Lapata Ladaki
(0)
Author:
Arvind jainPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
195
156 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
वह निस्संग है, आखेटित है, लापता है। वही यहाँ है। परम्पराएँ उसे लापता करती हैं। बाज़ार उसे निस्संग और उसका आखेट करता है। हर धर्म, हर जाति उसके संग ऐसा ही सलूक करती है।</p> <p>ये कहानियाँ इसी स्त्री या लिंग संवेदनशीलता से शुरू होती हैं और इस लापता कर दी गई स्त्री की खोज का आवेशमय विमर्श बन जाती हैं। ये औरत को किसी घटना या क़िस्से के ब्योरे में नहीं दिखातीं, उसे खोजती हैं, बनाती हैं और जितना बनाती हैं, पाठक को उतना ही सताती हैं।</p> <p>स्त्री-लेखन स्त्री ही कर सकती है, यह सच है लेकिन ‘स्त्रीवादी’ लेखन पुरुष भी कर सकता है—यह भी सच है। यह तभी सम्भव है, जब वह लिंग भेद के प्रति आवश्यक संवेदनशील हो, क्योंकि वह पितृसत्ता की नस-नस बेहतर जानता है। मर्दवादी चालें! मर्दों की दुनिया में औरत एक जिस्म, एक योनि, एक कोख भर है और मर्दों के बिछाए बाज़ार में वह बहुत सारे ब्रांडों में बन्द एक विखंडित इकाई है।</p> <p>अरविन्द, जो बहुत कम कहानी लिखते हैं, इस औरत को हर तरह से, हर जगह पूरी तदाकारिता से खोजते हैं। अरविन्द कहीं पजैसिव हैं, कहीं कारुणिक हैं, लेकिन प्रायः बहुत बेचैन हैं। यहाँ स्त्री के अभिशाप हैं जिनसे हम गुज़रते हैं। मर्दों की दुनिया द्वारा गढ़े गए अभिशाप, आज़ादी चाहकर भी औरत को कहीं आज़ाद होने दिया जाता है?</p> <p>अरविन्द की इन वस्तुतः छोटी कहानियों में मर्दों की दुनिया के भीतर, औरत के अनन्त आखेटों के इशारे हैं। यह ‘रसमय’ जगत नहीं, मर्दों की निर्मित स्त्री का ‘विषमय’ जगत है। अरविन्द की कहानी इशारों की नई भाषा है। उनकी संज्ञाएँ, सर्वनाम, विशेषण सब सांकेतिक बनते जाते हैं। वे विवरणों, घटनाओं में न जाकर संकेतों, व्यंजकों में जाते हैं और औरत की ओर से एक ज़बर्दस्त जिरह खड़ी करते हैं। स्त्री को हिन्दी कथा में किसी भी पुरुष लेखक ने इतनी तदाकारिता से नहीं पढ़ा जितना अरविन्द ने।</p> <p>इन कहानियों को पढ़ने के बाद पुरुष पाठकर्ता सन्तप्त होगा एवं तदाकारिता की ओर बढ़ेगा और स्त्री पाठकर्ता अपने पक्ष में नई क़लम को पाएगी—वहाँ भी, जहाँ स्त्री सीधा विषय नहीं है।</p> <p>अरविन्द जैन का यह कथा-संग्रह बताता है कि हिन्दी कहानी में निर्णायक ढंग से फिर बहुत कुछ बदल गया है।</p> <p>—सुधीश पचौरी
Read moreDon’t Miss Out
Pick a membership and see exactly what it gets you
- 15 Free Deliveries
- 1 Free Book up to ₹500 MRP
- 0% off every book, every time
Subscribed already? Continue to your
benefits Login
You pay ₹1,499/Year
You will be auto-charged ₹1,499 every year. Cancel auto-charge anytime.
