुस्तक की हर कहानी में बचपन की एक अलग छवि है और नटखटपन से भरी एक हँसती-खिलखिलाती दुनिया! इसीलिए ये कहानियाँ बच्चों को अपने दोस्त सरीखी लगेंगी। एक बार पढ़ने के बाद वे इन्हें कभी भूलेंगे नहीं और हमेशा एक ‘बहुमूल्य उपहार’ की तरह सँजोकर रखेंगे। "
Vande Matram
- Author Name:
Milind Prabhakar Sabnees
- Book Type:

- Description: वंदे मातरम् ऋषि बंकिमचंद्र की अलौकिक काव्य प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। वैदिक काल से अर्वाचीन काल तक मातृभूमि के प्रति हमारे मन में बसनेवाले अनन्य प्र्रेम का अव्यक्त रूप यानी वंदे मातरम्! मातृभूमि के प्रति यह प्रेम शाश्वत है, चिरंतन है। जिस भूमि ने मुझे जन्म दिया, जिसने मेरा पालन-पोषण किया, मुझे समृद्धता दी और अंत में जिस भूमि में मैं मिल जाने वाला हूँ, वह भूमि यानी यह हमारी भूमाता, मातृभूमि! उसे हमारा शत-शत प्रणाम! भारतीय संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त मातृपूजन, भूमिपूजन, इस जगन्माता का पूजन इन सबके प्रतीक बने शब्द हैं ‘वंदे मातरम्’! मातृभूमि के प्रति यह प्रेम प्रत्येक व्यक्ति के मन में सहज-स्वाभाविक होता है। जैसा अपनी जननी-माता के प्रति होता है ठीक वैसा ही! वह प्रेम हम प्रत्येक के हृदय में है। उस पर केवल निराशा के पुट चढ़े हैं, जिन्हें दूर हटाना होगा। अंतरतम की तह से ‘वंदे मातरम्’ के उच्चारण से उन्हें निश्चय ही दूर किया जा सकता है। वंदे मातरम्!!
Ram Itihas Ke Aprichit Adhyay
- Author Name:
Shriram Mehrotra
- Book Type:

- Description: महासागर के समक्ष खड़े होने से समझ में आता है कि यही सबसे अधिक अथाह, अनन्त, विशाल जल-संसार है, इसके समानान्तर कुछ नहीं है किन्तु जब कभी कोई पुरुषोत्तम के चरित्र-महासागर के गहरे पानी में पैठता है तब समझ में आता है कि यह विशाल चरित्र-सागर कहीं अधिक अनन्त और उन्नत रत्नाकर है। इसके समक्ष बाहर का दृश्य-महासागर कुछ भी नहीं है। धरतीतल वाले सागर से चरित्र-सागर कई गुना अपरिमेय व अजेय है। यह महान और असीम बहुमूल्य सम्पदाओं का भरा-पूरा, कभी न समाप्त होनेवाला रत्नाकर है। रामचरित्र कुछ ऐसा ही रत्नाकर है। उसे पूर्णता से आज तक कोई नहीं जान पाया है। पृथ्वी के इतिहास में जन्मे मात्र दो अक्षरों के 'राम' के चरित्र-सागर की समानता करनेवाला आज तक कोई नहीं हुआ। इस संसार का गहन-गम्भीर रामाख्यान, लोक में कब से साधारण मनुष्यों से लेकर ज्ञानी ऋषियों, मनीषियों, कवियों द्वारा कहा, सुना गया और लिखा जा रहा है, यह भी किसी को नहीं ज्ञात है। कब यह लेखन पूर्ण होगा, कोई नहीं जानता। ‘रामचरित सतकोटि अपारा’ है जिसे ‘इदमित्थं’ नहीं कहा जा सकता।
Dastan Mughal Badshahon Ki
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
- Book Type:

