Pratinidhi Kahaniyan : Usha Priyamvada
(3)
Author:
Usha PriyamvadaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
199
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उषा प्रियम्वदा को पढ़ना एक साथ बहुत से बिम्बों में घिर जाना है। बिम्ब जो घुमड़ते बादलों की तरह अनायास तैरते चले आते हैं और एक सार्थक संगति में गुँथकर पहले दृश्य का रूप लेते हैं। कहानियों में परम्परा के निर्वहण की अभ्यस्तता और उसे तोड़ देने की सजगता एक साथ गुँथी हुई मिलती है। 1952 से 1989 तक के कालखंड में फैली उषा प्रियम्वदा की कहानियों का अधिकांश साठ के दशक में उनके विदेश प्रवास के बाद आया है। ज़ाहिर है, डायस्पोरा मनोविज्ञान रिवर्स कल्चरल शॉक से उबरने की क्रमिक प्रक्रिया को नॉस्टेल्जिया में तब्दील कर देता है। इसलिए उषा जी की कहानियों की ज़मीन भले ही विदेशी हो गई हो, वहाँ की खुली संस्कृति और उदार वर्जनामुक्त माहौल से सम्बन्धों में सहजता और कुंठाहीनता पनपी हो, लेकिन उनकी नायिका स्वयं को भारतीयता के संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यही वजह है कि दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध बनाते हुए भी वह अपराध-बोध और लोकापवाद के भय से ग्रस्त रहती है। सरपट दौड़ते हुए अचानक ठिठककर खड़े हो जाना, और फिर बिना कुछ कहे अपनी खोह में दुबक जाना उनकी स्त्री की विशेषता है। उषा जी बेहद महीन और कलात्मक पच्चीकारी के साथ उसके चारों ओर रहस्यात्मकता का वातावरण बुनती हैं, जो एक सम्मोहक तिलिस्म का रूप धरकर पाठक के भीतर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता चला जाता है, ठीक कृष्णा सोबती की लम्बी कहानी 'तिन पहाड़' की जया की तरह।
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उषा प्रियम्वदा को पढ़ना एक साथ बहुत से बिम्बों में घिर जाना है। बिम्ब जो घुमड़ते बादलों की तरह अनायास तैरते चले आते हैं और एक सार्थक संगति में गुँथकर पहले दृश्य का रूप लेते हैं। कहानियों में परम्परा के निर्वहण की अभ्यस्तता और उसे तोड़ देने की सजगता एक साथ गुँथी हुई मिलती है।
1952 से 1989 तक के कालखंड में फैली उषा प्रियम्वदा की कहानियों का अधिकांश साठ के दशक में उनके विदेश प्रवास के बाद आया है। ज़ाहिर है, डायस्पोरा मनोविज्ञान रिवर्स कल्चरल शॉक से उबरने की क्रमिक प्रक्रिया को नॉस्टेल्जिया में तब्दील कर देता है। इसलिए उषा जी की कहानियों की ज़मीन भले ही विदेशी हो गई हो, वहाँ की खुली संस्कृति और उदार वर्जनामुक्त माहौल से सम्बन्धों में सहजता और कुंठाहीनता पनपी हो, लेकिन उनकी नायिका स्वयं को भारतीयता के संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यही वजह है कि दाम्पत्येतर प्रेम सम्बन्ध बनाते हुए भी वह अपराध-बोध और लोकापवाद के भय से ग्रस्त रहती है। सरपट दौड़ते हुए अचानक ठिठककर खड़े हो जाना, और फिर बिना कुछ कहे अपनी खोह में दुबक जाना उनकी स्त्री की विशेषता है। उषा जी बेहद महीन और कलात्मक पच्चीकारी के साथ उसके चारों ओर रहस्यात्मकता का वातावरण बुनती हैं, जो एक सम्मोहक तिलिस्म का रूप धरकर पाठक के भीतर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता चला जाता है, ठीक कृष्णा सोबती की लम्बी कहानी 'तिन पहाड़' की जया की तरह।
Book Details
-
ISBN9788126730483
-
Pages152
-
