Shikshan Aani Shanti
Author:
Shobha Bhagwat, Jane SahiPublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 128
₹
160
Available
शाळा ही काही समाजाबाहेर,
एखाद्या पोकळीत असणारी गोष्ट नाही.
ती समाजातून येते आणि पुन्हा समाजापर्यंतच वाहत जाते.
शाळा काही फक्त जीवनाची तयारी नव्हे;
ती समाजाच्या सामाजिक, आर्थिक वास्तवाचा
अविभाज्य भाग असते.
सध्या समाजात एकंदरीतच जे ताण आहेत
आणि दडपणं आहेत त्यांनाच शाळांनाही
तोंड द्यावं लागत आहे.
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वरवंट्याखाली भरडलं जाणं.
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किंवा प्रतिबिंब आहे. आपल्या सध्याच्या समाजातली हिंसा,
भेदभाव आणि अन्याय यांनीच विविध प्रकारच्या
शाळांमधली उतरंडीची व्यवस्था निर्माण केली,
अभ्यासक्रमाचे तपशील ठरवले आणि शिक्षणाच्या पद्धती
आणि मूल्यमापनाच्या पद्धती ठरवल्या.
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पण त्या शाळा जीवनापासून अलिप्त नाहीत तर अन्याय
आणि असमानता या कठोर वास्तवांचा भाग आहेत.
Shikshan Aani Shanti : Jane Sahi , Shobha Bhagwat
शिक्षण आणि शांती : जेन साही, शोभा भागवत
ISBN: 9789386118110
Pages: 136
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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भारत से लेकर सम्पूर्ण विश्व के शक्तिहीन, दबे-कुचले, सामाजिक रूप से पिछड़े और सताए हुए
लोग और उनके समूह जब आपस में मिलकर शक्ति-सम्पन्न होने का संकल्प लें, तो इसे बड़े बदलाव के भावी संकेत
के रूप में लिया जाना चाहिए। इतिहास बनने की शुरुआत ऐसे ही होती है। जो इसकी अगुआई करते हैं, उन्हें
इतिहास अपने सिर-माथे बैठाता है, क्योंकि अगर वे आगे नहीं बढ़ते तो यात्रा अपने अन्तिम चरण पर पहुँचती ही
नहीं। दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण की यात्रा शुरू हो चुकी है। इस यात्रा का ध्येय है शक्तिहीन, दबे-कुचले, और
सामाजिक रूप से भेदभाव के शिकार दलितों और अल्पसंख्यकों को शक्ति-सम्पन्न करना व उनके सामाजिक आधार
को मज़बूत करते हुए उन्हें नेतृत्व के लिए तैयार करना।
पुस्तक का महत्त्वपूर्ण अंश है डॉ. मनमोहन सिंह का कथन। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने शक्तिहीनों
को शक्ति-सम्पन्न बनाने तथा दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण के प्रयास को अपना पूरा समर्थन देने की घोषणा की।
भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने साफ़ कहा कि अब सहूलियत देने से काम नहीं चलेगा, वंचितों
को शिरकत भी देनी होगी। बाबा साहेब अम्बेडकर ने ग़रीबों, दलितों, अल्पसंख्यकों के सशक्तीकरण की लड़ाई को
वैज्ञानिक विचार का आधार दिया तथा उसे हथियार बनाया। उसी कड़ी में यह एक प्रयास है ताकि आज दलित,
अल्पसंख्यक सशक्तीकरण के लिए लड़नेवाले लोग न केवल अपना वैचारिक आधार मज़बूत कर सकें, बल्कि उसे
हथियार के रूप में भी इस्तेमाल कर सकें।
यह पुस्तक उन सबके लिए उपयोगी होगी जो ग़रीबों और वंचितों की लड़ाई में या तो शामिल होना चाहते हैं या
उन्हें सहयोग देना चाहते हैं। राजनीति और समाजशास्त्र के विद्यार्थियों के लिए यह पुस्तक भारत के परिवर्तन की इस
लड़ाई को समझने का आधार बनेगी।
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