Janjatiya Navjagran
(0)
Author:
Rahul SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
General-non-fiction₹
399
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Available
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‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है।औपनिवेशिक दबावों के विरुद्ध जनजातीय समूह कैसे संगठित होकर प्रतिरोध और परिवर्तन की इबारत लिखते हैं? कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है। वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी है।
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‘जनजातीय नवजागरण’ पुस्तक जनजातीय यानी आदिवासी सन्दर्भों के इतिहास में बिखरे पड़े तथ्यों को जुटाकर जनजातीय नवजागरण का एक नैरेटिव खड़ा करती है; बांग्ला, मराठी और हिन्दी क्षेत्रों के बहुश्रुत नवजागरणों के बरक्स जनजातीय नवजागरण की एक सैद्धान्तिकी निर्मित करती है; और प्रादेशिक नवजागरणों से जनजातीय नवजागरण को अलगाने के सूत्र प्रस्तावित करती है। इसके लिए यह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और रानी विक्टोरिया के अधीन औपनिवेशिक भारत में हुए जनजातीय सामाजिक-धार्मिक आन्दोलनों की गहरी पड़ताल करती है और उससे हासिल निष्कर्षों को साझा करती है।औपनिवेशिक दबावों के विरुद्ध जनजातीय समूह कैसे संगठित होकर प्रतिरोध और परिवर्तन की इबारत लिखते हैं? कम्पनी राज और अंग्रेजी राज के बढ़ते अमानवीय दमन के समान्तर वे कैसे अपनी रणनीति में बदलाव करते चले जाते हैं? ऐसे अनेक प्रश्नों पर विचार करते हुए यह पुस्तक उजागर करती है कि शेष भारत की तुलना में आदिवासी समुदायों के लिए अंग्रेजी राज एक गहन सभ्यतागत संकट बनकर आया था जो उनके लिए अस्तित्वगत संकट का सबब बन गया था। उनका अभूतपूर्व प्रतिरोध इसी संकट की तीव्रतर प्रतिक्रिया था। उसका आधार थी उनकी स्वाधीनता की चेतना जो उनकी सहजीवी-समावेशी जीवनदृष्टि, सदियों पुराने सामुदायिक अनुभवों और परम्पराओं से उपजी थी, न कि किसी कथित आधुनिक विचार अथवा संस्थान के सम्पर्क से। इस ऐतिहासिक परिघटना की पूरी प्रक्रिया को यह पुस्तक उसकी सामाजिकता और ऐतिहासिकता के साथ दर्ज करती है। अंग्रेजी राज ने आदिवासी समुदायों की पूरी विरासत को जिस व्यवस्थित तरीके से ध्वस्त किया उसकी एक बानगी झारखंड के सन्दर्भ में इस पुस्तक में देखी जा सकती है। तथ्यों को विमर्शों के ताने-बाने में यह पुस्तक बहुत सावधानीपूर्वक पिरोती है।
वस्तुतः यह एक विचारोत्तेजक किताब है, जो इतिहास की प्रचलित समझदारी को चुनौती देते हुए विमर्श की एक नई जमीन विकसित करती है। यह अकादमिक और गैर-अकादमिक दोनों समूहों के लिए जरूरी है।
Book Details
-
ISBN9789360866532
-
Pages272
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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काला पानी की भयंकरता का अनुमान इसी एक बात से लगाया जा सकता है कि इसका नाम सुनते ही आदमी सिहर उठता है। काला पानी की विभीषिका, यातना एवं त्रासदी किसी नरक से कम नहीं थी। विनायक दामोदर सावरकर चूँकि वहाँ आजीवन कारावास भोग रहे थे, अतः उनके द्वारा लिखित यह उपन्यास आँखों-देखे वर्णन का-सा पठन-सुख देता है। इस उपन्यास में मुख्य रूप से उन राजबंदियों के जीवन का वर्णन है, जो ब्रिटिश राज में अंडमान अथवा ‘काला पानी’ में सश्रम कारावास का भयानक दंड भुगत रहे थे। काला पानी के कैदियों पर कैसे-कैसे नृशंस अत्याचार एवं क्रूरतापूर्ण व्यवहार किए जाते थे, उनका तथ वहाँ की नारकीय स्थितियों का इसमें त्रासद वर्णन है। इसमें हत्यारों, लुटेरों, डाकुओं तथा क्रूर, स्वार्थी, व्यसनाधीन अपराधियों का जीवन-चित्र भी उकेरा गया है। उपन्यास में काला पानी के ऐसे-ऐसे सत्यों एवं तथ्यों का उद्घाटन हुआ है, जिन्हें पढ़कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
Parakram
- Author Name:
Dinesh Kandpal
