Sardar Patel Tatha Bhartiya Musalman
(0)
Author:
Vishwanath Sachdev, Rafiq ZakariaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
199
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भारत के प्रथम गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल पर उनके जीवन के अन्तिम वर्षों में और उनकी मृत्यु के बाद तो और भी ज़्यादा यह आरोप चस्पाँ होता गया है कि उनकी सोच में मुस्लिम-विरोध का पुट मौजूद था। इस पुस्तक में देश के जाने-माने बौद्धिक डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया ने बिना किसी आग्रह-पूर्वाग्रह के इस आरोप की असलियत की जाँच-पड़ताल की है और इसकी तह तक गए हैं। सरदार पटेल के तमाम बयानात, उनके राजनीतिक जीवन की विविध घटनाओं और विभिन्न दस्तावेज़ों का सहारा लेते हुए विद्वान लेखक ने यहाँ उनकी सोच और व्यवहार का खुलासा किया है। इस खोजबीन में उन्होंने यह पाया है कि देश-विभाजन के दौरान हिन्दू शरणार्थियों की करुण अवस्था देखकर पटेल में कुछ हिन्दू-समर्थक रुझानात भले ही आ गए हों पर ऐसा एक भी प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह पता चले कि उनके भीतर भारतीय मुसलमानों के विरोध में खड़े होने की कोई प्रवृत्ति थी। महात्मा गांधी के प्रारम्भिक सहकर्मी के रूप में सरदार पटेल ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के जैसे शानदार उदाहरण गुजरात में प्रस्तुत किए थे, उन्हें अन्त तक बनाए रखने की प्रबल भावना उनमें बार-बार ज़ाहिर होती रही। मोहम्मद अली जिन्ना और ‘मुस्लिम लीग’ का कड़ा विरोध करने का उनका रवैया उनके किसी मुस्लिम विरोधी रुझान को व्यक्त करने के बजाय उनकी इस खीझ को व्यक्त करता है कि लाख कोशिशों के बावजूद भारत की सामुदायिक एकता को वे बचा नहीं पा रहे हैं। कूटनीतिक व्यवहार की लगभग अनुपस्थित और खरा बोलने की आदतवाले इस भारतीय राष्ट्र-निर्माता की यह कमज़ोरी भी डॉ. ज़करिया चिन्हित करते हैं कि ‘मुस्लिम लीग’ के प्रति अपने विरोध की धार उतनी साफ़ न रख पाने के चलते कई बार उन्हें ग़लत समझ लिए जाने की पूरी गुंजाइश रह जाती थी। निस्सन्देह, सरदार वल्लभभाई पटेल के विषय में व्याप्त कई सारी ग़लतफ़हमियाँ इस पुस्तक से काफ़ी हद तक दूर हो जाएँगी।
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भारत के प्रथम गृहमंत्री लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल पर उनके जीवन के अन्तिम वर्षों में और उनकी मृत्यु के बाद तो और भी ज़्यादा यह आरोप चस्पाँ होता गया है कि उनकी सोच में मुस्लिम-विरोध का पुट मौजूद था। इस पुस्तक में देश के जाने-माने बौद्धिक डॉ. रफ़ीक़ ज़करिया ने बिना किसी आग्रह-पूर्वाग्रह के इस आरोप की असलियत की जाँच-पड़ताल की है और इसकी तह तक गए हैं। सरदार पटेल के तमाम बयानात, उनके राजनीतिक जीवन की विविध घटनाओं और विभिन्न दस्तावेज़ों का सहारा लेते हुए विद्वान लेखक ने यहाँ उनकी सोच और व्यवहार का खुलासा किया है।
इस खोजबीन में उन्होंने यह पाया है कि देश-विभाजन के दौरान हिन्दू शरणार्थियों की करुण अवस्था देखकर पटेल में कुछ हिन्दू-समर्थक रुझानात भले ही आ गए हों पर ऐसा एक भी प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह पता चले कि उनके भीतर भारतीय मुसलमानों के विरोध में खड़े होने की कोई प्रवृत्ति थी। महात्मा गांधी के प्रारम्भिक सहकर्मी के रूप में सरदार पटेल ने हिन्दू-मुस्लिम एकता के जैसे शानदार उदाहरण गुजरात में प्रस्तुत किए थे, उन्हें अन्त तक बनाए रखने की प्रबल भावना उनमें बार-बार ज़ाहिर होती रही। मोहम्मद अली जिन्ना और ‘मुस्लिम लीग’ का कड़ा विरोध करने का उनका रवैया उनके किसी मुस्लिम विरोधी रुझान को व्यक्त करने के बजाय उनकी इस खीझ को व्यक्त करता है कि लाख कोशिशों के बावजूद भारत की सामुदायिक एकता को वे बचा नहीं पा रहे हैं।
