Chitthiyan Renu Ki Bhai Birjoo Ko
(0)
Author:
Vidyasagar GuptaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
695
556 (20% off)
Available
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‘चिट्ठियाँ रेणु की भाई बिरजू को’ एक महान कथाकार के अन्तर्जगत के ऐसे दृश्यों का एलबम है जो अब तक अज्ञात-अल्पज्ञात रहे हैं। ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे कालजयी उपन्यासों के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु और गांधीवादी-समाजवादी विचारधारा से गहरे जुड़े मिल-मालिक बृजमोहन बाँयवाला की पारस्परिक आत्मीयता का जो वृत्तान्त इस किताब में संकलित चिट्ठियों से उभरता है, वह दो व्यक्तियों की आपसी मित्रता तक सीमित नहीं है। उस वृत्तान्त से ऐसा एक दौर पाठक के सामने साकार हो उठता है जो भारत के समाजवादी आन्दोलन से लेकर नेपाली क्रांति तक की हलचलों से भरा था। इस किताब में रेणु के घर-परिवार का जिक्र तो है ही, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, अज्ञेय, दिनकर, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, ओमप्रकाश दीपक और जुगनू शारदेय के साथ-साथ बृजमोहन बाबू के परिवार और घर का जीवन्त उल्लेख है, जो भारत के समाजवादियों और नेपाल के क्रान्तिकारियों का विश्वस्त ठिकाना था। किताब में संकलित चिट्ठियों में रेणु विभिन्न रूपों में नजर आते हैं—कभी लेखक के रूप में तो कभी परिवार के जिम्मेदार अभिभावक के रूप में, कभी किसान के रूप में तो कभी समाजवादी कार्यकर्ता के बतौर। लेकिन हर बार सहज, संवेदनशील, मानवीय। निश्चय ही यह किताब हिन्दी पत्र-साहित्य की एक उपलब्धि है। अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय।
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‘चिट्ठियाँ रेणु की भाई बिरजू को’ एक महान कथाकार के अन्तर्जगत के ऐसे दृश्यों का एलबम है जो अब तक अज्ञात-अल्पज्ञात रहे हैं। ‘मैला आँचल’ और ‘परती परिकथा’ जैसे कालजयी उपन्यासों के लेखक फणीश्वरनाथ रेणु और गांधीवादी-समाजवादी विचारधारा से गहरे जुड़े मिल-मालिक बृजमोहन बाँयवाला की पारस्परिक आत्मीयता का जो वृत्तान्त इस किताब में संकलित चिट्ठियों से उभरता है, वह दो व्यक्तियों की आपसी मित्रता तक सीमित नहीं है। उस वृत्तान्त से ऐसा एक दौर पाठक के सामने साकार हो उठता है जो भारत के समाजवादी आन्दोलन से लेकर नेपाली क्रांति तक की हलचलों से भरा था। इस किताब में रेणु के घर-परिवार का जिक्र तो है ही, डॉ. राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, विश्वेश्वर प्रसाद कोइराला, अज्ञेय, दिनकर, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, ओमप्रकाश दीपक और जुगनू शारदेय के साथ-साथ बृजमोहन बाबू के परिवार और घर का जीवन्त उल्लेख है, जो भारत के समाजवादियों और नेपाल के क्रान्तिकारियों का विश्वस्त ठिकाना था। किताब में संकलित चिट्ठियों में रेणु विभिन्न रूपों में नजर आते हैं—कभी लेखक के रूप में तो कभी परिवार के जिम्मेदार अभिभावक के रूप में, कभी किसान के रूप में तो कभी समाजवादी कार्यकर्ता के बतौर। लेकिन हर बार सहज, संवेदनशील, मानवीय।
निश्चय ही यह किताब हिन्दी पत्र-साहित्य की एक उपलब्धि है। अत्यन्त पठनीय और संग्रहणीय।
Book Details
-
ISBN9789390971688
-
Pages198
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा है। समृद्ध कला, कौशल और तकनीक के बल पर विश्व के सकल घरेलू उत्पाद में भारत की भागीदारी 25-30 प्रतिशत तक थी। लेकिन विदेशी आक्रमणकारियों द्वारा कई शताब्दियों तक इसे लगातार लूटे जाने और विदेशी शासन के कारण भारत का वैभव बीते दिनों की बात बनकर रह गया। उत्पीड़ित और असहाय जन-समुदाय ने इस आपदा से मुक्ति के लिए भगवान् की शरण ली। दो सौ वर्ष के अंग्रेजी राज में पश्चिम का बुद्धिजीवी वर्ग यह प्रचारित करने लगा कि भारतीय समाज केवल परलोक की चिंता करनेवाला व पलायनवादी है और आर्थिक मामलों को लेकर भारत की कोई सोच ही नहीं है। इसी अवधारणा की छाया में भारत ने स्वतंत्रता के उपरांत अपने विकास के लिए पश्चिमी वैचारिक अधिष्ठान पर आधारित सामाजिक, आर्थिक संरचना के निर्माण का प्रयोग किया। लेकिन इससे समस्याएँ सुलझने के बजाय उलझती ही जा रही हैं। यही नहीं, अनेक प्रकार की उपलब्धियों के बावजूद आज विश्व के अनेक विचारक पश्चिमी देशों की प्रगति की दृष्टि एवं दिशा से संतुष्ट नहीं हैं। आज पूरा विश्व एक वैकल्पिक विकास मॉडल चाहता है। प्रख्यात अर्थशास्त्रा् डॉ. बजरंग लाल गुप्ता ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू अर्थचिंतन : दृष्टि एवं दिशा’ में भारतीय अर्थचिंतन की सुदीर्घ एवं पुष्ट चिंतन परंपरा का विशद् वर्णन करते हुए पश्चिमी अर्थचिंतन की उन खामियों का भी सांगोपांग विश्लेषण किया है, जिसके कारण पूरा विश्व आज आर्थिक-सामाजिक संकट के कगार पर खड़ा है। इस वैश्विक संकट से उबरने के लिए उन्होंने भारतीय अर्थचिंतन पर आधारित एक ऐसा वैकल्पिक मार्ग भी सुझाया है, जो सर्वमंगलकारी है।
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