Kashmir Ka Sahitya
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भारत की बहुभाषिकता भारत की शक्ति है तो भारतीय सृजनधर्मी साहित्य का सौंदर्य भी। कश्मीर का साहित्य वहां के जन की सृजनधर्मिता में विकसित हुई। लगभग 40 वर्षों से कश्मीर को दूर से देखा जा रहा था। इस दूर से देखने का असर कश्मीर में प्रस्फुटित साहित्य को देखने-जानने पर भी हुआ। परिणामतः कश्मीरी साहित्य विशेषतः कश्मीरी भाषा में लिखा गया। कश्मीर में रहकर जो कश्मीरी भाषा में लिखा जा रहा था, वह सब अपरिचित-सा हो गया। विस्थापित कश्मीरी समूह जहां विस्थापन की पीड़ा में सिमटकर रह गया, वही कश्मीर के अंदर जो लोग लिख रहे थे, घाटी में जो लोग लिख रहे थे, उनमें जाने-अनजाने कश्मीरियत की पहचान, ऐसी पहचान जो शेष भारत से अलग, अलहदा यह देखने लगा। और कश्मीर के लेखन में भारत अनुपस्थिति-सा हो गया। साहित्य में भारत लोग की और लोक मन की उपस्थिति है। स्वतंत्रता के पूर्व यहां तक की बीसवीं सदी में नब्बे के दशक के पूर्व तक के सृजनात्मक लेखन में यह लोक मन सर्वत्र परिलक्षित होता है और कश्मीर के वैशिष्ट्य के साथ भारतीयता का अनुरणन करता है पर नब्बे के बाद अलग, अलहदा कश्मीर और उस पर पांथिक उन््माद तथा आतंक की छाया ने सबकुछ खत्म कर दिया। संवेदना और सद्भाव, जो कुछ लिखा जा रहा था, उससे तिरोहित हो गया। नेह छोह नाते लुप्त हो गए। पर काल का परिवर्तन हुआ है। भारत का भारत के लिए कश्मीर का भाव जम्मू कश्मीर की आवोहवा में प्रसारित हुआ है। भारत के साथ एकात्म और अभिन्न भाव जम्मू कश्मीर के स्वर सब ओर गुंजरित हो रहे हैं। ऐसे में कश्मीर के साहित्यिक संसार का एक सम्यक् आकलन आवश्यक और अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है। इस अपरिहार्यता को दृष्टिगत कर प्रस्तुत ग्रंथ कश्मीर के साहित्य संसार की संक्षिप्त समीक्षा है। कविता, कहानी, साहित्य, कश्मीर की भाषा की विशिष्टताओं को प्रतिनिधि तौर पर प्रस्तुत करने की यह कोशिश है.
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भारत की बहुभाषिकता भारत की शक्ति है तो भारतीय सृजनधर्मी साहित्य का सौंदर्य भी। कश्मीर का साहित्य वहां के जन की सृजनधर्मिता में विकसित हुई। लगभग 40 वर्षों से कश्मीर को दूर से देखा जा रहा था। इस दूर से देखने का असर कश्मीर में प्रस्फुटित साहित्य को देखने-जानने पर भी हुआ।
परिणामतः कश्मीरी साहित्य विशेषतः कश्मीरी भाषा में लिखा गया। कश्मीर में रहकर जो कश्मीरी भाषा में लिखा जा रहा था, वह सब अपरिचित-सा हो गया। विस्थापित कश्मीरी समूह जहां विस्थापन की पीड़ा में सिमटकर रह गया, वही कश्मीर के अंदर जो लोग लिख रहे थे, घाटी में जो लोग लिख रहे थे, उनमें जाने-अनजाने कश्मीरियत की पहचान, ऐसी पहचान जो शेष भारत से अलग, अलहदा यह देखने लगा। और कश्मीर के लेखन में भारत अनुपस्थिति-सा हो गया। साहित्य में भारत लोग की और लोक मन की उपस्थिति है।