Avg Reading Time5 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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ये कहानियाँ कई-कई बार उन जगहों पर पहुँचती हैं, दस्तक देती हैं जो हिन्दी कहानी लेखन में लगभग वर्जित रहे हैं। निश्चय ही यह सायास नहीं है। यह स्पष्टत: असहमति और प्रतिरोध का स्वर ही है जो अन्तत: मनुष्यता के पक्ष में है। ‘पतलून में जेब’, ‘द रॉयल घोस्ट’, ‘भूगोल के दरवाज़े पर’ तथा ‘चाँद चाहता था कि धरती रुक जाए’ इसी तरह की कहानियाँ हैं। इन कहानियों का हिन्दी साहित्य जगत में चर्चित होना भी इसी तरह से यानी लगभग वर्जित से क्षेत्र में सृजनात्मक दख़ल की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। असहमति और प्रतिक्रिया का जो स्वरूप इन रचनाओं में है, वह एकदम से लाउड न होकर बेहद संवेदनात्मक है। यह बात ख़ासकर जंगलों पर लिखी गई कहानियों के साथ-साथ ‘सब्जेक्ट फ़्लैट नम्बर थर्टी वन’, ‘लॉर्ड इर्विन ने इग्नोर किया’ तथा ‘द रॉयल घोस्ट’ में दीखती है जहाँ अपने फ़ार्म और कंटेंट दोनों स्तरों पर ज़बरदस्त क़िस्म के प्रयोग किए गए हैं। इन प्रयोगों में इतिहास तथा समय के अतिक्रमण हैं तथा दो-तीन कथानकों को उनके धुर विरोधाभासी होने के बावजूद लम्बे क़िस्से में गूँथने की प्रभावकारी युक्ति भी। बावजूद इसके कहानियों की तरलता पर इसका प्रभाव नहीं है। ‘दादी, मुल्तान और टच एंड गो’ एक ऐसे विषय पर आख्यान के रूप में लिखी गई है जिस पर इधर कहानियाँ देखने को नहीं मिलीं।
इन कहानियों में कई तरह के मैटाफ़र हैं, कहने का अनोखापन है और एक भिन्न भाषा विन्यास है जो इकहरा न होकर कई-कई बार बदलता है। संवाद, वृत्तान्त, पात्र और घटनाओं की बेहद कल्पनात्मक और रोचक जुगलबन्दी से लबरेज ये कहानियाँ बेहद रोचक और पठनीय हैं। अपने कहन और असहमति के स्तर पर प्रगतिशील संवेदनात्मक चेतना की ये कहानियाँ जीवन और आम आदमी के संकटों का दस्तावेज़ हैं। काव्यात्मकता से युक्त अत्यन्त सुन्दर भाषा में लिखी गईं ये कहानियाँ हमारे समय के कई अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं। सुख, दु:ख, प्रेम, यातना, संकट, करुणा, त्रासदी, अकेलेपन और हास्य के जिन विविध रंगों को इसके पात्र जी रहे हैं, वे आधुनिक इनसान के अनुभवों और समय का जीवन्त चित्रण करते हैं। ये कहानियाँ अपने कथ्य की सार्थकता, वैविध्य, असहमतियाँ, सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा तथा विस्तृत फलक पर मानवीय संवेदनाओं की पड़ताल की कहानियाँ हैं जो नि:सन्देह रोचक हैं और पाठक के अन्तर्मन में इन तमाम वजहों से गूँजती हैं। यह संग्रह निश्चय ही न सिर्फ़ पाठकों को पसन्द आएगा बल्कि अपनी एक प्रभावकारी उपस्थिति भी दर्ज करेगा।
The Turning Point of Life
- Author Name:
Surbhi Sareen +1
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- Description: Life represents a roller coaster ride. It is thrilling and full of ups and downs. Life does not remain the same forever, and every day is a new story, but some changes are the ramifications of certain events that change lives for good. These might either build you or destroy you. This book has exciting and thrilling anecdotes of varied turning points in life and how they changed our lives for good. It has all the hues of life covered in its stories.
