Gorakh-Vijay
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‘गोरख विजय' नाथपंथ के महान योगी गुरु गोरखनाथ से सम्बन्धित पुरातन बाग्रा काव्य ग्रन्थ ‘गोर्ख विजय’ का हिन्दी अनुवाद और समीक्षात्मक पर्यालोचन प्रस्तुत करनेवाली कृति है। गोरखनाथ ने अपने साधनामय जीवन और कल्याणमय दर्शन से तत्कालीन जन-समाज को अत्यन्त प्रभावित-प्रेरित किया था। उन्होंने द्वैताद्वैत-विलक्षण अद्वैतवाद का समर्थन किया लेकिन संसार को मिथ्या मानने से इनकार किया। उन्होंने मोक्ष का साधन योग को माना और योग को अष्टांग न मानकर षडंग माना। वस्तुतः यम-नियम को उन्होंने, साधक हो या सामान्य-जन, मनुष्य मात्र का कर्तव्य और दायित्व बताया जिनमें परिपक्वता के बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि सम्भव है। ऐसी अनेकानेक बातों को जानने-समझने के लिए ‘गोरख विजय’ एक अत्यन्य उपयोगी ग्रन्थ है। प्रस्तुत पुस्तक का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें बंगाल के लोक समाज में प्रचलित गोरखनाथ सम्बन्धी कई लोकगाथाएँ और कुछ अन्य प्रासंगिक सामग्री भी दी गई हैं जिनसे गोरखपंथी साधना के नये आयाम खुलते हैं। वस्तुतः साधक हो या साहित्यिक, विद्वान हो या सामान्य पाठक, गोरखनाथ में दिलचस्पी रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।
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‘गोरख विजय' नाथपंथ के महान योगी गुरु गोरखनाथ से सम्बन्धित पुरातन बाग्रा काव्य ग्रन्थ ‘गोर्ख विजय’ का हिन्दी अनुवाद और समीक्षात्मक पर्यालोचन प्रस्तुत करनेवाली कृति है। गोरखनाथ ने अपने साधनामय जीवन और कल्याणमय दर्शन से तत्कालीन जन-समाज को अत्यन्त प्रभावित-प्रेरित किया था। उन्होंने द्वैताद्वैत-विलक्षण अद्वैतवाद का समर्थन किया लेकिन संसार को मिथ्या मानने से इनकार किया। उन्होंने मोक्ष का साधन योग को माना और योग को अष्टांग न मानकर षडंग माना। वस्तुतः यम-नियम को उन्होंने, साधक हो या सामान्य-जन, मनुष्य मात्र का कर्तव्य और दायित्व बताया जिनमें परिपक्वता के बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि सम्भव है। ऐसी अनेकानेक बातों को जानने-समझने के लिए ‘गोरख विजय’ एक अत्यन्य उपयोगी ग्रन्थ है।
प्रस्तुत पुस्तक का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें बंगाल के लोक समाज में प्रचलित गोरखनाथ सम्बन्धी कई लोकगाथाएँ और कुछ अन्य प्रासंगिक सामग्री भी दी गई हैं जिनसे गोरखपंथी साधना के नये आयाम खुलते हैं।
वस्तुतः साधक हो या साहित्यिक, विद्वान हो या सामान्य पाठक, गोरखनाथ में दिलचस्पी रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।
Book Details
-
ISBN9788119989263
-
Pages304
-
Avg Reading Time10 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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हृषीकेश सुलभ ने लगभग 1975 से लेखन शुरू किया। उनके लगभग 40 वर्षों के परिश्रम, अनुभव, आस-पास की सामाजिक उथल-पुथल पर पैनी दृष्टि और उससे जुड़ा रचनाकार का दायित्वबोध आदि के बाद उपन्यास ‘अग्निलीक’ आया। आलोचक रचनाकार की उस मनःस्थिति की पड़ताल कर पाया है या करता है, जिसने इस रचना को जन्म दिया और जो पूरी रचना- प्रक्रिया में साथ चला या अपनी टिप्पणी रखते समय समीक्षक/आलोचक भी अपनी मनःस्थिति और मान्यताओं की कसौटी से निर्देशित