Khandit Bharat
About the book
"आधुनिक भारत के मनीषी, तत्त्वज्ञानियों और चिंतकों में देशरत्न राजेंद्र प्रसाद का प्रथम स्थान है। परदु:खकातरता, त्याग और सेवा- भाव उनके स्वाभाविक गुण थे। भारत की एकता और अखंडता बनाए रखना उनके लिए अत्यंत महत्त्व की बात थी। सन् 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुसलिम लीग ने जब देश के विभाजन का प्रस्ताव पारित किया तो यह गंभीर चिंता और चर्चा का विषय बन गया। अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने इस पर अपने विचार एवं योजनाएँ प्रस्तुत कीं तथा अपने-अपने ढंग से इस समस्या के समाधान सुझाए। 1945 में इसी बात को ध्यान में रखकर राजेंद्र बाबू ने अंग्रेजी में पुस्तक लिखी-' इंडिया डिवाइडेड'; खंडित भारत उसी का हिंदी अनुवाद है। पाकिस्तान की माँग से संबद्ध उस समय तक प्रकाशित प्राय: संपूर्ण साहित्य के विस्तृत अध्ययन के बाद लिखी गई इस पुस्तक की मुख्य विशेषता है कि इसमें लेखक के विचार पाठकों पर आरोपित नहीं किए गए। तथ्यों, आँकड़ों, तालिकाओं, नक्शों और ग्राफों की सहायता से भारतीय प्रायदीप के विभाजन से संबंधित संपूर्ण सामग्री उपस्थित कर देश के बँटवारे के पक्ष-विपक्ष में इस प्रकार तर्क प्रस्तुत किए गए हैं कि पाकिस्तान की व्यवहार्यता अथवा अव्यवहार्यता के विषय में पाठक स्वयं अपनी राय बना सकें। विभाजन के समर्थकों एवं विरोधियों-दोनों के लिए ' खंडित भारत' एक आदर्श ग्रंथ माना गया। यद्यपि देश को विभाजित हुए साठ वर्ष से ऊपर बीत चुके हैं, इतिहासकारों की दृष्टि में आज भी यह पुस्तक महत्वपूर्ण है और प्रत्येक भारतीय के लिए पठनीय है।
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"आधुनिक भारत के मनीषी, तत्त्वज्ञानियों और चिंतकों में देशरत्न राजेंद्र प्रसाद का प्रथम स्थान है। परदु:खकातरता, त्याग और सेवा- भाव उनके स्वाभाविक गुण थे। भारत की एकता और अखंडता बनाए रखना उनके लिए अत्यंत महत्त्व की बात थी।
सन् 1940 के लाहौर अधिवेशन में मुसलिम लीग ने जब देश के विभाजन का प्रस्ताव पारित किया तो यह गंभीर चिंता और चर्चा का विषय बन गया। अनेक प्रमुख व्यक्तियों ने इस पर अपने विचार एवं योजनाएँ प्रस्तुत कीं तथा अपने-अपने ढंग से इस समस्या के समाधान सुझाए। 1945 में इसी बात को ध्यान में रखकर राजेंद्र बाबू ने अंग्रेजी में पुस्तक लिखी-' इंडिया डिवाइडेड'; खंडित भारत उसी का हिंदी अनुवाद है।
पाकिस्तान की माँग से संबद्ध उस समय तक प्रकाशित प्राय: संपूर्ण साहित्य के विस्तृत अध्ययन के बाद लिखी गई इस पुस्तक की मुख्य विशेषता है कि इसमें लेखक के विचार पाठकों पर आरोपित नहीं किए गए। तथ्यों, आँकड़ों, तालिकाओं, नक्शों और ग्राफों की सहायता से भारतीय प्रायदीप के विभाजन से संबंधित संपूर्ण सामग्री उपस्थित कर देश के बँटवारे के पक्ष-विपक्ष में इस प्रकार तर्क प्रस्तुत किए गए हैं कि पाकिस्तान की व्यवहार्यता अथवा अव्यवहार्यता के विषय में पाठक स्वयं अपनी राय बना सकें। विभाजन के समर्थकों एवं विरोधियों-दोनों के लिए ' खंडित भारत' एक आदर्श ग्रंथ माना गया।
यद्यपि देश को विभाजित हुए साठ वर्ष से ऊपर बीत चुके हैं, इतिहासकारों की दृष्टि में आज भी यह पुस्तक महत्वपूर्ण है और प्रत्येक भारतीय के लिए पठनीय है।
Book details
- Format
- Hardbound
- Publisher
- Prabhat Prakashan
- Weight
- 400 grams
- ISBN-13
- 9788173156793
- Pages
- 498
- Reading time
- ~17 hrs
- Age
- 18+
- Country of origin
- India
- Dimensions
- 14 × 21.5 cm
- Language
- Hindi
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Khandit Bharat is Rajendra Prasad's 1945 response to the gravest constitutional crisis facing pre-independence India: the Muslim League's demand for partition after the 1940 Lahore Resolution. Unlike reactive political commentary, this work is rooted in Prasad's philosophical conviction that India's civilizational unity transcends communal divides. Written before the Partition became inevitable, the book examines alternative constitutional frameworks proposed by leaders across the spectrum—federalism, consociationalism, minority safeguards—and interrogates each through the lens of historical continuity and ethical governance. Prasad, later India's first President, brings the rigor of a legal mind and the compassion of a Gandhian to this analysis. The book does not shy from hard questions: What is the nature of political community in a religiously diverse society? Can constitutional engineering prevent communal violence? For readers seeking to understand why Partition remains India's deepest historical wound, Khandit Bharat offers the intellectual lineage of resistance to it—grounded not in denial, but in a constitutional imagination of shared sovereignty.