Kailash Gautam Samagra : Vols. 1-3
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Kailash Gautam
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- Description: ‘कैलाश गौतम समग्र’ (तीन खंड) वस्तुतः समय के सच को रेखांकित करते हुए, चुनौतियों में जूझते हुए आम जनमानस की ही आवाज़ है। यह सहज साहित्यिक मौलिक अभिव्यक्ति का बोलता-बतियाता दस्तावेज़ है। सुव्यवस्थित दुर्व्यवस्था की विद्रूपताओं-विसंगतियों पर चोट के साथ-साथ, राग-अनुराग मिलन-मनुहार विछोह भी है। बदलते हुए गाँव और शहरीकरण का टूटता तिलस्म भी। ‘गंगा’, ‘झुनिया’, ‘अमावस्या का मेला’, ‘कचहरी’, ‘भाभी की चिट्ठी’, ‘कुर्सी’, ‘अन्हरे से लड़ाई’, ‘पप्पू की दुलहिन’, ‘रामलाल का फगुआ’, ‘धुरन्धर’, ‘मीराबाई’ जैसी अनेकानेक कालजयी रचनाएँ भी जो आम आदमी से लेकर शीर्षस्थ आलोचकों व समीक्षकों के भी ज़ुबान पर हैं। वे सारे पात्र और देसज मुहावरे सब सजीव हो उठते हैं, ऐसा लगता है। इसमें लोकबोली की मिठास के साथ ही तीज-त्योहारों, हँसी-ख़ुशी और पनप रहा फीकापन भी है। महँगाई की मार है तो रिश्तों की मिठास-खटास भी। तीन खंडों में प्रस्तुत यह समग्र कैलाश गौतम के गद्य-पद्य का समूचा रचना-संसार है। सुविख्यात सम्पादकों व आलोचकों की भूमिकाओं के साथ मनकवि-जनकवि कैलाश गौतम की रचनात्मक अभिव्यक्ति का एक निष्पक्ष, सच्चा और सारगर्भित लेखा-जोखा है।
Highway E 47
- Author Name:
Smt. Archana Painuly
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- Description: नारी-विमर्श अपने आप में साहित्य में एक महत्त्वपूर्ण विधा रही है। स्त्रा्वादी साहित्य महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों को परिभाषित तथा नारीवादी लक्ष्यों का समर्थन करता है। नारी-विमर्श पर आधारित संकलन की ये बारह कहानियाँ विविध नारी पात्रों को लेकर बुनी गई हैं, जो एक तरफ समकालीन जीवन के जटिल और क्रूर यथार्थ को चिह्नित करती हैं तो दूसरी तरफ स्त्रा्-जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित करती हैं। समाज के प्रत्येक वर्ग की स्त्रा् के जीवन को प्रस्तुत करती हैं ये कहानियाँ। एक व्यापक भूमंडल को आच्छादित किए इन कहानियों में मानव जीवन के कई रंग बिखरे हुए हैं। पाठकों को भिन्न-भिन्न परिवेश में जी रही महिलाओं के जीवन से रूबरू करवाती, हमारी पारंपरिक सोच और रूढ़िवादी विचारों को झकझोरती ये कहानियाँ अत्यंत सजीव हैं। अहं, अन्याय, अकेलापन, विमुखता, प्रतिरोध, यंत्रणा, वेदना, लाचारी...तमाम अंतर्द्वंद्वों से जूझती, स्वयं के लिए सही संतुलन प्राप्त करने के लिए संघर्ष करती इन कहानियों की दमदार महिलाएँ पाठकों को प्रेरणा प्रदान करती हैं। पारिवारिकता और सामाजिकता की ये कहानियाँ नारी-सशक्तीकरण परिवेश का सशक्त स्वर हैं।
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