हो जाता है? यह प्रश्न इसलिए कि इन समीक्षाओं के संकलन में एक ही शिल्प, शैली, ट्रीटमेंट, घटनाओं की प्रस्तुति, उनके विस्तार और उनके स्वरूप पर अलग-अलग और कभी-कभी परस्पर विरोधी राय/ऑब्ज़र्वेशन देखने को मिले हैं। यह संकलन, इसलिए, रचनाकार को आलोचकों की चिन्ता और समय-समय पर व्यक्त उनके निदेशों के सम्मान के बाद भी अपनी तपस्या, अपने अनुभव और स्वतःस्फूर्त पर सजग चेतना पर चलने का स्वर देता है। ये आलेख ‘अग्निलीक’ उपन्यास को समझने और व्याख्यायित करने में सहायक तो हैं ही, उपन्यास ने ग्रामीण सामाजिक संरचना में होते जिन परिवर्तनों और उसके साथ-साथ स्थापित जिन वैचारिक जड़ताओं को कथा-सूत्र में पिरोया है, ये उसे और आगे ले जाते हैं। इसलिए इनका अध्ययन आवश्यक है। स्वतंत्रता-पूर्व और स्वतंत्रता-पश्चात गाँवों की विडम्बनाओं को इन समीक्षकों, आलोचकों ने इस उपन्यास के बहाने गम्भीरता से देखा-परखा और अभिव्यक्त किया है। इन आलेखों को समग्रता में देखना साहित्यिक उद्देश्य की पूर्ति करता है, यही कारण है कि इन्हें एक साथ रखकर प्रस्तुत करने की यह कोशिश की गई है। किसी रचना पर टिप्पणी सिर्फ़ उस रचना का भला या बुरा नहीं करती, यह उस विधा की समझ को भी विस्तार देती है। समीक्षाओं का यह संकलन इन्हीं उद्देश्यों से सामने रखा गया है।
Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
- Author Name:
Bachchan Singh +1
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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Kavya-Pustak Samiksha Ka Swaroop
- Author Name:
Ramkishor Sharma +1
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Awating description for this book
Soordas
- Author Name:
Nandkishore Naval +1
- Book Type:

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तुलसीदास पर पुस्तक लिखने के बाद हिन्दी के जाने-पहचाने ही नहीं, माने हुए आलोचक डॉ. नवल ने अन्तःप्रेरणा से सूरदास के पदों पर यह आस्वादनपरक पुस्तक लिखी है, जिसमें आवश्यक स्थानों पर अत्यन्त संक्षिप्त आलोचनात्मक टिप्पणियाँ भी हैं। उन्होंने कृष्ण और राधा की संकल्पना तथा वैष्णव भक्ति के उद्भव और विकास पर भी काफ़ी शोध किया, लेकिन पुस्तक की पठनीयता बरकरार रखने के लिए उससे प्राप्त तथ्यों का संकेत भूमिका में ही करके आगे बढ़ गए हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल द्वारा सम्पादित ‘भ्रमरगीत सार’ की भूमिका उनकी आलोचना का उत्तमांश है, जिसमें उनकी शास्त्रज्ञता और रसज्ञता दोनों का अद्भुत सम्मिश्रण हुआ है। लेकिन यह भी सही है कि उनकी लोकमंगल और कर्म-सौन्दर्य की कसौटी, जो उन्होंने ‘रामचरितमानस’ से प्राप्त की थी, सूर के लिए अपर्याप्त है। कारण यह कि उक्त दोनों ही शब्द बहुत व्यापक हैं, जिनका अभिलषित अर्थ ही आचार्य ने लिया है। तुलसी मूलतः प्रबन्धात्मक कवि थे और क्लासिकी, जबकि सूर आद्यन्त गीतात्मक और स्वच्छन्द, इसलिए पहले महाकवि के निकष पर दूसरे महाकवि को चढ़ाकर दूसरे के साथ न्याय नहीं किया जा सकता। डॉ. नवल प्रगीतात्मकता के सम्बन्ध में एडोर्नो की इस उक्ति के क़ायल हैं कि ‘प्रगीत-काव्य इतिहास की ‘दार्शनिक धूपघड़ी’ है।’ इस कारण उसकी छाया को उस तरह नहीं पकड़ा जा सकता, जिस तरह इतिवृत्तात्मक शैली में लिखनेवाले किसी कवि की कविता में हम यथार्थ को ठोस रूप में पकड़ लेते हैं। दूसरी बात यह कि उन्होंने सूर की कविता से सीधा साक्षात्कार किया है।
