1857 Ke Amar Nayak Raja Jailal Singh
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Author:
Pratap GopendraPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
History-and-politics₹
250
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अखण्ड राष्ट्र के रूप में संगठित होने के पूर्व भारतवर्ष ने साहस एवं उत्सर्ग की अनगिनत परीक्षाएँ दी हैं। धीरोदात्त वीरों ने सैकड़ों वर्षों की आततायी शोषणकारी राज्य व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए अदम्य संघर्ष किये हैं। इन संघर्षो को इतिहास के अनेक स्वनाम-गुमनाम नायकों ने शक्ति एवं नेतृत्व प्रदान किया है। सूचना क्रान्ति के इस युग में ऐसी शख्सियतों व उनकी अमर कृतियों की खोज कर दिग्-दिगन्त तक उनका उद्घोष किया जाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी को जीवन संघर्ष में अडिग रहने की प्रेरणा तो मिले ही, स्वतन्त्रता का मूल्य भी उनके हृदयों में दृढ़ता से स्थापित हो सके। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा जयलाल सिंह ऐसे ही देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिन्हें समय के बादलों ने आच्छादित कर रखा है। सत्तावनी क्रान्ति का एक ऐसा किरदार जिसने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध व्यक्तिगत शौर्य का परिचय देते हुए न केवल प्रत्यक्ष युद्ध लड़े वरन सम्पूर्ण भारतवर्ष में क्रान्तिकारियों की आश्रयस्थली बने शहर लखनऊ में पूरे युद्ध-तन्त्र का संचालन व प्रबन्धन करते हुए अन्तिम नवाबी सरकार के मन्दराचल को कूर्मावतार बन अपनी पीठ पर धारण किया। स्वतन्त्र भारत का भव्य प्रासाद नींव के जिन कीर्त्ति स्तम्भों पर खड़ा है, निःसन्देह राजा जयलाल सिंह उनमें से एक हैं।</p> <p>यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व एवं उत्सर्गपूर्ण कृतित्वों को जानने-समझने का एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज है।
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अखण्ड राष्ट्र के रूप में संगठित होने के पूर्व भारतवर्ष ने साहस एवं उत्सर्ग की अनगिनत परीक्षाएँ दी हैं। धीरोदात्त वीरों ने सैकड़ों वर्षों की आततायी शोषणकारी राज्य व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने के लिए अदम्य संघर्ष किये हैं। इन संघर्षो को इतिहास के अनेक स्वनाम-गुमनाम नायकों ने शक्ति एवं नेतृत्व प्रदान किया है। सूचना क्रान्ति के इस युग में ऐसी शख्सियतों व उनकी अमर कृतियों की खोज कर दिग्-दिगन्त तक उनका उद्घोष किया जाना चाहिए, जिससे युवा पीढ़ी को जीवन संघर्ष में अडिग रहने की प्रेरणा तो मिले ही, स्वतन्त्रता का मूल्य भी उनके हृदयों में दृढ़ता से स्थापित हो सके। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में राजा जयलाल सिंह ऐसे ही देदीप्यमान नक्षत्र हैं जिन्हें समय के बादलों ने आच्छादित कर रखा है। सत्तावनी क्रान्ति का एक ऐसा किरदार जिसने ब्रिटिश हुकूमत के विरुद्ध व्यक्तिगत शौर्य का परिचय देते हुए न केवल प्रत्यक्ष युद्ध लड़े वरन सम्पूर्ण भारतवर्ष में क्रान्तिकारियों की आश्रयस्थली बने शहर लखनऊ में पूरे युद्ध-तन्त्र का संचालन व प्रबन्धन करते हुए अन्तिम नवाबी सरकार के मन्दराचल को कूर्मावतार बन अपनी पीठ पर धारण किया। स्वतन्त्र भारत का भव्य प्रासाद नींव के जिन कीर्त्ति स्तम्भों पर खड़ा है, निःसन्देह राजा जयलाल सिंह उनमें से एक हैं।</p>
<p>यह पुस्तक उनके व्यक्तित्व एवं उत्सर्गपूर्ण कृतित्वों को जानने-समझने का एकमात्र प्रामाणिक दस्तावेज है।
Book Details
-
ISBN9789393603104
-
Pages176
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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- Description: बिहार में 1974 में भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, तानाशाही, संविधान एवं न्यायालय विरोधी सरकार के कार्य जैसे मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलन शुरू हुआ और इसने प्रचंड रूप धारण कर लिया था। बाद में जयप्रकाश नारायणजी भी आंदोलन के समर्थन में आ गए थे। उस आंदोलन में मैं भी छात्रों का समर्थन कर रहा था, इस कारण मुझे आपातकाल के पूर्व दो बार जेल जाना पड़ा । फिर कुछ ही दिन बाद हम जेल से बाहर आए देशव्यापी आंदोलन से असहज होकर तत्कालीन केंद्र सरकार ने आपातकाल की घोषणा कर दी। आपातकाल के दौरान पटना शहर से कुछ दूर खाजपुरा गाँव स्थित मेरा पैतृक निवास 'आर्य भवन' आंदोलन संबंधी गतिविधियों के संचालन का गुप्त केंद्र बन गया था, इस बीच संघ एवं जनसंघ की आंतरिक गुप्त बैठकें 'आर्य भवन' में ही होती थीं। जिसमें संघ के अखिल भारतीय अधिकारी, जनसंघ एवं दूसरे दलों के भूमिगत शीर्षस्थ नेता भी शामिल होते थे। इस दृष्टि से 'आर्य भवन' आंदोलन संचालन का मुख्यालय बन गया था।
Bharat Mein Rashtrapati Pranali
- Author Name:
Bhanu Dhamija
- Book Type:

- Description: Awating description for this book
Mithila Ki Ranbhumi
- Author Name:
Sunil Kumar "Bhanu"
- Book Type:

- Description: “मिथिला की चर्चा होते ही यहाँ के ज्ञान की चर्चा शुरू हो जाती है । सैन्य इतिहास पर बौद्धिक इतिहास हावी हो जाता है । जबकि मिथिला एक से बढ़कर एक युद्ध की साक्षी रही है । इसकी कोख से एक से एक वीर-योद्धाओं का जन्म हुआ, जो न केवल मिथिला की सीमा के रक्षार्थ लड़े, अपितु भारत के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर अपने मित्र शासकों के लिये अपराजेय युद्ध किया । इन मैथिलों की शौर्य-गाथा की चर्चा शायद ही किसी इतिहासकार ने खुलकर की है। मिथिला में मैथिलों द्वारा लड़े गये युद्ध का मतलब कंदर्पीघाट की लड़ाई या बल्दिबाड़ी की लड़ाई तक सीमित है । मैथिल योद्धाओं को इतिहास लेखन में पूरी तरह हाशिये पर डाल दिया गया है, इनकी शौर्य गाथा समाज की यादों से विलुप्त होती जा रही है । इस पुस्तक उन्ही योद्धाओं के शौर्य गाथा को आप तक लाने का प्रयास है । विदेह से लेकर खण्डवला राजवंश तक के युद्ध इतिहास को इसमें दिखाने का प्रयास किया गया है । यह पुस्तक एक दस्तावेज ही नहीं बल्कि सुधी पाठकों के लिए उनके शक्तिशाली अतीत का एक सम्पूर्ण ज्ञानकोष भी साबित होगा ।”
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