कूटनीतिक व्यवहार की लगभग अनुपस्थित और खरा बोलने की आदतवाले इस भारतीय राष्ट्र-निर्माता की यह कमज़ोरी भी डॉ. ज़करिया चिन्हित करते हैं कि ‘मुस्लिम लीग’ के प्रति अपने विरोध की धार उतनी साफ़ न रख पाने के चलते कई बार उन्हें ग़लत समझ लिए जाने की पूरी गुंजाइश रह जाती थी। निस्सन्देह, सरदार वल्लभभाई पटेल के विषय में व्याप्त कई सारी ग़लतफ़हमियाँ इस पुस्तक से काफ़ी हद तक दूर हो जाएँगी।
Book Details
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ISBN9789389577471
-
Pages152
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Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: अफ़गान-संकट पर दुनिया की अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं लेकिन यह ग्रन्थ ज़रा लीक से हटकर है। यह अफ़ग़ानिस्तान के वर्तमान संकट की जड़ों को खोजने के लिए उसके अतीत को खँगालता है और अतीत की व्याख्या उसके वर्तमान के सन्दर्भ में करता है। अफ़ग़ानिस्तान के अतीत और वर्तमान इस ग्रन्थ में सतत संगोष्ठी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह ग्रन्थ अफ़ग़ानिस्तान का कोरा इतिहास नहीं है। उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य का दर्शन है। यह अफ़ग़ानिस्तान के त्रिकाल की जीवन्त और सरस व्याख्या है। हिन्दी में ही नहीं, दुनिया की किसी भी भाषा में समसामयिक अफ़ग़ानिस्तान पर प्रस्तुत किया जानेवाला यह सर्वप्रथम मौलिक ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ से पाठकों को पता चलेगा कि आर्यों, बौद्धों और हिन्दुओं का यह देश कभी ‘आर्याना’ कहलाता था। पाणिनी, गांधारी और गोरखनाथ का यह देश इस्लामी कैसे बना? यह देश अब भी इस्लाम से संचालित होता है या उसके पहले से चली आ रही जातीय परम्पराओं से? अफ़ग़ानिस्तान में ऐसे कौन-से ख़ज़ाने छिपे हुए हैं, जिन्हें पाने के लिए ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों ने काबुल में अपने घुटने तुड़वाए और विश्व-विजेता सिकन्दर, सम्राट अशोक तथा चंगेज़ ख़ान ने हिन्दुकुश के गगनचुम्बी हिम-शिखरों को पार किया? पिछले दो सौ वर्षों में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने अफ़ग़ानिस्तान में क्या-क्या विविध और विलक्षण रूप धारण किए और आगामी समय में उसका हश्र क्या हो सकता है, इसका विवेचन डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे अधिकारी विद्वान से बेहतर कौन कर सकता है? रूसी और फ़ारसी भाषा के जानकार तथा कई दशकों से अफ़ग़ानिस्तान की शोध-यात्राएँ करनेवाले डॉ. वैदिक ने अफ़ग़ान राजवंशों की अन्दरूनी खींचतान और सत्तारूढ़ गुटों की राजनीति के अनेक अनजाने पहलुओं को भी इस ग्रन्थ में उजागर किया है। अफ़ग़ानिस्तान आतंकवाद का अड्डा कैसे बना और उससे मुक्त कैसे हुआ, इसका चित्रोपम वर्णन तो इस ग्रन्थ में है ही, भारत-पाक-अफ़ग़ान सम्बन्धों के अनेक रहस्यमय और रोचक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह ग्रन्थ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, शोधकर्त्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।
Karmayogi Sannyasi Yogi Adityanath
- Author Name:
Rahees Singh
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Khandhar Bolte Hai
- Author Name:
Gunakar Muley
- Book Type:

-
Description:
किसी देश के इतिहास और सांस्कृतिक विकास-क्रम को जानने-समझने में अन्य स्रोतों के साथ ऐतिहासिक इमारतों और क़िलों का भी ख़ासा योगदान होता है। वे हमारे लिए अतीत का साक्षात् आईना होते हैं।
इतिहास, पुरातत्त्व, पुरालिपि और मुद्राशास्त्र के उद्भट विद्वान और विज्ञान को सरल भाषा में सामान्य पाठक के लिए सुगम बनानेवाले जनप्रिय लेखक गुणाकर मुळे की यह पुस्तक हमें उन खँडहरों की यात्रा पर ले जाती है, जिनमें हमारे इतिहास की लोमहर्षक गाथाएँ छिपी हैं।