Bhartiya Sahityashatra
- Author Name:
Brahma Dutt Sharma +1
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- Description:
प्रस्तुत पुस्तक में डॉ. ब्रह्मदत्त शर्मा ने हिन्दी समीक्षा के मूल तक जाने का प्रयत्न किया है और अग्निपुराणकार, भरत, दंडी, आनन्दवर्द्धन, वामन, कुन्तक एवं क्षेमेन्द्र की मान्यताओं और मतों को बोधगम्य बनाने का प्रयास किया है। भारतीय चित्त एवं मानस में ये मान्यताएँ इतनी रची-बसी हैं कि सामान्य पाठक भी कविता पढ़ते समय स्वभावतः यह प्रश्न करता है कि कविता किस रस की है, इसमें कौन से अलंकार हैं, कौन-सी वक्रता है तथा उससे क्या व्यंजित हो रहा है। प्रस्तुत पुस्तक में सभी भारतीय सम्प्रदायों की मान्यताओं का विवेचन उपरोक्त प्रश्नों के सन्दर्भ में किया गया है। किस प्रकार का लेखन साहित्य है और उसकी क्या विशेषताएँ हैं? साहित्यकार किस प्रकार चमत्कारपूर्ण भाषा का प्रयोग कर अपनी अनुभूति को सार्वजनीन व सार्वकालिक बनाता है? किस प्रकार वह अपने भावावेगों का सम्प्रेषण कर उनका साधारणीकरण कर देता है? किस प्रकार अपने विषयों को चुनता है व उनमें अपनी अनुभूति का संचार करता है? उसे साहित्य रचना की प्रेरणा कहाँ से मिलती है तथा उसमें उसकी प्रतिभा का क्या योगदान है? काव्य-सृजन का हेतु एवं प्रयोजन क्या है? इन गम्भीर प्रश्नों का विवेचन भी सभी भारतीय साहित्य सम्प्रदायों के परिप्रेक्ष्य में इस पुस्तक में पाठकों को मिलेगा।
Kavita Mein Jantantra
- Author Name:
Apoorvanand
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कविता स्वभावतः ही लोकतांत्रिक मूल्यों की पैरोकार होती है, वह उनकी तरफ़ हमारा ध्यान भी खींचती है, उनकी कमी को रेखांकित भी करती है, और कई बार नए मूल्यों, नई समझदारी, एक ज़्यादा महीन संवेदना की ओर भी लेकर जाती है। कविता उन परिस्थितियों की गहरी आलोचना भी करती है, जो व्यक्ति की, मनुष्य की स्वतंत्रता के विरुद्ध हैं, और इस तरह लोकतंत्र के भविष्य के लिए ख़तरा पैदा करती है। ‘कविता में जनतंत्र’ पुस्तक में कुछ कविताओं के पाठ के साथ भारतीय जनतंत्र की वर्तमान दशा और दिशा पर चिन्तन किया गया है, यह समझने की कोशिश की गई है कि एक देश और एक समाज के रूप में बहैसियत एक जनतंत्र हमने क्या खोया और क्या पाया है, और इस समय हम कहाँ हैं? ग़ौरतलब है कि इन टिप्पणियों की पृष्ठभूमि में 2024 का लोकसभा चुनाव है, यह वह समय था जब हम जनतंत्र और बहुमत को आमने-सामने खड़ा पा रहे थे; स्वतंत्रता और सर्वसमावेशी उदारता के पक्षधर आशंकित थे, और अल्पसंख्यक भयभीत। जिन कविताओं के बहाने यह गहन जनतंत्र-चर्चा संभव हुई है उनमें नागार्जुन, रघुवीर सहाय, धूमिल, श्रीकान्त वर्मा, विजयदेव नारायण साही, केदारनाथ सिंह, जैसे वरिष्ठों से लेकर अनुज लुगुन, अदनान कफ़ील दरवेश और जसिंता केरकेट्टा तक कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों की कविताएँ शामिल हैं। अत्यन्त समीचीन यह पुस्तक कविता को पढ़ने की एक नई पद्धति तो हमें देती ही है, एक विचार, एक शासन-पद्धति और एक सम्भावना के रूप में जनतंत्र की परिभाषा, उसकी आधारभूत शर्तों, चुनौतियों और प्रतिबद्धताओं पर सोचना भी सिखाती है।
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