Parai Daal Ka Panchhi
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महत्त्वाकांक्षा, प्यार और स्वार्थ। दीपक को अपने जीवन का सार यही लगता है। लेकिन उसे महसूस होता है कि जीवन से उसे कुछ नहीं मिला। पत्नी के रूप में उसे अहिल्या मिली जबकि वह चाहता था कि उसकी शादी किसी आधुनिक लड़की से होती। इसलिए वह हमेशा किसी पराई डाल की तलाश में रहता है, मित्रों के घर में, उनकी पत्नियों से ऐसा व्यवहार कर जाता है जो अपेक्षित नहीं है। इसके लिए उसे कई बार अपमान का पात्र भी बनना पड़ता है, जिसके चलते कुछ समय के लिए वह एक संयमित पारिवारिक जीवन बिताने और अपने मन के ऊपर नियन्त्रण रखने का संकल्प भी लेता है। लेकिन फिर रेखा उसकी जिन्दगी में आती है। साहित्य में रुचि रखनेवाली एक मेधावी छात्रा। दीपक की बौद्धिक बातों से वह उसके प्रेमपाश में बँध जाती है और दीपक एक बार फिर अहिल्या से दूर अपने सुख की तलाश में चल देता है... इस मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास में अमरकान्त एक मध्यवर्गीय परिवार में स्त्री की स्थिति को भी भली-भाँति चित्रित करते हैं, और समाज के सम्बन्धों को भी जिनका आधार बहुत छोटे-छोटे स्वार्थ होते हैं।
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महत्त्वाकांक्षा, प्यार और स्वार्थ। दीपक को अपने जीवन का सार यही लगता है। लेकिन उसे महसूस होता है कि जीवन से उसे कुछ नहीं मिला। पत्नी के रूप में उसे अहिल्या मिली जबकि वह चाहता था कि उसकी शादी किसी आधुनिक लड़की से होती। इसलिए वह हमेशा किसी पराई डाल की तलाश में रहता है, मित्रों के घर में, उनकी पत्नियों से ऐसा व्यवहार कर जाता है जो अपेक्षित नहीं है।
इसके लिए उसे कई बार अपमान का पात्र भी बनना पड़ता है, जिसके चलते कुछ समय के लिए वह एक संयमित पारिवारिक जीवन बिताने और अपने मन के ऊपर नियन्त्रण रखने का संकल्प भी लेता है।
लेकिन फिर रेखा उसकी जिन्दगी में आती है। साहित्य में रुचि रखनेवाली एक मेधावी छात्रा। दीपक की बौद्धिक बातों से वह उसके प्रेमपाश में बँध जाती है और दीपक एक बार फिर अहिल्या से दूर अपने सुख की तलाश में चल देता है...
इस मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास में अमरकान्त एक मध्यवर्गीय परिवार में स्त्री की स्थिति को भी भली-भाँति चित्रित करते हैं, और समाज के सम्बन्धों को भी जिनका आधार बहुत छोटे-छोटे स्वार्थ होते हैं।
Book Details
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ISBN9789360869816
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Pages184
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Avg Reading Time6 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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आठ साल की एक लड़की सांतो दोमिंगो में अपने पिता–पापू–का इन्तज़ार करती है। यह इन्तज़ार उसे एक लम्बी और दर्दनाक मौत जैसा लगता है लेकिन वह राह देखती है कि पापू अमेरिका से आएँगे और अपनी दौलत और शोहरत की शानदार उपलब्धियों—चमचमाती नई कारों, पोलो शर्टों, सोने की चेन और सुन्दर जूतों से उसे अभिभूत कर देंगे। जब पापू आते हैं तो वह उसे फ़िल्म ‘फ़्राइडे