Harishankar Parsai : Vyangya Ki Vaicharik Prishthbhoom
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Author:
Radhe Mohan SharmaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
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हरिशंकर परसाई सही मायनों में व्यंग्य-लेखन में ‘मास्टर माइंड’ हैं। एक ऐसे लौह-लेखक जिनके कारण ही व्यंग्य एक विधा के रूप में स्थापित हो सका । प्रो. राधेमोहन शर्मा ने अपने लघु शोध-प्रबन्ध में विस्तार से विवेचन-विश्लेषण कर हिंदी गद्य साहित्य में परसाई की शिखर-स्थिति को रेखांकित किया है। व्यंग्य के स्वरूप और प्रकार, युग की बात युग के लिए, व्यक्तित्व की पहचान जैसे विश्लेषणों में परसाई के व्यंग्य की समग्रता को समेटा गया है। हरिशंकर परसाई के पाठकों, छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक उन्हें गहरे तक समझने के लिए श्रेष्ठ मार्गदर्शक है।
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हरिशंकर परसाई सही मायनों में व्यंग्य-लेखन में ‘मास्टर माइंड’ हैं। एक ऐसे लौह-लेखक जिनके कारण ही व्यंग्य एक विधा के रूप में स्थापित हो सका ।
प्रो. राधेमोहन शर्मा ने अपने लघु शोध-प्रबन्ध में विस्तार से विवेचन-विश्लेषण कर हिंदी गद्य साहित्य में परसाई की शिखर-स्थिति को रेखांकित किया है। व्यंग्य के स्वरूप और प्रकार, युग की बात युग के लिए, व्यक्तित्व की पहचान जैसे विश्लेषणों में परसाई के व्यंग्य की समग्रता को समेटा गया है।
हरिशंकर परसाई के पाठकों, छात्रों, अध्यापकों, शोधार्थियों के लिए यह पुस्तक उन्हें गहरे तक समझने के लिए श्रेष्ठ मार्गदर्शक है।
Book Details
-
ISBN9789349159167
-
Pages96
-
Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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बीते वर्षों के दौरान साम्प्रदायिकता का उभार भारतीय राजनीति में एक बड़े दावेदार के रूप में हुआ है। सो भी इतने ज़ोर-शोर से कि हमारे संवैधानिक ढाँचे के लिए ख़तरा बनता दिखाई दे रहा है। अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी उत्तरोत्तर धार्मिक शब्दावली का प्रयोग ज़्यादा दिखने लगा है। विश्व के भी मानवाधिकार आन्दोलन इसको एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं।
इस पुस्तक में शामिल सत्रह मौलिक आलेखों की पृष्ठभूमि यही है जिसमें अमेरिका पर सितम्बर 11 का हमला, अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर अमेरिकी आक्रमण, दुनिया-भर में इस्लाम का शैतानीकरण और भारत के मुम्बई व गुजरात के दंगों को ख़ास तौर पर रेखांकित किया गया है।
ये आलेख बताते हैं कि भीड़ को धर्म के नाम पर भड़काकर वंचित समूहों के भीतर किसी भी विद्रोह की सम्भावना को कैसे असम्भव कर दिया जाता है और धर्म-आधारित राजनीति किस तरह आज उदारीकरण, भूमंडलीकरण और निजीकरण के साथ गठजोड़ करके चल रही है। यह पुस्तक मुस्लिम पिछड़ेपन के मिथक, हिन्दुत्व की विभाजनकारी राजनीति को आप्रवासियों की आर्थिक मदद आदि मुद्दों पर भी तथ्याधारित विचार करती है और अब आदिवासी, दलित और स्त्रियों के साथ अन्य अल्पसंख्यक समूह कैसे उसके निशाने पर आ रहे हैं, यह भी बताती है।
‘हिन्दुत्व’ पर लगभग हर कोण से विस्तृत परिदृश्य में प्रश्नवाचक समीक्षा करनेवाली यह पुस्तक राजनीति, समाजविज्ञान, इतिहास और धर्म आदि सभी क्षेत्र के अध्येताओं के लिए पठनीय है।
Udarikaran Ki Tanashahi
- Author Name:
Prem Singh
- Book Type:

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Description:
यह पुस्तक उदारीकरण-भूमंडलीकरण की परिघटना पर केन्द्रित है। इसमें उदारीकरण के नाम से प्रचारित नई आर्थिक नीतियों के देश की अर्थव्यवस्था और राजनीति पर पड़नेवाले प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। पुस्तक की मुख्य स्थापना है : वैश्विक आर्थिक संस्थाओं—विश्व बैंक, अन्तरराष्ट्रीय मुद्राकोष, विश्व व्यापार संगठन—और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के ‘डिक्टेट’ पर लादी जा रही आर्थिक ग़ुलामी का नतीजा राजनैतिक ग़ुलामी में निकलने लगा है।
इसके साथ यह भी दर्शाया गया है कि आर्थिक और राजनैतिक के साथ सांस्कृतिक और शैक्षिक क्षेत्रों पर भी उदारीकरण की तानाशाही चल रही है। इसके लिए अकेले राजनैतिक नेतृत्व को ज़िम्मेदार न मानकर, भूमंडलीकरण के समर्थक बुद्धिजीवियों और विदेशी धन लेकर एनजीओ चलानेवाले लोगों को भी ज़िम्मेदार माना गया है।
पुस्तक में भूमंडलीकरण को नवसाम्राज्यवाद का अग्रदूत मानते हुए साम्राज्यवादी सभ्यता के बरक्स वैकल्पिक सभ्यता के निर्माण की ज़रूरत पर बल दिया गया है।
पुस्तक में सारी बहस देश और दुनिया की वंचित आबादी की ज़मीन से की गई है। इस रूप में यह सरोकारधर्मी और हस्तक्षेपकारी लेखन का सशक्त उदाहरण है।
भाषा की स्पष्टता और शैली की रोचकता पुस्तक को सामान्य पाठकों के लिए पठनीय बनाती है।
Aadhi Aabadi Ka Sangharsh
- Author Name:
Mamta Jeitali
- Book Type:

- Description: राजस्थान में देश के अन्य राज्यों की अपेक्षा रजवाड़ों और जागीरदारों का ज़बर्दस्त दबदबा रहा, लेकिन जैसे ही सामन्ती व्यवस्था हटी तो औरतों के लिए अवसर आए, शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ। अपनी स्थिति पर उनके बीच चर्चा व मंथन की शुरुआत हुई तथा राजस्थान की आम औरतों ने अपनी आवाज़ को बुलन्द करना शुरू किया। यह एक पुनर्जागरण की शुरुआत थी। राजस्थान में कार्यरत कई स्वयंसेवी संस्थाएँ जो औरतों के मुद्दों पर काम करती थीं, उन्होंने संस्थाओं में घरेलू हिंसा, लैंगिक भेदभाव तथा बलात्कार जैसे मुद्दों पर चर्चाओं के माध्यम से ज़ोरदार माहौल बनाया। सन् 1985 में एक महिला मेले के दौरान पूरे राजस्थान से आई औरतों ने किशनगढ़ क्षेत्र में बलात्कार जैसी सामाजिक बुराई के विरुद्ध एक रैली निकाली। मज़दूर महिलाओं को सड़क पर उतरकर, मुट्ठी बाँधकर, आक्रोश के साथ बुलन्द नारे लगाते, मंचों पर अत्याचारों के विरुद्ध बेख़ौफ़ बोलते देखकर मध्यवर्गीय औरतों में भी हिम्मत आई। अक्सर घर-परिवार तक ही सीमित रहकर शोषण व जुल्म को सहनेवाली औरतों ने भी दहेज, घरेलू हिंसा जैसे मुद्दों के ख़िलाफ़ उठ खड़ी होने का साहस जुटाया तथा महिलाओं पर हिंसा का प्रभावी विरोध शुरू किया। नगरीय समुदाय की मध्यवर्गीय औरतों तथा विश्वविद्यालय की महिलाएँ, जिन्होंने घरेलू हिंसा के मुद्दे से जुड़कर काम शुरू किया, अब वे महिला आन्दोलन की नेतृत्वकर्त्री बनकर औरतों के कई मुद्दों पर जमकर संघर्ष करती हुई नज़र आती हैं। एक उल्लेखनीय बात और भी रही कि राजस्थान के महिला आन्दोलन की बागडोर मुख्यतः मज़दूर महिलाओं के हाथों में रही, इसलिए उन्होंने कभी भी समाज के ध्रुवीकरण का रास्ता नहीं लिया। कहना चाहिए कि इस आन्दोलन का रुझान पुरुषों के ख़िलाफ़ न होकर बराबरी और अवसरों की समानता की तलाश की ओर ही अधिक रहा। ‘विविधा महिला आलेखन एवं सन्दर्भ केन्द्र’ व ‘विविधा फ़ीचर्स’, जयपुर ने राजस्थान की आधी आबादी के गुमनाम सफ़र का इस पुस्तक में दस्तावेज़ीकरण करने का काम किया है। यह केवल राजस्थान ही नहीं, बल्कि भारतीय महिला आन्दोलन के स्वरूप को समझने का एक सार्थक उपक्रम है।
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