Kala Ragister
(0)
Author:
Ravindra KaliyaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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एक टुटही सायकल है, उसके टैक्स का टोकन मैंने सायकल में ही कसवा दिया है। अब सरकार मुझसे क्या चाहती है? हुज़ूर आप ही बताइए, जो शख़्स बिना हुज्जत के सरकार का पूरा टैक्स अदा कर देता है, जिसकी किसी से कोई अदावत नहीं, जो सिर्फ़ अपने काम से काम रखता है और गर्दन नीची किए हुए उसी अल्लाह मियाँ को याद करके चुपचाप चलता रहता है, वह क्यों इतना परेशाँ है? जिधर निकलता हूँ, यही आवाज़ें आने लगती हैं—मारो! मारो! क्यों मरोगे भाई? मैंने क्या गुनाह किया है, किस जुर्म की सज़ा देना चाहते हो। इस घर से आवाज़ आ रही है, उस घर से भी यही आवाज़ आ रही है। बाज वक़्त कान लगाकर सुनता हूँ तो यक़ीन हो जाता है कि किसी इनसान की ही आवाज़ है। आप तो पढ़े-लिखे आदमी हैं हुज़ूर, क्या मुझे बता सकते हैं कि हुकूमत क्यों ख़ामोश है? लगता है, आप हुकूमत की बात से ऊब रहे हैं।
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एक टुटही सायकल है, उसके टैक्स का टोकन मैंने सायकल में ही कसवा दिया है। अब सरकार मुझसे क्या चाहती है? हुज़ूर आप ही बताइए, जो शख़्स बिना हुज्जत के सरकार का पूरा टैक्स अदा कर देता है, जिसकी किसी से कोई अदावत नहीं, जो सिर्फ़ अपने काम से काम रखता है और गर्दन नीची किए हुए उसी अल्लाह मियाँ को याद करके चुपचाप चलता रहता है, वह क्यों इतना परेशाँ है? जिधर निकलता हूँ, यही आवाज़ें आने लगती हैं—मारो! मारो! क्यों मरोगे भाई? मैंने क्या गुनाह किया है, किस जुर्म की सज़ा देना चाहते हो। इस घर से आवाज़ आ रही है, उस घर से भी यही आवाज़ आ रही है। बाज वक़्त कान लगाकर सुनता हूँ तो यक़ीन हो जाता है कि किसी इनसान की ही आवाज़ है। आप तो पढ़े-लिखे आदमी हैं हुज़ूर, क्या मुझे बता सकते हैं कि हुकूमत क्यों ख़ामोश है? लगता है, आप हुकूमत की बात से ऊब रहे हैं।
Book Details
-
ISBN9788180311314
-
Pages103
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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पर कुछ अनुभूतियाँ कालनिरपेक्ष सत्य की तरह अकाट्य होती हैं। सूरज-चाँद-सितारों की तरह सनातन प्रतीत होती हैं, जैसे अपनी माँ सबसे सुन्दर और अपना घर सबसे बड़ा स्वर्ग है। संवेदना ने जिस कुरूप चेहरे को सदा हिकारत से देखा, वही एक दिन सुन्दरता की मिसाल बन गया।
परदेस गए बेटे का वियोग बूढ़े माँ-बाप को कैसे सालता है—‘अपना घर अपना आसमान’ इस पीड़ा का आईना है, ‘खुली छतरी’ बाल मनोविज्ञान का चित्रण करती है तो ‘सज़ा’ आदर्श नारी के मिथक को तोड़कर उसके सहज रूप में संवेग और आवेग, प्यार और प्रतिकार की सृष्टि करती है।
अनब्याही माँ बनना, बलात्कार को मात्र दुर्घटना मानना, स्त्री द्वारा लीक तोड़कर शठे शाठ्यं समाचरेत् की परिपालना—समाज के ये नए मूल्य कहानियों में उजागर हुए हैं।
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