द थर्टींथ’ के जेसन जैसे मालूम पड़ते हैं—स्मार्ट, चतुर और निर्मम। वे एक डोमिनिकन माफ़िया बॉस हैं, एक ड्रग डीलर, एक ऐसा शख़्स जो अविश्वसनीय रूप से ख़तरनाक है, लेकिन इससे उसकी बेटी ख़ुद को बेहद ताक़तवर और जीवन्त महसूस करती है। लड़की के जीवन में पापू आते हैं, ग़ायब हो जाते हैं और फिर एक बार और प्रकट होते हैं पैसे, गाड़ियों और मार-तमाम तोहफ़ों से लदे हुए, प्रेमिकाओं से घिरे हुए। सांतो दोमिंगो और अपने पिता के साथ की गई अमेरिका की जगर-मगर यात्राओं के बीच विभाजित, एक लड़की की बचपन की यादों को समेटे यह उपन्यास एक बेटी के प्यार के अलावा अपराध और मर्दानगी के आकर्षण और बड़ों की दुनिया की हिंसा का कभी न भूलने वाला चित्र पेश करता है। एक बच्ची की कल्पना के साथ व्यंग्य और विज्ञान-कथा के साथ ख़ौफ़ का कुशल मिश्रण, कैरेबियाई संस्कृति की पृष्ठभूमि में बुनी गई इस कहानी को अत्यन्त प्रभावी बना देता है।
Million Dollar ki Hera-Pheri
- Author Name:
Jeffrey Archer
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इसी उपन्यास से विश्वप्रसिद्ध लेखक जेफरी आर्चर का रोचक-रोमांचक उपन्यास, जो किसी मसाला मूवी का आनंद तो देता ही है; साथ ही माया के मोहजाल में फँसे किरदारों की मनःस्थिति भी दिखाता है।
Sevasadan
- Author Name:
Premchand
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प्रेमचंद आधुनिक हिंदी साहित्य के कालजयी कथाकार हैं। कथा-कुल की सभी विधाओं—कहानी, उपन्यास, लघुकथा आदि सभी में उन्होंने लिखा और अपनी लगभग पैंतीस वर्ष की साहित्य-साधना तथा लगभग चौदह उपन्यासों एवं तीन सौ कहानियों की रचना करके ‘प्रेमचंद युग’ के रूप में स्वीकृत होकर सदैव के लिए अमर हो गए। प्रेमचंद का ‘सेवासदन’ उपन्यास इतना लोकप्रिय हुआ कि वह हिंदी का बेहतरीन उपन्यास माना गया। ‘सेवासदन’ में वेश्या-समस्या और उसके समाधान का चित्रण है, जो हिंदी मानस के लिए नई विषयवस्तु थी। ‘प्रेमाश्रम’ में जमींदार-किसान के संबंधों तथा पश्चिमी सभ्यता के पड़ते प्रभाव का उद्घाटन है। ‘रंगभूमि’ में सूरदास के माध्यम से गांधी के स्वाधीनता संग्राम का बड़ा व्यापक चित्रण है। ‘कायाकल्प’ में शारीरिक एवं मानसिक कायाकल्प की कथा है। ‘निर्मला’ में दहेज-प्रथा तथा बेमेल-विवाह के दुष्परिणामों की कथा है। ‘प्रतिज्ञा’ उपन्यास में ‘प्रेमा’ की कथा को कुछ परिवर्तनों के साथ पुनः प्रस्तुत किया गया है। ‘गबन’ में युवा पीढ़ी की पतन-गाथा है और ‘कर्मभूमि’ में देश की राजनीतिक संघर्ष को रेखांकित किया गया है। ‘गोदान’ में कृषक और कृषि-जीवन के विध्वंस की त्रासद कहानी है। उपन्यासकार के रूप में प्रेमचंद का महान् योगदान है। उन्होंने हिंदी उपन्यास को भारतीय मुहावरा दिया और उसे समाज और संस्कृति से जोड़ा तथा साधारण व्यक्ति को नायक बनाकर नया आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी भाषा को मानक रूप दिया और देश-विदेश में हिंदी उपन्यास को भारतीय रूप देकर सदैव के लिए अमर बना दिया। —डॉ. कमल किशोर गोयनका
Bhootgaon
- Author Name:
Naveen Joshi
