Johar Jharkhand
(0)
Author:
Amar Kumar SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
150
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प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।</p> <p>डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।</p> <p>कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।</p> <p> </p> <p>
Read moreAbout the Book
प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।</p>
<p>डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।</p>
<p>कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।</p>
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Book Details
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ISBN9788126704026
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Pages118
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Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अखण्ड राष्ट्र के रूप में संगठित होने के पूर्व भारतवर्ष ने साहस एवं उत्सर्ग की अनगिनत परीक्षाएँ दी हैं। धीरोदात्त वीरों ने सैकड़ों वर्षों की आततायी शोषणकारी राज्य व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए अदम्य संघर्ष किये हैं। इन संघर्षो को इतिहास के अनेक स्वनाम-गुमनाम नायकों ने शक्ति एवं नेतृत्व प्रदान किया है। सूचना क्रान्ति के इस युग में ऐसी शख्सियतों व उनकी अमर कृतियों की खोज कर दिग्-दिगन्त तक उनका उद्घोष किया जाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी को जीवन संघर्ष में अडिग रहने की प्रेरणा तो मिले ही, स्वतन्त्रता का मूल्य भी उनके हृदयों में दृढ़ता से स्थापित हो सके। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा जयलाल सिंह ऐसे ही देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिन्हें समय के बादलों ने आच्छादित कर रखा है। सत्तावनी क्रान्ति का एक ऐसा किरदार जिसने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध व्यक्तिगत शौर्य का परिचय देते हुए न केवल प्रत्यक्ष युद्ध लड़े वरन सम्पूर्ण भारतवर्ष में क्रान्तिकारियों की आश्रयस्थली बने शहर लखनऊ में पूरे युद्ध-तन्त्र का संचालन व प्रबन्धन करते हुए अन्तिम नवाबी सरकार के मन्दराचल को कूर्मावतार बन अपनी पीठ पर धारण किया। स्वतन्त्र भारत का भव्य प्रासाद नींव के जिन कीर्त्ति स्तम्भों पर खड़ा है, निःसन्देह राजा जयलाल सिंह उनमें से एक हैं।
यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व एवं उत्सर्गपूर्ण कृतित्वों को जानने-समझने का एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज है।
Bharat : Ek Vichar-Parampara
- Author Name:
Prem Kumar Mani
- Book Type:

- Description: भारत क्या है—आज इस सवाल को पूछना, इसके उत्तर तलाश करना और एक राष्ट्र के रूप में भारत की संरचना को समझना बहुत ज़रूरी हो गया है। समय है कि अकादमिक बहसों-विमर्शों से आगे बढ़कर इस सवाल पर आम जन की आम भाषा में बात हो। ‘भारत : एक विचार-परम्परा’ इसी दिशा में एक बड़ा क़दम है। इसका उद्देश्य भारतखंड की हज़ारों वर्षों की सामाजिक-सांस्कृतिक यात्रा पर दृष्टिपात करते हुए यह जानना है कि वह क्या चीज़ है कि ‘हस्ती मिटती नहीं हमारी’? वह क्या तत्व है जो आरम्भ से अब तक इस इतने लम्बे सफ़र की प्रेरणा-पूँजी रहा है। सिन्धु नदी के किनारे उगी-उभरी सभ्यता कैसे आगे बढ़ी; वेदों का, उपनिषदों का समय आया, हड़प्पा और मुअन-जो-दड़ो विकसित हुए, तक्षशिला जैसे ज्ञान के महान केन्द्र अस्तित्व में आए, मगध में विचारों और विचारकों का इतना जमावड़ा हुआ; बौद्ध दर्शन, जहाँ उद्भूत हुआ, मध्यकाल में जिसने विदेशी आक्रान्ताओं का सामना किया, ब्रिटिश शासन का लम्बा औपनिवेशिक दौर देखा, और लम्बे संघर्ष के उपरान्त विभाजन जैसी विभीषिका के साथ स्वतंत्रता प्राप्त की। लेकिन एक विचार के रूप में भारत भारत ही बना रहा; समय से सीखता ख़ुद को बदलता, आगे बढ़ता। यह पुस्तक इस पूरी यात्रा पर दृष्टिपात करती है और हमें अपनी सुदीर्घ वैचारिक परम्परा के मद्देनज़र एक मत स्थिर करने में मदद करती है।
Basics of Tarot
- Author Name:
Manisha Koushik
- Book Type:

- Description: Tarot is a divination tool that not only shows the current situation of the person concerned but also gives an idea of what steps should be taken. This clarity is obtained through the pictorial presentation of the cards. Once the cards are held in the hands and are concentrated upon, the answers appear automatically in the cards. Through this book one can quickly and easily learn the meanings of the cards along with a few spreads that would help in day to day readings. The tarot cards are 56 in number and for ease are divided into 4 suits namely � Wands, Cups, Swords and Coins. Seems Tough? Do not worry! For making it simple, a grid between numerology and the archetypes of the four suits has been provided which would help a novice to easily remember the meanings. Thus instead of 56 cards only 18 cards have to be understood. The tricks and shortcuts further simplify the cards and make it easy to memorize them. The main aim of writing this book is to equip one with a reference book to guide those interested in learning this mystical science. Easy keywords have been given to memorize the cards, and short descriptions provided for reference.
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