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"तोलोलिंग की चोटी पर बीस दिन से भारतीय जवान शहीद हो रहे थे। आखिरी हमले की रात वे दुश्मन के बंकर के बेहद करीब पहुँच गए, लेकिन तभी गोलियों की बौछार हो गई। वे घायल थे, लेकिन वापसी उन्हें मंजूर नहीं थी। शरीर से बहते खून की परवाह किए बिना उन्होंने एक ग्रेनेड दागा और कारगिल में भारत को पहली जीत मिल गई। उसके सामने 100 चीनी सिपाही खड़े थे; गिनती की गोलियाँ बची थीं, लेकिन मातृभूमि का कर्ज चुकाते वक्त उसके हाथ नहीं काँपे और उसने युद्ध के मैदान को दुश्मन सिपाहियों का कब्रिस्तान बना दिया। ये भारतीय सेना की वे युद्ध गाथाएँ हैं, जो आप शायद आज तक नहीं जान पाए होंगे। रणभूमि में कान के पास से निकलती गोलियाँ जो सरसराहट पैदा करती हैं, वही कहानी इस किताब में है। बडगाम में मेजर सोमनाथ शर्मा की कंपनी ने कैसे श्रीनगर को बचाया और सियाचिन में पाकिस्तान के किले को किसने ढहाया, इस पराक्रम के हर पल का ब्योरा यह किताब देती है। सन् 1947 से लेकर करगिल तक भारतीय सैनिकों की वीरता की ये वे सच्ची कहानियाँ हैं, जो बताती हैं कि विपरीत हालात के बावजूद कैसे अपने प्राणों की परवाह किए बिना हमारे सैनिकों ने अदम्य साहस और शौर्य दिखाया। यह उस पराक्रम की झलक है, जो युद्धभूमि में दिखा और आज इस पुस्तक के जरिए आप तक पहुँच रहा है। भारतीय जाँबाजों के शौर्य, साहस, निडरता और राष्ट्रप्रेम का जीवंत प्रमाण है यह कृति ‘पराक्रम’, जो पाठकों को न केवल प्रेरित करेगी, वरन् भारतीय सैनिकों के समर्पण के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक कर देगी।"
Upyogi Vastuon Ke Aavishkar
- Author Name:
Laxman Prasad +1
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कल्पना कीजिए कि हमारे पास साबुन न होता, शौचालय का फ्लश न होता, कपड़े न होते, बिजली न होती, थर्मामीटर न होता तो हमें कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता । हम अपने दैनिक जीवन में अनेक छोटी-बड़ी चीजों का उपयोग करते हैं । देखने में इन अत्यंत साधारण वस्तुओं के पीछे अनेक आविष्कारकों का परिश्रम छिपा है, जिन्होंने पिछले सैकड़ों-हजारों वर्षों में इन्हें तैयार किया और हमारे उपयोग लायक बनाया । आविष्कारों की यह प्रक्रिया हजारों वर्षों से चल रही है और भविष्य में भी चलती ही रहेगी ।प्रस्तुत पुस्तक के लेखन के दौरान लेखक द्वय ने अनेक पुस्तकों व प्रामाणिक स्रोतों से सामग्री जुटाई है और तथ्यों को हू-ब-हू प्रस्तुत किया है । इसमें विश्व के महान् युग- प्रवर्तक आविष्कारकों के जीवन-पहलुओं को तो उजागर किया ही गया है, साथ ही उनके आविष्कार की प्रक्रिया को भी सरल और सुबोध भाषा में वर्णित किया गया है । हमें विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों को पसंद आएगी और उनके बुद्धि-विकास तथा ज्ञान-कोष को बढ़ाने में उपयोगी सिद्ध होगी ।
Prabhat Khabar : Prayog Ki Kahani
- Author Name:
Anuj Kumar Sinha
- Book Type:

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इस पुस्तक के जरिए यह बताने का प्रयास किया गया है कि दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। अगर टीमवर्क हो, वर्क कल्चर हो, विजन हो, बेहतर लीडरशिप हो और लोगों में काम करने का जज्बा हो तो मृतप्राय संस्था को भी पुनर्जीवित किया जा सकता है, उसे एक बेहतरीन संस्था बनाया जा सकता है। ‘प्रभातखबर’अखबार की 30 वर्षों की यात्रा के संदर्भ में लिखी इस पुस्तक में इसी बात का उल्लेख है कि वे कौन से कारण हैं, जिनके बल पर एक समय बंद होता प्रभात खबर (स्थानीय/क्षेत्रीय अखबार) देश के शीर्ष हिंदी अखबारों में शामिल हो गया। पुस्तक में इस बात का जिक्र है कि कैसे एक संस्था को खड़ा किया जा सकता है। इसके लिए प्रभात खबर में क्या-क्या प्रयोग किए गए। चाहे वह संपादकीय प्रयोग हो या गैर-संपादकीय प्रयोग। प्रभात खबर की यात्रा में साधन के अभाव में अनेक मौके आए, जब लगा कि अखबार आज बंद हो गया कल, लेकिन ये सभी आशंकाएँ गलत निकलीं। पूरी किताब में उदाहरणों के बल पर यह बताने का प्रयास किया गया है कि एक स्थानीय और क्षेत्रीय अखबार भी अपने कंटेंट और अनूठे प्रयोग केबल पर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हो सकता है।