स्वतंत्रता के पूर्व यहां तक की बीसवीं सदी में नब्बे के दशक के पूर्व तक के सृजनात्मक लेखन में यह लोक मन सर्वत्र परिलक्षित होता है और कश्मीर के वैशिष्ट्य के साथ भारतीयता का अनुरणन करता है पर नब्बे के बाद अलग, अलहदा कश्मीर और उस पर पांथिक उन््माद तथा आतंक की छाया ने सबकुछ खत्म कर दिया। संवेदना और सद्भाव, जो कुछ लिखा जा रहा था, उससे तिरोहित हो गया। नेह छोह नाते लुप्त हो गए। पर काल का परिवर्तन हुआ है।
भारत का भारत के लिए कश्मीर का भाव जम्मू कश्मीर की आवोहवा में प्रसारित हुआ है। भारत के साथ एकात्म और अभिन्न भाव जम्मू कश्मीर के स्वर सब ओर गुंजरित हो रहे हैं। ऐसे में कश्मीर के साहित्यिक संसार का एक सम्यक् आकलन आवश्यक और अपरिहार्य प्रतीत हो रहा है। इस अपरिहार्यता को दृष्टिगत कर प्रस्तुत ग्रंथ कश्मीर के साहित्य संसार की संक्षिप्त समीक्षा है। कविता, कहानी, साहित्य, कश्मीर की भाषा की विशिष्टताओं को प्रतिनिधि तौर पर प्रस्तुत करने की यह कोशिश है.
Book Details
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ISBN9789355212559
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Pages276
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Avg Reading Time9 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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‘शालभञ्जिका’ शब्द प्राचीन भारतीय कला की एक विशेष लोकप्रिय ललित मुद्रा का वाचक था। इसके ज्वलन्त उदाहरण भारत के विविध ऐतिहासिक केन्द्रों से प्राप्य हैं, जिसमें उच्चित्रित सुन्दरी अपने एक हाथ से वृक्ष-शाखा को नमित एवं दूसरा कटि-प्रदेश पर अलम्बित करती त्रिभङ्ग मुद्रा में विलसित है। कला के अतिरिक्त संस्कृत, पालि एवं प्राकृत साहित्य में भी इस ललित कला-मुद्रा का प्रचुर निरूपण प्राप्य है। इससे विशेष रूप से प्रभावित होनेवाले कवियों, लेखकों एवं समीक्षकों में अश्वघोष, कालिदास, श्रीहर्ष, बाणभट्ट, राजशेखर एवं गोवर्द्धनाचार्य उल्लेखनीय हैं। इनके ग्रन्थों में प्राप्य तत्सम्बन्धी विवरण कला, इतिहास एवं दर्शन की दृष्टि से रोचक, सारगर्भित एवं ज्ञानवर्द्धक हैं।
भारतीय कला के मर्मज्ञ डॉ. उदय नारायण राय ने प्राचीन ग्रन्थों का मन्थन कर साहित्यिक एवं पुरातत्त्वीय साक्ष्यों में सुन्दर सामंजस्य स्थापित करते हुए प्रस्तुत ग्रन्थ में इस ललित कला-मुद्रा का विस्तृत ऐतिहासिक परिचय एकत्र उपलब्ध कराने का अभिमत प्रयास किया है।
Swatantrata Aandolan Ka Itihas (1857-1947)
- Author Name:
Shashiprabha Srivastav
- Book Type:

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स्वतंत्रता का महापर्व पीड़ा, यातना, त्याग व बलिदान के बीहड़ मार्ग से होकर आया है। इस मार्ग पर लहूलुहान होती, मरती-खपती एक पूरी की पूरी पीढ़ी ने अपना जीवनकाल गुज़ारा है। न्याय व अधिकार के लिए संघर्षरत पिछली पीढ़ी के साहस, ओज, शक्ति और साथ ही उसकी पीड़ा, यातना, त्याग का ज्ञान अपनी पूरी गरिमा के साथ नई पीढ़ी को होना ही चाहिए। यह संघर्ष उस शक्ति से था जिसके राज्य में सूर्य कभी अस्त ही नहीं होता था। हम विजयी हुए, इसलिए कि पूरा भारत अपनी विभिन्न प्रतिरोधक शक्तियों के साथ उठ खड़ा हुआ। यह युद्ध एक साथ राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक और धार्मिक सभी मंचों से लड़ा गया। अंग्रेज़ों के साथ लड़ते हुए हमने अपनी बुराइयों तथा अपने लोगों से भी युद्ध किया।
