Stree : Deh Ki Rajniti Se Desh Ki Rajniti Tak
Author:
Mrinal PandePublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 316
₹
395
Unavailable
हमारे उपनिषदों–पुराणों के समय से स्त्रियों को लेकर जिन नियमों और मर्यादाओं की रचना हुई, उनकी स्वाधीनता और आत्म–निर्भरता के ख़िलाफ़ निहित स्वार्थों द्वारा जो महीन क़िस्म का सांस्कृतिक षड्यंत्र रचा गया और भारतीय संविधान के लागू होने के बाद भी व्यावहारिक जीवन में स्त्रियों को जिन जटिल अन्तर्विरोधों से जूझना पड़ रहा है—पुस्तक में प्रस्तुत लेखों में एक स्त्री के नज़रिए से इस सबकी समसामयिक सन्दर्भों में पड़ताल की गई है।
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जैविक, सांस्कृतिक और आर्थिक सन्दर्भों में स्त्री की शक्ति और शक्तिहीनता का विवेचन करनेवाली यह पुस्तक स्त्री–शोषण की करुण कथा नहीं, बल्कि उसके कारणों की जड़ में जाकर किया गया भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था का ऐसा सटीक विश्लेषण है जो पाठकों को स्त्री के साथ–साथ हरिजनों, भूमिहीनों, दलितों जैसे समाज के हर क्षेत्र में छाए शक्ति–असन्तुलनों के शिकार वर्गों को समझने की नई दृष्टि देगा।
ISBN: 9788171798063
Pages: 143
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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- Description: यह एक बेहतरीन किताब है...कक्षा में मैं इसका प्रयोग किसी और पुस्तक से ज़्यादा करता हूँ। —पी. साईनाथ; पत्रकार व लेखक प्रचार-हमला को चीरती हुई यह किताब बताती है कि आज क्या हो रहा है। —अमिताव घोष; लेखक यह आज के विरोधी-धाराओं का एक महत्त्वपूर्ण वृत्तान्त है...इस पक्ष को सुनना और समझना ज़रूरी है। —अरुणा रॉय; समाजकर्मी वैश्वीकरण के विशाल पुस्तक-संग्रह में यह किताब बौद्धिक साहस और ईमान का एक कीर्तिमान है जो बेहतर दुनिया के लिए रास्ता दिखाती है। —अमित भादुड़ी; अर्थशास्त्री आज अगर गाँधी जी ज़िन्दा होते और 'हिन्द स्वराज' की रचना करते, तो उन्हें लगभग उन्हीं सवालों से जूझना पड़ता जो इस किताब में हैं। —गणेश देवी; लेखक और भाषाविद् यह किताब दर्शाती है कि इस वैश्विक युग में हमारी तथाकथित स्वेच्छा वस्तुत: कितनी पराधीन है...आज की दुनिया से चिन्तित किसी भी इनसान के लिए यह पुस्तक अनिवार्य है। —मल्लिका साराभाई; नृत्यांगना और संस्कृतिकर्मी आज के वैश्विक युग की तमाम तब्दीलियों के परिप्रेक्ष्य में यह पुस्तक एक महत्त्वपूर्ण संश्लेषण है...साथ ही इस किताब में एक वैकल्पिक दुनिया की कल्पना की गई है जिस पर गम्भीरता से सोचने और बहस करने की ज़रूरत है। —माधव गाडगिल; पर्यावरणशास्त्री यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और असरदार किताब है...लेखक जो व्यापक प्रमाण पेश करता है उसका हमें सामना करना होगा। —हर्ष मंदर; समाजकर्मी
Gopan Aur Ayan : Khand 1
- Author Name:
Sitanshu Yashashchandra
- Book Type:

- Description: गुजराती आदि भारतीय भाषाएँ एक विस्तृत सेमिओटिक नेटवर्क अर्थात संकेतन-अनुबन्ध-व्यवस्था का अन्य-समतुल्य हिस्सा हैं। मूल बात ये है कि विशेष को मिटाए बिना सामान्य अथवा साधारण की रचना करने की, और तुल्यमूल्य संकेतकों से बुनी हुई एक संकेतन-व्यवस्था रचने की जो भारतीय क्षमता है, उसका जतन होता रहे। राष्ट्रीय या अन्तरराष्ट्रीय राज्यसत्ता, उपभोक्तावाद को बढ़ावा देनेवाली, सम्मोहक वाग्मिता के छल पर टिकी हुई धनसत्ता एवं आत्ममुग्ध, असहिष्णु विविध विचारसरणियाँ/आइडियोलॉजीज़ की तंत्रात्मक सत्ता आदि परिबलों से शासित होने से भारतीय क्षमता को बचाते हुए उस का संवर्धन होता रहे। गुजराती से मेरे लेखों के हिन्दी अनुवाद करने का काम सरल तो था नहीं। गुजराती साहित्य की अपनी निरीक्षण परम्परा तथा सृजनात्मक लेखन की धारा बड़ी लम्बी है और उसी में से मेरी साहित्य तत्त्व-मीमांसा एवं कृतिनिष्ठ तथा तुलनात्मक आलोचना की परिभाषा निपजी है। उसी में मेरी सोच प्रतिष्ठित (एम्बेडेड) है। भारतीय साहित्य के गुजराती विवर्तों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में जाने बिना मेरे लेखन का सही अनुवाद करना सम्भव नहीं है, मैं जानता हूँ। इसीलिए, इन लेखों का हिन्दी अनुवाद टिकाऊ स्नेह और बड़े कौशल्य से जिन्होंने किया है, उन अनुवादक सहृदयों का मैं गहरा ऋणी हूँ। ये पुस्तक पढ़नेवाले हिन्दीभाषी सहृदय पाठकों का सविनय धन्यवाद, जिनकी दृष्टि का जल मिलने से ही तो यह पन्ने पल्लवित होंगे। —सितांशु यशश्चन्द्र (प्रस्तावना से) ''हमारी परम्परा में गद्य को कवियों का निकष माना गया है। रज़ा पुस्तक माला के अन्तर्गत हम इधर सक्रिय भारतीय कवियों के गद्य के अनुवाद की एक सीरीज़ प्रस्तुत कर रहे हैं। इस सीरीज़ में बाङ्ला के मूर्धन्य कवि शंख घोष के गद्य का संचयन दो खंडों में प्रकाशित हो चुका है। अब गुजराती कवि सितांशु यशश्चन्द्र के गद्य का हिन्दी अनुवाद दो जिल्दों में पेश है। पाठक पाएँगे कि सितांशु के कवि-चिन्तन का वितान गद्य में कितना व्यापक है—उसमें परम्परा, आधुनिकता, साहित्य के कई पक्षों से लेकर कुछ स्थानीयताओं पर कुशाग्रता और ताज़ेपन से सोचा गया है। हमें भरोसा है कि यह गद्य हिन्दी की अपनी आलोचना में कुछ नया जोड़ेगा।" —अशोक वाजपेयी
Shivrayanchi Dharmniti
- Author Name:
Dr. Ismail Pathan
- Book Type:

- Description: सतराव्या शतकातील धर्मश्रद्ध वातावरणात छत्रपती शिवाजी महाराजांनी दख्खनमध्ये स्वबळावर हिंदवी स्वराज्य स्थापन केले. अर्थात शिवरायांचा सर्वधर्मसमभावाचा विचार त्यांच्या या हिंदवी स्वराज्याचा मूलाधार होता. खरं तर छत्रपती शिवाजी महाराजांची हिंदू धर्मावर निष्ठा होती. ते धर्माभिमानीही होते, तरीही ते धार्मिक स्वातंत्र्याचे पुरस्कर्ते होते. त्यांनी नेहमीच सहिष्णुतेचे धोरण अवलंबले आणि आपल्या राज्यात सर्व जातिधर्मांच्या लोकांना आश्रय दिला. इतकंच नाही, तर कोणत्याही स्वरूपात धर्मभेद, जातीभेद न करता महाराजांनी शूर, पराक्रमी आणि एकनिष्ठ लोक आपल्याभोवती गोळा केले. त्यांनी कायमच हिंदू आणि मुस्लीम धर्माबद्दल उदार आणि पुरोगामी दृष्टिकोन बाळगला. स्वराज्यातील सर्व धर्मांच्या बांधवांना सन्मान देत सामाजिक सलोखा निर्माण करत सर्वार्थाने हिंदवी स्वराज्य बळकट केले. जगभरात सर्वांनीच गौरविलेल्या शिवरायांच्या या सहिष्णू धार्मिक धोरणाची प्राचार्य डॉ. इस्माईल पठाण यांनी आपल्या या ग्रंथात साधार, तपशीलवार चर्चा केली असून समाजस्वास्थ्याच्या दृष्टिकोनातून ती मार्गदर्शक ठरणारी अशी आहे. वाचक त्याचं दमदार स्वागत करतील अशी आशा. Shivrayanchi Dharmniti | Dr. Ismail Pathan शिवरायांची धर्मनीती | डॉ. इस्माईल पठाण
Pais Paryavaransanvadacha
- Author Name:
Santosh Shintre
- Book Type:

- Description: हे पुस्तक सजग, सर्वसामान्य वाचकांसमोर भारतीय निसर्ग-पर्यावरण आणि त्यातील आर्थिक, सामाजिक, राजकीय गुंतागुंत सविस्तर उलगडते.पर्यावरण क्षेत्रात सक्रिय व्यक्ती/संस्था/समूहांना आजवर पडलेल्या बहुतांश अनुत्तरित प्रश्नांची समर्पक उत्तरे देणारे; निव्वळ ‘झाडे लावा, वाघ वाचवा' ह्यांच्यापलीकडे असणारा पर्यावरण प्रश्नांवरील उपायांबाबतचा संवाद-आवाका भारतीय संदर्भ घेऊन समजवणारे आणि इथल्या पर्यावरण समस्या निवारण्यासाठी आवश्यक संवादाच्या दिशा अचूक दर्शवणारे हे पुस्तक आहे.पर्यावरणसंवादाचे सामाजिक न्याय, विज्ञान, समाजशास्त्र, व्यवस्थापन, राज्यशास्त्र, मानसशास्त्र, तंत्रज्ञान, विक्री-कौशल्ये या अन्य विद्याशाखांशी गहिरे नाते असते. हे पुस्तक ते विस्तृत रीतीने दर्शवते. संबंधित विषयांच्या अभ्यासकांना, अध्यापकांना, संशोधकांना या आंतरविद्याशाखीय अभ्यासक्षेत्रातील भावी अभ्यास-संशोधनाचे थांबे, हे पुस्तक स्पष्ट करते. पैस पर्यावरणसंवादाचा | संतोष शिंत्रे Pais Paryavaransanvadacha I Santosh Shintre
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