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Uttar Bharat Mein Chamar Aur Dalit Aandolan Ka Itihas

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‘उत्तर भारत में चमार और दलित आन्दोलन का इतिहास’ दलितों के उन संघर्षों का इतिहास है, जो उन्होंने अस्पृश्यता और बेगार-प्रथा के विरुद्ध और अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए किए थे और जिनमें वे सफल हुए थे। यह पहली कृति है जिसमें दलितों के सन्दर्भ में औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के समय तक की गहरी छानबीन की गई है। इसमें प्रामाणिक तथ्यों के ज़रिये बतलाया गया है कि अधिकतर चमार हमेशा से किसान रहे हैं। लेकिन औपनिवेशिक इतिहासकारों ने उन्हें खालों के लिए मवेशियों को ज़हर देकर मारने वाला गठित अपराधी गिरोह बताया। इस मिथ्या धारणा को नकारने की ज़रूरत राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी नहीं समझी। दरअसल ब्राह्मणों ने सभी शिल्पकार और किसान जातियों के बारे में ऐसी धारणाएँ गढ़ी थीं जो लगभग प्रत्येक दलित जाति के लिए अस्पृश्यता का कारण बनता है। इनके विरुद्ध दलितों की विभिन्न स्तरों पर प्रतिक्रियाएँ और प्रतिरोध हुए लेकिन यह सब इतिहास में प्रायः अनुल्लिखित रहा, जिन्हें सामने लाकर यह पुस्तक एक ज़रूरी सन्दर्भ मुहैया कराती है। डॉ. आंबेडकर से भी एक सदी पहले, उत्तर प्रदेश में शुरू हुए चमारों के अस्मिता-आन्दोलन, उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश में शुरू हुए किसान-आन्दोलन में दलितों के प्रतिनिधित्व और तीसरे दशक में चले आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन पर इसमें विस्तार से विचार किया गया है। आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन ने राजनीतिक संगठन के लिए सम्पूर्ण दलित जातियों के लिए एक मूल श्रेणी के रूप में ‘अछूत’ पहचान का निर्माण किया, जिसने नया दलित-इतिहास निर्मित किया और वे प्रमुख मुद्दे निर्धारित किए जो बीते आठ दशक से दलित राजनीति को आकार दे रहे हैं। बेशक यह दलित आन्दोलन को उसके मूल परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए एक आवश्यक पुस्तक है। पठनीय, विचारणीय और संग्रहणीय!

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‘उत्तर भारत में चमार और दलित आन्दोलन का इतिहास’ दलितों के उन संघर्षों का इतिहास है, जो उन्होंने अस्पृश्यता और बेगार-प्रथा के विरुद्ध और अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए किए थे और जिनमें वे सफल हुए थे। यह पहली कृति है जिसमें दलितों के सन्दर्भ में औपनिवेशिक काल से लेकर आज़ादी के समय तक की गहरी छानबीन की गई है। इसमें प्रामाणिक तथ्यों के ज़रिये बतलाया गया है कि अधिकतर चमार हमेशा से किसान रहे हैं। लेकिन औपनिवेशिक इतिहासकारों ने उन्हें खालों के लिए मवेशियों को ज़हर देकर मारने वाला गठित अपराधी गिरोह बताया। इस मिथ्या धारणा को नकारने की ज़रूरत राष्ट्रवादी इतिहासकारों ने भी नहीं समझी। दरअसल ब्राह्मणों ने सभी शिल्पकार और किसान जातियों के बारे में ऐसी धारणाएँ गढ़ी थीं जो लगभग प्रत्येक दलित जाति के लिए अस्पृश्यता का कारण बनता है। इनके विरुद्ध दलितों की विभिन्न स्तरों पर प्रतिक्रियाएँ और प्रतिरोध हुए लेकिन यह सब इतिहास में प्रायः अनुल्लिखित रहा, जिन्हें सामने लाकर यह पुस्तक एक ज़रूरी सन्दर्भ मुहैया कराती है।

डॉ. आंबेडकर से भी एक सदी पहले, उत्तर प्रदेश में शुरू हुए चमारों के अस्मिता-आन्दोलन, उन्नीसवीं सदी के दूसरे दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश में शुरू हुए किसान-आन्दोलन में दलितों के प्रतिनिधित्व और तीसरे दशक में चले आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन पर इसमें विस्तार से विचार किया गया है। आदि-हिन्दू महासभा के आन्दोलन ने राजनीतिक संगठन के लिए सम्पूर्ण दलित जातियों के लिए एक मूल श्रेणी के रूप में ‘अछूत’ पहचान का निर्माण किया, जिसने नया दलित-इतिहास निर्मित किया और वे प्रमुख मुद्दे निर्धारित किए जो बीते आठ दशक से दलित राजनीति को आकार दे रहे हैं। बेशक यह दलित आन्दोलन को उसके मूल परिप्रेक्ष्य में समझने के लिए एक आवश्यक पुस्तक है। पठनीय, विचारणीय और संग्रहणीय!

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
2nd
Publication year
2024
Weight
150 grams
ISBN-13
9789348157218
Pages
328
Reading time
~11 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
15 × 22 cm
Language
Hindi

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