Bhartiya Rajneeti aur Sansad : Vipaksh Ki Bhoomika
Author:
Subhash KashyapPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 396
₹
495
Available
संसदीय लोकतंत्रात्मक व्यवस्था में विपक्ष का विशेष महत्त्व है। यदि पता करना हो कि किसी देश में स्वतंत्रता और लोकतंत्र जीवित हैं या नहीं तो यह जानना होगा कि वहीं विपक्ष है या नहीं, और है तो उसकी भूमिका क्या है, कैसी है।</p>
<p>प्रस्तुत पुस्तक में भारतीय संसद में विपक्ष की भूमिका पर ऐतिहासिक और संकल्पनात्मक परिप्रेक्ष्यों में विचार किया गया है। पुस्तक दो भागों में विभक्त है। पहले भाग में लोकतांत्रिक संस्थाओं के उद्भव और विकास, स्वाधीनता से पूर्व विधायिका तथा स्वाधीनता के बाद अस्थायी संसद और प्रथम लोकसभा से लेकर ग्यारहवीं लोकसभा तक विपक्ष की भूमिका की चर्चा की गई है। दूसरे भाग में विपक्ष और नेता विपक्ष के बारे में कुछ संकल्पनात्मक बातें स्पष्ट की गई हैं तथा विपक्ष की भूमिका के कुछ रूमानी आदर्श और यथार्थ स्वरूपों पर रोशनी डाली गई है। विभिन्न अध्यायों में प्रस्तुत विवेचन-विश्लेषण बहुत कुछ व्यक्तिगत अनुभव-अन्वेषण पर आधारित है क्योंकि प्रथम लोकसभा, जवाहरलाल नेहरू और दादा साहेब मावलंकर के समय से लेकर 37 वर्षों से अधिक अवधि तक डी. सुभाष काश्यप संसद से सम्बद्ध रहे और उन्होंने संसद और सांसदों के विभिन्न स्वरूप और आयाम, उतार-चढ़ाव, उत्थान-पतन देखे हैं ।</p>
<p>अपनी राजनीतिक व्यवस्था और प्रातिनिधिक संस्थाओं तथा अपने चुने हुए सांसदों और विधायकों के कार्यकलापों में रुचि रखनेवाले सभी सचेत नागरिकों, शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों एवं स्वयं राजनेताओं के लिए यह पुस्तक सर्वथा संग्रहणीय, रोचक और पठनीय सिद्ध होगी ।
ISBN: 9788171786312
Pages: 126
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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इस पुस्तक में 1399 से 1526 ई. तक के देहली के सुल्तानों के इतिहास से सम्बन्धित समस्त प्रमुख समकालीन एवं बाद के फ़ारसी के ऐतिहासिक ग्रन्थों का हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत किया गया है। पहला भाग देहली के सुल्तानों के राज्य से सम्बन्धित है और दूसरा भाग उन प्रान्तीय राज्यों से जिनका प्रादुर्भाव फ़ीरोज़ तुग़लक़ की मृत्यु के उपरान्त ही धीरे-धीरे होने लगा था और जो तैमूर के आक्रमण के उपरान्त पूर्णतः स्वतंत्र हो गए।
सैयद वंश के इतिहास से सम्बन्धित यहया बिन अहमद बिन अब्दुल्लाह सिहरिन्दी की ‘तारीख़े मुबारकशाही’ एवं ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद की ‘तबक़ाते अक़बरी’ भाग-1 के उद्धरणों का अनुवाद किया गया है। दूसरे भाग में अफ़ग़ानों के सुल्तानों के इतिहास के अनुवाद सम्मिलित किए गए हैं। इनमें शेख़ रिज़्कुल्लाह मुश्ताक़ी की ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’, ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद की ‘तबक़ाते अकबरी’, अब्दुल्लाह की ‘तारीख़े दाऊदी’, अहमद यादगार की ‘तारीख़े शाही’ एवं मुहम्मद कबीर बिन शेख़ इस्माइल की ‘अफ़सानए-शाहाने हिन्द’ के उद्धरण शामिल हैं।
भाग-2 के इतिहासकारों में ख़्वाजा निज़ामुद्दीन अहमद के अतिरिक्त सभी अफ़ग़ान इतिहासकार हैं। अहमद यादगार का इतिहास 1930 ई. में प्रकाशित हुआ था और ‘तारीख़े दाऊदी’ 1954 ई. में। इनके अतिरिक्त ‘वाक़ेआते मुश्ताक़ी’ और ‘अफ़सानए-शाहाने हिन्द’ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं और इनकी हस्तलिखित प्रतियाँ भी भारतवर्ष में उपलब्ध नहीं हैं, अतः आवश्यक अंशों का अनुवाद करते समय तत्सम्बन्धी पूरे-पूरे इतिहासों का अनुवाद कर दिया गया है। इस कारण एक ही घटना की कई बार पुनरावृत्ति अनुपेक्षणीय हो गई है। इतिहासकारों तथा उनकी कृतियों का परिचय अनुवाद के प्रारम्भ में प्रस्तुत किया गया है।
Johar Jharkhand
- Author Name:
Amar Kumar Singh
- Book Type:

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प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।
डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।
कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।
Rashtra Prem Ki Kahaniyan
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
- Book Type:

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