DADA-DADI KI KAHANIYON KA PITARA
Author:
Smt. Sudha MurtyPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction0 Ratings
Price: ₹ 280
₹
350
Available
हर दिन एक कहानी
मुश्किलों के बिन जिंदगानी!
यह वर्ष 2020 की बात है, जब बच्चे घरों में कैद होकर रह गए; क्योंकि नोवेल कोरोना वायरस भारत में आ धमका है। पूरे देश में लॉकडाउन घोषित हो चुका है, और इस बढ़ते संकट के बीच अज्जा और अज्जी अपने पोते-पोतियों और कमलु अज्जी का शिग्गाँव स्थित अपने घर में स्वागत करते हैं।
मास्क सिलने से लेकर, घर के काम में हाथ बँटाने और श्रमिकों के लिए खाना तैयार करने से लेकर कालातीत कहानियों में खो जाने तक बच्चों के लिए लॉकडाउन का समय यादगार बन जाता है, जब वे देवी-देवताओं, राजाओं, राजकुमारों, साँपों, जादुई फलियों, चोरों, साम्राज्यों और महलों की दिलचस्प दुनिया में कदम रखते हैं। दादा-दादी की सुनाई अनगिनत कहानियाँ उनके जीवन में खुशियाँ भर देती हैं, जिनसे बच्चे दुनियादारी को लेकर पहले से कहीं अधिक दयालु और समझदार हो जाते हैं।
भारत की लोकप्रिय लेखिका सुधा मूर्ति आपके लिए नैतिक गुणों से भरी ‘दादा-दादी की कहानियों का पिटारा’ का ऐसा संग्रह लेकर आई हैं, जिसे उन्होंने लॉकडाउन के दौरान बड़े प्यार से सँजोया है, ताकि नन्हे-मुन्ने पाठकों को सुकून मिले और वे दूसरों की देखरेख तथा उनके साथ चीजों को साझा करने के चमत्कार का अनुभव प्राप्त कर सकें। उनकी चिर-परिचित शैली में बेहतरीन ढंग से बुनी गई पुस्तक को आप पढ़ने लगें तो उसे छोड़ने का मन नहीं करेगा और यह हर बच्चे के बुकशेल्फ के लिए एक आवश्यकता तो
है ही!
ISBN: 9789390900428
Pages: 208
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
Recommended For You
Sonam Gupta Bewafa Nahin Hai
- Author Name:
Anil Yadav
- Book Type:

- Description: article
Kathghare Mein Loktantra
- Author Name:
Arundhati Roy
- Book Type:

-
Description:
अपने जनवादी सरोकारों और ठोस तथ्यपरक तार्किक गद्य के बल पर अरुन्धति रॉय ने आज एक प्रखर चिन्तक और सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में अपना ख़ास मुक़ाम हासिल कर लिया है। उनके सरोकारों का अन्दाज़ा उनके चर्चित उपन्यास, ‘मामूली चीज़ों का देवता’ ही से होने लगा था, लेकिन इसे उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की निशानी ही माना जाएगा कि अपने विचारों और सरोकारों को और व्यापक रूप से अभिव्यक्त करने के लिए, अरुन्धति रॉय ने अपने पाठकों की उम्मीदों को झुठलाते हुए, कथा की विधा का नहीं, बल्कि वैचारिक गद्य का माध्यम चुना और चूँकि वे स्वानुभूत सत्य पर विश्वास करती हैं, उन्होंने न सिर्फ़ नर्मदा आन्दोलन के बारे में अत्यन्त विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किया, बल्कि उस आन्दोलन में सक्रिय तौर पर शिरकत भी की। यही सिलसिला आगे परमाणु प्रसंग, अमरीका की एकाधिपत्यवादी नीतियों और ऐसे ही दूसरे ज्वलन्त विषयों पर लिखे गए लेखों की शक्ल में सामने आया।
‘कठघरे में लोकतंत्र’ इसी सिलसिले की अगली कड़ी है। इस पुस्तक में संकलित लेखों में अरुन्धति रॉय ने आम जनता पर राज्य-तंत्र के दमन और उत्पीड़न का जायज़ा लिया है, चाहे वह हिन्दुस्तान में हो या तुर्की में या फिर अमरीका में। जैसा कि इस किताब के शीर्षक से साफ़ है, ये सारे लेख ऐसी तमाम कार्रवाइयों पर सवाल उठाते हैं जिनके चलते लोकतंत्र–यानी जनता द्वारा जनता के लिए जनता का शासन–मुट्ठी-भर सत्ताधारियों का बँधुआ बन जाता है।
अपनी बेबाक मगर तार्किक शैली में अरुन्धति रॉय ने तीखे और ज़रूरी सवाल उठाए हैं, जो नए विचारों ही को नहीं, नई सक्रियता को भी प्रेरित करेंगे। और यह सच्चे लोकतंत्र के प्रति अरुन्धति की अडिग निष्ठा का सबूत हैं।
–नीलाभ
Rakesh Aur Parivesh : Patron Mein
- Author Name:
Jaidev Taneja
- Book Type:

-
Description:
कोई व्यक्ति और विशेषत: रचनाकार अपने बारे में क्या कहता है—इससे अधिक महत्त्वपूर्ण और बड़ा सच यह है कि दूसरे उसके बारे में क्या कहते हैं? यह पत्र-संग्रह दूसरों के आईने में राकेश के व्यक्तित्व, कृतित्व और परिवेश की एक प्रामाणिक तस्वीर पेश करता है। यहाँ केन्द्र में राकेश हैं और परिधि पर उनके समकालीन।
लेखकीय आत्म-सम्मान और अपने अधिकारों के लिए हर किसी से कभी भी और कहीं भी त्याग-पत्र देने, वॉक आउट करने और लड़ने-झगड़ने को सदैव तत्पर, निश्छल आत्मीयता की तलाश में दर-दर भटकते सैलानी, भीतर से असुरक्षित, अकेले और बेचैन लेकिन बाहर से छतफाड़ ठहाके लगानेवाले हरदिल अज़ीज़ अनूठे दोस्त, एक साथ ज़बरदस्त बौद्धिक एवं अहंकारी तथा अत्यधिक संवेदनशील और भावुक अपने सिद्धान्तों के लिए अडिग और अटूट तथा अपने लेखन के लिए अत्यन्त अस्थिर, बेसब्र और बेचैन मोहन राकेश के अन्तर्विरोधों की कोई सीमा नहीं है। इस पुस्तक में संकलित राकेश और उनके सहयात्रियों के 721 पत्र उनके जटिल व्यक्तित्व को, पाठकों के लिए, बड़े प्रामाणिक एवं विश्वसनीय रूप में एकदम पारदर्शी बना देते हैं। इनमें उनके चेतन-अवचेतन के अँधेरे-गुह्य कोनों और परिवेश के नेपथ्य की जीवन्त छवियों एवं धड़कनों को साफ़-साफ़ पहचाना और सुना जा सकता है।
नि:सन्देह, यह पुस्तक राकेश के पाठकों, अध्येताओं और शोधार्थियों को राकेश के संघर्षमय जीवन और वैविध्यपूर्ण रचनाकर्म के मर्म को गहराई से जानने-समझने में न केवल रोचक, दुर्लभ एवं महत्त्वपूर्ण सामग्री ही उपलब्ध कराती है, बल्कि हिन्दी के पत्र-साहित्य में एक उल्लेखनीय भूमिका भी निभाती है।
Bharatnama
- Author Name:
Sunil Khilnani
- Book Type:

- Description: आज के भारत की राजनीति का संभवतः सर्वश्रेष्ठ गैरऔपन्यासिक परिचय...-माइकल फुट, इवनिंग स्टैण्डर्ड भारत और उसकी समसामयिक परिस्थितियों पर कोई और किताब ही इससे अधिक गहनता के साथ बेहतर रौशनी डाल सके | - इयान जैक, ऑब्जर्वर इस शानदार किताब का मकसद कोई भविष्यवाणी करने के बजाय यह बताना है कि भारत अपनी मौजूदा हैसियत तक कैसे पहुँचा और उसका अंतर्निहित विचार कैसे विकसित हुआ | यह किताब आजादी के पचास साल बाद भारत की खूबियों और खामियों की तरफ इशारा करती है...उत्कृष्ट बौद्धिकता से समपन्न यह पुस्तक करीब ढाई सौ पृष्ठों में आधुनिक भारत की कई जटिलताओं की शिनाख्त करते हुए उनके उद्घाटन और व्याख्या में सफल होती है...इसकी जितनी प्रशंसा की जाए वह कम है |-डेविड गिलमूर, इंडिपेंडेंट ऑन सन्डे यह पुस्तक भारतीय राष्ट्र की परिभाषाओं को उजागर करती है...सभी तरह के रोमानी संस्कृतिवादियों और धार्मिक कट्टरपंथियों की दलीलों को कुशलता से परास्त कर देती है |- इयान वरुपा, न्यूयार्क रिव्यु ऑव बुक्स
Buniyadi Taleem
- Author Name:
A. Arvindakshan
- Book Type:

- Description: जब हम गांधी जी द्वारा परिकल्पित तथा कार्यान्वित बुनियादी शिक्षा की बात करते हैं तो अजीब-सा अनुभव महसूस हो सकता है, क्योंकि गांधी जी की बुनियादी शिक्षा-परिकल्पना के साथ आज के शिक्षा-जगत् का कोई सम्बन्ध नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक का विचारणीय विषय यही है कि गांधी जी द्वारा परिकल्पित बुनियादी शिक्षा की मूल्यदृष्टि क्या है और आज उसे किस तरह से देखा-परखा जाना चाहिए तथा आज की नूतन शिक्षा-पद्धति के साथ इसको कैसे मिलाया जाना चाहिए। गांधी जी सचमुच एक आत्मसजग पीढ़ी भारत के लिए तैयार करना चाहते थे। इसलिए प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को केन्द्र में रखा। ऐसे में हमें यह सोचना चाहिए कि मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा, सभी तबकों के विद्यार्थियों को समान सुविधाओं वाली पाठशालाओं की परिकल्पना और उन्हें सुविधाएँ उपलब्ध कराना, शिक्षा-पद्धतियों को समान बनाना, अध्यापक-प्रशिक्षण को वैज्ञानिक बनाना, सुविधाओं से वंचित सामाजिक तबके के विद्यार्थियों को समकक्ष तक ले आने योग्य पद्धतियों व योजनाओं का अखिल भारतीय स्तर पर आविष्कार करना आदि समान दृष्टि से जब तक कार्यान्वित नहीं होगा, तब तक बुनियादी शिक्षा का यह मातृभाषा में शिक्षण का सपना अतीत का अवैज्ञानिक सपना ही सिद्ध हो सकता है। पुस्तक में बुनियादी तालीम के विभिन्न पक्षों पर सारगर्भित लेख प्रस्तुत करने का प्रयास है। इस विषय पर गम्भीर चिन्तन के लिए यह एक प्रवेशिका का कार्य करेगी, इसी आशा के साथ इसे पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया जा रहा है।
Ghar Ka Bhedi
- Author Name:
Salman Akhtar
- Book Type:

- Description: डॉक्टर सलमान अख़्तर के दादा मुज़्तर ख़ैराबादी, मामू मजाज़ लखनवी, वालिद जाँ निसार अख़्तर और भाई जावेद अख़्तर पर लिखे ये लेख साहित्यिक दुनिया में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। ‘घर का भेदी’ उर्दू शायरी की सोच-समझ और आलोचना की ऐसी पहली किताब है जिसमें लेखक ख़ुद अपने ख़ानदान के मशहूर और लोकप्रिय शोअरा के कलाम का विवेचन करता है और साथ ही उनके साहित्यिक ख़ज़ाने की तुलना तत्कालीन सम्माननीय शोअरा के साहित्य से भी करता है। बात की गहराई और बढ़ जाती है जब हमको ये पता चलता है कि इस किताब का लेखक न सिर्फ़ ख़ुद एक विश्वसनीय शायर और साहित्यकार है बल्कि अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त एक मनोवैज्ञानिक भी है। नतीजे के तौर पर ‘घर का भेदी’ किताब हमें कला के प्रतीकों और बिंबों से भी परिचित कराती है और उसमें निहित व्यक्तिगत पीड़ा और द्वंद्व से भी।
Mere Yuvjan Mere Parijan
- Author Name:
Ramesh Gajanan Muktibodh
- Book Type:

- Description: मुक्तिबोधजी अपनी रचनाओं के प्रति कुछ लापरवाह ज़रूर रहे हों किन्तु इसके विपरीत वे लेखक-मित्रों से प्राप्त पत्रों को सहेजकर सुरक्षित रखने में काफ़ी सचेत थे। संग्रह के इन पत्रों की अवधि 28 वर्ष के अन्तराल में फैली हुई है। संग्रह का पहला पत्र 11.3.1936 को प्रभागचन्द्र शर्माजी ने तथा अन्तिम पत्र विनोद कुमार शुक्लजी ने 7.4.1964 को लिखा है। 43 लेखकों के कुल 306 पत्र संग्रहीत हैं। पुस्तक की पांडुलिपि तैयार करते समय नेमिजी के पत्रों की खोज करने पर संयोगवश वे प्राप्त हो गए। अन्यथा उनके पत्रों के बिना यह पुस्तक अपूर्ण-सी रहती। परिशिष्ट में मुक्तिबोधजी के सहपाठी अन्य मित्रों के 15 पत्र हैं। इनकी एक ऐतिहासिकता है। पुस्तक में मात्र 6 पत्र मराठी में लिखे हैं। इनमें एक पत्र प्रभाकर माचवेजी ने 27.12.1939 को पेंसिल से लिखा है जो अंग्रेज़ी से शुरू होकर मराठी में समाप्त होता है। बीच-बीच में अंग्रेज़ी-मराठी का प्रयोग खूब हुआ है। गांधीजी के आश्रम का सुन्दर चित्र खींचा है। इन पत्रों का मूल स्वर या सार संक्षेप एक-दूसरे के प्रति सौम्य आदर और अटूट स्नेह का है। आचार-विचार में मतान्तर रहते हुए भी स्नेहमय सम्बन्धों की मिठास में कोई कमी नहीं। —रमेश गजानन मुक्तिबोध पिछली शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जिस एक कवि ने मरणोत्तर मूर्धन्यता अर्जित की, वे हैं गजानन माधव मुक्तिबोध। वे एक ऐसे कवि भी रहे हैं जिनकी कविता में मित्रता का एक विराट् स्पन्दित परिसर महसूस किया जा सकता है : दरअसल उन्हें एक अनोखे अर्थ में एक बड़ा मित्र-कवि भी कहा जा सकता है। एक स्तर पर उनकी कविता मित्र-संवाद है। वह जो सुने उसको तो सम्बोधित है ही वह अपने मित्रों को भी लगातार और विशेष रूप से सम्बोधित है। हिन्दी के मुख्य अंचल के हाशिए पर रहते हुए भी मुक्तिबोध एक संवादप्रिय व्यक्ति और लेखक थे। इस अनूठे संचयन में लगभग पचास लेखकों के तीन सौ से अधिक पत्र शामिल किए गए हैं। मुक्तिबोध की 1964 में असमय और बेहद दुखद मृत्यु के 43 बरसों बाद इन पत्रों का एकत्र प्रकाश में आना एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। इस पत्र-संग्रह से उस समय की याने आज से चालीस साल पहले की हिन्दी साहित्य-संस्कृति के बारे में कुछ ऐसा पता चलता है जो इन दिनों उस संस्कृति से, हमारा दुर्भाग्य है, कि अगर एक दम गायब नहीं तो बहुत बिरला हो गया है। इन पत्रों में कई पत्रिकाओं की व्यथा और संघर्ष की अन्तरंग कथाएँ भी छिपी हुई हैं जैसे हरिशंकर परसाई द्वारा सम्पादित ‘वसुधा’ और नरेश मेहता और श्रीकान्त वर्मा द्वारा सम्पादित ‘कृति’ की। ‘आलोचना’, ‘कल्पना’, ‘हंस’ आदि की अन्तर्कथाएँ भी कुछ पता चलती हैं। कई लेखकों की कठिनाइयों, संघर्षों, समझौतों, दिग्भ्रमों, उलझनों और चतुराइयों का आभास भी यहाँ-वहाँ मिलता है। जो भी हो, यह पत्र-संग्रह मुक्तिबोध को उस समय चल रहे साहित्यिक, वैचारिक और निजी संवाद के एक महत्त्वपूर्ण, सजग और सक्रिय केन्द्र के रूप में भी अवस्थित करता है। —अशोक वाजपेयी
Bad Man
- Author Name:
Gulshan Grover +1
- Book Type:

- Description: "हमारे देश की राजधानी के बाहरी इलाके में पले-बढ़े गुलशन ग्रोवर 1970 के दशक में एक्टिंग में अपना कॅरियर बनाने के लिए बंबई चले आए। ऐसे समय में जब एक्टर बनने की ख्वाहिश रखनेवाले अधिकांश लोग हीरो बनना चाहते थे, तब उन्होंने अपनी पसंद से खलनायक की भूमिकाओं को चुना। उन्होंने एक के बाद एक कई यादगार किरदार निभाए जिनमें से 1989 की सुपरहिट फिल्म, ‘राम-लखन’ में उनकी भूमिका कॅरियर के लिए निर्णायक साबित हुई और बॉलीवुड के ‘बैड मैन’ के तौर पर उनकी पहचान पक्की हो गई। उस युग की कितनी ही बड़ी-बड़ी फिल्मों को उनके खास तकियाकलामों और अजीब-अजीब किस्म की पोशाकों की वजह से कामयाबी मिली जो अब बॉलीवुड के किस्से-कहानियों का हिस्सा बन चुके हैं। धीरे-धीरे उन्होंने अंतरराष्ट्रीय फिल्मों का रुख किया और वहाँ भी अपने बेहतरीन अभिनय केकारण भारत का जाना-माना चेहरा बन गए। इस आत्मकथा में, ग्रोवर अपनी कहानी बयाँ करते हैं—अपनी फिल्मों की, अपने सफर की, बैड मैन की छवि को बनाए रखने के मनोवैज्ञानिक और व्यक्तिगत नुकसान की, बॉलीवुड के खलनायकों के बीच होड़ की, ज्यादा विविधता भरे किरदार निभाने के फैसले की, और बहुत कुछ ऐसी बातों की, जो उनकेबारे में लगभग अनजानी हैं।
Jeevan Beema : Kyun Aur Kaise?
- Author Name:
Gyansundaram Krishnamurthy
- Book Type:

- Description: हममें से हरेक ने अपने जीवन में या तो स्वतः या दूसरों के अनुभवों से अपने चहेतों की अचानक मृत्यु और सदमे की इस घबराहट का अनुभव किया है। वह हमारे मित्रों, संबंधियों और अपरिचितों में से कोई भी हो सकता है। एक खुशहाल परिवार में रोजी कमानेवाला व्यक्ति पत्नी के अच्छे जीवन, बच्चों की शिक्षा, विवाह, जीवन की शुरुआत और परिवार का यदि कोई ऋण हो तो उसके लिए एक आशा और सुनिश्चितता होती है। उसकी अनुपस्थिति में ये आशाएँ एक बड़ा प्रश्नचिह्न बन जाती हैं। जीवन बीमा एक ऐसा सशक्त माध्यम है, जो आवश्यकता के समय परिवार की आर्थिक सुरक्षा की गारंटी प्रदान करता है। इस पुस्तक का एकमात्र उद्देश्य जीवन बीमा को इसके बीमांकन या वित्तीय रूप में देखना नहीं है, बल्कि इसके कानूनी पहलुओं को सामने लाना है, ताकि यह लाखों पॉलिसीधारकों को उनकी आवश्यकता के समय बिना किसी परेशानी के इसके लाभ को प्राप्त करने और जिस उद्देश्य के साथ बीमा लिया गया है, उसको पूरा करने की सुनिश्चितता के लिए एक पथ-प्रदर्शक के रूप में सेवा प्रदान करे। बीमा संबंधी समस्त जानकारी से परिपूर्ण एक उपयोगी पुस्तक। अंतिम आवरण पृष्ठ जीवन बीमा एक आवश्यकता है, जो कि जरूरत है समय वित्तीय सुरक्षा की सुनिश्चितता प्रदान करती है; परंतु यदि इसके नियम व शर्तों को नहीं समझा जाता या उनका पालन नहीं होता है तो यह भले के बजाय बुरा अधिक कर सकती है। लेखक ज्ञानसुंदरम कृष्णमूर्ति, पूर्व अध्यक्ष, भारतीय जीवन बीमा निगम ने जीवन बीमा और इसके दावों से जुड़े कानूनी पहलुओं का मुकदमों के अध्ययन द्वारा सोदाहरण विवेचना की है। पुस्तक पथ-प्रदर्शक के रूप में— पॉलिसीधारकों के लिए • पॉलिसी खरीदने के पहले और बाद में उनके अधिकारों और दायित्व की विवेचना हेतु। • दावों के अमान्य होने पर शिकायत सुधार प्रक्रिया के अनुसरण हेतु। बीमाकर्ताओं के लिए • बीमा की जानकारी एवं इसके कानूनी पहलुओं की आधुनिकता की समझ हेतु। • मुआवजे और बिक्री के लिए अपने ग्राहकों को बेहतर मार्गदर्शन का प्रस्ताव देने के लिए। • पॉलिसी लेने से पूर्व अपने ग्राहकों को विवेचित करना कि उन्हें ‘क्या’ जानना जरूरी है।
Chunautiyon Ko Avasaron Mein Badalata Bharat
- Author Name:
Ramesh Pokhriyal 'Nishank'
- Book Type:

- Description: नई शिक्षा नीति से विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों व शैक्षिक नेतृत्व की सोच में व्यापक बदलाव होगा। समकालीन विषय, जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजाइन थिंकिंग, होलिस्टिक हेल्थ, ऑर्गेनिक लिविंग, इनवायरनमेंटल एजुकेशन, ग्लोबल सिटिजनशिप एजुकेशन आदि शामिल करने से शिक्षा के स्तर में काफी बढ़ोतरी होगी। नई शिक्षा नीति में हमारा पूरा ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि हमारी बालिकाएँ कहीं भी पीछे नहीं रहें। केवल भारत ही एक ऐसा देश है, जहाँ पर अल्पसंख्यकों के साथ कोई दुर्व्यवहार नहीं हुआ। जहाँ एक ओर हमने हमेशा विदेशी भूमि से लोगों का स्वागत किया है और उन्हें गले लगाया है, उनके मूल्यों और परंपराओं को समाहित करती हमारी संस्कृति अत्यंत विविधताओं को समेटे हुए एक खूबसूरत जीवंतता के दर्शन कराती है। आज पूरा विश्व भारत की ओर देख रहा है, क्योंकि विषम परिस्थितियों में भी अद्भुत जिजीविषा का परिचय देकर भारतीयों ने हर क्षेत्र—शिक्षा, उद्योग, विज्ञान, पर्यावरण, अनुसंधान में मुँह बाए खड़ी चुनौतियों को अवसर में बदलकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध की है। प्रस्तुत पुस्तक भारतीय कर्मशीलता और कर्तव्यबोध का दिग्दर्शन कराती सकारात्मकता जाग्रत् करनेवाली कृति है।
Namvar Sanchayita
- Author Name:
Namvar Singh
- Book Type:

- Description: यह है हिन्दी के ख्यातिप्राप्त आलोचक डॉ. नामवर सिंह के आलोचनात्मक लेखन का उत्तमांश। नामवर जी हिन्दी में मार्क्सवादी आलोचक के रूप में स्वीकृत हैं, लेकिन मूलत: वे एक लोकवादी आलोचक हैं। जिस ‘लोक’ को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने काव्य के प्रतिमान के रूप में व्यवहृत किया था और जिसे आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने क्रान्तिकारी अर्थ प्रदान किया, उसे वे मार्क्सवाद की सहायता से ‘वर्ग’ तक ले गए हैं। लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी विशेषता है कि उन्होंने मार्क्सवाद को विदेशी, संकीर्ण और रूढ़िबद्ध विचार प्रणाली के रूप में ग्रहण नहीं किया है। सच्चाई तो यह है कि साहित्य के नए मूल्य के लिए उन्होंने प्रत्येक मोड़ पर लोक की तरफ़ देखा है। अकारण नहीं कि हिन्दी में वे साहित्य की दूसरी परम्परा के अन्वेषक हैं, जो उस लोक की परम्परा है, जो असंगतियों और अन्तर्विरोधों का पुंज होते हुए भी विद्रोह की भावना से युक्त होता है। नामवर जी की आलोचना हिन्दी में ग़ैर-अकादमिक आलोचना का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। ‘कहानी : नई कहानी’ में उन्होंने व्यक्तिगत निबन्ध की शैली में आलोचना लिखी, जिसमें बात से बात निकलती चलती है और अत्यन्त सार्थक। ‘कविता के नए प्रतिमान’ उनके विलक्षण परम्परा–बोध, गहन विश्लेषण और पारदर्शी अभिव्यक्ति का स्मारक है। इसी तरह ‘दूसरी परम्परा की खोज’ में उन्होंने ऐसी आलोचना प्रस्तुत की है, जो एक तरफ़ अतिशय ज्ञानात्मक है और दूसरी तरफ़ अतिशय संवेदनात्मक। यह सर्जनात्मकता आचार्य द्विवेदी के साहित्य से उनके निजी लगाव के कारण सम्भव हुआ है। नामवर जी की पचहत्तरवीं वर्षगाँठ पर प्रकाशित यह संचयिता महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय की ओर से हिन्दी जगत् को दिया गया एक उपहार है, जो उसे पिछली शती के उत्तरार्ध के सर्वश्रेष्ठ हिन्दी आलोचक के अवदान से परिचित कराएगा।
Gorakhnath : Jeevan Aur Darshan
- Author Name:
Kanhaiya Singh
- Book Type:

-
Description:
महायोगी गोरखनाथ नौवीं-दसवीं शताब्दी में अवतरित हुए। उन्होंने पतंजलि के योगसूत्रों के आधार पर अपनी योग-साधना का प्रतिपादन किया तथा स्वयं उसकी साधना से सिद्धि प्राप्त की थी। बुद्ध के बाद गोरखनाथ ही भारत में सच्चे लोकनायक हुए। उनका प्रभाव राजमहल से झोपड़ियों तक पड़ा था। अछूत और अन्त्यज के लिए उन्होंने अपने पंथ का द्वार खोल दिया था। कई महत्त्वपूर्ण योगी ऐसी ही जातियों से निकले और बहुत से अन्य धर्मावलम्बी भी योगमार्ग पर अग्रसर हुए। इस प्रकार उन्होंने जाति, पन्थ और सम्प्रदाय की रूढ़ियों को तोड़कर सामाजिक समरसता का मार्ग प्रशस्त किया। साथ ही ब्रह्मचर्य, वैराग्य और साधना द्वारा योगमार्ग को प्रशस्त किया।
उनका प्रभाव, उनके समय से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक के समाज और साहित्य पर सम्पूर्ण भारत में पड़ा। उनके क्रियात्मक योग की प्रक्रिया और शब्दावली आदि का सभी भाषाओं के सन्त कवियों और सूफ़ी कवियों ने प्रयोग किया है। गोरखनाथ के योग का जादू को आज सारा विश्व स्वीकर कर रहा है। योग शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह योग आज के विश्व-मानव समाज के लिए महायोगी गोरखनाथ की अमूल्य देन है।
Will For Children
- Author Name:
Kailash Satyarthi
- Book Type:

- Description: Before I began working for children's rights, I constantly found myself struggling with a ‘why’. Why are some children born to work at the cost of their freedom and childhood? Why do the economic conditions of parents determine a child’s education and future? Why are we employing children of the poor to make clothes and toys for children of the better-off? My articles published in the 1980s helped raise critical questions on child labour, trafficking of children, sexual exploitation, the lack of education, and more. This compilation of articles has contributed towards laying The theoretical foundation catalysed a mass movement for children's rights. Over the past 36 years, this movement has led to the establishment of institutions of governance, national and transnational policies for the protection of children, and the mainstreaming of child rights on the global development agenda. As you have picked up this book, I sincerely hope you will exercise your right to ask questions and your willingness to help the children of the world. —Kailash Satyarthi “Once, a fire broke out in the forest. All the birds and beasts, including the lion, the King of the Jungle, started running for their lives. In the midst of the chaos, the lion caught sight of a hummingbird flying towards the fire. Shocked, the lion asked, “What are you trying to do?” The hummingbird, indicating its beak, said, “I am carrying a drop of water to extinguish the fire.” The lion was amused. It said, "How can you douse a fire with just a drop? But the hummingbird was unshaken. It said: “I am doing my bit.” During my Nobel acceptance speech, when I lost some papers, I was reminded of a story I then recounted to the audience. Join me in my movement for children and do your bit, like the little, brave hummingbird. —Kailash Satyarthi
Jahan Auratein Gadhi Jati Hain
- Author Name:
Mrinal Pande
- Book Type:

- Description: हिन्दी की वरिष्ठ कथाकार और पत्रकार मृणाल पाण्डे अपने लेखन में समय तथा समाज के गम्भीर मसलों को लगातार उठाती रही हैं। भारतीय स्त्रियों के संघर्ष और जिजीविषा को भी वे इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखती–परखती रही हैं। यही कारण है कि स्त्री–प्रश्न के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के बावजूद, उनका लेखन स्त्री–विमर्श के संकीर्ण दायरे में सिमटा हुआ नहीं है। वे ‘अन्दर के पानियों का सपना’ देखती हैं, तो ‘नारीवादी आन्दोलन की विडम्बना’ को भी उजागर करती हैं। इस पुस्तक में समय–समय पर लिखी गई उनकी टिप्पणियाँ और आलेख संकलित हैं। लेखिका ने राजनीति में ‘महिला सशक्तिकरण’ और ‘पंचायती राज में महिला भागीदारी’ जैसे बड़े सवालों के साथ–साथ कई छोटे–छोटे मसलों और प्रश्नों को भी उठाया है, जिनसे गुज़रते हुए एक ऐसा ‘हॉरर शो’ पाठकों के सामने उपस्थित होता है, जिसमें पुरुषवादी समाज की नृशंसता में फँसी स्त्री की छटपटाहटों के कई रूप दिखलाई देते हैं। इसमें सिर्फ़ पराजय ही नहीं, प्रतिकार की छटपटाहट भी है। करुणा के भीतर की बेचैनी को रेखांकित करना मृणाल पाण्डे के लेखन की ख़ास विशेषता है। एक पत्रकार के नाते वे हर छोटे–बड़े सवाल को शिद्दत के साथ उठाती हैं, लेकिन, अपने पात्रों को जड़ पदार्थ मानकर छोटा नहीं बनातीं, बल्कि एक लेखिका के नाते संवेदना के स्तर पर उनसे जुड़ जाती हैं—यही चीज़ मृणाल पाण्डे के लेखन को सबसे अलग और विशिष्ट बनाती है।
Ghulami Ke 12 Saal
- Author Name:
Solomon Northup
- Book Type:

- Description: ऐसे भी बहुत से मालिक हैं, जिनमें इंसानियत है और निश्चित रूप से इसकी उलट प्रवृत्ति वाले मालिक हैं ही। ऐसे ग़ुलाम हो सकते हैं, जिनके तन पर कपड़ा हो, पेट में भरपेट भोजन हो और वे ख़ुश भी हों लेकिन यह भी पक्की बात है कि ऐसे भी फटे-हाल दास हैं, जिनके तन पर सिर्फ़ लंगोट है और पेट में सिर्फ़ भूख! मैं इस बात का गवाह हूँ कि वह व्यवस्था क्रूर, अत्याचारी और बर्बर है, जो इस प्रकार की अमानवीयता और विषमता को बरदाश्त करती है। लोग ग़रीब-ग़ुरबों के जीवन पर लंबी-लंबी झूठी और सच्ची कथाएँ बाँच सकते हैं और अज्ञानता के आनंद पर चतुराई से डींगे हाँक सकते हैं, चक्के वाली कुर्सी पर बैठकर ग़ुलामों के जीवन के आनंद पर बड़ी बेशर्मी से भाषण दे सकते हैं। लेकिन वे दूसरी कहानियाँ वापस लेकर आएंगे, जब उन्हें ग़ुलामों के साथ खेत में भेज दो, केबिन में उनके साथ सोने को कहो, भूसे पर बैठकर उनके साथ खाना खाने को कहो और ग़ुलामों के साथ कोड़े की मार और लात सहने को कहो। उन्हें बेचारे ग़ुलामों के दिल को जानने दो, उनके सीने में छिपे विचारों को जानने दो, वे विचार जो इस डर से नहीं व्यक्त किए जाते हैं कि कहीं गोरा सुन न ले। रात की ख़ामोश रातों में उनके साथ, उनके पास बैठ कर तो देखो, उनके साथ जीवन, आज़ादी, ख़ुशी आदि के बारे में भरोसेमंद माहौल में उनसे बात करके तो देखो, आप पाएँगे, हर सौ में से निन्यान्नवे में अपनी परिस्थिति को समझने की भरपूर समझदारी है। वह भी आपकी ही तरह अपने सीने में स्वतंत्रता से प्रेम के जुनून को वर्षों से बिल्कुल आपकी ही तरह संभाल के रखा हुआ है। --
Premchand (Radha)
- Author Name:
Satyendra
- Book Type:

- Description: उपन्यास सम्राट कहे जानेवाले प्रेमचन्द हमारी भाषा के कालजयी रचनाकार हैं और इनकी रचनाओं को क्लासिक का दर्जा प्राप्त है। जीवन में जनवादी, साहित्य में यथार्थवादी प्रेमचन्द ने जीवन को जैसा देखा वैसा ही उसे चित्रित किया। उन्होंने उपन्यासों के अतिरिक्त कहानियाँ, नाटक और लेख भी लिखे। उनकी रचनाओं में एक व्यावहारिक ढंग का समाजवाद हमें दिखाई पड़ता है। भारतीय पुनर्जागरण के महान लेखकों में वे ही ऐसे हैं, जो अपने सामाजिक निष्कर्षों में क्रान्तिकारी या वैज्ञानिक समाजवाद के सबसे समीप हैं। यह पुस्तक एक विशेष दृष्टि से तैयार की गई है। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रेमचन्द की रचनाओं से सम्बन्धित गम्भीर, विचारोत्तेजक व अमूल्य सामग्रियों को इस उम्मीद के साथ एक जगह सुलभ कराया गया है कि पाठकों, अध्यापकों व शोधार्थियों को प्रेमचन्द के अध्ययन में विशेष सहायता मिलेगी। इसमें प्रेमचन्द के नारी-विषयक विचार, उनके पात्रों के चारित्रिक विकास, औपन्यासिक-कला के शिल्प-विधान, भाषा-शैली सम्बन्धी प्रयोगों के अध्ययन के अतिरिक्त प्रेमचन्द और तारा शंकर, प्रेमचन्द का नाट्य व कथा साहित्य तथा समस्यामूलक उपन्यास और प्रेमचन्द जैसे विषयों पर भी गम्भीरतापूर्वक विचार किया गया है। आशा है कि प्रेमचन्द अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी व विचारोत्तेजक सिद्ध होगी।
Kirtishesh : Mohan Rakesh
- Author Name:
Jaidev Taneja
- Rating:
- Book Type:

- Description: मोहन राकेश के समृद्ध और बहुआयामी व्यक्तित्व के अनेक पक्ष थे, जो शायद किसी एक मित्र के साथ पूरी तरह शेयर नहीं किये जा सकते थे। लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने जिस मित्र के साथ जो पहलू शेयर किया, वह पूरी ईमानदारी के साथ किया। फिर भी, आज इतने समय के बाद भी उनके दोस्त और दुश्मन, प्रशंसक और आलोचक, दर्शक, पाठक और इतिहासकार यही तय नहीं कर पाए कि वह व्यक्ति वास्तव में था क्या? उसके कृतित्व का मूल्य और महत्त्व क्या और कितना है? वह असीम भावुक था या चरम बौद्धिक? अत्यन्त महत्त्वाकांक्षी अवसरवादी था या तमाम उपलब्धियों के मोहपाश को पल-भर में काटकर किसी नये, अज्ञात और बड़े लक्ष्य की ओर निर्भय आगे बढ़ जानेवाला निरासक्त संन्यासी? मोहन राकेश के अन्तर्विरोधी एवं चौंकानेवाले अप्रत्याशित-अनपेक्षित कारनामों को लेकर उनके दोस्त और दुश्मन समान रूप से सच्चे-झूठे किन्तु चकित करनेवाले क़िस्से, प्रसंग, लतीफ़े, कथा-कहानियाँ, ख़बरें और अफ़वाहें रचते रहे हैं। सत्य और कल्पना तथा हक़ीक़त और फ़सानों से उपजी इस धुंध ने राकेश के जीवनकाल में ही उन्हें एक जीवित किंवदन्ती बना दिया था। ‘कीर्तिशेष : मोहन राकेश’ पुस्तक उन्हें, उनके जटिल व्यक्तित्व को एक नये सिरे से समझने का रास्ता खोलती है। यहाँ आप उनके समकालीनों, सहकर्मियों, मित्रों, सम्पादकों, प्रकाशकों, नाट्य-निर्देशकों, अभिनेताओं, फ़िल्मकारों, आलोचकों, मीडिया-कर्मियों और शिष्यों के संस्मरण पढ़ेंगे। उम्मीद है कि इनसे हम मोहन राकेश के व्यक्तित्व को कुछ बेहतर समझ सकेंगे।
Kokanratne
- Author Name:
Dr. Neelam P. Naik +1
- Book Type:

- Description: कोकण म्हणजे कर्तृत्ववान रत्नांची खाण आहे, असं म्हटलं तर ते वावगं ठरू नये. याचं कारण भारताचा सर्वोच्च सन्मान असलेला भारतरत्न हा किताब देऊन या भूमितल्या सहा व्यक्तींचा आजवर गौरव करण्यात आलेला आहे. शिवाय कर्तृत्वाचा असा उत्तुंग डोंगर उभारणाऱ्या व्यक्तींची संख्या इतर प्रदेशांच्या तुलनेत कोकणभूमीत सर्वाधिक आहे. त्या अर्थाने कोकणसारखा कर्तृत्वसुपीक प्रदेश केवळ महाराष्ट्रातच नव्हे, तर भारतात दुसरा नाही. अशा या भूमितल्या काही मोजक्या कोकणरत्नांची त्यांच्या कार्यकर्तृत्वासह ओळख करून देणारं हे पुस्तक म्हणजे भारताच्या सामाजिक, राजकीय, शैक्षणिक आणि सांस्कृतिक इतिहासाची एक झलक आहे. आचार्य बाळशास्त्री जांभेकर, प्राच्यविद्यापंडित रामकृष्ण गोपाळ भांडारकर, लोकमान्य बाळ गंगाधर टिळक, महर्षी धोंडो केशव कर्वे, रियासतकार गोविंद सखाराम सरदेसाई, नामदार गोपाळ कृष्ण गोखले, महामहोपाध्याय पांडुरंग वामन काणे, डॉ. भीमराव रामजी तथा बाबासाहेब आंबेडकर, संगीतकार वसंत देसाई आणि बॅरिस्टर नाथ पै अशा दहा कोकणरत्नांच्या प्रेरक कार्याचा वेध घेणारं हे पुस्तक प्रत्येकाने वाचावं असं आहे. भारताच्या इतिहासात घेऊन जाणारं हे पुस्तक नव्या पिढीसाठी दिशादर्शक असं आहे. त्यामुळे शाळा-महाविद्यालयातील विद्यार्थी, शिक्षक, पालक तसेच सामाजिक इतिहासाचे अभ्यासक, कोकणात जन्मलेल्या, कोकणचा अभिमान असलेल्या आणि कोकणच्या सुपुत्रांबद्दल कुतूहल असलेल्या प्रत्येकाने संग्रही ठेवावं असं हे पुस्तक आहे. कोकणरत्ने | डॉ.नीलम प्र. नाईक | डॉ.प्रमोद वा. नाईक Kokanratne | Dr. Neelam P. Naik | Dr. Pramod V. Naik
Neetidarshan : Ek Niyamak Adhyayan
- Author Name:
Shyam Kishor Seth
- Book Type:

- Description: इस पुस्तक में नीतिदर्शन के पारम्परिक नियामक अध्ययन (Normative Study) का प्रस्तुतीकरण है। पुस्तक को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम भाग नीतिदर्शन/नीतिशास्त्र की परिभाषा, स्वरूप, विषय-क्षेत्र व सुनिश्चित विषयवस्तु से सम्बन्धित है। इसी भाग में विभिन्न नैतिक सिद्धान्तों के वर्गीकरण को सुव्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है जिसके फलस्वरूप दो तरह के वर्ग सामने आते हैं : (1) परिणाम-निरपेक्षतावाद या शुद्ध कर्त्तव्यवाद (Deontological Theories) और (2) परिणाम-सापेक्षतावाद या फलवाद (Teleological Theories or Consequentialism)। पुस्तक के दूसरे भाग में परिणाम-निरपेक्षतावाद या शुद्ध कर्त्तव्यवाद के वर्ग में आने वाले विभिन्न सिद्धान्तों को विश्लेषित किया गया है जिसमें नैतिकता-निर्धारण हेतु कुछ बाह्य नियमों, यथा दैवी व सामाजिक नियमों, से सम्बन्धित तथा कुछ आन्तरिक नियमों सम्बन्धी सिद्धान्त, जैसे अन्तःप्रज्ञावाद व बुद्धिवाद शामिल हैं। पुस्तक के तीसरे भाग की विषयवस्तु परिणाम-सापेक्षतावाद या फलवाद है। इस भाग में सुखवाद व उसके विभिन्न प्रकारों, शक्ति के सिद्धान्त तथा पूर्णतावाद का विशद विश्लेषण है। पुस्तक में एक परिशिष्ट भी जोड़ा गया है जिसमें नीतिदर्शन सम्बन्धी एक अत्याधुनिक सिद्धान्त 'सद्गुण नीति' (Virtue Ethics) की संक्षिप्त चर्चा है, जो प्रथम भाग में वर्णित 'अधिनीतिशास्त्र' (Meta Ethics) के साथ मिलकर सम्भवतः इस पुस्तक की सामग्री को अधिक व्यापक बनाती है।
HASHIYE PAR HASRAT
- Author Name:
Bhim Singh Bhavesh
- Book Type:

- Description: "‘हाशिए पर हसरत’ एक ऐसे कटु यथार्थ का दस्तावेज है, जो हमारे समाज के लिए आज भी शर्म का बायस है। भारतीय समाज की संरचना में जाति-वर्ण की विभाजक रेखा इतनी प्रतिगामी और अमानवीय साबित हुई है कि एक सभ्य समाज उससे जितनी जल्द मुक्त होगा, उसका उतना ही भला होगा। यह पुस्तक उसी परिप्रेक्ष्य में भारतीय समाज की जाति-व्यवस्था में अस्पृश्य जातियों की अंतिम पंक्ति में खड़े मुसहर जाति की स्थिति से रू-ब-रू कराने की कोशिश है। भीम सिंह भवेश की यह पुस्तक वस्तुतः समाज विज्ञान में एक शोध है। यह पुस्तक मुसहरों के जीवन, उनकी जीवन-दृष्टि, आपसी संबंधों, दशा-दिशा, भविष्य और समाज की मुख्यधारा के प्रति उनकी धारणाओं का प्रामाणिक दस्तावेज है। मुसहर-टोलों के जीवन को जिस संवेदना के साथ भवेश ने उकेरा है, उसका एहसास इसे पढ़ने पर होता है। उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, मान्यताओं और जटिलताओं को लेखक ने बहुत करीब से देखा है। ग्रामीण जीवन के अमर चितेरे फणीश्वर नाथ रेणु के जन्म शताब्दी वर्ष में ‘हाशिए पर हसरत’ का प्रकाशन ‘मैला आँचल’ के लेखक को सबसे अच्छी श्रद्धांजलि भी है। भवेश ने जानकारियाँ जुटाने में मेहनत तो की ही है, उन्हें प्रस्तुत भी रोचक शैली में किया है। इसीलिए यह शुष्क शोध नहीं, बल्कि पठनीय कथ्य के माध्यम से संवेदनशील विषय के प्रति हमारे अंदर संवेदना जगाती है। यही इस पुस्तक की विशेषता है। यह पुस्तक मुसहर जाति को समझने, उनके दारुण दुःखों को महसूस करने और उन्हें उच्च मानवीय गरिमा प्रदान करने के प्रयासों को बल देगी। —अवधेश प्रीत "
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book