- Description: इतिहास के समकालीन पन्ने भी सामान्य पाठक और हिन्दी माध्यम वाले छात्रों के लिए खुलें तो इतिहास के अवसान की घोषणा करनेवालों की आवाज़ मन्द ही नहीं पड़ेगी, अपितु बन्द ही हो जाएगी। इतिहास नई ताज़गी के साथ जीवित रहे, उसके लिए भी वापस उसी विषय की निगाह से उसे फिर देखा जाए, जिसके साथ वह 19वीं सदी तक चलता रहा था, जब तक इसका वर्गीकरण इस प्रकार से नहीं हुआ था। मॉमसेन के विषय में हम सब जानते हैं जिस इतिहासकार को उसकी कृति रोम के इतिहास पर 20वीं सदी के पहले दशक के अन्त में साहित्य का ‘नोबेल पुरस्कार’ मिला था, उसी तरह का इतिहास दिलचस्प भी होगा और अपने तथ्यों के साथ ईमानदार भी होगा।
Gharvaas
- Author Name:
Mridula Sinha
- Book Type:

- Description: "जेब की अमावस्या आकाश की अमावस्या से अधिक दर्द देनेवाली। आँखों के आगे सूर्य के प्रकाश में भी अँधेरा लानेवाली। वे भाग्यवान हैं, जिनकी जेब ही नहीं होती। एक बार चाँदनी रात की लत पड़ जाए तो अँधेरी रातें काटने को दौड़ती हैं। सच है, जिसके घर लक्ष्मी विराजती हो, प्रतिदिन दीपावली है। वैसे लक्ष्मी कभी अकेली नहीं आती। अपनी दोनों बहनों को भी न्योत लाती है। सरस्वती बहुत आनाकानी करती है, पर उन्हें भी आना ही पड़ता है। दुर्गा की शक्ति भी उस घर में शोभायमान होती है। तीनों बहनों में से किसी एक का भी अनादर हुआ, धीरे से एक के बाद एक, तीनों खिसक लेती हैं। जीवन में अर्थ की प्रधानता ने सारे पुरातन जीवन-मूल्यों को पीछे धकेला है। इसलिए दीपावली का रूप तो बदल गया, पर आडंबर बढ़ता जा रहा है। व्यक्ति अंदर से जितना अकेला और कमजोर होता जा रहा है, उतना ही पर्व-त्योहारों पर धूम-धड़ाका करने की उसकी लालसा बलवती होती जा रही है। गरीब-बेबस आदमी तो पैसेवाले के रहन-सहन, खान-पान, रीति-रिवाज को ही अपना आदर्श मानने लगता है। सदा से उसी आदर्श तक पहुँचने के असफल भगीरथ प्रयत्न में अपनी हड्डियाँ गलाता आया है। —इसी पुस्तक से दूसरे शहर में जाकर दो वक्त की रोटी और जीवनयापन के लिए अस्थायी विस्थापन का दंश झेलते श्रमिकों को केंद्र में रखकर लिखा गया पठनीयता से भरपूर उपन्यास। "
Magadhnama : Magadh Ke Itihas Ki Kathatmak Yatra
- Author Name:
Kumar Nirmalendu
- Book Type:

- Description: अपने आरम्भिक दिनों में वैदिक आर्य संस्कृति के प्रभाव से मुक्त रहा है। तब वह 'व्रात्य-सभ्यता' का केन्द्र हुआ करता था। वैसे आगे चलकर च्यवन और दधीचि जैसे ऋषियों का जन्म मगध में ही हुआ। अथर्ववेद की रचना भी यहीं हुई। मगध की धरती पर तेईसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को तत्वज्ञान हुआ, चौबीसवें तीर्थंकर वर्द्धमान महावीर को कैवल्य ज्ञान मिला; और गौतम सिद्धार्थ क्रो बुद्धत्व की प्राप्ति भी हुई। मगध की धरती पर यदि शूरवीरों की तलवारों की झंकार गूँजी; तो पूरी दुनिया को प्रेम, सत्य और अहिंसा का संदेश देनेवाले बुद्ध और महावीर की अमृतवाणी भी मुखरित हुई। महावीर ने राजगृह में पहला सामूहिक उपदेश दिया; और राजगृह के समीप पावापुरी में राजा संस्थिपाल के राजभवन में उनका देहान्त हुआ। कुल चौबीस जैन तीर्थंकरों में से दो को छोड़कर अन्य सभी ने मगध की धरती पर ही निर्वाण प्राप्त किया। यहीं खगोलविद् आर्यभट पैदा हुए और गद्यकवि बाणभट्ट भी। यहाँ चाणक्य और कामन्दक जैसे कूटनीति-दक्ष आचार्य हुए; तो जीवक और धनवन्तरि जैसे आयुर्वेदाचार्य भी। बिम्बिसार, अजातशत्रु, उदयिन, कालाशोक, महापद्मनन्द, चन्द्रगुप्त मौर्य, अशोक, पुष्यमित्र शुंग, चन्द्रगुप्त प्रथम, समुद्रगुप्त, चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य जैसे प्रतापी राजाओं की एक लम्बी शृंखला है, जिनकी जन्मदात्री होने पर किसी को भी गर्व हो सकता
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva
- Book Type:

- Description: अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Itihas, Sanskriti Aur Sampradayikta
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

-
Description:
गुणाकर मुळे को हम विज्ञान विषयों के लेखक के रूप में जानते हैं। उन्होंने हिन्दी पाठकों को सरलतम शब्दावली में विज्ञान की कठिन अवधारणाओं, आविष्कारों और खोजों से परिचित कराया। लेकिन उनके लेखन का उद्देश्य वैज्ञानिक दृष्टि को आमजन की जीवन-शैली और विचार का हिस्सा बनाना था। इसीलिए उन्होंने शुद्ध सूचनात्मक वैज्ञानिक लेखक के साथ संस्कृति, समाज, धर्म, अंधविश्वास आदि पर भी हमेशा लिखा। मार्क्सवाद उनकी वैचारिक भूमि रहा और आधुनिक जीवन-मूल्य उनके अभीष्ट। यह किताब उनके ऐसे ही लेखन का संकलन है जिसमें संस्कृति, धर्म, हिन्दुत्व की राजनीति, आर्यों का मूल आदि विभिन्न विषयों पर उनका लेखन शामिल है। पाठक इन लेखों में काफ़ी कुछ नया पाएँगे।
रामकथा को लीजिए। आज राम को लेकर देश में साम्प्रदायिक तनाव पैदा करने के प्रयास जारी हैं। मगर राम काफ़ी हद तक एक मिथकीय चरित्र है, इस बात के पर्याप्त सबूत वाल्मीकि-रामायण में ही मौजूद हैं।
शिवाजी जैसे कई ऐतिहासिक चरित्रों को विकृत रूप में पेश करके मुस्लिम-द्वेष को उभारने के प्रयास हो रहे हैं। मगर प्रामाणिक इतिहास इस बात की गवाही देता है कि शिवाजी रत्ती-भर भी मुस्लिम-द्वेषी नहीं थे। इस बात को 'ऐसा था शिवाजी का राजधर्म' लेख में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
इधर के वर्षों में देश में धार्मिक असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता में तेज़ी से वृद्धि हुई है। इस पर रोक लगाने के लिए आम जनता को शिक्षित करना अत्यावश्यक है—उनकी अपनी भाषा में। साम्प्रदायिकता अपने प्रचार-प्रसार के लिए आम जनता की भाषा का भरपूर उपयोग कर रही है। साम्प्रदायिकता के प्रतिकार के लिए भी जनता की भाषा का ही उपयोग होना चाहिए। इस तरह गुणाकर मुळे की यह पुस्तक तमाम मुद्दों से टकराते हुए ऐसे कैनवस की रचना करती है, जहाँ विचार-विमर्श अपने सृजनात्मक रूप में सम्भव हो सके।
Savarkar : Kalapani Aur Uske Baad
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
- Book Type:

-
Description:
यह किताब एक सावरकर से दूसरे सावरकर की तलाश की एक शोध-सिद्ध कोशिश है। सावरकर की प्रचलित छवियों के बरक्स यह किताब उनके क्रांतिकारी से राजनेता और फिर हिन्दुत्व की राजनीति के वैचारिक प्रतिनिधि तथा पुरोधा बनने तक के वास्तविक विकास क्रम को समझने का प्रयास करती है।
इसके लिए लेखक ने सावरकर के अपने विपुल लेखन के अलावा उनके सम्बन्ध में मिलने वाली तमाम पुस्तकों, तत्कालीन ऐतिहासिक स्रोतों, समकालीनों द्वारा ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रस्तुत दस्तावेज़ों आदि का गहरा अध्ययन किया है।
यह सावरकर की जीवनी नहीं है, बल्कि उनके ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केन्द्र में रखकर स्वतंत्रता आन्दोलन के एक बड़े फ़लक को समझने-पढ़ने का ईमानदार प्रयास है। कहने की ज़रूरत नहीं कि राष्ट्र की अवधारणा की आड़ लेकर क़िस्म-क़िस्म की ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक विकृतियों के आविष्कार और प्रचार-प्रसार के मौजूदा दौर में इस तरह के निष्पक्ष अध्ययन बेहद ज़रूरी हो चले हैं।
अशोक कुमार पांडेय ने इतिहास सम्बन्धी अस्पष्टताओं की वर्तमान पृष्ठभूमि में कश्मीर और गांधी के सन्दर्भ में अपनी पुस्तकों से सत्यान्वेषण का जो सिलसिला शुरू किया था, यह पुस्तक उसका अगला पड़ाव है और इस रूप में वर्तमान में एक आवश्यक हस्तक्षेप भी।
Itihas Chakkra
- Author Name:
Rammanohar Lohia
- Book Type:

- Description: वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में ऐसे नेताओं की कमी बहुत खलती है जो सत्ता की तिकड़मों के बजाय समाज और देश की वास्तविक चिन्ताओं को लेकर न सिर्फ़ सोचने की प्रवृत्ति रखते हों, बल्कि उनमें तमाम परिस्थितियों को एक व्यापक नज़रिए के साथ देखने की क्षमता भी हो। भारतीय राजनीति में एकाधिक व्यक्तित्व ऐसे रहे हैं जो अपनी वैचारिक उद्यमिता में विश्व का नेतृत्व करने की क्षमता रखते थे। राममनोहर लोहिया ऐसे ही नेता थे। अपने तकरीबन चार दशकों के राजनीतिक जीवन में वे ज़मीनी हक़ीक़तों के अध्ययन और चिन्तन-मनन में इस तरह व्यस्त रहे कि सत्ता-केन्द्रित राजनीति ने उन्हें बहुत अहमियत नहीं दी। न ही उन्होंने इसके लिए कोई हड़बड़ी दिखाई। और जब देश की निगाह उनकी सामर्थ्य की ओर गई, वे चले गए। लेकिन उनकी वैचारिक थाती उनके लेखन के रूप में आज भी हमारे पास है, और हम चाहें तो एक सम्पूर्ण तथा न्यायसंगत समाज का विज़न उनके आधार पर गढ़ सकते हैं। इस पुस्तक में हम इतिहास को लेकर उनकी दृष्टि तथा विचारों से अवगत होते हैं। देखने लायक है कि उनकी इतिहास-दृष्टि जन-गण के जीवन को कभी अपने सामने से ओझल नहीं होने देती। उनके शब्द हैं : “इतिहास को बनाने व समझने में एक हानिकारक भूल यह होती है कि आंशिक कौशल को पूर्ण कौशल समझ लिया जाए और संसार के एक भाग की स्थिति को समस्त संसार पर लागू मान लिया जाए। हम इतिहास के अब तक सूखे रेगिस्तान को ऐसी मृग मरीचिकाएँ और सपनों के ऐसे बाग़ न पैदा करने दें कि दिमाग़ को ऐसे बीजों को अंकुरित होते देखने का भ्रम हो जाए जो अभी बोए भी नहीं गए हैं।” यह पुस्तक लोहिया के इतिहास बोध और दृष्टि की परिचायक है।
Vikas Ki Rajneeti
- Author Name:
Vinay Sahasrabuddhe
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Jatiyon Ka Loktantra : Jati Aur Rajneeti
- Author Name:
Arvind Mohan
- Book Type:

- Description: दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों के विपरीत भारत में निर्धन, ग्रामीण और दलित-दमित लोगों की चुनावी भागीदारी एक विशेष परिघटना है, जिसे राजनीति-विज्ञानी रजनी कोठारी जाति और लोकतंत्र की अर्न्तक्रिया से आया बदलाव मानते हैं। उनका मानना था कि जाति और लोकतांत्रिक राजनीति की उथल-पुथल के बीच समाज में बदलाव की एक सकारात्मक धारा गतिमान रहती है। यह किताब मोटे तौर पर इसी स्थापना को लेकर चलती है। इसमें संकलित आलेख भारत में जाति व्यवस्था के अहम पड़ावों, उससे जुड़े तर्क-वितर्क और जाति को समझने की जद्दोजहद को सामने लाते हैं। चुनावों में उसकी भूमिका का विश्लेषण भी इसमें है। जाति के गुण-दोषों की विवेचना करनेवाले, उसके परिणामों को रेखांकित करते बाबा साहब, लोहिया और किशन पटनायक के लेख भी इसमें शामिल हैं। गांधी जाति को लेकर कैसे सोचते थे, और इसे लेकर आगे अपने जीवनकाल में क्या करना चाहते थे, इस विषय में भी पुस्तक का एक लेख विचारणीय बिन्दु प्रस्तुत करता है। इस समय जब अपनी पहचानों को लेकर बढ़ती सजगता समाज के हर स्तर पर गहरी बेचैनी पैदा कर रही है, और तकनीक के रास्ते पर तेजी से बढ़ती दुनिया में अपनी अस्मिता को बचाए-बनाए रखने की नई चुनौती सामने है, अपनी उस सामाजिक संरचना को समझना निश्चय ही उत्तेजक होगा, जिसके लिए पूरी दुनिया भारत को आश्चर्य से देखती है। यह किताब हमें इस दिशा में काफी आगे तक ले जाती है।
Aadhunik Itihas Mein Vigyan
- Author Name:
Om Prakash Prasad
- Book Type:

-
Description:
भारत में आधुनिक विज्ञान का नक़्शा बनाने में हिन्दुओं से ज़्यादा मुसलमानों और मुसलमानों से ज़्यादा भूमिका अंग्रेज़ों की रही। आज़ादी के पूर्व से ही भारत जात-पाँत और ऊँच-नीच के दलदल में फँसा हुआ है। आधुनिक भारतीय इतिहास पर भारत में जितनी पुस्तकें लिखी गईं, उनमें से अधिकांश के लेखक हिन्दू रहे। उनके द्वारा अधिकांश पुस्तकें भारत के प्रमुख नेताओं के पक्ष में, अंग्रेज़ों के विरोध में, मुसलमानों के योगदान और वैज्ञानिक गतिविधियों को नज़रअन्दाज़ करते हुए लिखी गईं।
आधुनिक काल के क़रीब सभी भारतीय वैज्ञानिक इंग्लैंड से विज्ञान पढ़-लिख-जान कर आए। भारत के निवासियों को अंग्रेज़ों ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा छूत-अछूत अथवा हिन्दू-मुसलमान में कोई भेदभाव न कर सबको एक नाम भारतीय दिया। भारत का मानचित्र भी अंग्रेज़ों ने तैयार किया। अंग्रेज़ी शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाएँ, बैंक, प्रयोगशाला, रेलवे आदि सब अंग्रेज़ों की देन है। कलकत्ता में अंग्रेज़ों ने अपने कर्मचारियों को भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए फ़ोर्ट विलियम कॉलेज नमक विशेष विद्यालय की स्थापना की थी, जहाँ भारतीय भाषाओं में अनेक पाठ्य-पुस्तकों की रचना भी की गई। अठारहवीं सदी में महलों, सड़कों, पुलों आदि से युक्त अनेक नए नगर पैदा हुए। अठारहवीं सदी में भारत में विशेष रूप से बंगाल में यूरोपीय शैली के भवन भी बनने लगे थे। 1882 में टेलीफ़ोन आया। 1914 में प्रथम ऑटोमेटिक टेलीफ़ोन एक्सचेंज लगाया गया। अगस्त 1945 से लम्ब्रेटा स्कूटर बनना शुरू हुआ।
प्रस्तुत पुस्तक में आधुनिक वैज्ञानिकों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है। इन सभी वैज्ञानिकों को सर्वाधिक प्रोत्साहन एवं प्रेरणा इंग्लैंड से मिली। प्रथम अध्याय में आधुनिक भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है। प्रथम और द्वितीय महायुद्ध के दौरान भारत में विज्ञान की एक विशेष धारा दिखाई देती है। आधुनिक तकनीक और सामाजिक विकास से भारत किन-किन रूपों में प्रभावित हुआ, इसका विशद वर्णन दूसरे अध्याय में किया गया है। इसके अलावा 'द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान तकनीक एवं समाज’, 'द्वितीय महायुद्ध के उपरान्त’, 'विज्ञान एवं पेट्रोल’, 'प्लास्टिक और चलचित्र तकनीक’, 'आपदा प्रबन्धन’ और 'भारतीय विज्ञान एवं अंग्रेज़ों का योगदान’ आदि अध्यायों में आधुनिक भारत में विज्ञान के विभिन्न चरणों पर संक्षेप में प्रकाश डाला गया है।
Rajbhasha Hindi
- Author Name:
Dr. Bholanath Tiwari
- Book Type:

- Description: "भारतीय संविधान में ‘राजभाषा’ के रूप में हिंदी को स्वीकृति मिले काफी समय हो गया है; किंतु अभी तक इससे संबद्ध सारी बातें पुसतक रूप में नहीं आ सकी हैं। प्रसिद्ध भाषा-शास्त्री डॉ. भोलानाथ तिवारी ने इस पुस्तक में पहली बार राजभाषा के रूप में हिंदी के उद्भव, विकास, उसकी वर्तमान स्थिति तथा उसके मानकीकरण, आधुनिकीकरण एवं अन्य समस्याओं को विस्तार से लिया है; साथ ही उन समस्याओं के समाधान के लिए यथास्थान सुझाव भी दिए हैं। राजभाषा से राष्ट्रलिपि की समस्या भी जुड़ी है। अत: यहाँ नागरी लिपि के ऐसे रूप पर भी विस्तार से विचार किया गया है, जो सभी भारतीय भाषाओं के लेखन में प्रयुक्त हो सके। इसमें परिवर्द्धित देवनागरी के अनेक चार्ट दिए हैं, जिनसे भारत की सभी लिपियों के साथ इसका तुलनात्मक अध्ययन सुगम हो गया है। पुस्तक का यह दूसरा संस्करण है — पूरी तरह संशोधित और परिवर्द्धित। इसमें अनेक नई चीजें जुड़ने से पहले संस्करण की तुलना में इसकी उपयोगिता और भी बढ़ गई है। "
Samvaidhanik-Rajnitik Vyavastha
- Author Name:
Subhash Kashyap
- Book Type:

-
Description:
इस पुस्तक में भारत सहित आठ प्रमुख राष्ट्रों की राजनीतिक व्यवस्था, शासन-प्रणाली और निर्वाचन-प्रक्रिया का एक सरल, सुगम और संक्षिप्त विवरण-विश्लेषण प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। भारत के अतिरिक्त जिन देशों का अध्ययन किया गया है, वे हैं—जर्मनी, ब्रिटेन, फ़्रांस, रूस, ऑस्ट्रेलिया, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका।
यह नितान्त आवश्यक है कि आम नागरिक अपनी स्वतंत्रताओं, अधिकारों और दायित्वों के प्रति सचेत हों और उस संवैधानिक राजनीतिक व्यवस्था के बारे में जानें जिसके अधीन वह रहते हैं और शासित होते हैं। अपनी व्यवस्था की उपलब्धियों और असफलताओं, अच्छाइयों और कमियों को पहचानने-समझने के लिए हमें विश्व के अन्य प्रमुख राष्ट्रों की व्यवस्थाओं और अनुभवों के बारे में भी जानकारी होनी चाहिए।
Singhbhum Ka Itihas: Pracheen Se Purv-Aupniveshik Kaal Tak
- Author Name:
Lalita Sundi
- Book Type:

- Description: औपनिवेशक पराधीनता झेल चुके समाजों का इतिहास जाने-अनजाने औपनिवेशक दृष्टिकोण के बोझ से दबा नजर आता है। भारत के आदिवासियों के सन्दर्भ में यह समस्या दोहरी रही है क्योंकि उनके सामने ब्रिटिश पराधीनता के साथ-साथ वर्चस्वशाली गैर-आदिवासी तबके का शोषण भी रहा है। दरअसल आदिवासियों का इतिहास भी अब तक ज्यादातर गैर-आदिवासी ही लिखते रहे हैं जिसमें उन्हें देखने के दो प्रमुख दृष्टिकोण रहे हैं। पहला, सब-आल्टर्न परिप्रेक्ष्य जिसमें इतिहास को नीचे से देखने अर्थात उपेक्षित-वंचित तबकों का इतिहास में समुचित उल्लेख करने और उन्हें वाजिब श्रेय देने पर जोर रहा है। और दूसरा, राष्ट्रवादी परिप्रेक्ष्य जिसमें मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन में आदिवासियों की भूमिका को रेखांकित किया जाता रहा है। ये दोनों दृष्टिकोण भी आदिवासी समुदायों को अन्य और विशिष्ट सांस्कृतिक समूह मानने की औपनिवेशिक भ्रान्ति से मुक्त नहीं रह पाए। इसलिए इन दोनों तरह के इतिहासकारों के लेखन में प्राचीन और मध्यकालीन आदिवासी राजवंशों और गणराज्यों की प्रभावी उपस्थिति का जिक्र या आकलन न के बराबर मिलता है। ललिता सुंडी की यह पुस्तक उपरोक्त सीमाओं को लाँघकर आदिवासी इतिहास को बहुआयामी स्वरूप प्रदान करती है। इसमें सिंहभूम की भौगोलिक स्थिति, प्राचीन इतिहास, राजवंशों का उदय, राजनीतिक परिदृश्य, सामाजिक-सांस्कृतिक परम्पराएँ, पारम्परिक शासनप्रणाली, क्षेत्र के प्रमुख आदिवासी समुदायों का महत्व और उनका परस्पर सम्बन्ध आदि तमाम विषयों को समाहित किया गया है। इस ऐतिहासिक विवेचना में सिंहभूम के अर्थशास्त्रीय पक्ष को भी शामिल किया गया है। वस्तुतः यह पुस्तक सिंहभूम के हवाले से आदिवासियों के प्रति रूढ़ दृष्टिकोण को नकारने की एक शोधपरक पहल है जिसमें उन्हें सिर्फ जंगल और पिछड़ेपन से जोड़कर देखे जाने के विपरीत उनके समृद्ध इतिहास को प्रस्तुत किया गया है। इसका दस्तावेजी महत्त्व असंदिग्ध है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book