कौन-सा क़िला कब अस्तित्व में आया, उसका निर्माण किसने कराया, वह किन युद्धों का साक्षी रहा, इन सब तथ्यों की प्रामाणिक जानकारी के साथ यह पुस्तक तत्कालीन राजवंशों के चित्रों, उस समय प्रयोग में आनेवाले अस्त्रों, क़िलों की बनावट, निर्माण कला और हवेलियों आदि का भी सम्यक् ब्यौरा उपलब्ध कराती है। बीच-बीच में नक़्शों के द्वारा भी विषय को स्पष्ट किया गया है।
कहना न होगा कि इतिहास के रोमांचक गलियारों का रहस्य खोलती यह पुस्तक न सिर्फ़ इतिहास के विद्यार्थियों के लिए, बल्कि सामान्य पाठकों के लिए भी अत्यन्त उपयोगी है।
Patriots and Partisans
- Author Name:
Ramchandra Guha
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- Description: In this wide-ranging collection of essays, Ramachandra Guha defends the liberal centre against the dogmas of left and right, and does so with style, depth, and polemical verve. Among the subjects on which he turns a critical eye are Hindutva, the Communist left and the dynasty-obsessed Congress party. Whether writing about politics, profiling individuals or analysing social trends, Guha displays a masterly touch, confirming his standing as India's most admired historian and public intellectual. Key Features: Written in a wonderfully readable style, will provoke much debate and discussion Covering a wide range of subjects of contemporary relevance, such as: An essay on the threats to the Indian republic from the Right, the Left and the state itself An analysis comparing and contrasting two old men, PM Manmohan Singh and Anna Hazare An examination of the dynasty-obsessed Congress Party and its culture of sycophancy Hindutva hate mail which floods the Internet
‘Kaun Hain Bharat Mata?’
- Author Name:
Purushottam Agarwal
- Book Type:

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यह भारतमाता कौन है, जिसकी जय आप देखना चाहते हैं’? 1936 की एक सार्वजनिक सभा में जवाहरलाल नेहरू ने लोगों से यह सवाल पूछा। वही जवाहरलाल जो भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन के सबसे महत्त्वपूर्ण नायकों में रहे और बाद में देश के पहले प्रधानमंत्री भी बने। फिर उन्होंने कहा : बेशक ये पहाड़ और नदियाँ, जंगल और मैदान सबको बहुत प्यारे हैं, लेकिन जो बात जानना सबसे ज़रूरी है वह यह कि इस विशाल भूमि में फैले भारतवासी सबसे ज़्यादा मायने रखते हैं। भारतमाता यही करोड़ों-करोड़ जनता है और भारतमाता की जय उसकी भूमि पर रहने वाले इन सब की जय है।’ यह किताब इस सच्ची लोकतांत्रिक भावना और समावेशी दृष्टिकोण को धारण करने वाले शानदार दिमाग़ को हमारे सामने रखती है। यह पुस्तक आज के समय में ख़ासतौर से प्रासंगिक है जब ‘राष्ट्रवाद’ और ‘भारतमाता की जय’ के नारे का इस्तेमाल भारत के विचार को एक आक्रामक चोगा पहनाने के लिए किया जा रहा है जिसमें यहाँ रहनेवाले करोड़ों निवासियों और नागरिकों को छोड़ दिया गया है।
‘कौन हैं भारतमाता?’ में नेहरू की क्लासिक किताबों—‘आत्मकथा’, ‘विश्व इतिहास की झलक’ और ‘भारत की खोज’—से लेख और अंश लिये गए हैं। उनके भाषण, निबन्ध और पत्र, उनके कुछ बहुत प्रासंगिक साक्षात्कार भी इसमें हैं। संकलन के दूसरे भाग में नेहरू का मूल्यांकन करते हुए अन्य लेखकों के अलावा महात्मा गांधी, भगत सिंह, सरदार पटेल, मौलाना आज़ाद, अरुणा आसफ़ अली, रामधारी सिंह ‘दिनकर’, अली सरदार जाफ़री, बल्देव सिंह, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, रिचर्ड एटनबरो, ली कुआन यू और अटल बिहारी वाजपेयी के आलेख शामिल हैं। बहुत सारे विषयों से गुँथी इस किताब के पन्नों में—जिसमें एक बहुत शानदार प्रस्तावना भी है—नेहरू एक ऐसे महत्त्वपूर्ण कर्मशील व विचारशील व्यक्ति के रूप में उभरते हैं जिनमें भारत की सभ्यतामूलक आत्मा की एक सहज समझदारी थी और साथ ही वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता भी; और एक राजनेता के रूप में राजनीति की सारी मजबूरियों के बावजूद जो हमेशा एक लोकतंत्रवादी बने रहे। उनकी विरासत आज भी महत्त्वपूर्ण बनी हुई है—शायद हमारे इतिहास के किसी भी दौर से ज़्यादा वह आज प्रासंगिक है।
