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Janjatiya Navjagran

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‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है। कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है। वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी किताब है।

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‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है।

कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है।

वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी किताब है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2024
Weight
450 grams
ISBN-13
9789360866532
Pages
272
Reading time
~9 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14.5 × 22 cm
Language
Hindi

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