Natya Prastuti : Siddhant, Shilp Aur Vidhan
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Author:
Ramesh RajhansPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Academics-and-references₹
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‘नाट्य प्रस्तुति : सिद्धान्त, शिल्प और विधान’ रंगकर्म में रुचि रखनेवाले उन सभी व्यक्तियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो नाटक के क्षेत्र में नये हैं और नाट्य-विधा के सम्बन्ध में अधिक विस्तृत व गहन जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। गाँव-कस्बे अथवा छोटे और पिछड़े इलाकों में रहनेवाले वे तमाम प्रतिभाशाली नाट्य-प्रेमी इस कृति से लाभान्वित होंगे जिनके लिए किसी नाट्य-विद्यालय अथवा नाट्य-संस्था में सम्मिलित होना सम्भव नहीं है लेकिन जो छोटी-छोटी रंग-मंडलियाँ बनाकर नाट्य-क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस पुस्तक के माध्यम से वे नाट्य-विधा से विधिवत परिचित होंगे और अपनी प्रस्तुतियों को अधिक सम्प्रेषणीय तथा अधिक अर्थवत्तापूर्ण बना सकेंगे। पुस्तक में भारतीय रंग-पद्धति के साथ-साथ पश्चिमी निर्देशकों और प्रस्तोताओं के विचारों और तकनीक का भी वर्णन है। चूँकि आज के नाट्य-मंच का स्वरूप बहुत कुछ ‘प्रोसीन्यम’ है और यह प्रोसीन्यम थियेटर दरअसल पश्चिमी रंग-पद्धति है, इसलिए पश्चिमी रंग-पद्धति और रंग-परम्परा की चर्चा भी इस पुस्तक के दायरे में है। दोनों ही रंग-पद्धतियों के बुनियादी तत्त्व एक हैं और किसी एक रंग-पद्धति को गम्भीरतापूर्वक समझ लेने से दूसरी को समझना काफी सरल है।
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‘नाट्य प्रस्तुति : सिद्धान्त, शिल्प और विधान’ रंगकर्म में रुचि रखनेवाले उन सभी व्यक्तियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जो नाटक के क्षेत्र में नये हैं और नाट्य-विधा के सम्बन्ध में अधिक विस्तृत व गहन जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं।
गाँव-कस्बे अथवा छोटे और पिछड़े इलाकों में रहनेवाले वे तमाम प्रतिभाशाली नाट्य-प्रेमी इस कृति से लाभान्वित होंगे जिनके लिए किसी नाट्य-विद्यालय अथवा नाट्य-संस्था में सम्मिलित होना सम्भव नहीं है लेकिन जो छोटी-छोटी रंग-मंडलियाँ बनाकर नाट्य-क्षेत्र में सक्रिय हैं। इस पुस्तक के माध्यम से वे नाट्य-विधा से विधिवत परिचित होंगे और अपनी प्रस्तुतियों को अधिक सम्प्रेषणीय तथा अधिक अर्थवत्तापूर्ण बना सकेंगे। पुस्तक में भारतीय रंग-पद्धति के साथ-साथ पश्चिमी निर्देशकों और प्रस्तोताओं के विचारों और तकनीक का भी वर्णन है। चूँकि आज के नाट्य-मंच का स्वरूप बहुत कुछ ‘प्रोसीन्यम’ है और यह प्रोसीन्यम थियेटर दरअसल पश्चिमी रंग-पद्धति है, इसलिए पश्चिमी रंग-पद्धति और रंग-परम्परा की चर्चा भी इस पुस्तक के दायरे में है। दोनों ही रंग-पद्धतियों के बुनियादी तत्त्व एक हैं और किसी एक रंग-पद्धति को गम्भीरतापूर्वक समझ लेने से दूसरी को समझना काफी सरल है।
Book Details
-
ISBN9789349159983
-
Pages168
