Rahul-Chintan
Author:
Gunakar MuleyPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 156
₹
195
Unavailable
विज्ञान के साथ-साथ साहित्य, पुरातत्त्व-इतिहास एवं संस्कृति पर गुणाकर मुळे की महत्त्वपूर्ण लेखमालाएँ और पुस्तकें पहले प्रकाशित हो चुकी हैं। वस्तुतः राहुल पर उनकी पुस्तकें उसी सिलसिले की अगली कड़ी हैं, क्योंकि राहुल पर लिखना महज़ एक साहित्यकार के बारे में और उसके साहित्य पर लिखना नहीं है। एक साहित्यकार होने के अलावा राहुल ने समाज, राजनीति, इतिहास-पुरातत्त्व, धर्म और संस्कृति पर गहन चिन्तन किया था। इन विषयों पर उनके मौलिक विचार थे, जिन्हें समझे और उद्घाटित किए बिना राहुल के वास्तविक महत्त्व को नहीं समझा जा सकता। गुणाकर मुले ने इस काम को बड़ी निष्ठा और वैज्ञानिक सूझबूझ के साथ सम्पन्न किया है, जिसका ज्वलन्त उदाहरण यह पुस्तक है।</p>
<p>इस पुस्तक में गुणाकर जी ने राहुल के बहुआयामी व्यक्तित्व का विशद एवं विराट चित्र उपस्थित किया है और अन्त में ‘राहुल-साहित्य : एक परिचय’ शीर्षक के अन्तर्गत राहुल की लगभग सभी कृतियों का संक्षिप्त परिचय दे दिया है, जिससे राहुल साहित्य के बारे में आज भी जो भ्रामक बातें लिखी और प्रचारित की जा रही हैं, उनका निराकरण होता है।
ISBN: 9788126705665
Pages: 164
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ ग्रन्थमाला की यह दूसरी पुस्तक है जिसमें विश्व की एक प्राचीनतम दार्शनिक धारा का परिचय प्रस्तुत किया गया है।
चीन में दर्शन की परम्परा यों तो बहुत पुरानी है, लेकिन ईसा-पूर्व की पाँचवीं से तीसरी शताब्दी का काल दार्शनिक चिन्तन की दृष्टि से समृद्धि का काल माना जाता है। कन्फ्यूशियस का चिन्तन इसी काल की देन है। तब से लेकर कुछ शताब्दी पहले तक इस देश में अनेक दार्शनिक मतवाद अस्तित्व में आए। प्रस्तुत पुस्तक में इन सभी मतवादों की पृष्ठभूमि स्पष्ट करने के लिए अनेक सदियों के कालक्रम में चीन के राजवंशों की एक संक्षिप्त रूपरेखा दी गई है। उसके बाद विभिन्न सम्प्रदायों के सिद्धान्तों और उनके सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थों का विवेचन किया गया है। चीन में बौद्ध मत का आगमन एक महत्त्वपूर्ण घटना थी, जिसके फलस्वरूप चिन्तन के क्षेत्र में कई धाराओं-उपधाराओं का जन्म हुआ। चीनी दर्शन में चूँकि इन धाराओं-उपधाराओं का विशेष महत्त्व है, इसलिए लेखक ने ख़ास तौर पर इनका विश्लेषण और इनके दार्शनिक लक्ष्यों का मूल्यांकन किया है। इसी प्रकार, इन्होंने एक ओर महिमामंडित कन्फ्यूशियस को एक सटीक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में स्थापित किया है तो दूसरी ओर लांछित ताओवाद की एक सुबोध व्याख्या भी दी है।
चीनी दर्शन के अनेक सम्प्रदायों का मत रहा है कि दर्शनशास्त्री होने के लिए हर समय तत्त्वमीमांसा के गूढ़ रहस्यों में उलझे रहना आवश्यक नहीं है। इसी प्रकार हमारा भी विश्वास है कि प्रस्तुत पुस्तक को पढ़ने और समझने के लिए दर्शन का पंडित होना आवश्यक नहीं है। थोड़े-से पृष्ठों में चीनी दर्शन का एक व्यापक, फिर भी सुबोध, परिचय इस पुस्तक की विशेषता है, और आशा की जा सकती है कि इससे विशेषतः भारतीय और चीनी दर्शनों के तुलनात्मक अध्ययन की प्रेरणा प्राप्त होगी।
Gopan Aur Ayan : Khand 1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description: गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Beeswin Shatabdi Mein Darshanshastra
- Author Name:
Suman Gupta
- Book Type:

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Description:
‘दर्शनशास्त्र : पूर्व और पश्चिम’ शृंखला की इस सातवीं पुस्तक में डॉ. सुमन गुप्ता ने समकालीन दार्शनिक चिन्तन की दो मुख्य प्रवृत्तियों—भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद—का मार्क्सवादी दृष्टि से अध्ययन किया है। इन दोनों विचारधाराओं को उनके सही सामाजिक-ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में रखते हुए, डॉ. गुप्ता ने इनकी प्रचलित व्याख्याओं पर प्रश्नचिह्न लगाया है। उनका तर्क है कि गूढ़ पारिभाषिक शब्दावली के आवरण में इन विचारधाराओं की अमूर्त तत्त्वमीमांसी प्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगाया है, जो एक सही विश्व-दृष्टि प्रस्तुत करने के स्थान पर यथार्थ को विरूपित करती है। भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों के दृष्टिकोण के विपरीत, डॉ. सुमन गुप्ता ने एक ऐसा दृष्टिकोण अपनाया है, जो न केवल इन चिन्तनधाराओं के विविध पक्षों का एकीकरण करता है बल्कि उनके सामाजिक यथार्थ की जड़ों में भी जाता है। सुमन गुप्ता ने स्पष्ट रूप से दर्शाया है कि भाषिक दर्शनशास्त्रियों और अस्तित्ववादियों द्वारा प्रतिपादित मनुष्य की संकल्पना मनुष्य को एक ऐसे अमूर्त रूप में चित्रित करती है जो अपने सामाजिक क्रियाकलाप से अपना या अपने चारों ओर की दुनिया का रूपान्तरण करने में असमर्थ है।
डॉ. गुप्ता ने समकालीन दर्शन की इन दोनों प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा प्रस्तुत की है, बल्कि वह विश्व-दृष्टि भी सामने रखी है जिसे वे सही मानती हैं।
सुमन गुप्ता ने भाषिक दर्शनशास्त्र और अस्तित्ववाद का विवेचन साधारण कुशलता से किया है लेकिन उनकी पद्धति निस्सन्देह विवादमूलक है, जिसके फलस्वरूप यह पुस्तक दर्शनशास्त्र के प्रति एक नई दृष्टि विकसित करने में सहायक होगी और जो पाठक दर्शनशास्त्र की सार्थकता को जीवन की यथार्थ समस्याओं से जोड़कर देखना चाहते हैं, उनके लिए यह निश्चय ही रोचक और पठनीय सिद्ध होगी।
Bandhavarachi Zade
- Author Name:
Dr. V. N. Shinde
- Book Type:

- Description: बोर, हादगा, जांभूळ, शेवगा, चिंच, आंबा, आवळा, कडुलिंब, बाभूळ, साग या झाडांविषयीच्या ज्ञानललित माहितीचा लेखसंग्रह म्हणजे ‘बांधावरची झाडे' हे पुस्तक.डॉ. व्ही. एन. शिंदे यांनी जाणीवपूर्वक घडविलेला हा विज्ञानललित बंध आहे. झाडांच्या शास्त्रीय माहितीबरोबर त्यांचा व्याप्ती-पसारा, भूगोल, भाषिक संज्ञेचा वर्णपट त्यामध्ये निवेदिला आहे. त्यामुळे त्यास वस्तुनिष्ठ वैज्ञानिक माहितीचे स्वरूप प्राप्त झाले आहे. त्यासाठी त्यांनी विविध ज्ञानशाखांमधील माहितीचा भरगच्च आधार घेतला आहे. झाडांचा अधिवास व परिसर विज्ञानाविषयीचे हे कथन आहे. त्यात शेतीज्ञानाबरोबर वनस्पतिविज्ञान आहे. त्या त्या झाडांची व्यावहारिक उपयोगिता सांगितली आहे. शिंदे यांच्या लेखनाचा महत्त्वपूर्ण विशेष म्हणजे झाडसृष्टीच्या मानवनिर्मित बांधकामाचे कथन. माणूस आपल्या कल्पनानिरीक्षणाने सृष्टिवाचन करत त्यास मानवी रंगरूप देत आला आहे. डॉ. शिंदे यांच्या लेखनात मानवाने आदिकाळापासून झाडांविषयीचे रचलेले विहंगदर्शन आहे. लोककथा, गाणी, दंतकथा, मिथके व आधुनिक साहित्यातील ही झाडदर्शने आहेत. लोक व लिखित परंपरेच्या झाडवाचनाचा त्यात धांडोळा आहे. एका अर्थाने मराठी संस्कृतीत उमटलेले झाडांचे हे बिलोरी रंगछायादर्शन आहे. डॉ. शिंदे यांच्या या झाडवाचनाला लेखकाच्या आत्मपरतेचे गहिरे रंग प्राप्त झाले आहेत. त्यामुळे बांधावरील हे झाडमायादर्शन मनोहारी ठरेल. - डॉ. रणधीर शिंदे
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