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हिन्दी के वरिष्ठ कवि-गद्यकार लीलाधर मंडलोई की यह आत्मकथा ‘जब से आँख खुली हैं’ केवल उनकी नहीं बल्कि सतपुड़ा के जंगलों में विस्थापित होकर पहुँचे खान-मज़दूरों, दलित-अल्पसंख्यक और पिछड़े वर्गों की भी कथा है। कोरकू, गोंड़ और भारिया आदिवासियों के जीवन के स्याह चित्र भी इसमें आपको मिलेंगे। वेस्टर्न कोल्ड फ़ील्ड के छिन्दवाड़ा और दमुआ जिलों में कोयला-खानों की एक बड़ी शृंखला है। एक में कोयला ख़त्म हुआ तो दूसरी, तीसरी, चौथी और यह प्रक्रिया चलती रहती है जिसमें मज़दूरों को बार-बार उजड़ना पड़ता है। न पक्की नौकरी, न अस्पताल, न स्कूल, न मकान; बस भूख, ग़रीबी, अकाल मृत्यु, दुर्घटनाएँ और दुखों का असीम संसार। ओपनकास्ट और अंडर ग्राऊंड खदानों में बाल-मज़दूर का जीवन जीते हुए लेखक ने यह सब बचपन में ही देख-जी लिया था। आस-पास का जीवन त्रासद था लेकिन जीवन की प्रतिकूलताओं में बनी सामुदायिकता ने वहाँ संघर्ष, जिजीविषा और आनन्द की एक पारिस्थितिकी भी निर्मित की थी जिसमें गोंडवाना, बुन्देलखंड और बाहर से आए लोगों की बोली-बानी, भाषा, खानपान, रहन-सहन और संगीत की समावेशी संस्कृति दिखाई देती थी। इस आत्मकथा को पढ़ते हुए हम जान पाते हैं कि खदानों की गहराइयों ने खदानों को कैसे खोखला कर दिया, कैसे जल-स्तर हज़ारों फ़ीट नीचे चला गया, पानी का संकट गहराया और जंगल उजड़ने लगा। जंगल का जीव-जगत समाप्त होने लगा। कई प्रजातियाँ खो गईं। आदिवासियों का विस्थापन शुरु हुआ। उनकी संस्कृति लुप्त होने लगी। सके अलावा प्राइवेट कम्पनी के कार्यकाल में शोषण, अनाचार, उपेक्षा, शोषण आदि के आख्यान भी इस पुस्तक का हिस्सा हैं।
Musafir Hoon Yaro
- Author Name:
Partha Sarthi Sen Sharma
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इस पुस्तक के लेखक सरकार के लिए कार्य करनेवाले एक सैंतीस वर्षीय भारतीय हैं। भारत सरकार ने अपने मध्य क्रम के अधिकारियों के शिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत एम.बी.ए कोर्स हेतु उन्हें चुना और प्रायोजित किया था। इस कोर्स के लिए उन्हें एक अल्पज्ञात यूरोपीय देश स्लोवेनिया की राजधानी ल्युब्ल्याना भेजा गया। बीते हजारों वर्षों से यूरोपीय यात्री भारत की यात्रा करते और अपनी इन यात्राओं के बारे में लिखते रहे हैं। मेगस्थनीज से लेकर मार्को पोलो और निकोलो कॉण्टी से मार्क टली तक बहुत से श्वेत यूरोपियनों ने भारत की यात्रा कर अपने देशवासियों व भावी पीढ़ी के लाभ हेतु अपने अनुभवों को दर्ज किया है। इस अनुपात में, यूरोप की यात्रा करनेवाले भारतीयों की संख्या बहुत कम है और उनमें से भी अपने अनुभवों, दृष्टिकोणों व प्रतिक्रियाओं को दर्ज करनेवालों की संख्या तो और भी कम रही है। लेकिन पिछली शताब्दी में भारत इतना बदल गया है, जितना इतिहास में किसी भी शताब्दी में नहीं बदला था। आज इतिहास में पहली बार यूरोप से आनेवालों के मुकाबले यूरोप जानेवाले भारतीयों की संख्या अधिक हो गई है। इसके बावजूद कुछ अज्ञात कारणों से अपनी यूरोप यात्रा के अनुभवों को दर्ज करनेवाले भारतीयों की संख्या नगण्य ही है। यह पुस्तक इसी असंतुलन को साधने का एक विनीत प्रयास है, जो वहाँ की कला-संस्कृति-समाज का सांगोपांग दर्शन कराती है।
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