Amar Shaheed Ashfaq Ulla Khan
Author:
Banarsidas chaturvediPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Available
‘‘जब तुम दुनिया में आओगे तो मेरी कहानी सुनोगे और मेरी तस्वीर देखोगे। मेरी इस तहरीर को मेरे दिमाग़ का असर न समझना। मैं बिलकुल सही दिमाग़ का हूँ और अक़्ल ठीक काम कर रही है। मेरा मक़सद महज़ बच्चों के लिए लिखना यूँ है कि वह अपने फ़राइज़ महसूस करें और मेरी याद ताज़ा करें।’’</p>
<p>उक्त बातें क्रान्तिकारी शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने अपने भतीजों के लिए, फाँसी से ठीक पूर्व लिखी थीं। उनका मक़सद देश की नौजवान पीढ़ी को उनके दायित्वों और प्रतिबद्धताओं से वाक़िफ़ कराना था। देशभक्ति से सराबोर ऐसे क्रान्तिकारी आज विस्मृत कर दिए गए हैं। क्रान्तिकारियों और स्वतंत्रता-सेनानियों के हमदर्द बनारसीदास चतुर्वेदी द्वारा सम्पादित यह पुस्तक अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ के क्रान्तिकारी जीवन और उनके काव्य-संसार से पाठक का परिचय कराती है। दरअसल उनकी रचनाओं और जीवन के मुक़ाम के रास्ते दो नहीं एक रहे हैं। पुस्तक में अशफ़ाक़ उल्ला का बचपन, सरफ़रोशी की तमन्नावाले जवानी के दिन, अंग्रेज़ों के प्रति मुखर विद्रोह और अन्ततः देश की ख़ातिर फाँसी के तख़्ते पर चढ़ाए जाने तक की सारी बातें सिलसिलेवार दर्ज हैं। किताब का सबसे महत्त्वपूर्ण हिस्सा है—अशफ़ाक़ के पत्र, उनके सन्देश, उनकी ग़ज़लें, शायरी तथा उनके लेख जिनमें वह अपनी ‘ख़ानदानी हालत’, ‘बचपन और तालीमी तरबियत’, ‘स्कूल और मायूस ज़िन्दगी’ और ‘जज़्बाते-इत्तिहादी इस्लामी’ का यथार्थ वर्णन करते हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्ला को जानना देश की गंगा-जमना तहज़ीब की विरासत और उनके रग-रेशे में प्रवाहित देशभक्ति और मित्रभाव को भी जानना है। बनारसीदास चतुर्वेदी के अलावा रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, मन्मथनाथ गुप्त, जोगेशचंद्र चटर्जी और रियासत उल्ला ख़ाँ के लेख भी अशफ़ाक़ की वतनपरस्ती और ईमान की सच्ची बानगी पेश करते हैं। निस्सन्देह, यह पुस्तक अशफ़ाक़ को नए सिरे से देखने और समझने में मददगार साबित होती है।
ISBN: 9789387462809
Pages: 172
Avg Reading Time: 6 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘विकल्पहीन नहीं है दुनिया’ किशन पटनायक के राजनैतिक चिन्तन का पहला प्रतिनिधि संकलन है। इस पुस्तक के अधिकांश निबन्ध पिछले दो दशकों में लिखे गए हैं जब देश और दुनिया के बदलते चेहरे को समझने में स्थापित विचार की अक्षमता ज़ाहिर हो गई है। स्थापित राजनैतिक विचारधाराएँ जड़ तथा अप्रासंगिक होती जा रही हैं और बुद्धिजीवी आज की दुनिया के सवालों से पलायन कर रहे हैं। बढ़ती विषमता और नैतिक पतन के सवालों को उठाने की इच्छा, सामर्थ्य और भाषा तक ख़त्म होती जा रही है। विचार के इस संकट के दौर में यह पुस्तक एक नया युगधर्म ढूँढ़ने की कोशिश करती है।
इस नए युगधर्म को यहाँ कोई नाम नहीं दिया गया है। यह किंचित् अनगढ़ देशीय चिन्तन गांधी और समाजवादी विचार परम्परा के साथ–साथ जनान्दोलनों के अनुभव से प्रेरणा ग्रहण करता है, लेकिन किसी इष्ट देवता या वैचारिक बाइबिल का सहारा नहीं लेता है। समता और नैतिकता की कसौटियों का पुनरुद्धार करने के इस प्रयास की परिधि में एक ओर आधुनिक सभ्यता के संकट, विज्ञान और टेक्नोलॉजी के चरित्र और नैतिकता के स्रोत जैसे अमूर्त सवाल शामिल हैं। दूसरी ओर यह चिन्ता अपने मूर्त रूप में सोमालिया के अकाल से कालाहांडी की भुखमरी तक फैली है, नाइजीरिया में सारो वीवा की हत्या और मणीबेली की डूब को एक सूत्र में पिरोती है, शूद्र राजनीति की सम्भावनाओं और धर्मनिरपेक्षता के भविष्य के रिश्ते की शिनाख़्त करती है।
इस पुस्तक के ‘प्रवक्ता’ किशन पटनायक राजनीति में वैचारिक स्पष्टता, चारित्रिक शुद्धता और बुद्धि तथा मन के बीच मेल के लिए जाने जाते हैं। अकादमिक पांडित्य के बोझ और राजनैतिक वाक् युद्ध के गाली–गलौज से अलग हटकर यह पुस्तक वैचारिक बारीकी और राजनैतिक प्रतिबद्धता को गूँथने की एक नई शैली प्रदान करती है।
Hum, Bharat Ke Rajyon Ke Log
- Author Name:
Sanjeev Chopra
- Book Type:

- Description: भारत के नौ प्रान्त तथा वे 562 रियासतें जो अगस्त, 1947 में मौजूद थीं, आज आज़ादी के 75वें साल में देश के नक़्शे पर कहीं दिखाई नहीं देतीं, यह तथ्य अपनी राजनीतिक व प्रशासनिक सीमाओं को लेकर अपने नागरिकों को विश्वास में लेने की राष्ट्र की क्षमता को दर्शाता है। राज्यों के मद्देनज़र भारत की पुनर्कल्पना की प्रक्रिया एक तरफ़ जहाँ प्रशासनिक ज़रूरतों से प्रभावित हुई, वहीं आन्तरिक सीमाओं का पुनर्गठन विभिन्न भाषायी और जातीय समूहों की आकांक्षाओं को समायोजित करने के लिए भी हुआ, वे समूह जो राज्य और संघीय राजनीति में अपना स्थान चाहते थे। प्रस्तुत अध्ययन डॉ. संजीव चोपड़ा ने राज्य अभिलेखों और भूमि बन्दोबस्त के लिए भूमि मापन उपकरणों पर शोध के रूप में शुरू किया था, जो होते-होते राज्य सीमाओं के मानचित्रण तथा भारत के भूगोल के माध्यम से इसके समकालीन राजनीतिक इतिहास के आख्यान के रूप में बदल गया। इस पुस्तक में राज्य पुनर्गठन आयोग, भाषायी पुनर्गठन आयोग, राजकीय दस्तावेजों और विदेश तथा राष्ट्रमंडल कार्यालय के दस्तावेजों से ली गई मूल्यवान सामग्री के साथ इस आख्यान को रचा गया है। राज्यों तथा केन्द्रशासित प्रदेशों के 1947 से अब तक हुए एकाधिक सीमा-निर्धारणों के बारे में यह पुस्तक प्रामाणिक तथ्यों के साथ प्रकाश डालती है। यह बताती है कि भारत ने कैसे अपने आपको लगातार पुनर्परिभाषित किया है और कर रहा है।
Rashtra Aur Naitikata : Naye Bharat Se Uthte 100 Sawal
- Author Name:
Rajeev Bhargava
- Book Type:

- Description: भारत की सामूहिक नैतिक पहचान बहुत दबाव में है। हमारी सामूहिक भलाई किस चीज़ में है, इस पर देश में कोई आम सहमति नहीं दिखती। कुछ समूह मानते हैं कि भारत आख़िरकार अपनी हिन्दू पहचान को वापस पा रहा है और फिर से एक महान राष्ट्र-राज्य बनने की राह पर है। कुछ अन्य के लिए यह बदलाव हमें अपने उस सभ्यतागत चरित्र को गवाँ देने के कगार पर ला चुका है, जहाँ समावेशी होने का अर्थ कम हिन्दू या कम भारतीय होना नहीं था। राजीव भार्गव का मानना है कि एक समावेशी और बहुलतावादी भारत के विचार से जिन लोगों का भी मोहभंग हो चुका है, उनकी जायज़ चिन्ताओं को भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के खाँचे के भीतर ही सम्बोधित किया जा सकता है। अपने संक्षिप्त, सहज और सुबोध लेखों में वे पाठकों को भारतीय गणतंत्र के बुनियादी आख्यानों तक ले जाते हैं। वे यह बताने की कोशिश करते हैं कि अगर मूल नीतियों और नैतिक दृष्टि पर हमारी समझ सही बन पाई, तो हो सकता है कि हम अपने देश को और ज़्यादा ध्रुवीकरण से अब भी बचा ले जाएँ और साथ ही कुछ दरारों को भी भर सकें।
Aadhunik Kaal : Paryavaran, Arthvyavstha, Sanskriti (Bharat 1880 to 1950)
- Author Name:
Sumit Sarkar
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Madhyakalin Bharat mein Prodhyogiki
- Author Name:
S. Irfan Habib
- Book Type:

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Description:
‘भारत का लोक इतिहास’ श्रृंखला की यह कड़ी भारतीय इतिहास के उस पहलू पर दृष्टिपात करती है जिस पर अभी तक बहुत कम काम हुआ है। इसमें आमजन के साधारणतम औज़ारों से लेकर खगोल-वैज्ञानिकों के उपकरणों और युद्ध में काम आनेवाले हथियारों तक के विकास को रेखांकित किया गया है। अध्ययन का मुख्य तत्त्व यह है कि यह पूर्णतया ऐतिहासिक है, तकनीक के विकास-क्रम की खोज न सिर्फ़ प्रमाणों के साथ की गई है, बल्कि उनके सामाजिक और आर्थिक परिणामों को भी विस्तार से समझा गया है।
श्रृंखला की अन्य पुस्तकों की तरह इसमें भी मूल दस्तावेज़ों के उद्धरणों और आधुनिक-पूर्व तकनीक के विषय में विशिष्ट सूचनाएँ दी गई हैं। तकनीकी शब्दावली, तकनीक के ऐतिहासिक स्रोतों और भारत से बाहर विकसित होनेवाली मध्यकालीन तकनीक पर विशेष टिप्पणियाँ भी दी गई हैं।
छात्रों और सामान्य पाठकों को ध्यान में रखते हुए कोशिश की गई है कि प्रामाणिकता को हानि पहुँचाए बिना पुस्तक जितनी सरल हो सकती है, उतनी हो सके। उम्मीद है कि सिर्फ़ इतिहासकारों को ही नहीं, हर उस पाठक को यह प्रस्तुति मूल्यवान लगेगी जो यह जानना चाहते हैं कि प्राचीन युग में जनसाधारण, आम स्त्री और पुरुषों ने अपने हाथों और औज़ारों से क्या कुछ किया।
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