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘अज्ञेय अपनी विलक्षण मेधा के साथ पारम्परिक प्रज्ञा से संवाद और विसंवाद दोनों का सिलसिला रचते हैं। इसके द्वारा पुरानी अवधारणाएँ पुनरीक्षित और पुनःपरिभाषित भी हो जाती हैं।’ और, ‘शमशेर अमूर्त उपमा के जितने प्रकार अपनी कविता में रचते हैं, उतने अन्यत्र कम मिलते हैं। वे अमूर्त से मूर्त को उपमित करते हैं, मूर्त से अमूर्त को उपमित करते हैं, तो अमूर्त से अमूर्त को भी उपमित करते हैं।’ हिन्दी के दो विशिष्ट कवियों के विषय में ये टिप्पणियाँ हैं वरिष्ठ साहित्य-चिन्तक एवं संस्कृति-चेता राधावल्लभ त्रिपाठी की, जो ‘नया साहित्य, नई सम्भावनाएँ’ पुस्तक में संकलित आलेखों का हिस्सा हैं। इनके अलावा इस पुस्तक में धर्मवीर भारती, आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी, हरिशंकर परसाई, नामवर सिंह, अष्टभुजा शुक्ल, अनामिका और गगन गिल की पुस्तकों और उनके रचनात्मक आयामों पर विवेचनात्मक आलेख भी शामिल हैं। कुछ वे निबन्ध भी इस पुस्तक में संकलित हैं जिनमें वे विमर्श के ऐसे सैद्धान्तिक आधारों की तलाश करते हैं जो समकालीन रचनात्मकता के अनुशीलन के लिए आलोचना की भूमि बन सकें। राधावल्लभ त्रिपाठी हिन्दी के वर्तमान परिदृश्य में उपस्थित ऐसे कुछ आलोचक-चिन्तकों में से एक हैं जिनकी विवेचना हमें सोचने और बरतने के लिए एक समृद्ध भाषा देती है और भारतीय चिन्तन के लम्बे इतिहास में गढ़े गए सैद्धान्तिक उपकरणों से परिचित कराती है। उनके इधर के चिन्तन से उपजे इन निबन्धों से साहित्य के अध्येता और सर्जक, दोनों ही निस्सन्देह लाभान्वित होंगे।
Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand
- Author Name:
Yogendra Pratap Singh +1
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Shri Ramcharitmanas : Saptam Sopan Uttar Kand Literary Criticism Ram Sahitya
Kavya-Pustak Samiksha Ka Swaroop
- Author Name:
Ramkishor Sharma +1
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Awating description for this book
Chandrakanta (Santati) Ka Tilism
- Author Name:
Wagish Shukla
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कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है। —अशोक वाजपेयी
Alochak Aur Alochana
- Author Name:
Bachchan Singh +1
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पूर्व और पश्चिम के आलोचना सिद्धान्तों के बृहद् विवेचन के लिए ख्यात डॉ. बच्चन सिंह की यह कृति उनकी अपनी कुछ मूल्यवान स्थापनाओं के लिए भी पढ़ी जाती रही है। उनका मानना है कि पाश्चात्य समीक्षा-सिद्धान्तों से हम अपनी समीक्षा-पद्धति का निर्माण नहीं कर सकते, लेकिन उनके सम्यक अध्ययन के बिना हम कुछ नवीन भी नहीं बना सकते। ‘आलोचक और आलोचना’ का उद्देश्य इसी अध्ययन को प्रस्तुत करना है। लेकिन केवल पश्चिमी सिद्धान्तों का अध्ययन नहीं, भारतीय आलोचना-पद्धतियों और अवधारणाओं का भी। वे आरम्भ में ही स्पष्ट करते हैं कि किसी भी रचना को आप बाह्य उपकरणों या फार्मूलों से नहीं समझ सकते, न ही ऐसा करना उपादेय होगा। न तो अलंकारों की गणना को आलोचना कह सकते हैं और न ही सूरदास को पुष्टिमार्गी सिद्ध करना आलोचना है। उनके मुताबिक अपने समय की मानव-स्थितियों के सन्दर्भ में भाषा-संरचना का विश्लेषण करना ही आलोचना का काम है। ऐसी ही आधारभूत मान्यताओं के साथ चलते हुए लेखक ने इस कृति में पश्चिम के प्लेटो, अरस्तू, लोंगिनुस, आई.