Devnagari Jagat Ki Drishya Sanskriti
Author:
Sadan JhaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 200
₹
250
Unavailable
“हिन्दी में सभ्यता-समीक्षा कम ही होती है और यह कहा जा सकता है कि यह हिन्दी में विचार और आलोचना की जो परम्परा रही है उससे विपथ होने जैसा है। इधर तो सारा समय हिन्दी में, जैसे कि अन्यत्र भी, देखने-दिखाने में ही बीतता है। इसके बावजूद अभी तक देवनागरी जगत में जो दृश्य संस्कृति विकसित हुई है उसका कोई सुचिन्तित अध्ययन नहीं हुआ है। सदन झा की यह पुस्तक इस सन्दर्भ में पहली ही है : उसमें समझ और जतन से, वैचारिक सघनता और खुलेपन से इस दृश्य संस्कृति के विभिन्न रूपों पर विचार किया गया है। निश्चय ही यह हिन्दी में चालू मानसिकता से अलग कुछ करने का ज़रूरी जोख़िम उठाने जैसा है। हम रज़ा पुस्तक माला में यह पुस्तक सहर्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।”</p>
<p>—अशोक वाजपेयी
ISBN: 9789388183925
Pages: 206
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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G. M. Pawar
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- Description: “स्वार्थावर लाथ मारून गळ्यात झोळी अडकवून संस्थेकरता - अर्थात आमच्या लोकांकरिता - संस्थेचे जे चालक भिक्षांदेही करीत दारोदार फिरतात व त्यांना त्यात कितीही अल्प यश आले तरी ते पर्वा न करता चंदनासारखे स्वत: झिजू दुसर्यांना- आम्हांला - सुख देण्याकरिता, आमची स्थिती सुधारण्याकरिता आपला प्रयत्न चालू ठेवतात, त्या संतांची किंमत आजपर्यंत झालेल्या कोणत्याही संतापेक्षा आम्हांला यत्किं चितही कमी वाटत नाही. कित्येकांना ती जास्त वाटेल.’’ श्री. गणेश आकाजी गवई डी. सी. मिशनच्या महाराष्ट्र परिषदेत केलेले भाषण, पुणे, 1912 “इतिहास असे सांगतो की, ज्यापासून राष्ट्राचा विकास होतो, अशा सर्व प्रकारच्या चळवळींचा उगम थोड्याशा व्यक्तींच्या कार्यात सापडतो. प्रस्तुतच्या बाबतीत त्या व्यक्ती म्हणजे, ज्यांची प्रथम प्रथम हेटाळणी झाली ते डिप्रेस्ड क्लासेस मिशनचे गृहस्थ होत. त्यांच्या कार्याने प्रचंड अशा हिंदू समाजाची सदसद्विवेकबुद्धी जागृत झाली.’’ न्यायमूर्ती सर नारायणराव चंदावरकर डी. सी. मिशनची अस्पृश्यतानिवारक परिषद , मुंबई, 1918 “मराठ्यांतील कार्यशक्ती काय करू शकते, असा जर कोणी आपल्याला प्रश्न विचारला, तर अण्णासाहेब शिंद्यांच्या कार्याकडे बोट करा. मराठ्यांतील स्वार्थत्यागाचे उदाहरण दाखविण्याचा प्रसंग आला, तर आपण अण्णासाहेब शिंद्यांचे नाव घ्या. परकीय सत्तेचा विध्वंस शिवाजीमहाराजांनी केला; वर्णवर्चस्वाचा विध्वंस शाहूमहाराजांनी केला व अस्पृश्यतेच्या विध्वंसनाचे कार्य करण्याकरिता तितक्याच धडाडीने अण्णासाहेबांनी आपले आयुष्य वेचले.’’ श्री. बाबुराव जेधे मुंबई इलाखा शेतकरी परिषद, पुणे, 1928 “शिंद्यांचा जिला भरीव हातभार लागला नाही, अशी लोकसेवेची व समाजोन्नतीची चळवळ दाखवून देणे कठीण आहे. राजकारण, समाजकारण, धर्मकार्य, शिक्षणकार्य; इतकेच नव्हे, तर वाङ्मयसेवा आणि इतिहास संशोधन या सर्वांत शिंद्यांचा भाग आहे; आणि फार महत्त्वाचा भाग आहे. ज्या काळी विधवाविवाहासारखे साधे प्रश्न सुटणे दुरापास्त होते, अशा त्या घनदाट धर्मवेडाच्या काळात अस्पृश्योद्धाराची चळवळ सुरू करणे, त्यासाठी डिप्रेस्ड क्लासेस मिशन ही संस्था काढणे; इतकेच नव्हे, तर अस्पृश्यांत जाऊन त्यांच्यापैकी एक झाल्याप्रमाणे त्यांच्यात वागणे, या गोष्टींसाठी अतुल स्वमतधैर्याची; एवढेच नव्हे, तर मूलमार्गी बुद्धीची व समाजाविषयी खर्या कळकळीचीही गरज होती. इतक्या व्यापक व सूक्ष्म दृष्टीच्या कार्यकर्त्याची दृष्टी सबंध देशाइतकी विशाल विस्तृत असावी लागते. म्हणूनच श्री. शिंदे सामाजिक चळवळींप्रमाणेच अनेक राजकीय चळवळींतही भाग घेताना दिसत.’’ न्यायमूर्ती भवानीशंकर नियोगी महाराष्ट्र साहित्य संमेलन नागपूर, 1933 Maharshi Vitthal Ramaji Shinde : Jeevan Va Karya / G. M. Pawar महर्षी विठ्ठल रामजी शिंदे : जीवन व कार्य । गो. मा. पवार
Nari Prasna
- Author Name:
Sarla Maheshwari
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- Description: नारी प्रश्न के असंख्य आयाम हैं। कुछ प्रश्न ऐसे हैं, जो काल और स्थान की सीमाओं से बँधे हुए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो काल के दीर्घ प्रवाह के बीच से चिरन्तन प्रश्नों के रूप में सामने आए हैं। काल और स्थान-निरपेक्ष ये प्रश्न हर देश के नारी समाज की मानवीय अस्मिता से जुड़े हुए हैं। एक वृहत्तर मानव समाज में ऐसे प्रश्नों की अपनी नारी-पहचान के बावजूद ये प्रश्न किसी संकीर्णता के द्योतक नहीं हैं, बल्कि वास्तविक अर्थों में मानव समाज को ही और अधिक मानवीय बनाने की निरन्तर जारी प्रक्रिया के अंग हैं। अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नारीवाद के अन्दर की अनेक परस्पर विरोधी धाराओं के बावजूद, नारी-मुक्ति और उससे जुड़े हुए मानव-मुक्ति के बहुत से महत्त्वपूर्ण प्रश्न इस संघर्ष के बीच से उभरकर सामने आए हैं। भारत का नारी आन्दोलन भी ऐसे तमाम प्रश्नों की अवहेलना नहीं कर सकता। सरला माहेश्वरी की यह पुस्तक हिन्दी में अपने क़िस्म की पहली पुस्तक है, जिसमें बहुत व्यापक और गहन अध्ययन के ज़रिए नारी आन्दोलन की अन्तरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि और उसके आधार पर निर्मित दृष्टि की रोशनी में नारी जीवन से जुड़े कई ज़रूरी सामाजिक प्रश्नों पर गम्भीरता से रोशनी डाली गई है।
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