Utho! Jago! Aage Barho
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Author:
Sandip Kumar SalunkhePublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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हमारी आत्मा में ऐसी कई सूक्ष्म आवाजें बसती हैं जो अमूर्त हैं और जिन्हें शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव सा है। उन्हें हम स्वयं अनुभूत करते हैं। ये अनमोल किताबें 'उस’ आवाज को सुनने की क्षमता रखती हैं। जिस प्रकार से प्रकृति में समाई एक अनजान शक्ति ही बीज को अंकुरित होने में, पेड़ बनने में, फलने-फूलने में सदैव प्रेरित करती है, ठीक उसी तरह हमारी अंतरात्मा में भी एक अनजान प्रेरणा बसती है, जो हमारे 'स्व’ रूप के सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति की ओर, जीवन के सही अर्थ को खोजने की दिशा में प्रेरित करती है। जीवन सफर के पहले दौर में हम बाहरी जगत् में आदर्श को खोजने में लग जाते हैं। हम संघर्ष करते हैं। बार-बार गिरते हैं और क्षत भी होते रहते हैं। फिर साहस से उठते हैं और संघर्ष के साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। हमारे अंदर समाई क्रांति के सफर में यह संघर्ष महत्त्वपूर्ण है। अनिवार्य भी है। अंत में इच्छित क्रांतिकारी पल हमारे जीवन में अवश्य आता है। जीवन को पूर्णतया बदल डालने की ताकत शब्दों में होती है। सारी निराशा को, आलस्य को दूर करने की क्षमता उनमें होती है। तमाम अवगुणों को जलाकर, भस्म कर, अंतर्मन की शक्ति को जाग्रत् करने की शक्ति, क्षमता शब्दों में होती है। अत: 'उठो, जागो और ध्येयसिद्धी की राह पर अविरत चलते रहो। जब तक ध्येय प्राप्त न हो, रुको मत।’
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हमारी आत्मा में ऐसी कई सूक्ष्म आवाजें बसती हैं जो अमूर्त हैं और जिन्हें शब्दों में अभिव्यक्त कर पाना असंभव सा है। उन्हें हम स्वयं अनुभूत करते हैं। ये अनमोल किताबें 'उस’ आवाज को सुनने की क्षमता रखती हैं। जिस प्रकार से प्रकृति में समाई एक अनजान शक्ति ही बीज को अंकुरित होने में, पेड़ बनने में, फलने-फूलने में सदैव प्रेरित करती है, ठीक उसी तरह हमारी अंतरात्मा में भी एक अनजान प्रेरणा बसती है, जो हमारे 'स्व’ रूप के सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति की ओर, जीवन के सही अर्थ को खोजने की दिशा में प्रेरित करती है।
जीवन सफर के पहले दौर में हम बाहरी जगत् में आदर्श को खोजने में लग जाते हैं। हम संघर्ष करते हैं। बार-बार गिरते हैं और क्षत भी होते रहते हैं। फिर साहस से उठते हैं और संघर्ष के साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। हमारे अंदर समाई क्रांति के सफर में यह संघर्ष महत्त्वपूर्ण है। अनिवार्य भी है। अंत में इच्छित क्रांतिकारी पल हमारे जीवन में अवश्य आता है। जीवन को पूर्णतया बदल डालने की ताकत शब्दों में होती है। सारी निराशा को, आलस्य को दूर करने की क्षमता उनमें होती है। तमाम अवगुणों को जलाकर, भस्म कर, अंतर्मन की शक्ति को जाग्रत् करने की शक्ति, क्षमता शब्दों में होती है। अत: 'उठो, जागो और ध्येयसिद्धी की राह पर अविरत चलते रहो। जब तक ध्येय प्राप्त न हो, रुको मत।’
Book Details
-
ISBN9789389982015
-
Pages204
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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Prabhakar Shrotriya
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- Description: ‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
Samvad Purush Prof. Devendra Swarup
- Author Name:
Jitendra Tiwari
- Book Type:

- Description: प्रो. देवेंद्र स्वरूप एक निमित्त हैं, जो राष्ट्रीय हैं। जिनमें सांस्कृतिक प्रवाह है। जिनमें गांधी और राष्ट्रीयता का संगम है। उसे दूसरी तरह से भी कह सकते हैं। भारत की सनातन यात्रा में जो-जो और जब-जब प्रवाह पैदा हुए, उसे अगर समझना हो तो देवेंद्र स्वरूप को पढ़ना जरूरी होगा। उन्हें सुनना भी ऐसा अनुभव होता है मानो इतिहास की तरंगों में आप खेल रहे हों। जिन्हें यह भ्रम है कि राष्ट्रीयता की संघ धारा में बौद्धिक विमर्श कर सकने लायक व्यक्ति नहीं होते, वे प्रो. देवेंद्र स्वरूप को जानें और समझें। जैसे ही वे ऐसा करेंगे, उनका भ्रम गिर जाएगा। आग्रह की वह दीवार ढह जाएगी। सामने होगा खुला मैदान, जो संवाद का होगा।
Shikshan Aani Shanti
- Author Name:
Jane Sahi +1
- Book Type:

- Description: शाळा ही काही समाजाबाहेर, एखाद्या पोकळीत असणारी गोष्ट नाही. ती समाजातून येते आणि पुन्हा समाजापर्यंतच वाहत जाते. शाळा काही फक्त जीवनाची तयारी नव्हे; ती समाजाच्या सामाजिक, आर्थिक वास्तवाचा अविभाज्य भाग असते. सध्या समाजात एकंदरीतच जे ताण आहेत आणि दडपणं आहेत त्यांनाच शाळांनाही तोंड द्यावं लागत आहे. उदाहरणार्थ, स्पर्धा आणि व्यापारीकरणाच्या वरवंट्याखाली भरडलं जाणं. शाळा ज्या प्रकारे वाढलेल्या दिसतात, तो काही योगायोग नाही; तो समाज, त्याची मूल्यं, त्याच्या अपेक्षा आणि गरजा यांचा तर्कशुद्ध विस्तार किंवा प्रतिबिंब आहे. आपल्या सध्याच्या समाजातली हिंसा, भेदभाव आणि अन्याय यांनीच विविध प्रकारच्या शाळांमधली उतरंडीची व्यवस्था निर्माण केली, अभ्यासक्रमाचे तपशील ठरवले आणि शिक्षणाच्या पद्धती आणि मूल्यमापनाच्या पद्धती ठरवल्या. थोडं नकारात्मक अर्थानं आणि एका दृष्टिकोनातून पाहिलं पण त्या शाळा जीवनापासून अलिप्त नाहीत तर अन्याय आणि असमानता या कठोर वास्तवांचा भाग आहेत. Shikshan Aani Shanti : Jane Sahi , Shobha Bhagwat शिक्षण आणि शांती : जेन साही, शोभा भागवत
MAIN TAGORE BOL RAHA HOON
- Author Name:
Ed. Anil Kumar Mishra , Manish Kumar
- Book Type:

- Description: भारतीय नवजागरण में अनेक लोगों ने अपने-अपने स्तर पर श्रेष्ठ योगदान दिया। ऐसे ही अनन्य महापुरुषों की पंक्ति में एक नाम रवींद्रनाथ टैगोर का भी है। यह संभवतः एक विलक्षण व महत्त्वपूर्ण नाम है, क्योंकि इसी व्यक्ति ने भारतीय, विशेषकर बँगला साहित्य को विश्व के सामने प्रस्तुत किया। उनके अद्भुत लेखन तथा कल्पना-शक्ति ने ही उन्हें ‘विश्व पुरुष’ के रूप में पहचान दी। वे भारतीय संस्कृति एवं शिक्षा-पद्धति के पर्याय पुरुष माने जाते हैं। उन्होंने स्वतंत्रता पूर्व भारत में शिक्षा और साहित्य का गौरव बढ़ाया। उनका नाम विश्व साहित्य में एक अलग पहचान रखता है, क्योंकि वे भारतीय साहित्य-जगत् तथा एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार विजेता थे, जो उन्हें उनके कालजयी काव्य ‘गीतांजलि’ के लिए दिया गया। उल्लेखनीय है कि उन्होंने भारत के राष्ट्रगान ‘जन-गण-मन’ के साथ-साथ बांग्लादेश के राष्ट्रगान ‘आमार सोनार बांग्ला’ की रचना भी की। इसलिए विश्व में उन्हें ‘कविगुरु’ और ‘गुरुदेव’ जैसे आदरणीय उपनामों से संबोधित किया गया। प्रस्तुत पुस्तक में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के नाना विषयों पर प्रकट विचारों और उनकी सोच को वर्णित किया गया है। टैगोर को संपूर्ण रूप में जानने-समझने में सहायक एक उपयोगी पुस्तक।
Life Without Principle
- Author Name:
Henry David Thoreau
- Book Type:

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