Upari Gangaghati Dwitiya Nagarikaran
- Author Name:
Sanju Mishra
- Book Type:

- Description: ऊपरी गंगा के मैदान में नगरीकरण से सम्बन्धित ज्ञान के मुख्य आधार साहित्यिक साक्ष्यों के साथ-साथ पुरातात्त्विक अन्वेषण एवं उत्खनन है। भारत में नगरों के आविर्भाव की प्राचीनता ताम्राश्म काल में हड़प्पा एवं मोहनजोदड़ो नामक स्थानों पर बने हुए नगरों के सन्निवेश तथा उनके सामाजिक एवं आर्थिक जीवन के दृष्टान्तों से सिद्ध हो जाती है, किन्तु द्वितीय सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व के मध्य में सैन्धव सभ्यता के विनाश के साथ ही सम्पूर्ण भारत पुनः ग्राम्य संस्कृति में लौट आया तथा एक हजार वर्षों के लम्बे अन्तराल के पश्चात् छठी शताब्दी ईसा पूर्व में, गंगा के मैदान में षोडश महाजनपदों का उद्भव राजनीतिक इकाइयों के रूप में उत्तर भारत में हुआ। छठी शताब्दी ईसा पूर्व का काल उत्तर भारत में अनेकानेक नवीन परिवर्तनों का काल था तथा ये परिवर्तन जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में दिखाई देते हैं। इसे द्वितीय नगरीकरण की संज्ञा दी गई है। पुरातात्त्विक भाषा में इसे उत्तरी कृष्ण मार्जित पत्र-परम्परा संस्कृति के प्रारम्भ का काल माना जा सकता है। इस शोध-प्रबन्ध के माध्यम से ऊपरी गंगा के मैदान के पुरातात्त्विक अनुक्रम का तथा द्वितीय नगरीकरण से सम्बन्धित नगरीय साक्ष्यों का क्रमबद्ध एवं सुव्यवस्थित ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक अध्धयन प्रस्तुत करने का यथासम्भव प्रयास किया गया है।
Bharat : Sanskritik Chetna Ka Adhishthan
- Author Name:
Baldev Bhai Sharma
- Book Type:

- Description: ऋग्वेद में उल्लेख है ‘भद्रं इच्छन्ति ऋषयः’, ऋषि लोककल्याण की कामना से जीवन जीते हैं। लोकहित के लिए सोचना और कर्म करना यही ऋषि की पहचान है। इसीलिए भारत को ऋषि-परंपरा का देश कहा जाता है। यह उन्हीं ऋषियों का उद्घोष है—सर्वे भवन्तु सुखिनः/सर्वे सन्तु निरामया/सर्वे भद्राणि पश्यन्तु/मा कश्चिद् दुखभाग्भवेत्। यानी सब सुखी हों, सब निरोग हों, सब एक-दूसरे की भलाई में रत रहें, किसी के कारण किसी को दुख न पहुँचे। भारत की संस्कृति इसी भावबोध का विस्तार है। हमारी ऋषि-परंपरा को आगे बढ़ाने वाले आद्य शंकराचार्य से लेकर संत तुलसीदास तक ने इसी सांस्कृतिक चेतना को परिपुष्ट किया है। इस तरह भारत विश्व को सुख-शांति-सद्भाव का मार्ग दिखानेवाली सांस्कृतिक चेतना का अधिष्ठान बन गया। भारत को जानना है तो इस संस्कृति के मर्म को जानना-समझना पड़ेगा। इसे ‘सरवाइवल ऑफ द फिटैस्ट’ जैसी पाश्चात्य या ‘वर्ग संघर्ष’ जैसी कम्युनिस्ट अवधारणाओं से नहीं जाना-समझा जा सकता, जो देश की स्वाधीनता के बाद भी सत्ता का संरक्षण पाकर औपनिवेशिक मानसिकता को पाल-पोसकर भारतीयता के विरुद्ध खड़ा करने में लगी रही हों। यह पूरी जमात ‘लोग आते गए, कारवाँ बनता गया’ जैसे जुमलों की आड़ में भारत की सांस्कृतिक पहचान को ही मिटाने का कुचक्र रचती रही है। जबकि विश्वविख्यात विद्वान् अर्नाल्ड टायन्बी अपनी पुस्तक ‘द स्टडी ऑफ हिस्ट्री’ में भारत के इन्हीं सांस्कृतिक मूल्यों को विनाश के कगार पर खड़ी मानवता को बचाने का विकल्प मानते हैं।
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