Vibhram Aur Yathartha
(0)
Author:
Christopher Caudwell, Bhagwan SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
995
796 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
‘विभ्रम और यथार्थ’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखी गई काव्यशास्त्र की सम्भवतः पहली और हमारे युग की विशिष्टतम पुस्तक है। इसमें कविता की तो चर्चा है ही, कविता के स्रोतों की भी चर्चा की गई है। कविता भाषा में लिखी जाती है, इसलिए इस पुस्तक में भाषा के स्रोतों का भी विवेचन किया गया है। भाषा मनुष्य को समाज से प्राप्त होती है। एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से लोग न केवल अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, एक-दूसरे को प्रेरित और प्रोत्साहित भी करते हैं, इसलिए भाषा समाज में रहनेवाले मनुष्यों की प्रेरणा का भी उपकरण है। यानी कविता के स्रोतों का अध्ययन समाज के अध्ययन का अंग है, उसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता। साहित्य समाज की उपज है, यह कोई नई स्थापना नहीं है। किन्तु मार्क्सवादी समीक्षा-प्रणाली में इसका निहितार्थ यह होता है कि साहित्य या कला की आलोचना के लिए आलोचक को साहित्य से बाहर जाना पड़ता है। उसके लिए साहित्य केन्द्रीय महत्त्व का होता है, किन्तु भौतिक विज्ञान, नृतत्त्वशास्त्र इतिहास और दर्शनशास्त्र आदि विषय में भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इस पुस्तक में साहित्य के सैद्धान्तिक अध्ययन के लिए विशुद्ध सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण के निषेध और साहित्य अथवा कविता के मूल्यों को साहित्येतर मूल्यों के सन्दर्भ में देखने का आग्रह किया गया <br />है।</p> <p>कॉडवेल इस बात की लगातार वकालत करते दिखते हैं कि कला को कला के भीतर से नहीं, अपितु उसके बाहर से (यानी समाज के भीतर से) देखना चाहिए। उनके मतानुसार, कला या साहित्य की आलोचना शुद्ध सर्जना अथवा शुद्ध रसास्वादन से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें एक समाजशास्त्रीय तत्त्व निहित होता है। वस्तुतः साहित्य के हर जिज्ञासु पाठक के लिए यह अत्यंत आवश्यक और उपयोगी पुस्तक है।
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
‘विभ्रम और यथार्थ’ मार्क्सवादी दृष्टिकोण से लिखी गई काव्यशास्त्र की सम्भवतः पहली और हमारे युग की विशिष्टतम पुस्तक है। इसमें कविता की तो चर्चा है ही, कविता के स्रोतों की भी चर्चा की गई है। कविता भाषा में लिखी जाती है, इसलिए इस पुस्तक में भाषा के स्रोतों का भी विवेचन किया गया है। भाषा मनुष्य को समाज से प्राप्त होती है। एक ऐसा उपकरण है जिसके माध्यम से लोग न केवल अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, एक-दूसरे को प्रेरित और प्रोत्साहित भी करते हैं, इसलिए भाषा समाज में रहनेवाले मनुष्यों की प्रेरणा का भी उपकरण है। यानी कविता के स्रोतों का अध्ययन समाज के अध्ययन का अंग है, उसे समाज से अलग नहीं किया जा सकता। साहित्य समाज की उपज है, यह कोई नई स्थापना नहीं है। किन्तु मार्क्सवादी समीक्षा-प्रणाली में इसका निहितार्थ यह होता है कि साहित्य या कला की आलोचना के लिए आलोचक को साहित्य से बाहर जाना पड़ता है। उसके लिए साहित्य केन्द्रीय महत्त्व का होता है, किन्तु भौतिक विज्ञान, नृतत्त्वशास्त्र इतिहास और दर्शनशास्त्र आदि विषय में भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। अतः इस पुस्तक में साहित्य के सैद्धान्तिक अध्ययन के लिए विशुद्ध सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टिकोण के निषेध और साहित्य अथवा कविता के मूल्यों को साहित्येतर मूल्यों के सन्दर्भ में देखने का आग्रह किया गया <br />है।</p>
<p>कॉडवेल इस बात की लगातार वकालत करते दिखते हैं कि कला को कला के भीतर से नहीं, अपितु उसके बाहर से (यानी समाज के भीतर से) देखना चाहिए। उनके मतानुसार, कला या साहित्य की आलोचना शुद्ध सर्जना अथवा शुद्ध रसास्वादन से इस अर्थ में भिन्न है कि इसमें एक समाजशास्त्रीय तत्त्व निहित होता है। वस्तुतः साहित्य के हर जिज्ञासु पाठक के लिए यह अत्यंत आवश्यक और उपयोगी पुस्तक है।
Book Details
-
ISBN9788171780921
-
Pages344
-
Avg Reading Time11 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bharat Aur Bharatiya Mansikata
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description:
यदि इतिहास का सम्बन्ध सामान्य जन से है तो इतिहासकार उन संस्थाओं, विश्वासों, आग्रहों और विचारों की उपेक्षा नहीं कर सकता जिनसे जनसाधारण की मानसिकता निर्मित होती है। लेकिन आज हम समाज-चिन्तन के एक ऐसे समय से गुजर रहे हैं जहाँ इतिहास पर ही बात करना खतरनाक होता जा रहा है। एक मनस्वी के रूप में इतिहासकार खत्म हो रहा है। उसका पुनर्जन्म एक योद्धा के रूप में हो रहा है। ‘भारत और भारतीय मानसिकता’ पुस्तक में शामिल निबन्ध इतिहास-लेखन की वास्तविक भूमिका को रेखांकित करते हुए भारतीय समाज की प्राचीनतम अवस्था से लेकर आधुनिक काल तक के कुछ प्रश्नों को उठाते हैं। मुख्य रूप में जो एक बात इन आलेखों में उभरकर आती है वह है एक राष्ट्र के रूप में भारतीय चेतना के विकास का इतिहास और यह प्रश्न कि भारत के सन्दर्भ में ‘नेशन’ की यूरोपीय उन्मादी अवधारणा का कोई अर्थ है या नहीं। ‘नेशन’ की मौजूदा अवधारणा औद्योगिक क्रान्ति के बाद तेजी से विकास करने वाले देशों के व्यवसायियों की जरूरत थी, फिर ऐसा हुआ कि हर देश उसे एक आदर्श मानने लगा। पुस्तक में शामिल ‘आदिम भारत में भाषाओं का अन्तर्मिलन’ भारतीय बोलियों की शब्दावली के अध्ययन की जरूरत को रेखांकित करता है जिससे दसियों हजार साल पहले के विषय में अहम जानकारियाँ मिल सकती हैं जब अनेक भाषाभाषी समूह इस महाद्वीप में विचरण कर रहे थे। बहुलता में एकात्मता के ऐसे ही सूत्रों की तलाश करती यह पुस्तक आज हर उस पाठक की समझ को विस्तार देगी, जो इस देश की सहिष्णु चेतना को समझना-जानना चाहता है!
Hadappa Sabhyata Aur Vaidik Sahitya
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description:
हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य (1987) के प्रकाशन से पहले तक इतिहासकार और पुरातत्त्वविद् अपने-अपने क्षेत्रों में अर्ध-दिग्भ्रमित से प्राचीनतम इतिहास को समझने का प्रयत्न कर रहे थे और अपने साक्ष्यों से टकराते हुए ख़ुद पछाड़ खाकर गिर जाते थे। अन्तर्विरोधी दावों का ऐसा दबाव था कि उनके पक्ष में प्रमाण भी नहीं मिल रहे थे और फिर भी उनका निषेध नहीं हो पा रहा था। सच तो यह है कि न तो इतिहास को अपना पुरातत्त्व मिल रहा था, न पुरातत्त्व को अपना इतिहास। ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ के प्रकाशन ने इन दोनों अनुशासनों और इनके प्रमाण-पुरुषों के आत्मनिर्वासन को पहली बार पूरे अधिकार और विपुल प्रमाणों के साथ खंडित किया और उसके बाद भारतीय पुरातत्त्व में पुरातात्त्विक सामग्री को साहित्य से जोड़कर भी देखने का आरम्भ हुआ। इस अर्थ में इसे एक युगान्तरकारी कृति के रूप में स्वीकार किया गया।
इस बीच शब्दमीमांसा को आधार बनाकर भी लेखक ने ऋग्वैदिक भाषा का अध्ययन किया और साहित्यिक सन्दर्भ से हटकर उनके शब्दों के मूलार्थ को ग्रहण करते हुए तकनीकी शब्दावली के आधार पर अपनी स्थापनाओं की जाँच करते हुए लेखक इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इनसे उसकी स्थापनाओं की पुष्टि ही नहीं होती, अपितु ‘हड़प्पा सभ्यता और वैदिक साहित्य’ में प्रकाशित उसकी स्थापनाएँ आइसबर्ग के दृश्य भाग को ही प्रकट कर पाई हैं। हड़प्पा सभ्यता के लगभग सभी प्रमुख पार्थिव लक्षणों की पुष्टि तो ऋग्वेद से होती ही है, यह ऐसे अनेक उदात्त और जीवन्त सांस्कृतिक पक्षों का भी उद्घाटन करता है जिनकी आशा पार्थिव अवशेषों से की ही नहीं जा सकती। उसके इस अध्ययन का सार The Vedic Harappans (1995) के रूप में प्रकाशित हुआ।
इस पुस्तक के वर्तमान संस्करण में इस पक्ष का समावेश भी किया गया है जिससे इसकी सार्थकता इसके ही पूर्व संस्करणों से अधिक बढ़ जाती है। इस संस्करण को आदि से अन्त तक सम्पादित करते हुए कुछ और भी परिवर्द्धन-संशोधन किए गए हैं। हड़प्पा सभ्यता का वैभव और वैदिक साहित्य की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने की दृष्टि से यह पुस्तक अनन्य है।
Arya-Dravid Bhashaon Ki Moolbhoot Ekta
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description:
आमतौर पर माना जाता है कि आर्य और द्रविड़ भाषाओं का सम्बन्ध दो अलग-अलग भाषा परिवारों से है। ‘आर्य-द्रविड़ भाषाओं की मूलभूत एकता’ पुस्तक इसी धारणा का खंडन करती है और यह सिद्ध करने का प्रयास करती है कि आर्य और भारोपीय भाषाओं का स्रोत वही है जो द्रविड़ भाषाओं का।
जिन तथ्यों को आधार मानकर यह प्रबन्ध अपनी इस धारणा को स्पष्ट करता है, उनमें सबसे प्रमुख यह है कि भारोपीय और द्रविड़ भाषाओं में तात्विक विभेद नहीं है और यह कि इन भाषाओं का विकास भारतीय परिवेश में ही हुआ था।
विभिन्न भाषाओं की शब्दावली और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए यह पुस्तक भाषा की आदिम अवस्था और विकास क्रम का विश्लेषण भी करती है तथा वैदिक, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और आधुनिक बोलियों की सामान्य प्रवृत्तियों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि इन बोलियों के स्वरूप को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम इन्हें अलग मानकर चलेंगे।
लेखक के अपने शब्दों में इस ‘कृति का गम्भीरता से अध्ययन करने के बाद इतना तो स्पष्ट हो जाएगा कि इसका उद्देश्य कुतूहल उत्पन्न करना नहीं है।’ यह एक बेहद उलझी हुई समस्या को समझने और उसका कोई समाधान ढूँढ़ने का एक जिम्मेदार प्रयास है।
भाषा के गम्भीर अध्येताओं के लिए एक विचारोत्तेजक कृति।
Bharatiya Sabhyata Ki Nirmiti
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description:
भारतीय सभ्यता की निर्मिति’ भारतीय सभ्यता के इतिहास की उस बड़ी कमी को दूर करने का सुचिन्तित प्रयास है, जो सभ्यता के निर्माताओं के बजाय भोक्ताओं को केन्द्र में रख कर लिखने से पैदा हुई है। वास्तव में भोक्ताओं को केन्द्र में रखकर लिखा गया इतिहास दमन के औजारों, हथियारों, संस्थाओं और वर्चस्व के रूपों का इतिहास होता है, जिसमें अर्थव्यवस्था और सामाजिक सम्बन्धों के बजाय अधिरचना को प्रमुखता दी जाती है। इससे इतिहास में समाज के वही तबके अनुल्लिखित रह जाते हैं जिनके बिना सभ्यता ही सम्भव नहीं हो पाती। यह समस्या केवल भारतीय सभ्यता के इतिहास की नहीं, बल्कि समूचे ‘सभ्य’ संसार की रही है। इस समस्या को ध्यान में रखते हुए यह पुस्तक इतिहास के उन अनदेखे-ओझल-पक्षों की सूक्ष्मता से और सप्रमाण विवेचना करती है, जिनके बिना भारतीय सभ्यता की महायात्रा से परिचित होना सम्भव नहीं है।
Kosambi : Kalpana Se Yatharth Tak
- Author Name:
Bhagwan Singh
- Book Type:

- Description:
भारतीय इतिहास के सन्दर्भ में दामोदर धर्मानन्द कोसंबी को मार्क्सवादी इतिहास का जनक माना जाता है, लेकिन यह विडम्बना ही है कि मार्क्सवादी इतिहासकारों तक ने उन पर ऐसा ठोस काम अभी तक नहीं किया है, जिससे कोसंबी को समझना आसान हो सके, और जो उनके अध्ययन की दिशाओं में आगे कुछ जोड़ सके। कोसंबी के अन्तर्विरोधों को रेखांकित करने और उनके पीछे निहित कारणों को जानने की कोशिश लगभग नहीं ही हुई है।
प्रसिद्ध इतिहासकार और लेखक भगवान सिंह की यह पुस्तक इस अर्थ में एक महत्त्वपूर्ण आरम्भ है। इसमें उन्होंने न सिर्फ़ कोसंबी की मौलिक उद्भावनाओं और स्थापनाओं पर विस्तार से विचार किया है, बल्कि उनकी प्रतिपादन-पद्धति का भी विश्लेषण किया है। साथ ही व्यक्ति कोसंबी और एक विलक्षण प्रतिभा के रूप में बनी उनकी 'मूरत' को भी समझने की कोशिश की है। कोसंबी के नाम-जाप से ही अपनी उपलब्धियों का आकाश छूनेवाले इतिहासकारों के विपरीत भगवान सिंह ने इस सुचिन्तित अध्ययन में उनके अन्तर्विरोधों को भी रेखांकित किया है। आमुख में वे लिखते हैं, ‘हमारा अपना प्रयत्न कोसंबी को समझने का रहा है, परन्तु जहाँ वे अपने ही सिद्धान्त के विपरीत आचरण करते दिखाई देते हैं या अपनी सैद्धान्तिकी के विपरीत दावे करते हैं...वहाँ उनकी निन्दा के लिए भी बाध्य हुए हैं।’
कहना न होगा कि यह पुस्तक इतिहासवेत्ता कोसंबी को समझने में इतिहास के विद्वानों और अध्येताओं के लिए बहस के नए बिन्दु प्रस्तावित करेगी।
Jirah Ajudhia
- Author Name:
Rakesh Tewari
- Book Type:

- Description:
‘रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद’ को लेकर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। ‘जिरह अजुधिया : एक पुरातत्त्ववेत्ता की कलम से’ उन सबसे इस मामले में अलग है कि इसे उस व्यक्ति ने लिखा है जो इस विवाद के सबसे निर्णायक मोड़ पर विवादित स्थल के सबसे निकट था। न सिर्फ वहाँ मौजूद बल्कि उस प्रक्रिया में शामिल भी जो उस जगह की सदियों पुरानी मिट्टी को छानकर वास्तविकता के प्रमाण जुटाने के लिए की जा रही थी। न्यायालय द्वारा विवादित स्थल के पुरावशेषों की जाँच और संग्रह का काम जब पुरातत्त्व विभाग को सौंपा गया, राकेश तिवारी उस समय इस विभाग के निदेशक थे। उन्हीं के नेतृत्व में वह अभिलेखीकरण हुआ जो न्यायालय के अन्तिम फैसले का भी आधार बना। इस पुस्तक में उन्होंने उस पूरी प्रक्रिया और उससे सम्बन्धित अदालती जिरह का ब्योरेवार विवरण दिया है, इस विवाद की पूरी राजनीतिक पृष्ठभूमि के साथ। निष्पक्ष और तथ्यों-साक्ष्यों पर आधारित वह पूरा घटनाक्रम भी इस पुस्तक में उपलब्ध है जो तमाम बहसों और विवादों के घटाटोप में इस तरह सामने नहीं आ सकता था। लेखक ने पुरातत्त्ववेत्ताओं और इतिहासकारों के उन मतों का भी संक्षिप्त लेकिन सारभूत रूप में उल्लेख किया है जो अयोध्या और राम की ऐतिहासिकता को लेकर बीच-बीच में सामने आते रहे।
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
- Author Name:
Balwant Kaur
- Book Type:

- Description:
जैसे-जैसे मैं जीवन में आगे बढ़ती गई, मैंने कट्टरपन्थियों के पागलपन का विरोध करने की हमेशा कोशिश की, चाहे वे किसी भी समुदाय के हों।...मुझे पता था कि मेरे बचपन के सपनों का भारत बिखर गया था। शायद बलवन्त का भारत भी बिखर गया इसीलिए मैं और वह इस असामान्य प्रस्तावना के ज़रिये एक सह-अनुभूति रखते हैं, जिसे मैं पेश कर रही हूँ क्योंकि जब मैं इस अशान्त राष्ट्र के इतिहास को याद करती हूँ तो मेरा मन इसी तरह भटकता है। -उमा चक्रवर्ती इतिहासकार क्या बलवन्त कौर की यह कृति आत्मकथा, साहित्य-अध्ययन, इतिहास और समाजशास्त्र के बीच आवाजाही करती है? नहीं; यह इन सबको एक साथ लाकर बल्कि मिलाकर अन्दरूनी सरहदों से मुक्त एक अवकाश बनाती है जिसमें आप किसी अनुशासन के प्रति आत्मसजग हुए बगैर घूम-फिर सकते हैं। आपको पता नहीं चलता कि कब व्यक्तिगत संस्मरण सुनते-सुनते साहित्यिक कृतियों के साथ आपका संवाद शुरू हो गया और कब इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के हवाले से आप हिंसा, पहचान, अन्यीकरण, विभाजन-विस्थापन के सवालों से दो-चार होने लगे। विभाजन और उसकी निरन्तरता पर यह निस्सन्देह एक अनोखी किताब है। —संजीव कुमार आलोचक
Smriti Aur Dansh : Vibhajan, Nirantarata Aur Teesri Pirhi
Balwant Kaur
20% off₹ 399
₹ 319.2
Available
Manusmriti
- Author Name:
Dr. Ramchandra Verma Shastri
- Book Type:

- Description:
मनुष्य ने जब समाज व राष्ट्र्र के अस्तित्व तथा महत्त्व कौ मान्यता दी, तो उसके कर्तव्यों और अधिकारों की व्याख्या निर्धारित करने तथा नियमों के अतिक्रमण करने पर दण्ड व्यवस्था करने की भी आवश्यकता उत्पन्न हुई । यही कारण है कि विभिन्न युगों में विभिन्न स्मृतियों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति को विशेष महत्व प्राप्त है । मनुस्मृति में बारह अध्याय तथा दो हज़ार पांच सौ श्लोक हैं, जिनमें सृष्टि की उत्पत्ति, संस्कार, नित्य और नैमित्तिक कर्म, आश्रमधर्म, वर्णधर्म, राजधर्म व प्रायश्चित्त आदि अनेक विषयों का उल्लेख है। ब्रिटिश शासकों ने भी मनुस्मृति को ही आधार बनाकर ' इण्डियन पेनल कोड ' बनाया तथा स्वतन्त्र भारत की विधानसभा ने भी संविधान बनाते समय इसी स्मृति को प्रमुख आधार माना । व्यक्ति के सर्वतोमुखी विकास तथा सामाजिक व्यवस्था को सुनिश्चित रूप देने व व्यक्ति की लौकिक उन्नति और पारलौकिक कल्याण का पथ प्रशस्त करने में मनुस्मृति शाश्वत महत्त्व का एक परम उपयोगी शास्त्र मथ है । वास्तव में मनुस्मृति भारतीय आचार-संहिता का विश्वकोश है, जो भारतीय समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।
Meghdoot : Ek Antaryatra
- Author Name:
Prabhakar Shrotriya
- Book Type:

- Description:
‘मेघदूत’ एक कालजयी कृति ही नहीं प्रेम, प्रकृति और निसर्ग के प्रति कालिदास की अनन्य प्रपत्ति भी है। अपने विशिष्ट स्वर, स्वरूप और न्यास में यह काव्य एक अप्रतिम एवं इन्द्रधनुषी भाव-वितान है, जिसमें कृतिकार की अपूर्व परिकल्पना, मौलिक उद्भावना तथा बिम्बों और वर्णों की जीवन्त छवियाँ सहज ही देखी जा सकती हैं। कालिदास ने अपनी यशस्वी कृति ‘मेघदूत’ के द्वारा जिस रूपक-राज्य का निर्माण किया था—पिछली दो सहस्राब्दियों से उसका निरन्तर विकास और विस्तार होता रहा है। विरही यक्ष के मनोजगत में विद्यमान एक आर्तप्रेमी के प्रणयोत्सुक प्रार्थी भाव को अनुषंग बनाकर—अपनी प्राण-प्रियतमा को भेजे जानेवाले विरहातुर सन्देश को कई रचनाकारों, भाष्यकारों और रूपान्तरकारों और चित्रकारों ने अपने-अपने ढंग से, अलग-अलग शैलियों में निरूपित किया है। प्रसंगानुरूप और प्रसंगान्तर परिदृश्य को अपने विरहकातर निवेदन से मुखर करनेवाली इस कालातीत रचना का अनुगायन और अनुकीर्तन न केवल सदियों से होता रहा है, बल्कि आधुनिक और समकालीन पीढ़ियाँ भी इसमें अपनी रचनात्मक भावांजलि लिए खड़ी रही हैं। अपनी सर्जनात्मक समग्रता के नाते और ‘क्लासिकी’ के गुणों से समृद्ध एवं समादृत ‘मेघदूत’ ने काव्य और काव्येतर माध्मयों के द्वारा सहृदय पाठकों, प्रेक्षकों, गायकों और समीक्षकों की क्षमता और आकांक्षाओं के अनुरूप सुदीर्घ रचना-प्रकिया एवं परम्परा को जीवित रखा है। इसी अनुक्रम में हिन्दी के सुपरिचित विद्वान, आलोचक, कवि एवं रचनाकार प्रभाकर श्रोत्रिय ने ‘मेघदूत’ के मार्मिक प्रसंगों, अछूते अनुषंगों—और सबसे बढ़कर—रचनाकार की विराट मनोभूमि का स्पर्श एवं अनुभावन अपनी विदग्ध रचना मनीषा के द्वारा किया है। ‘मेघदूत : एक अन्तर्यात्रा’ पुस्तक प्रेमी और प्रकृति के शाश्वत एवं चिरन्तन आधान को सुललित और सर्जनात्मक आयाम प्रदान करेगी—इसमें सन्देह नहीं।
J. Krishnamurti Ke Darshnik Vichar
- Author Name:
Swati Gautam
- Book Type:

- Description:
प्रसिद्ध दार्शनिक, आध्यात्मिक विषयों के लेखक एवं प्रवचनकार जे. कृष्णमूर्ति ने विभिन्न स्थानों पर विभिन्न वार्त्ताओं में अनगिनत विषयों पर बात की। उन्हीं विषयों में से कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों पर उनके विचारों को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। हमारे रिश्ते, दुःख का जन्म कैसे होता है? हमारी व्यवस्थाएँ कैसी हैं? हमारा मन कैसे काम करता है? ध्यान, प्रेम, मृत्यु। अपने जीवन में हम कैसे संबंध स्थापित करें ? भले ही हम इस अत्यधिक समाज में रह रहे हैं, परंतु यही आधुनिकता हमें अपना दास बना रही है। यदि हम दास हैं तो हम स्वतंत्र कैसे हुए ? हम पूरी दुनिया को अपने नए-नए आविष्कारों से अचंभित कर रहे हैं, परंतु हमारा मन अब तक हमारी बात नहीं मानता। हमारे रिश्ते बस एक-दूसरों से अपेक्षा पर ही टिके हुए हैं; क्या हो अगर हमारी अपेक्षाएँ खत्म हो जाएँ? मृत्यु कैसे हमारे जीवन का ही एक पहलू है, वह हमसे भिन्न नहीं है। कैसे हम अपने जीवन में सुख की तलाश में अनगिनत दुःखों का कारण बनते हैं। क्या सुख कोई ऐसी वस्तु है, जिसे बाहरी रूप से प्रकट किया जा सकता है? या फिर वह हमारे मन की एक अवस्था है, जहाँ सुख से जन्म लेता है। क्या प्रेम एक-दूसरे के प्रति आकर्षण और एक-दूसरे के लेन-देन पर ही संबंधित है या प्रेम एक भिन्न अवस्था है? जो किसी पुष्प-खुशबू की भाँति है, सबके लिए और सभी जगह। प्रेम की असली परिभाषा क्या है ? और अंतिम विषय जिसकी इस पुस्तक में चर्चा की गई है, वह है ध्यान; ध्यान क्या है, ध्यान क्यों आवश्यक है ? आध्यात्मिक और दार्शनिक उन्नयन के लिए एक आवश्यक पुस्तक ।
Sanlap
- Author Name:
Bhagwandas Morwal +2
- Book Type:

- Description:
अपनी साफ़गोई, कथा-विषयों की विविधता और अपनी रचनाओं के लिए श्रम-साध्य शोध और उद्यमिता के लिए सुपरिचित कथाकार भगवानदास मोरवाल इस पुस्तक में उन मुद्दों पर बात कर रहे हैं, जिनका ताल्लुक उनके लेखन, उनकी पुस्तकों, और पात्रों के अलावा हमारे समय, समाज और हिन्दी साहित्य के परिदृश्य से भी है। इस पुस्तक में उनके साक्षात्कार संकलित हैं। ये साक्षात्कार न सिर्फ़ उनके बारे में बताते हैं, बल्कि इन प्रश्नोत्तरों के माध्यम से भारतीय समाज के विरोधाभासों, उसकी बेचैनियों और बतौर एक नागरिक लेखक की ज़िम्मेदारियों पर भी रौशनी डालते हैं। ‘काला पहाड़’ जैसे चर्चित उपन्यास से हिन्दी क्षितिज पर उभरे मोरवाल यहाँ इसके अलावा अन्य उपन्यासों की रचना-प्रक्रिया और उनके साथ जुड़े अपने सरोकारों को भी रेखांकित करते हैं। अपने समाज और ख़ासतौर पर, मेवात क्षेत्र की सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक बनावट से उनका गहरा परिचय रहा है, जो उनके कई उपन्यासों में भी प्रकट हुआ है, यहाँ इस बारे में वे और विस्तार से बात करते हैं; समाज और साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर उनकी बेलाग अभिव्यक्ति तो इन साक्षात्कारों का आकर्षण है ही।
Vedic Log : Unka Itihas Aur Bhugol
- Author Name:
Rajesh Kochhar +1
- Book Type:

- Description:
क्या ऋग्वेद की रचना अफगानिस्तान में हुई थी? क्या किसी समय घग्गर नदी ही ऋग्वेद में वर्णित महान सरस्वती थी? क्या ऋग्वैदिक जन और हड़प्पा निवासी समान ही थे? क्या राम की अयोध्या भारत में ही थी? प्राचीन भारतीय इतिहास के इन निर्णायक प्रश्नों के उत्तर इस किताब ‘वैदिक लोग’ में मिलते हैं। इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए विख्यात खगोल-भौतिकीविद राजेश कोचर भाषाविज्ञान, साहित्य, प्राकृतिक इतिहास, पुरातत्व, प्रौद्योगिकी के इतिहास, भू-आकृति विज्ञान और खगोलशास्त्र आदि अनेक क्षेत्रों से प्राप्त आँकड़ों का विश्लेषण और संश्लेषण करते हैं और इस क्रम में ऐसे कई विरोधाभासों को सुलझाने की कोशिश करते हैं जो पेशेवर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों, दोनों को उलझन में डालते आए हैं। यह तर्क देते हुए कि ऋग्वेद के ज़्यादातर हिस्से की रचना दक्षिण अफ़ग़ानिस्तान में (1700 ई.पू. के बाद), ऋग्वैदिक लोगों के पुन्जाल मैदान में प्रवेश करने और गंगा नदी के पूर्व की ओर जाने से भी बहुत पहले हुई, वे दावा करते हैं कि अपने प्रवसन के दौरान वे न सिर्फ अपने अनुष्ठान और भजन इत्यादि, बल्कि नदियों और स्थानों के नाम भी अपने साथ ले गए जिनका प्रयोग उन्होंने अपनी इच्छानुसार किया। हर कदम पर अपनी बात को तर्कों से प्रमाणित करते हुए एक वैज्ञानिक ने इस पुस्तक को ऐसी सरल और सुबोध शैली में लिखा है कि साधारण पाठक भी इसे रुचिपूर्वक पढ़ सकते हैं, इतिहासकारों, पुरातत्वशास्त्रियों और भारतविदों के लिए तो यह काम उल्लेखनीय रहा ही है।
Vishamta : Ek Punarvivechan
- Author Name:
Amartya Sen +1
- Book Type:

- Description:
नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन की एक दार्शनिक रचना है—‘विषमता’। उनकी कई एक विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकों के बीच इस रचना का शुमार उनकी सोच की कुंजी के बतौर होता है। निस्संदेह यह प्रोफेसर सेन की कुछ सर्वाधिक कठिन पुस्तकों में से भी एक है। कठिन यह इस अर्थ में नहीं है कि कोई लंबी-चौड़ी उलझी हुई लफ़्फ़ाज़ी इसमें की गई है, बल्कि इस अर्थ में कि स्वतंत्रता, समानता, विविधता आदि अवधारणाओं का प्रयोग यहाँ इतने व्यापक संदर्भों में हुआ है कि उनका आदी होने में किसी को भी काफी मेहनत करनी पड़ेगी। समानता और स्वतंत्रता के बीच का विवाद इस सदी का एक महत्त्वपूर्ण दार्शनिक विवाद रहा है। शीतयुद्ध के चार दशकों ने तो इसे विश्व राजनीति के केंद्रीय विवाद का ही रूप दे दिया था। इस पुस्तक में प्रोफेसर सेन इस विवाद की तह में जाते हैं। समानतावादियों और स्वतंत्रतावादियों के मतों का विश्लेषण करते हुए प्रोफेसर सेन यह सिद्ध करते हैं कि इन दोनों के बीच विवाद दरअसल इस बात पर है ही नहीं कि मनुष्यों के बीच समानता होनी चाहिए या नहीं। विवाद तो इस बात पर है कि मनुष्यों के बीच समानता किस चीज की होनी चाहिए। इस केंद्रीय प्रश्न ‘समानता किस चीज की?’ का जवाब खोजने के क्रम में प्रोफेसर सेन मनुष्यों के बीच मौजूद भारी विविधताओं को केंद्र में रखते हैं। अपंग व्यक्ति, गर्भवती स्त्री, कालाजार प्रभावित इलाकों में रहनेवाले आदिवासी या स्वेच्छया सारी सुख-सुविधाओं का त्याग कर जनता की सेवा करनेवाले सामाजिक कार्यकर्ता–सभी उनकी नजर में रहते हैं और मनुष्य की किसी भी गढ़ी-गढ़ाई परिभाषा से वे ठोस रूपाकार वाले मनुष्यों का कुछ खास भला होते नहीं देखते। उनका केंद्रीकरण आमतौर पर भिन्न-भिन्न लक्ष्यों के लिए प्रयास करने की मानवीय स्वतंत्रता पर और खासतौर पर विविध मूल्यों को अर्जित करने की अलग-अलग व्यक्तियों के सामर्थ्य पर है। स्वतंत्रता और समानता को लेकर आपके विचार चाहे जो भी हों और प्रोफेसर सेन के विचारों से उनकी कोई संगति बैठती हो या न बैठती हो पर इसमें कोई संदेह नहीं कि इस विश्लेषण से गुजरने के बाद आपकी सोच का दायरा पहले से बढ़ चुका होगा।
Aapka Manto
- Author Name:
Mohammed Aslam Parvez
- Book Type:

- Description:
इस किताब में मंटो के अब तक मौजूद सभी खत संकलित किए गए हैं। हिंदी पढ़ने वालों के लिए मंटो साहब का नाम कोई नया नहीं। हिंदी वालों का भी मंटो पर उतना ही हक है, जितना उर्दू वालों का। इस वजह से हिंदी का एक बड़ा पाठक वर्ग इन खतों के जरिए मंटो की जिंदगी के उस हिस्से से भी रूबरू होगा, जिस पर अभी बहुत ज्यादा रौशनी नहीं पड़ी है। अब तक मंटो के मौजूद खत की संख्या 142 है, जो उसकी लिखी गई कहानियों की संख्या से भी बहुत कम है। मौजूद खत में सबसे ज्यादा खत मंटो ने अहमद नदीम कासमी को ही लिखे हैं। इन खतों के जरिए मंटो की जो तस्वीर कावि के मन में उभरती है, उसे अगर एक वाक्य में कहें तो हम ‘a man without a mask’ कह सकते हैं। उर्दू साहित्य की दुनिया में मोहम्मद असलम परवेज का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। एक लंबे समय से वे रंगकर्मी के तौर पर हिंदी, उर्दू, और हिंदुस्तानी रंगमंच से जुड़े हैं। उनके लिखे कई नाटक मुंबई के पृथ्वी और टाटा थिएटर के अलावा दूसरे शहरों में खेले जाते रहे हैं। इसके अलावा, मराठी और गुजराती में उनके नाटक पेशेवर मंच पर भी खेले जाते रहे हैं। मोहम्मद असलम परवेज की एक पहचान मंटो के आलोचक के रूप में भी है। उन्होंने मंटो को नित नए दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की। मंटो के हवाले से उनकी किताबें ‘आप का मंटो’, ‘मंटो और चचा सैम’, ‘मंटो: अफसानों के दरमियान’, और ‘मंटो: स्याह हाशिए और हाशिया रेखाएँ’ अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं।
Meri Maa Meri Gangster
- Author Name:
Arundhati Roy +1
- Book Type:

- Description:
अठारह बरस की उम्र में अरुंधति रॉय जिस माँ को छोड़कर भागीं, उनकी मौत से जज़्बाती तौर पर वह इस क़दर बिखर गईं कि उनकी यादों को सहेजते हुए उन्होंने यह असाधारण आख्यान लिखना शुरू किया। यह शानदार संस्मरण अन्तरंग है और प्रेरक भी, बहुत बार परेशान करने वाला और हैरानी की हद तक दिलचस्प भी। बचपन से लेकर वर्तमान तक, आयमनम से लेकर दिल्ली तक के सफ़र की यह गाथा हमें उन हालात से भी रूबरू कराती है, जिसने उन्हें वह इनसान और लेखक बना दिया, जो वह आज हैं।
HASHIYE PAR HASRAT
- Author Name:
Bhim Singh Bhavesh
- Book Type:

- Description:
"‘हाशिए पर हसरत’ एक ऐसे कटु यथार्थ का दस्तावेज है, जो हमारे समाज के लिए आज भी शर्म का बायस है। भारतीय समाज की संरचना में जाति-वर्ण की विभाजक रेखा इतनी प्रतिगामी और अमानवीय साबित हुई है कि एक सभ्य समाज उससे जितनी जल्द मुक्त होगा, उसका उतना ही भला होगा। यह पुस्तक उसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में अस्पृश्य जातियों की अंतिम पंक्ति में खड़े मुसहर जाति की स्थिति से रू-ब-रू कराने की कोशिश है। भीम सिंह भवेश की यह पुस्तक वस्तुतः समाज विज्ञान में एक शोध है। यह पुस्तक मुसहरों के जीवन, उनकी जीवन-दृष्टि, आपसी संबंधों, दशा-दिशा, भविष्य और समाज की मुख्यधारा के प्रति उनकी धारणाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। मुसहर-टोलों के जीवन को जिस संवेदना के साथ भवेश ने उकेरा है, उसका एहसास इसे पढ़ने पर होता है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मान्यताओं और जटिलताओं को लेखक ने बहुत करीब से देखा है। ग्रामीण जीवन के अमर चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष में ‘हाशिए पर हसरत’ का प्रकाशन ‘मैला आँचल’ के लेखक को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि भी है। भवेश ने जानकारियाँ जुटाने में मेहनत तो की ही है, उन्हें प्रस्तुत भी रोचक शैली में किया है। इसीलिए यह शुष्क शोध नहीं, बल्कि पठनीय कथ्य के माध्यम से संवेदनशील विषय के प्रति हमारे अंदर संवेदना जगाती है। यही इस पुस्तक की विशेषता है। यह पुस्तक मुसहर जाति को समझने, उनके दारुण दुःखों को महसूस करने और उन्हें उच्च मानवीय गरिमा प्रदान करने के प्रयासों को बल देगी। —अवधेश प्रीत "
Kirtishesh : Mohan Rakesh
- Author Name:
Jaidev Taneja
- Book Type:

- Description:
मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Dosti
- Author Name:
Amarkant
- Book Type:

- Description:
‘दोस्ती’ कथाकार अमरकान्त के संस्मरणों का संग्रह है। इसकी शुरुआत ही एक ऐसे संस्मरण से होती है जिसमें हमें बाद में अत्यन्त प्रतिष्ठित हुए रचनाकारों के शुरुआती दिनों और उनके संघर्षों का विवरण प्राप्त होता है। ‘लेखक की दोस्ती’ शीर्षक इस वृत्तान्त में कमलेश्वर, मार्कण्डेय, भैरवप्रसाद गुप्त, दुष्यन्त कुमार और अन्य समकालीनों की मित्रताओं और निजी व सामाजिक-रचनात्मक द्वन्द्वों का लेखा-जोखा पढ़ते ही बनता है। संस्मरण विधा में प्रवेश करते ही अमरकान्त जी की लेखनी इतनी चुटीली और चुस्त हो जाती है कि उनकी एक-एक पंक्ति आपको पकड़कर रखती है। उपरोक्त के अलावा इस पुस्तक में महादेवी वर्मा, नागार्जुन, रेणु, रवीन्द्र कालिया, मोहन राकेश आदि से सम्बन्धित संस्मरणों के अलावा कुछ यात्रा-वृत्तान्त भी शामिल हैं। ‘मेरा बचपन कब समाप्त हुआ’ शीर्षक लम्बे संस्मरण में अमरकान्त अपने जीवन के उन दिनों को याद करते हैं जब उनकी किशोर चेतना अलग-अलग दिशाओं से समझ और संस्कार ग्रहण कर रही थी। इस आलेख में कई बेहद मनोरंजक घटनाओं के विवरण भी उन्होंने दिए हैं और उस समय के सामाजिक-राजनीतिक हालात के भी। अमरकान्त और उनके समय को जानने-समझने में उनके ये संस्मरण साहित्य के अध्येताओं और पाठकों, दोनों को रुचिकर तथा सार्थक प्रतीत होंगे।
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
- Book Type:

- Description:
कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
Sagar Vigyan
- Author Name:
Shyam Sunder Sharma
- Book Type:

- Description:
पढ़ने या सुनने में यह बात भले ही अटपटी लगे, पर यह सत्य है कि अब वह समय आ गया है जब हमें खाद्य, आवास, ऊर्जा, प्रदूषण आदि की बढ़ती हुई समस्याओं के समाधान के लिए थल के सीमित संसाधनों से हटकर सागर की ओर उन्मुख होना चाहिए। सागर पृथ्वी के केवल 71% भाग को ही घेरे हुए नहीं है, उसमें कुल जल का 97% भाग ही नहीं हैं, वरन् उसमें अपार खनिज संपदा, असंख्य जीव-जंतु और ऊर्जा का असीम भंडार भी है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book