Khandit Bharat पुस्तक पढ़ने का अनुभव कैसा होगा?
यह पुस्तक भावनात्मक नहीं, बल्कि बौद्धिक रूप से गहन अनुभव देती है। राजेंद्र प्रसाद का लेखन शांत, तर्कसंगत और दार्शनिक है—वे विभाजन की माँग का विश्लेषण संवैधानिक, ऐतिहासिक और नैतिक दृष्टि से करते हैं। पाठक को धैर्यपूर्वक तर्कों का अनुसरण करना होगा, लेकिन प्रत्येक पृष्ठ भारत की एकता के प्रति उनकी अटूट आस्था को प्रतिबिंबित करता है।
Khandit Bharat पुस्तक किन पाठकों के लिए सबसे उपयुक्त है?
- भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन और विभाजन के इतिहास में गहरी रुचि रखने वाले पाठकों के लिए
- राजनीतिक दर्शन, संवैधानिक सिद्धांत और सांप्रदायिक प्रश्नों पर गांधीवादी दृष्टिकोण समझने के इच्छुक विद्यार्थियों के लिए
- 1940 के दशक में भारत के समक्ष उपस्थित संवैधानिक विकल्पों को जानने वाले शोधार्थियों और इतिहासकारों के लिए
Khandit Bharat पुस्तक के विषय का आज के भारतीय पाठकों के लिए सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रूप से क्या महत्व है?
विभाजन आज भी भारत की सामूहिक स्मृति में सबसे गहरा आघात है। यह पुस्तक उस क्षण को पुनर्जीवित करती है जब विभाजन अपरिहार्य नहीं था—जब नेता वैकल्पिक संवैधानिक मार्गों पर विचार कर रहे थे। सांप्रदायिक तनाव, अल्पसंख्यक अधिकार और राष्ट्रीय एकता के प्रश्न आज भी प्रासंगिक हैं। राजेंद्र प्रसाद की दृष्टि समकालीन भारत के लिए एक नैतिक और बौद्धिक संदर्भ प्रदान करती है।
Khandit Bharat विषय पर राजेंद्र प्रसाद का दृष्टिकोण क्या विशिष्ट बनाता है?
राजेंद्र प्रसाद केवल राजनेता नहीं, संवैधानिक विचारक और गांधीवादी दार्शनिक थे। वे विभाजन की माँग को भावनात्मक प्रतिक्रिया से नहीं, बल्कि कानूनी तर्क, ऐतिहासिक साक्ष्य और नैतिक दर्शन से संबोधित करते हैं। उनका लेखन अन्य नेताओं की योजनाओं का विश्लेषण करता है और भारत की अखंडता को सभ्यतागत आवश्यकता मानता है, न कि केवल राजनीतिक सुविधा।
Khandit Bharat पुस्तक पाठक को लंबे समय तक क्या याद दिलाती है?
यह पुस्तक पाठक को एक गहरा ऐतिहासिक प्रश्न देती है: क्या विभाजन अपरिहार्य था? राजेंद्र प्रसाद का तर्क यह विश्वास जगाता है कि संवैधानिक कल्पना और नैतिक साहस से सांप्रदायिक विभाजन को टाला जा सकता था। पाठक भारतीय एकता की नींव—सहिष्णुता, बहुलतावाद, साझा इतिहास—को नए परिप्रेक्ष्य में देखता है और समझता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल राजनीतिक नहीं, दार्शनिक कार्य है।