ए. रिचर्ड्स, क्रोचे आदि के साथ अलंकार, रस, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि भारतीय आलोचना-सिद्धान्तों की सुग्राह्य विवेचना की है जो आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी व आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की आलोचना दृष्टि के विश्लेषण तक जाती है। साहित्य के अध्येताओं और छात्रों के लिए विशेष रूप से उपयोगी।
Aacharya Shukla Ka Itihas Padhte Huye
- Author Name:
Bachchan Singh +1
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‘आचार्य शुक्ल का इतिहास पढ़ते हुए’ साहित्यालोचना की श्रेणी में एक अलग ढंग की पुस्तक है। हिन्दी साहित्य के मानक इतिहास के रूप में प्रतिष्ठित आचार्य शुक्ल की पुस्तक को ‘साहित्येतिहास-लेखन की अत्यन्त प्रौढ़ और प्रगतिशील विरासत’ मानते हुए डॉ. बच्चन सिंह यह भी कहते हैं कि अभी भी अनेक प्रश्न हैं जो उत्तर की माँग करते हैं, बहुत-से बिन्दु है जिन पर विचार किया जाना चाहिए। वे कहते हैं कि शुक्ल जी पहले व्यक्ति हैं जिनके हाथों हिन्दी साहित्य के इतिहास लेखन के लिए एक सुसंगत आधार और उसका पैटर्न तैयार हुआ। इसके लिए उन्होंने जो केन्द्रीय बिन्दु रखा, वह है ‘लोक प्रवृत्ति’, जिसे उन्होंने जनता की चित्तवृत्ति कहा। लेकिन वे इस तथ्य के प्रति भी सजग थे कि जिस चित्तवृत्ति का प्रतिफलन साहित्य में हुआ, उसका सरोकार शिक्षित जन से है। डॉ. बच्चन सिंह आचार्य शुक्ल के बाद आचार्य द्विवेदी के काम को ही उल्लेखनीय मानते हैं, इसलिए इस पुस्तक में दोनों ही विद्वानों के इतिहास-सम्बन्धी कामों पर अकसर साथ में बात करते हैं, जिससे पाठक के रूप में हम और भी लाभान्वित होते हैं। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल लिखित इतिहास को पढ़ने के लिए वृहत्तर भूमि तैयार करती है, और अन्य उपलब्ध साहित्येतिहास-ग्रंथों का भी परिचय देती चलती है।
Mahadevi : Naya Mulyankan
- Author Name:
Ganpatichandra Gupt +1
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प्रस्तुत पुस्तक में कवयित्री महादेवी के व्यक्तित्व, दर्शन, जीवन-दर्शन, काव्य-दर्शन, युग-बोध आदि का पहली बार गम्भीरता से विवेचन-विश्लेषण हुआ है। साथ ही महादेवी के काव्य के विभिन्न पक्षों पर भी गम्भीरता से विचार किया गया है। कवयित्री महादेवी के जीवनवृत्त एवं व्यक्तित्व, काव्य-दर्शन, दार्शनिक मान्यताएँ, जीवन-दर्शन, युग- बोध, छायावाद और महादेवी, रहस्यवाद और महादेवी काव्य में वेदना (दुःखवाद), काव्य में प्रकृति, काव्य का शैली पक्ष, काव्य रूप : गीति काव्य का मूल्यांकन, सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से, काव्यशास्त्रीय दृष्टि से, वैज्ञानिक दृष्टि से आदि कतिपय महत्त्वपूर्ण बिन्दुओं का संकेत पुस्तक में मिलता है। वस्तुत: महादेवी काव्य पर लिखा गया एक सर्वश्रेष्ठ आलोचनात्मक एवं गवेशणात्मक ग्रन्थ है जिसमें महादेवी काव्य के सभी पक्षों पर पूरी गम्भीरता से विचार किया गया है।
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