इस पुस्तक के दादा जी यूँ तो काल्पनिक पात्र हैं, लेकिन यदि कहा जाए कि राष्ट्रीय आन्दोलन की आत्मा को उनमें केन्द्रित किया गया है तो झूठ न होगा। उस दौर में अनेक ऐसे लोग थे जिन्होंने आन्दोलन के पीछे रहकर काम किया। साम्राज्यवाद की मार से बिखरे-टूटे परिवार के सदस्यों को सहारा ही नहीं दिया, उन्हें माता-पिता की कमी तक खलने नहीं दी। साम्प्रदायिक दंगों तथा विभाजन के अवसर पर हारे-थके बेसहारा लोगों की रक्षा की। अपने को, अपने व्यक्तिगत सुख, लाभ-हानि को भुलाकर पूरी तरह गांधीवादी विचारधारा में डूब गए। मगर आज वे गुमनामी की दुनिया में खो गए हैं। ऐसी सभी पुण्य आत्माओं को दादा जी के रूप में याद किया गया है। दादा जी के सहारे ही इस इतिहास खंड को कथात्मक रूप दिया जा सका है।
ज़रूरत इस बात की है कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता-संग्राम से किशोर पाठकों का भावनात्मक लगाव उत्पन्न
हो। वे इस संघर्ष की गौरवमय कथा को जानें, स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करें और आज़ादी के वास्तविक मूल्य को पहचानें। किशोर पाठकों के लिए सरल-सहज भाषा-शैली में लिखी गई यह पुस्तक निश्चय ही चाव से पढ़ी जाएगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Keval Daliton Ke Masiha Nahi Hain Ambedkar
- Author Name:
Sukan Paswan Pragyachakshu
- Book Type:

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बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने सदियों से सभी तरह के अधिकार एवं सुविधा से वंचित जनसमूहों में यदि चेतना का संचार किया और उन्हें शिक्षित, संगठित होकर संघर्ष करने का मार्ग बताया तो यह उनका दलित-प्रेम नहीं; बल्कि सभी मूल, कुल, वंश, जाति, गोत्र, नस्ल, सम्प्रदाय, वर्ग, वर्ण के अधिकार-वंचितों की सच्ची सेवा का दुर्लभ उदाहरण है। सुविधा तथा अधिकार-वंचित मात्र दलित ही नहीं हैं, वे भी हैं जिनकी उन्नति तथा समृद्धि के सभी मुहानों को उद्धारक कहलाने वाले मायावी मानवों ने अवरुद्ध कर रखा है। इस पुस्तक का प्रणयन डॉ. अम्बेडकर के इन्हीं अवदानों को रेखांकित करने के लिए किया गया है।
श्रम-समस्या, नारी-उत्थान, धर्म, सामाजिक न्याय, उद्योग, कृषि, मानव-संसाधन, जल-संसाधन, बीमा उद्योग, मद्यनिषेध, शिक्षा, लोकतंत्र, कार्यपालिका, न्यायपालिका, व्यवस्थापिका, संघीय शासन प्रणाली, भाषायी प्रान्त और राष्ट्रभाषा आदि विषयों पर डॉ. अम्बेडकर के चिन्तन तथा सिद्धान्त आज भी प्रासंगिक हैं।
पुस्तक में इन विषयों के सन्दर्भ में उनके विचारों पर सविस्तार विचार किया गया है जिससे स्पष्ट होता है कि बाबा साहब के विचार समष्टिभावी हैं, व्यष्टिभावी नहीं।
Rashtrapita Mahatma Gandhi
- Author Name:
Mahesh Sharma
- Book Type:

- Description: देश की आजादी तथा दु:खी मानवता के उद्धार के लिए गांधीजी जीवन भर संघर्षरत रहे। उनकी यात्रा पोरबंदर से आरंभ होकर राजकोट, इंग्लैंड, डरबन, जोहांसबर्ग, अहमदाबाद और कलकत्ता आदि से गुजरती हुई दिल्ली में समाप्त हुई। वे अंत समय तक देश-निर्माण, सांप्रदायिक सौहार्द, एकता-अखंडता के लिए कार्य करते रहे। अहिंसा गांधीजी का अचूक अस्त्र था, जो एटम बम से भी ज्यादा ताकतवर था। अंग्रेज सरकार उनके सत्याग्रह और अहिंसा से बहुत खौफ खाती थी। उन्होंने खादी को घर-घर पहुँचाया और स्वदेशी को प्रोत्साहन दिया। स्वयं अछूतें के साथ रहकर उनके दु:ख-दर्द को महसूस किया और उन्हें बराबरी का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया। उन्हें अनेक बार जेल-यात्रा करनी पड़ी। सत्याग्रह की ताकत ने गांधीजी को महात्मा बनाया और इसके बल पर उन्होंने आजादी के समर में प्रत्येक देशवासी को एक सिपाही के रूप में बदल दिया। सत्यवादिता ने उनमें आत्मिक शक्ति भर दी थी कि उनके एक आह्वान पर लाखों लोग सिर कटाने को तैयार हो जाते थे। गांधीजी के बारे में जितना लिखा-पढ़ा जाए, कम है। कृतज्ञ राष्ट्र ने अपने प्यारे बापू को ‘राष्ट्रपिता’ के सम्मान से विभूषित किया। एक युगपुरुष और महान् व्यक्ति के अंतहीन कार्यों की ब्योरेवार जानकारी देती एक प्रेरणादायी पुस्तक।
Vidrohi Mahatma
- Author Name:
Nandkishore Acharya
- Rating:
- Book Type:

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गाँधी के लिए नैतिक ही आध्यात्मिक है, मनुष्य ईश्वर की साकार प्रतिच्छवि है और जीवन की दैनन्दिनी ही ईश्वर का कार्यकलाप। यही वह चीज है जो गाँधी की आध्यात्मिकता को धार्मिक पाखंड से अलग करके उसे व्यक्ति के नैतिक व आंतरिक उत्तरदायित्व से जोड़ देती है। लौकिक सन्दर्भों में उसे मानवसुलभ और व्यापक बना देती है।
इस पुस्तक में नन्दकिशोर आचार्य गाँधी विषयक उन धारणाओं का उन्मूलन करते हैं जो गाँधी-विरोधियों के लिए लगभग फ़ैशन हो चली है। वे आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि कबीर को उनकी आध्यात्मिकता के बावजूद क्रान्तिकारी या विद्रोही मानने वाले विद्वान कबीर के समकक्ष, बल्कि अधिक व्यापक गाँधी की आध्यात्मिकता के चरित्र को क्यों नहीं समझ पाते?
इसी तरह मार्क्स समेत अनेक विचारकों द्वारा हिंसा को स्वीकार्य मान लिए जाने के बावजूद, गाँधी द्वारा अहिंसा को एक अस्त्र के ही रूप में प्रस्तुत करना, उसे साधना खुद में एक क्रांतिकारी घटना थी जिसने मनुष्य के निज विवेक को समूह के अचिंतित आवेगों-उद्वेगों से ऊपर और अपेक्षाकृत ज़्यादा शक्तिशाली बताया, जो मानव के रचनात्मक पक्ष की उत्तरजीविता की ज्यादा भरोसेमंद गारंटी देता है।
साध्य के मुक़ाबले साधन की पवित्रता पर ज़ोर देना, निर्बलतम के कल्याण को सभ्यता की कसौटी मानना और किसी भी विचार की पहली प्रयोग स्थली अपने ही जीवन और देह को बनाना—इन सबको भले ही आज वाचल और अर्थ-क्षरित जुमलेबाजियों ने घिस-घिसकर बेअसर कर दिया हो, लेकिन अपने मस्तिष्क की सफाई करके देखें तो ये सचमुच ही बड़े और क्रान्तिधर्मी विचार हैं जो हमारी जीवन तथा विश्वदृष्टि को आमूल बदल सकते हैं। गाँधी को एक नए सिरे से जानने के लिए इस पुस्तक को अवश्य पढ़ें।
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