Johar Jharkhand
(0)
Author:
Amar Kumar Singh, Faisal Anurag, Harivansh, Ramesh SharanPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
150
120 (20% off)
Unavailable
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है। डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो। कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
प्रोफ़ेसर अमर कुमार सिंह देश के प्रमुख मनोवैज्ञानिकों में से एक रहे। वे देश के उन थोड़े से समाजशास्त्रियों में थे, जिन्होंने अकादमिक दुनिया से बाहर आकर समाचार-पत्रों में मानवीय विकास, धर्मनिरपेक्षता, महिलाओं, आदिवासियों, दलितों और वंचित समूहों की समस्याओं पर गम्भीर लेकिन लोकप्रिय शैली में लेखन किया। उनके इन लेखों ने राजनीतिक–सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप एवं विमर्श पैदा किया है। झारखंड आन्दोलन के समर्पित कार्यकर्ता के रूप में डॉ. सिंह के लेखों में एक ख़ास क़िस्म का अनुभव है। डॉ. सिंह ने झारखंड विषयक समिति के सदस्य के रूप में भी उल्लेखनीय भूमिका निभाई, इस कारण आलेखों में एक ‘इनसाइडर’ जनदृष्टि की झलक मिलती है। डॉ. सिंह के नेतृत्व में झारखंड की आर्थिक–सामाजिक समस्याओं पर पिछले दशक में अनेक शोधकार्य हुए। इन शोध निष्कर्षों से आदिवासी भूमि, आदिवासी सशक्तिकरण, आदिवासी महिलाओं की स्थिति, झारखंड में सत्ता में विकेन्द्रीकरण के सवालों को व्यापक परिप्रेक्ष्य मिलता है।
डॉ. सिंह के आलेखों का यह प्रतिनिधि संग्रह है, जिसमें झारखंड सम्बन्धी उनकी चिन्ता तो ज़ाहिर होती है, साथ ही झारखंड की सम्भावनाओं, अन्तर्विरोधों और संकटों को समझने में मदद मिलती है। ये आलेख ‘प्रभात ख़बर’ तथा ‘सोशल चेंज’ में प्रकाशित हुए तथा इनसे झारखंड आन्दोलन में बहस को गति एवं दिशा मिली। आन्तरिक उपनिवेशवाद की अवधारणा को डॉ. सिंह ने झारखंड के उद्धरण के साथ राष्ट्रीय बहस का केन्द्र भी बनाया। विकास के साम्प्रतिक दृष्टिकोण में यह बहस कई शंकाओं एवं यथार्थों का रेखांकन करते हुए विकल्पों का क्षितिज खोलती है। डॉ. सिंह ने झारखंडी कार्यकर्ता के अनुभवों के आधार पर राजनीतिक विमर्श के अनेक अनछुए पहलुओं को उठाया है। आदिवासियों के प्रति वंचन एवं अन्याय उनके आलेखों के गहरे सरोकारों में हैं, लेकिन इनमें यह भी दृष्टि मौजूद है कि ग़ैर-आदिवासियों के साथ अन्याय न हो।
कई ज़मीनी विशेषताओं के कारण झारखंड नवनिर्माण से लेकर आज तक इन आलेखों का महत्त्व अपनी भूमिका में प्रमुखता से बना हुआ है।
Book Details
-
ISBN9788126704026
-
Pages118
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Chandrashekhar Ke Bare Mein
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

- Description:
‘चन्द्रशेखर के बारे में’ पुस्तक अपने समय के महत्त्वपूर्ण लेखकों-पत्रकारों, राजनीतिज्ञों और समाज-विज्ञानियों द्वारा किए गए आत्मीय और तटस्थ विश्लेषणों का एक संकलन है। यह संकलन इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह चन्द्रशेखर की राजनीतिक और रचनात्मक यात्रा के विभिन्न पड़ावों का एक विश्वसनीय लेखा-जोखा है। इन लेखों को पढ़ते हुए आजादी के बाद की भारतीय राजनीति का संक्षिप्त सफरनामा और उसमें चन्द्रशेखर के जरूरी योगदान से हमारा परिचय होता जाता है। संकलित आलेखों के क्रम में भले ही हमें कथासूत्र की तरह का कोई संयोजन नहीं मिलता है, मगर यही इस संकलन की खासियत भी है। हम कह सकते हैं कि भारतीय राजनीति के विविध-रंगी चित्रों और उसमें चन्द्रशेखर के राजनीतिक, सामाजिक व रचनात्मक सरोकारों का एक कोलाज है यह संकलन–और इसलिए इसकी सिर्फ राजनीतिक और सामयिक ही नहीं, रचनात्मक और साहित्यिक महत्ता भी है। नामवर सिंह, भोला चटर्जी, प्रभाष जोशी, केदारनाथ सिंह, उदयन शर्मा, तवलीन सिंह और एम.जे. अकबर सहित अनेक सुविख्यात कलमकारों ने चन्द्रशेखर के बारे में समय-समय पर लिखा। गांधी और जयप्रकाश नारायण के बाद शायद चन्द्रशेखर ही ऐसे राजनेता हैं, जिनके बारे में सभी धाराओं के अग्रणी लोगों ने सृजनात्मक राय रखी। युवा तुर्क की हैसियत के जमाने में और इमर्जेंसी के बाद चन्द्रशेखर के बारे में काफी कुछ लिखा गया। यह पुस्तक इस लेखन का एक प्रतिनिधि संकलन है।
Uthal-Puthal Aur Dhruvikaran Ke Beech
- Author Name:
Chandrashekhar +1
- Book Type:

- Description:
चन्द्रशेखर ऐसे राष्ट्रनायक हैं जिनके अंतरंग से परिचित होने की सहज उत्सुकता देशवासियों में रही है। इसे ध्यान में रखते हुए, सत्तर के दशक से ही देश-विदेश के प्रमुख सम्पादकों-पत्रकारों ने चन्द्रशेखर का साक्षात्कार लेना आरंभ कर दिया था। चन्द्रशेखर के अंतरंग का साक्षात्कार करना और कराना ही सम्पादकों-पत्रकारों को काम्य था। विभिन्न पत्रिकाओं में बिखरे पड़े चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों को संकलित करना दुरूह किंतु इसलिए अनिवार्य था क्योंकि इसके बगैर स्वातंत्र्योत्तर भारत की राजनीति को समझना कठिन है। तीन खंडों में प्रकाशित चन्द्रशेखर से हुई भेंटवार्ताओं का यह पहला खंड है। इस पहले खंड में समाजवाद, दोहरी सदस्यता, गरीबों की पीड़ा, राजनीतिक स्थिरता, पार्टी संगठन, राजनीतिक गठजोड़, राजनीतिक ध्रुवीकरण, विपक्षी एकता, अयोध्या-विवाद जैसे राजनीति से जुड़े जज्बाती सवालों पर चन्द्रशेखर के जवाब हैं जो इतिहास के नए गवाक्ष को खोलते हैं।
Rachnatmak Bechaini Mein
- Author Name:
Chandrashekhar +1
- Book Type:

- Description:
इस दूसरे खंड के साक्षात्कारों का दौर वह दौर है जब चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के पटल पर छाए हुए हैं। यह दौर कांग्रेस में रहकर पार्टी नीतियों का विरोध, जेपी आंदोलन और आपातकाल में उनके जबरदस्त हस्तक्षेप तथा जनता पार्टी के गठन और उसके अध्यक्ष बनने का दौर है। पुस्तक में संकलित साक्षात्कारों पर एक नजर डालें तो चन्द्रशेखर एक खास तरह की रचनात्मक बेचैनी और कुछ करने के लिए जल्दबाजी में दिखाई देते हैं। इस दौरान उनका अद्भुत रूप सामने आता है, जिसमें उनकी ऊर्जा और लक्ष्य दोनों साफ-साफ परिलक्षित होते हैं। उनके पास केवल लक्ष्य ही नहीं है, बल्कि उस तक पहुँचने का रास्ता भी है, जिसे वे मौजूदा कठिनाइयों के बीच से ही निकालना चाहते हैं। गत 30 वर्षों के भारतीय राजनीति के घटनाक्रम से साक्षात्कार करानेवाली एक संग्रहणीय पुस्तक।
Ek Doosre Shikhar se
- Author Name:
Chandrashekhar +1
- Book Type:

- Description:
यह तीसरा खंड पूर्व के दोनों खंडों से इसलिए भी भिन्न है क्योंकि इस दौरान चन्द्रशेखर देश के मुख्य कार्यकारी की भूमिका में हैं। इस दौरान वे देश की जनता की बुनियादी समस्याओं के बारे में कैसा रुख रखते हैं और इनके निदान के लिए उनके पास क्या कार्यक्रम है, इसकी झलक इस खंड के साक्षात्कारों से मिलती है। प्रधानमंत्री के पद पर रहते हुए उन्होंने धर्म, सांप्रदायिकता, राजनीति, राष्ट्रीय सरकार, समाजवाद, विदेश नीति तथा अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर खुलकर अपना पक्ष रखा है। प्रधानमंत्री के रूप में दिए गए चन्द्रशेखर के साक्षात्कारों की विशेषता है कि वे दृढ़ता से भारत का पक्ष रखते हैं। भेंटवार्ताओं में विभिन्न बुनियादी मुद्दों पर चन्द्रशेखर के विचार अनायास व्यक्त हुए हैं। विभिन्न मुद्दों पर चन्द्रशेखर की मान्यताओं से उनकी अंतर्दृष्टि का भी पता चलता है। उन्हें और मूलभूत राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय प्रश्नों को जानने-समझने में भी ये साक्षात्कार मदद पहुँचाते हैं। सत्तर के दशक से शुरू हुआ विमर्श पूर्व-पक्ष है तो इस तीसरे खंड का विमर्श उत्तर-पक्ष।
Chandrashekhar Ke Vichar
- Author Name:
Harivansh +1
- Book Type:

- Description:
हमारे पारंपरिक समाज में ‘विचारवान’ एक आस्थासूचक विशेषण है। अगर कोई अच्छी बात कहता है और उससे लोगों का भला होता है, तो समाज की स्वाभाविक प्रतिक्रिया होती है–‘बड़ा विचारवान आदमी है।’ चन्द्रशेखर भारतीय राजनीति के ‘विचारवान शख्स’ थे! चन्द्रशेखर समाज के लिए समाज की सतह पर खड़े होकर सोचते थे। प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के जमाने से ही चन्द्रशेखर समाजोन्मुख चिंतन और सामाजिक गैर-बराबरी को दूर करनेवाले विचार के साथ जनता से मुखातिब होते रहे। इसमें कोई शक नहीं कि चन्द्रशेखर समाजवादी विचारधारा की देन थे और इस विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा असंदिग्ध रही। जब वह छोटी अवधि के लिए प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने अपने अधिकांश भाषणों में अपने कामकाज का बखान करने की जगह भारत की गरीबी और विपन्न बच्चों की शिक्षा को लेकर गहरी चिंता जाहिर की। इस पुस्तक में संकलित भाषणों में भी यह चिंता बखूबी झलकती है। आर्थिक सवाल पर उनके विचार वैज्ञानिक चेतना से संपन्न देशज स्वाभिमान की तरह हमारे सामने हैं–देशज विकल्प के साथ। यह विकल्प गांधी के रास्ते चन्द्रशेखर तक आया है, इसलिए इसमें प्रति नागरिक आत्मोन्नति को पहली प्राथमिकता प्राप्त है। कहते हैं–अगर उदारीकरण आत्मोन्नति के प्रयासों को धक्का नहीं पहुँचाता है, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की जकड़न से समाज को मुक्त कराता है, तो यह ठीक है–नहीं तो यह महज एक लफ्फाजी है और ऊँचे वर्गों का सोसा है–और यही हमारे समय में चल रहे उदारीकरण की नियति है। इस पुस्तक में प्रधानमंत्रित्व काल के उनके भाषणों और ‘यंग इंडियन’ व अन्यत्र छपे उनके कुछ महत्त्वपूर्ण लेखों का संकलन किया गया है। इस संकलन की महत्ता यह है कि पाठक देख सकते हैं कि विभिन्न मुद्दों पर चन्द्रशेखर के विचार आज भी कितने प्रासंगिक हैं।
Dil Se Maine Duniya Dekhi
- Author Name:
Harivansh +1
- Book Type:

- Description:
हिन्दी के ज़्यादातर पत्रकारों के यात्रा-वृत्तान्त आम तौर पर रपट होते हैं। उनके केन्द्र में सिर्फ़ तथ्य और विवरण होते हैं। लेकिन वरिष्ठ पत्रकार और सांसद हरिवंश के इन यात्रा-विवरणों में तथ्यों के साथ-साथ संवेदना और मानवीय प्रसंगों को भी बख़ूबी पिरोया गया है। इसी के चलते उनकी ये पत्रकारीय रपटें साहित्यिक आस्वाद से युक्त हो जाती हैं। यात्रा के दौरान उनके मन में एक अन्तर्यात्रा भी समानान्तर चलती रहती है, विदेश उन्हें अपने देश को और सतर्क निगाह से देखने को प्रेरित करता है। वे सिर्फ़ पर्यटक की तरह नहीं एक प्रबुद्ध विचारक की तरह दुनिया को देखने लगते हैं। उनके इन यात्रा-संस्मरणों में सतत एक बेचैनी दिखाई देती है। साथ ही उनका पत्रकार भी अपनी वस्तुगतता के साथ लगातार उनके यात्री के साथ रहता है। उनका प्रयास होता है कि वे जहाँ भी जाएँ, वहाँ के यथार्थ को इस तरह प्रस्तुत करें, जिससे समय और समाज की समझ को विस्तार मिले—उनकी अपनी समझ भी खुले और पाठक की भी। यही विशेषता इस पुस्तक को एक साहित्यिक कृति बनाती है। आप इन यात्रा-विवरणों को पढ़कर रोमांचित भी होंगे, उत्तेजित भी होंगे और देश तथा दुनिया के विषय में सोचने के लिए व्याकुल भी होंगे।
Soochana Ka Adhikar
- Author Name:
Arvind Kejariwal +2
- Book Type:

- Description:
राजशाही में व्यक्ति और समाज के पास कोई अधिकार था, तो सिर्फ़ इतना कि वह सत्तावर्ग की आज्ञा का चुपचाप पालन करे। राजा निरंकुश था, सर्वशक्तिमान। उस पर कोई उँगली नहीं उठा सकता था, न उसे किसी चीज़ के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता था। औद्योगिक क्रान्ति तथा उदारवाद के आगमन और लोकतांत्रिक शासन पद्धतियों के प्रारम्भ के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता की अवधारणा आई। इसके बावजूद द्वितीय विश्वयुद्ध तक प्रजातांत्रिक देशों में भी शासनतंत्र में ‘गोपनीयता’ एक स्वाभाविक चीज़ बनी रही। विभिन्न दस्तावेज़ों में क़ैद सूचनाओं को ‘गोपनीय’ अथवा ‘वर्गीकृत’ करार देकर नागरिकों की पहुँच से दूर रखा गया। लोकतांत्रिक शासन-व्यवस्था के बावजूद राजनेताओं एवं अधिकारियों में स्वयं को ‘शासक’ या ‘राजा’ समझने की प्रवृत्ति हावी रही। यही शासकवर्ग आज भारतीय लोकतंत्र का असली मालिक है। नागरिक का पाँच साल में महज़ एक वोट डाल आने का बेहद सीमित अधिकार इतना निरुत्साहित करनेवाला है कि चुनावों में बोगस वोट न पड़ें तो मतदान का प्रतिशत तीस-चालीस फ़ीसदी भी न पहुँचे। यही कारण है कि अक्टूबर 2005 से लागू सूचनाधिकार लोकतांत्रिक राजा की सत्ता के लिए गहरे सदमे के रूप में आया है। राजनेता और नौकरशाह हतप्रभ हैं कि इस क़ानून ने आम नागरिक को लगभग तमाम ऐसी चीज़ों को देखने, जानने, समझने, पूछने की इजाज़त दे दी है, जिन पर परदा डालकर लोकतंत्र को राजशाही अन्दाज़ में चलाया जा रहा था। इस पुस्तक में संकलित उदाहरणों में आप देख पाएँगे कि किस तरह लोकतांत्रिक राजशाही तेज़ी से अपने अन्त की ओर बढ़ रही है। साथ ही इस पुस्तक में यह भी बताया गया है कि हम अपने इस अधिकार का प्रयोग कैसे करें।
Jharkhand : Disum Muktigatha Aur Srijan Ke Sapne
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

- Description:
झारखण्ड एक सांस्कृतिक-सामाजिक अवधारणा है। आन्दोलन के दीर्घकालिक इतिहास ने इसे विशिष्ट पहचान दी है। देशज सृजन एवं विचारों के सपने। जिन्दगी की सादगी। व्यवहार की सरलता। जिस तरह झरने पहाड़ों-जंगलों में गुनगुनाते हैं, उसी तरह झारखंडी आकांक्षाएँ प्राकृतिक साहचर्य का जीवन्त संवाद प्रेषित करती हैं। झारखंडी दिसुम की मुक्तिगाथा इन्हीं बोधों का दस्तावेज है। मानवीय सम्मान, देशज जनज्ञान और स्वशासन की अपराजेय चेतना झारखंड का मूल स्वर हैं। झारखण्ड स्त्री-पुरुष समानता, स्वशासी ग्राम-परम्परा, सामुदायिक जीवन, सम्पत्ति पर सामूहिक हक और सर्वानुमति मूलक जनतंत्र का जीवन्त जनबोध है। मानवीय सरोकारों की आदिम चेतना निरन्तर गतिशील व नवीनीकरण की प्रक्रिया से गुजरती भावी दुनिया के लिए अनेक उपहारों को सँजोए है और इनसे संघर्ष और निर्माण की दोहरी प्रक्रिया स्वाभाविक जीवन बनकर उभरती है। झारखण्ड प्रतिरोध संस्कृति का वह दिसुम (इलाका) है, जहाँ अस्मिता एवं स्वशासन एक गम्भीर विमर्श के रूप में सामूहिक चेतना का अभिन्न हिस्सा हैं। रचनात्मकता का एक नया क्षितिज दिखता है। श्रम की प्रतिष्ठा का अद्भुत केन्द्र। इस पुस्तक में झारखंडी दर्शन को व्यापक सन्दर्भ में देखने-समझने की कोशिश की गयी है। आदिवासी संस्कृति के मिथक एवं यथार्थ के विमर्श का विस्तृत फलक यहाँ प्रस्तुत है। समकालीन चुनौतियों एवं संकटों के बीच झारखंडी जनसमाज में अन्तर्निहित देशज विकल्प उम्मीदों से भरे रोशनदान हैं और अद्यतन विमर्श में एक नए अध्याय की तरह उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
Jharkhand : Samay Aur Sawal
- Author Name:
Harivansh
- Book Type:

- Description:
Awating description for this book
Vedic Kaal
- Author Name:
S. Irfan Habib +3
- Book Type:

- Description:
‘भारत के लोक इतिहास’ श्रृंखला के इस खंड का विषय 1500 ईसा पूर्व से 700 ईसा पूर्व के बीच का काल-खंड है जिसके तहत ऋग्वेद और उसके बाद के ग्रन्थों को क्रमशः व्यवस्थित किया गया है और उस युग के भूगोल, प्रव्रजन, प्रौद्योगिकी, अर्थव्यवस्था और समाज के साथ-साथ धर्म और दर्शन आदि पहलुओं का अन्वेषण किया गया है। लेखकों की कोशिश रही है कि उक्त आदिग्रन्थों के माध्यम से तत्कालीन जन-जीवन की पुनर्रचना कर आम पाठकों के लिए उसे बोधगम्य बनाया जाए। इस प्रक्रिया में लैंगिक और वर्ग-आधारित सामाजिक विभाजनों को ख़ास तौर पर देखने की कोशिश की गई है। पुस्तक के एक अध्याय में पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर प्रमुख क्षेत्रीय संस्कृतियों का सावधानीपूर्वक अध्ययन किया गया है। इतिहास में लोहे का आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना है जो इसी युग में सम्पन्न हुई थी, सो उसका वर्णन किंचित् विस्तार से हुआ है। साथ ही जाति व्यवस्था के आरम्भ पर भी इस पुस्तक में अपेक्षित प्रकाश डाला गया है। मूल ग्रन्थों के उद्धरणों, तार्किक व्याख्याओं और विश्लेषणों, अनेक प्रामाणिक चित्रों और नक़्शों से समृद्ध यह पुस्तक न सिर्फ़ रुचिकर, बल्कि पाठकों को विचारोत्तेजक भी लगेगी।
Sindhu Sabhyata
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
- Book Type:

- Description:
‘भारत का लोक इतिहास’ शृंख्ला की यह दूसरी पुस्तक सिन्धु सभ्यता के बारे में है। इसे इस शृंखला की पहली पुस्तक ‘प्रागैतिहास’ की अगली कड़ी के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। सिन्धु सभ्यता के और विस्तृत विवरण के अलावा इसमें अन्य समकालीन और उसके बाद की संस्कृतियों का सर्वेक्षण भी किया गया है। साथ ही भारत के मुख्य भाषा परिवारों के उद्भव पर विमर्श भी इसमें शामिल है। सिन्धु घाटी और सीमावर्ती क्षेत्रों में आरम्भिक कांस्य युग और उसके सांस्कृतिक पहलू तथा सिन्धु सभ्यता की व्यापकता, जनसंख्या, कृषि, हस्तशिल्प, व्यापार, क़स्बों और शहरों की बनावट के साथ इसमें जनता, समाज और राज्यसत्ता आदि का भी प्रमाण-आधारित विश्लेषण किया गया है। तालिकाओं, चित्रों और विस्तृत सन्दर्भ-ग्रन्थ सूचियों के साथ यह पुस्तक शृंखला की अन्य पुस्तकों की ही तरह संग्रहणीय और पठनीय सिद्ध होगी।
Gandhi Aur Unke 'Satyagrah' Ki Yatra
- Author Name:
Heramb Chaturvedi
- Book Type:

- Description:
जब तक मानव सभ्यता का अस्तित्व है तब तक गाँधी की प्रासंगिकता बनी रहेगी, क्योंकि गाँधी ने मानवता के साथ मानव सभ्यता के मौलिक मूल्यों और मानवता के आदर्शों, प्रतिमानों पर ही अपना दर्शन आधारित किया और उसे क्रियान्वित करते हुए अपना जीवन भी जी कर दिखा दिया। जब तक विश्व में युद्ध और युद्धपरक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, मानव-समाज और विश्व में उनके दर्शन का महत्त्व सदैव बना रहेगा। गाँधी मानवता, शान्ति, शान्तिपूर्ण अस्तित्व के साथ विकास के समर्थक थे और सत्य शाश्वत मूल्य अधारित हो अर्थात् सृष्टि, विश्व और समाज के मध्य भी सामंजस्य, सन्तुलन और सहभाग का भाव स्थायी हो, इसके इच्छुक थे। इसलिए किसी एक आयाम को लेकर गाँधी को समझने के लिए अध्ययन करना ख़तरा मोल लेना ही है। उनके व्यक्तित्व के समस्त आयामों के बिना उनका समावेशी अध्ययन सम्भव नहीं है। अत: गाँधी जी का हर अध्ययन उनकी जीवन-यात्रा का ही अध्ययन हो जाता है और इसलिए उन 'संस्कारों' और उनके व्यक्तित्व के मनोवैज्ञानिक विकास को भी विश्लेषित करना पड़ेगा तब हम उनको एवं उनके विचारों को समझ सकेंगे। बिना वांग्मय के अध्ययन के किसी लेखक, विचारक, ऐतिहासिक व्यक्तित्व को पूर्णता में समझा ही नहीं जा सकता। अत: गाँधी के 'सत्याग्रह' की यात्रा भी उनकी जीवन-यात्रा ही हो जाती है।
Davanal : Maovad Se Jang
- Author Name:
Nandini Sundar +2
- Book Type:

- Description:
पिछले दो दशकों के दौरान, मध्य भारत में व्यापक रूप से वनों से आच्छादित और खनिज के मामले में समृद्ध बस्तर का इलाका देश में सबसे अधिक सैन्यीकृत स्थलों में से एक के रूप में उभरा है। सरकार माओवादी उग्रवाद को भारत की ‘सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा’ बताती है। वर्ष 2005 में राज्य-प्रायोजित एक हथियारबन्द आन्दोलन, सलवा जुडुम, ने सैकड़ों गाँवों को जला दिया और मलेशिया, वियतनाम एवं अन्य जगहों पर विकसित आतंकवाद-विरोधी रवैये का अनुसरण करते हुए उन गाँवों के निवासियों को राज्य-नियंत्रित शिविरों में हाँक दिया। बलात्कार और हत्याओं के अलावा, ‘आत्मसमर्पण’ कर चुके सैकड़ों माओवादी समर्थकों को जबरन सहायक के रूप में भरती किया गया। संघर्ष आज भी जारी है, जो आम नागरिकों, सुरक्षा बलों और माओवादी कैडरों के जीवन पर भारी पड़ रहा है। वर्ष 2007 में, नन्दिनी सुन्दर एवं अन्य लोगों ने इस संघर्ष से उत्पन्न मानवाधिकार-हनन के मुद्दे पर भारत सरकार को सर्वोच्च न्यायालय में घसीटा। वर्ष 2011 में दिए गए एक ऐतिहासिक फ़ैसले में, न्यायालय ने हथियारबन्द गिरोह के लिए राज्य के समर्थन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। हालाँकि, सरकार ने इस फैसले को लागू नहीं किया है। ‘दावानल : माओवाद से जंग’ पुस्तक भारत के हृदयस्थल में चल रहे इस क्रूर युद्ध का वर्णन करती है और देश की अदालतों, मीडिया, राजनीति और अन्त में भारतीय लोकतंत्र की हकीकत बयान करती है। यह इलाके की व्यापक यात्राओं, अदालती साक्ष्यों, सरकारी दस्तावेजों और उन घटनाओं में एक सक्रिय भागीदार की भूमिका पर आधारित है।
Manushya Aur Paryavaran
- Author Name:
S. Irfan Habib +2
- Book Type:

- Description:
विगत दशकों में पारिस्थितिकी और उससे जुड़े मसलों के प्रति विशेष रुचि दिखाई पड़ी है, ख़ास तौर पर जलवायु-परिवर्तन को लेकर होनेवाली बहसों के सन्दर्भ में इस तरफ़ सुधीजन का ज़्यादा ध्यान गया है। लेकिन पारिस्थितिकी का विमर्श सिर्फ़ जलवायु तक सीमित नहीं है। इसमें जीव-जन्तुओं तथा पेड़-पौधों के साथ मनुष्य के रिश्तों के अलावा मनुष्य जाति के सम्मुख प्रकृति द्वारा प्रस्तुत चुनौतियों का अध्ययन भी शामिल होता है। इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ इस पुस्तक में पारिस्थितिकी के इतिहास को देखा-समझा गया है। ‘भारत का लोक इतिहास’ परियोजना के तहत प्रकाशित यह पुस्तक भी इस श्रृंखला की अन्य कड़ियों की तरह गहन अध्ययन और प्रामाणिक सामग्री पर आधारित है। मूल स्रोतों के उद्धरणों तथा पारिस्थितिकी, पर्यावरण विज्ञान, वन विज्ञान तथा प्राकृतिक इतिहास पर विशेष टिप्पणियों से समृद्ध इस पुस्तक में विषय से सम्बन्धित अन्य उपयोगी ग्रन्थों का उल्लेख भी किया गया है जिससे पाठक और अधिक लाभान्वित होंगे। सूचनाओं की सटीकता को बरकरार रखते हुए, पुस्तक को अतिरिक्त तकनीकी विवरणों से मुक्त रखा गया है ताकि इतिहास के छात्रों के अलावा यह सामान्य पाठकों के लिए भी रुचिकर सिद्ध हो।
RSS : Kaya Aur Maya
- Author Name:
Devanura Mahadeva +1
- Book Type:

- Description:
अब सौ साल का हुआ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ दरअसल है क्या? इसकी काया के पीछे छुपी माया क्या है? अब जबकि संघ से जुड़ी एक पार्टी सत्ता पर मज़बूती से क़ाबिज़ है, यह भारत को किस दिशा में ले जा रहा है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनके ग़ौरतलब जवाब देवनूर महादेव ने आर.एस.एस. : काया और माया में दिए हैं। मिथकों को आधुनिकता के और लोकवार्ताओं को गहरी राजनीतिक अन्तर्दृष्टि के बरअक्स रखकर देखने-परखने से हासिल इन जवाबों को पेश करते हुए, अपने ख़ास अन्दाज़ में वे पाठकों से आग्रह करते हैं : जब आर.एस.एस. का मायावी दानव भेष बदलकर हमारे दरवाज़े पर आता है, तब हमें उसकी बातों में नहीं आना चाहिए। ‘आज नक़द कल उधार’ की तर्ज़ पर हमें भी ग्रामवासियों की तरह अपने दरवाज़ों पर ‘नाले बा’ (कल आना) लिख देना चाहिए! कन्नड़ सहित अनेक भाषाओं में बिक्री के कीर्तिमान बना चुकी यह असाधारण किताब सांस्कृतिक आलोचना और ऐतिहासिक व्याख्या के साथ-साथ राजनीतिक कार्रवाई का आह्वान भी है।
Loktantra Ki Chaukidari
- Author Name:
Steven Levitsky and Daniel Ziblatt +1
- Book Type:

- Description:
लोकतंत्र कैसे ख़त्म होता है? अपने लोकतंत्र को बचाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? इतिहास हमें क्या सिखाता है? इक्कीसवीं सदी में लोकतंत्र जितना ख़तरे में है, पहले कभी नहीं रहा। समूचे इतिहास से सबक लेते हुए—चिली में पिनोशे की ख़ूनी सत्ता से लेकर चुपचाप ढहते तुर्की में एर्दुआं की सरकार तक—हार्वर्ड के प्रोफ़ेसर स्टीवेन लेवित्सकी और डेनियल ज़िब्लाट यह समझाते हैं कि लोकतंत्र क्यों नाकाम हो जाते हैं, ट्रम्प जैसे नेता कैसे उसे नष्ट करते हैं और अपने लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के लिए हम में से हर एक व्यक्ति क्या कर सकता है। विशेषज्ञों की राय जो भी लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिन्तित है उसे यह सहज, सरल किताब पढ़नी चाहिए। जो चिन्तित नहीं हैं, उन्हें तो ज़रूर पढ़नी चाहिए। — दारोन एसेमोगलू ‘व्हाई नेशंस फ़ेल’ के लेखक और 2024 के नोबेल पुरस्कार विजेता लेवित्सकी और ज़िब्लाट ने कितनी कुशलता से यह दलील रखी है कि हम सबको इस देश के रुझानों पर चिन्तित होना चाहिए, अमेरिकी संविधान का ज़बर्दस्त प्रशंसक होने के नाते मेरे लिए यह पढ़ना हताशाजनक था। ‘यह यहाँ नहीं हो सकता’ वाली धारणा लेवित्सकी और ज़िब्लाट के विश्लेषण में नहीं टिकती...क्या शानदार लिखा है। — डेनियल डब्ल्यू. ड्रेज़नर ‘वॉशिंगटन पोस्ट’
Sadak Se Sansad Tak
- Author Name:
Shivanand Tiwari +1
- Book Type:

- Description:
लोहिया, जेपी, किशन पटनायक, रामानन्द तिवारी, कर्पूरी ठाकुर वाली परम्परा के ही नेता हैं शिवानंद तिवारी। जितना लम्बा उनका राजनीतिक जीवन है आज की राजनीति में कम लोगों का है। वे गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई राजनीति करते रहे हैं और सन् पैंसठ के पहले से सक्रिय हैं। बाबा के नाम से विख्यात शिवानन्द जी के पास अनुभव, किस्सों और प्रत्यक्ष देखी घटनाओं का सम्भवत: सबसे बड़ा खजाना है। वे साठ के दशक के आखिर में शुरू हुए अंग्रेजी हटाओ आन्दोलन वाले दौर से सक्रिय रहे हैं और चौहत्तर के जेपी आन्दोलन के अगुआ लोगों में हैं। उन्होंने किशन पटनायक के साथ लोहिया विचार मंच और समता संगठन की राजनीति की और उनसे अलग होकर भी उनकी वैचारिक और व्यावहारिक राजनीति के पाठ से अलग नहीं हुए। इन भाषणों और टिप्पणियों से उनके चिन्तन का दायरा और दिशा झलकती है। साफ लगता है कि भूमंडलीकरण और साम्प्रदायिक राजनीति उनकी चिन्ता के केन्द्र में है। शिवानंद जी के इन भाषणों में किसानों की आत्महत्या, बुनकरों की भुखमरी और आत्महत्या, पेटेंट रीजीम से होने वाली मुश्किलों और उसकी कानूनी लड़ाई, असंगठित क्षेत्र के मजदूरों की स्थिति, अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश द्वारा गरीबों का भोजन बढ़ाने से महँगाई आने के कुतर्क की आलोचना, किसानों के खेती छोड़ने पर टिप्पणी है। और इसमें से काफी चीजों के लिए नई आर्थिक नीतियों को दोषी बताया गया है। यह आलोचना सही थी और यह किताब का महत्त्व है क्योंकि भूमंडलीकरण के पूरे दौर में कहीं से संसद के अन्दर इन नीतियों की आलोचना नहीं हुई।
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
- Author Name:
Ashok Kumar Pandey
- Book Type:

- Description:
यह किताब कश्मीर के उथल-पुथल भरे इतिहास में कश्मीरी पंडितों के लोकेशन की तलाश करते हुए उन सामाजिक-राजनैतिक प्रक्रियाओं की विवेचना करती है जो कश्मीर में इस्लाम के उदय, धर्मान्तरण और कश्मीरी पंडितों की मानसिक-सामाजिक निर्मिति तथा वहाँ के मुसलमानों और पंडितों के बीच के जटिल रिश्तों में परिणत हुईं। साथ ही, यह किताब आज़ादी की लड़ाई के दौरान विकसित हुए उन अन्तर्विरोधों की भी पहचान करती है जिनसे आज़ाद भारत में कश्मीर, जम्मू और शेष भारत के बीच बने तनावपूर्ण सम्बन्धों और इस रूप से कश्मीर घाटी के भीतर पंडित-मुस्लिम सम्बन्धों ने आकार लिया। नब्बे के दशक में पंडितों के विस्थापन के लिए ज़िम्मेदार परिस्थितियों की विस्तार से विवेचना करते हुए यह किताब विस्थापित पंडितों के साथ ही उन कश्मीरी पंडितों से संवाद स्थापित करती है जिन्होंने कभी कश्मीर नहीं छोड़ा, और उनके वर्तमान और भविष्य के आईने में कश्मीर को समझने की कोशिश करती है। धारा 370 हटाए जाने से पहले और बाद में, दोनों स्थितियों में, घाटी में रह रहे पंडितों के आख्यान को शामिल करनेवाली यह पहली किताब है जिसके लिए लेखक ने कश्मीर के विभिन्न इलाक़ों में यात्राएँ की हैं और पंडित परिवारों से विस्तार से बातचीत की है।
Kashmir Aur Kashmiri Pandit : Basne Aur Bikharne Ke 1500 Saal
Ashok Kumar Pandey
20% off₹ 499
₹ 399.2
Available
Gandhi Ka Saintalis
- Author Name:
Pushya Mitra +1
- Book Type:

- Description:
‘गांधी का सैंतालीस’ यानी आज़ादी के साल में गांधी की कथा। वैसे तो यह कहानी गांधी के जीवन के आख़िरी साल की है, जो अक्टूबर, 1946 में उनकी नोआखाली यात्रा से शुरू होती है और वहाँ से बिहार, दिल्ली, कलकत्ता और फिर दिल्ली आकर जनवरी, 1948 में उनकी शहादत के साथ ख़त्म होती है। मगर यह उनके आख़िरी साल का रोज़नामचा नहीं है, यह उनकी आख़िरी लड़ाई की कहानी है। डायरेक्ट एक्शन के बाद भारत में साम्प्रदायिक दंगे शुरू हुए, जो बँटवारे के फ़ैसले पर मुहर लगने के बाद और बढ़ गए। इन दंगों ने लाखों की जान ली और करोड़ों को विस्थापित होने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय एक गांधी ही थे, जो नफ़रत की इस आग को बुझाने में लगे थे। उन्हें बस एक ही चिन्ता थी कि इस देश की आत्मा कैसे बचे; वह देश जो पिछले तीस साल से अहिंसक तरीक़े से आज़ादी की लड़ाई लड़ रहा था, आज़ादी के ठीक पहले हिंसा से भर उठा था। लोग अपने पड़ोसियों के ख़ून के प्यासे हो गए थे। इस लड़ाई में 77 साल के गांधी ने अपना सब कुछ झोंक दिया—नंगे पाँव यात्रा करते, पीड़ितों के ज़ख़्मों पर मरहम लगाते, उनके हृदय में साहस भरते और दंगाइयों को सच्चे हृदय से पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करते हुए। उन्होंने संवाद, साहस और प्रेम के औज़ारों से यह लड़ाई लड़ी और अपने आख़िरी हथियार शहादत के ज़रिये इस महान लक्ष्य को हासिल किया। यह भी कहना ज़रूरी है कि यह कहानी गांधी के जीवन के इस सर्वश्रेष्ठ दौर की गौरवगाथा भर नहीं है। कोशिश की गई है कि यह कहानी हमारे सामने एक बोधपाठ की तरह खुले ताकि हम देख सकें कि क्या गांधी की इस आख़िरी लड़ाई के तौर-तरीक़ों में कुछ ऐसा भी है जिसे हम आज के भारत में प्रयोग कर सकें!
Prarthna-Pravachan : Vols. 1-2
- Author Name:
Mohandas Karamchand Gandhi
- Book Type:

- Description:
महात्मा गांधी की हत्या दिल्ली में उनके प्रार्थना-सभा में जाते हुए हुई थी। लेकिन इस पर कम ध्यान दिया गया है कि गांधी जी ने प्रार्थना-सभा के रूप में अपने समय और स्वतंत्रता-संग्राम के दौरान एक अनोखी नैतिक-आध्यात्मिक और राजनैतिक संस्था का आविष्कार किया था। थोड़े आश्चर्य की बात यह है कि आज भी यानी गांधी जी के सेवाग्राम छोड़े 70 से अधिक बरसों बाद भी वहाँ हर दिन सुबह-शाम प्रार्थना-सभा होती है : उसमें सभी धर्मों से पाठ होता है जिनमें हिन्दू, इस्लाम, ईसाइयत, बौद्ध, जैन, यहूदी, पारसी आदि शामिल हैं। दुनिया में, जहाँ धर्मों को लेकर इतनी हिंसा-दुराव-आतंक का माहौल है वहाँ कहीं और ऐसा धर्म-समभाव हर दिन नियमित रूप से होता हो, लगता या पता नहीं है। प्रार्थना-सभा में अन्त में गांधी जी बोलते थे। उनके अधिकांश विचार इसी अनौपचारिक रूप में व्यक्त होते थे। उनका वितान बहुत विस्तृत था। उन्हें दो खण्डों में प्रकाशित करना हमारे लिए गौरव की बात है। इसलिए भी रज़ा गांधी को भारत का बुद्ध के बाद दूसरा महामानव मानते थे। —अशोक वाजपेयी
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book