Ped-Paudhon Ki Ashcharyajanak Baaten
- Author Name:
Kumar Manish
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"प्रस्तुत पुस्तक में संसार के ऐसे ही विचित्र पेड़-पौधों के बारे में रोचक एवं ज्ञान-वर्धक जानकारी संकलित की गई है। रोचकता इसका प्राण है और ज्ञान-वर्धक इसका गुण। पुस्तक में पेड़-पौधों की आश्चर्यजनक बातों के साथ-साथ उनके जन्म-स्थान, मानव जीवन में उनके महत्त्व तथा यथासंभव उनके उपलब्ध चित्र दिए गए हैं। आशा है यह रोचक एवं ज्ञान-वर्धक रचना सभी वर्ग के पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी। "
Ekta-Akhandata Ki Kahaniyan
- Author Name:
Acharya Mayaram 'Patang'
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"‘एकता-अखंडता’ की कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं। टी.वी. चैनलों के हास्य और मनोरंजन के कार्यक्रम, जो कुछ जनता के समक्ष परोस रहे हैं, उसके परिणामस्वरूप समाज का युवा वर्ग दिशाहीन होता जा रहा है। चोरी, डकैती और छेड़छाड़ की घटनाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं। एक-दो नहीं, अनेक रेप कांड सभ्य नागरिकों, देशभक्तों के लिए घोर चिंता का विषय हैं। आम लोग न समाचार सुनते हैं, न सत्साहित्य पढ़ते हैं। प्रायः घरों में सीरियल ही देखते हैं। चरित्र-निर्माण तथा राष्ट्रभक्ति सिखाने की कोई व्यवस्था दिखाई नहीं देती। छोटी-छोटी बातों पर युवक गोली चला देते हैं। चाकूबाजी की घटनाएँ तो सामान्य हैं। राजनीति के खिलाड़ी सामान्य घटनाओं को राजनीतिक रंग देकर सांप्रदायिक झगड़े खड़े कर देते हैं। कोई जातीय रंग देते हैं, उच्च वर्ग और दलित वर्ग का संघर्ष खड़ा कर देते हैं, कारण वही है कि राष्ट्रीयता की भावना का पोषण करनेवाला साहित्य भी सीमित ही उपलब्ध है। हर समुदाय अपने जातीय हित के लिए आंदोलन के लिए तैयार है। कहीं जाट अपनी जाति को आरक्षण दिलवाने के लिए कटिबद्ध हैं तो कहीं पटेल विद्रोह पर उतर आए हैं। उनके सामने न सरकार और न्यायालय की विवशता है, न राष्ट्र की साख का प्रश्न है। युवाओं को देश की एकता-अखंडता की प्रेरणा देने का यह एक प्रयास है। आशा है, युवा वर्ग इन नई-पुरानी कहानियों से कुछ सीखेगा। "
1000 Bharat Gyan Prashanottari
- Author Name:
Sanjay Kumar Dwivedi
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"1000 भारत ज्ञान प्रश्नोत्तरी—संजय कुमार द्विवेदी किसी भी विषय की बढ़िया-से-बढ़िया पठन-सामग्री को उसके विस्तृत कलेवर के साथ पढ़ना और उसे याद करना कठिन होता है, परंतु यदि उसी सामग्री को प्रश्नोत्तर रूप में प्रस्तुत किया जाए तो वह अत्यंत रुचिकर हो जाती है और उसे सहजता से याद भी किया जा सकता है। भारत जैसे विशाल एवं विविधतापूर्ण देश को 1000 प्रश्नों में समेट पाना निश्चय ही जोखिम भरा काम है। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों का अपना एक दायरा होता है। इस स्थिति का आकलन करते हुए इस पुस्तक में प्रश्नों का चयन एवं प्रस्तुतीकरण इस तरह किया गया है कि पाठकों के समक्ष अधिक-से-अधिक जानकारी पहुँचाई जा सके। पुस्तक में शामिल किए गए अधिकतर प्रश्न ऐसे हैं, जिनमें कई उप-प्रश्न और उनके उत्तर छिपे हुए हैं। प्रस्तुत पुस्तक को यथासंभव ज्ञानवर्धक एवं रोचक बनाने की कोशिश की गई है। प्रश्नों का चयन करते समय प्रत्येक विषय के हर पहलू को छूने की कोशिश की गई है। पुस्तक संतुलित हो, इसका भी हर संभव प्रयास किया गया है। आशा है, भारत को भलीभाँति समझने में पुस्तक पाठकों की भरपूर मदद तो करेगी ही, भरपूर ज्ञानवर्द्धन भी करेगी। "
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