Bhintiaadacha Cheen
Author:
Shreeram KuntePublisher:
Manovikas Prakashan LLPLanguage:
MarathiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 344
₹
430
Available
भारताशी चीन शत्रुत्वाने का वागतो? चीनकेंद्रित जगाचे धोके काय
असतील? चीनच्या नाकावर टिच्चून भारत महासत्ता होईल का?
असे अनेक प्रश्न आपल्याला पडलेले असतात.
या प्रश्नांची उत्तरं शोधण्यासाठी चीनचा इतिहास, कम्युनिस्ट
पक्षाची अमानवी धोरणं, त्यातून चीनने घेतलेली झेप, इतिहास
आणि वर्तमानाबद्दलच्या भानातून तयार झालेलं चीनचं परराष्ट्र धोरण,
चीनचा भारताला असणारा धोका या सर्व अंगांनी श्रीराम कुंटे यांनी
सखोल अभ्यास केला. त्यातून ‘भिंतींआडचा चीन` जन्माला आलं आहे.
महासत्ता होऊ घातलेल्या चीनमधल्या साम्राज्यशाहीच्या इतिहासापासून
ते आजच्या उत्तुंग प्रगतीपर्यंतचा आढावा घेत लेखकाने या पुस्तकातून
चीनची कुंडली मांडली आहे. भारताच्या संदर्भात चीन समजून घ्यायचा
असेल, तर चिनी राजघराण्यांचा इतिहास, स्थित्यंतराची चाळीस वर्षं, जगाला
चकित करणारा काळ आणि भारतासमोरील चिनी आव्हानं या चार भागांत
विभागलेलं हे पुस्तक आपल्या जवळ असायलाच हवं.
चीनची ओळख करून देणाऱ्या पुस्तकाची मराठीत कमी होती. श्रीराम कुंटे
यांच्या ‘भिंतींआडचा चीन`मुळे ही उणीव भरून काढण्यास मदत होईल.
या निमित्ताने आंतरराष्ट्रीय विषयांवर प्रबंधी-प्राध्यापकीपणा टाळून जनसामान्यांसाठी
लिहिणारा एक नवा लेखक कुंटे यांच्या रूपाने मराठीत समोर येताना दिसतोय.
गिरीश कुबेर (संपादक, दै. लोकसत्ता व लेखक)
एका संतुलित राष्ट्रवादी दृष्टिकोनातून, तसेच बहुविद्याशाखीय जाणकारीतून
लिहिलेले हे पुस्तक आपल्या निकटतम स्पर्धकाला समजून घेण्यासाठीच्या
प्रवासातील अत्यावश्यक वाचन ठरणार आहे.
रवि आमले (ज्येष्ठ पत्रकार व लेखक)
महत्त्वाकांक्षी चीनशी स्पर्धा करण्यास आसुसलेल्या भारतीयांना स्वतःच्या व
चीनच्या मर्मस्थळांची जाणीव हे पुस्तक कळात-नकळत करवून देते.
प्रा. परिमल माया सुधाकर (चीनचे अभ्यासक व लेखक)
ISBN: 9789363742758
Pages: 364
Avg Reading Time: 12 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
भारत के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में दलित एक बड़ी चुनावी ताक़त के रूप में उभरकर आए हैं और लगभग सभी राजनीतिक दलों के लिए यह अनिवार्य हो गया है कि वे उन्हें अपने पाले में लाने की कोशिश करें।
‘हिन्दुत्व का मोहिनी मंत्र’ पुस्तक हिन्दुत्ववादी शक्तियों द्वारा दलितों को अपनी तरफ़ खींचने की मोहक रणनीतियों का विखंडन दिखाती है कि कैसे ये ताक़तें दलित जातियों के लोकप्रिय मिथकों, स्मृतियों और किंवदन्तियों को खोजकर उनकी हिन्दुत्ववादी व्याख्या करती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में किए गए मौलिक शोध पर आधारित इस पुस्तक में बताया गया है कि दलित नायकों को मुस्लिम आक्रान्ताओं के विरुद्ध लडऩेवाले योद्धाओं के रूप में प्रस्तुत करते हुए हिन्दुत्ववादी शक्तियाँ उन्हें हिन्दू धर्म और संस्कृति के रक्षकों के रूप में पुनर्व्याख्यायित करती हैं, या फिर उन्हें राम का अवतार बताकर दलित मिथकों को एक बड़े और एकीकृत हिन्दू महावृत्तान्त से जोड़ने का प्रयास करती हैं। लेखक ने पुस्तक में उत्तर भारत के ग्रामीण समाज में ‘पॉपुलर’ की संरचना और उसमें पिरोए गए साम्प्रदायिक तत्त्वों को भी समझने की कोशिश की है। सबसे दिलचस्प तथ्य पुस्तक में यह निकलकर आता है कि दलितों के अतीत की हिन्दुत्ववादी पुनर्व्याख्या को दलित समुदाय एक शक्तिशाली पूँजी के रूप में लेते हैं जिसे वे एक तरफ़ ऊपरी जातियों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और दूसरी तरफ़ सवर्ण प्रभुत्व को क्षीण करने के लिए साथ-साथ इस्तेमाल करते हैं। इतिहास, राजनीति, नृतत्त्वशास्त्र और दलित अध्ययन में रुचि रखनेवाले छात्रों, शोधार्थियों और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए समान रूप से उपयोगी पुस्तक।
I Gaze, Therefore I Am
- Author Name:
Subramoniam Rangaswami
- Rating:
- Book Type:

- Description: We live in a visual age. I Gaze, Therefore I Am is a book on medical gaze first described by Michel Foucault, French philosopher and historian of ideas. The journey the medical gaze has taken from its archaic beginnings to our era of digital culture has been noteworthy. In this book, Rangaswami takes us through this historic journey, blending stories from the history of science and medicine with a rich collection of tales from scriptures and legends as well as iconic episodes from his personal experience, stirring them in his unique style with a wide range of topics for academic discussions. This book is a compelling narrative of the shifting optics of gaze, especially medical gaze, poised in our age of human transition from Homo visualis to Homo virtualis.
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