Benefits with Rachnaye Connoisseur
1 Free Physical Book up to ₹500 MRP
Personal Recommendations
15 Free Deliveries Per Year
Format:
Piracy Free
Express Delivery
Secure Payment
About the Book
वह निस्संग है, आखेटित है, लापता है। वही यहाँ है। परम्पराएँ उसे लापता करती हैं। बाज़ार उसे निस्संग और उसका आखेट करता है। हर धर्म, हर जाति उसके संग ऐसा ही सलूक करती है।</p>
<p>ये कहानियाँ इसी स्त्री या लिंग संवेदनशीलता से शुरू होती हैं और इस लापता कर दी गई स्त्री की खोज का आवेशमय विमर्श बन जाती हैं। ये औरत को किसी घटना या क़िस्से के ब्योरे में नहीं दिखातीं, उसे खोजती हैं, बनाती हैं और जितना बनाती हैं, पाठक को उतना ही सताती हैं।</p>
<p>स्त्री-लेखन स्त्री ही कर सकती है, यह सच है लेकिन ‘स्त्रीवादी’ लेखन पुरुष भी कर सकता है—यह भी सच है। यह तभी सम्भव है, जब वह लिंग भेद के प्रति आवश्यक संवेदनशील हो, क्योंकि वह पितृसत्ता की नस-नस बेहतर जानता है। मर्दवादी चालें! मर्दों की दुनिया में औरत एक जिस्म, एक योनि, एक कोख भर है और मर्दों के बिछाए बाज़ार में वह बहुत सारे ब्रांडों में बन्द एक विखंडित इकाई है।</p>
<p>अरविन्द, जो बहुत कम कहानी लिखते हैं, इस औरत को हर तरह से, हर जगह पूरी तदाकारिता से खोजते हैं। अरविन्द कहीं पजैसिव हैं, कहीं कारुणिक हैं, लेकिन प्रायः बहुत बेचैन हैं। यहाँ स्त्री के अभिशाप हैं जिनसे हम गुज़रते हैं। मर्दों की दुनिया द्वारा गढ़े गए अभिशाप, आज़ादी चाहकर भी औरत को कहीं आज़ाद होने दिया जाता है?</p>
<p>अरविन्द की इन वस्तुतः छोटी कहानियों में मर्दों की दुनिया के भीतर, औरत के अनन्त आखेटों के इशारे हैं। यह ‘रसमय’ जगत नहीं, मर्दों की निर्मित स्त्री का ‘विषमय’ जगत है। अरविन्द की कहानी इशारों की नई भाषा है। उनकी संज्ञाएँ, सर्वनाम, विशेषण सब सांकेतिक बनते जाते हैं। वे विवरणों, घटनाओं में न जाकर संकेतों, व्यंजकों में जाते हैं और औरत की ओर से एक ज़बर्दस्त जिरह खड़ी करते हैं। स्त्री को हिन्दी कथा में किसी भी पुरुष लेखक ने इतनी तदाकारिता से नहीं पढ़ा जितना अरविन्द ने।</p>
<p>इन कहानियों को पढ़ने के बाद पुरुष पाठकर्ता सन्तप्त होगा एवं तदाकारिता की ओर बढ़ेगा और स्त्री पाठकर्ता अपने पक्ष में नई क़लम को पाएगी—वहाँ भी, जहाँ स्त्री सीधा विषय नहीं है।</p>
<p>अरविन्द जैन का यह कथा-संग्रह बताता है कि हिन्दी कहानी में निर्णायक ढंग से फिर बहुत कुछ बदल गया है।</p>
<p>—सुधीश पचौरी
Book Details
-
ISBN9788126723270
-
Pages100
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Bediyan Todati Stree
- Author Name:
Arvind jain
- Book Type:

- Description:
स्त्री-जीवन के क़ानूनी पहलू पर विस्तार और प्रामाणिक जानकारी से लिखते हुए अरविन्द जैन ने स्त्री-विमर्श की सामाजिक-साहित्यिक सैद्धान्तिकी में एक ज़रूरी पहलू जोड़ा। क़ानून की तकनीकी पेचीदगियों को खोलते हुए उन्होंने अक्सर उन छिद्रों पर रोशनी डाली जहाँ न्याय के आश्वासन के खोल में दरअसल अन्याय की चालाक भंगिमाएँ छिपी होती थीं। इसी के चलते उनकी किताब ‘औरत होने की सज़ा’ को आज एक क्लासिक का दर्जा मिल चुका है। स्त्री लगातार उनकी चिन्ता के केन्द्र में रही है। बतौर वकील भी, बतौर लेखक भी और बतौर मनुष्य भी। सम्पत्ति के उत्तराधिकार में औरत की हिस्सेदारी का मसला हो या यौन शोषण से सम्बन्धित क़ानूनों और अदालती मामलों का, हर मुद्दे पर वे अपनी किताबों और पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से पाठक का मार्गदर्शन करते रहे हैं। ‘बेड़ियाँ तोड़ती स्त्री’ उनकी नई किताब है जो काफ़ी समय के बाद आ रही है। इस दौरान भारतीय स्त्री ने अपनी एक नई छवि गढ़ी है, और एक ऐसे भविष्य का नक़्शा पुरुष-समाज के सामने साफ़ किया है जिसे साकार होते देखने के लिए शायद अभी भी पुरुष मानसिकता तैयार नहीं है। लेकिन जिस गति, दृढ़ता और निष्ठा के साथ बीसवीं सदी के आख़िरी दशक और इक्कीसवीं के शुरुआती वर्षों में पैदा हुई और अब जवान हो चुकी स्त्री अपनी राह पर बढ़ रही है, वह बताता है कि यह सदी स्त्री की होने जा रही है और सभ्यता का आनेवाला समय स्त्री-समय होगा। इस किताब का आधार-बोध यही संकल्पना है। तार्किक, तथ्य-सम्मत और सद्भावना से बुना हुआ स्त्री के भविष्य का स्वप्न। उनका विश्वास है कि अब साल दर साल देश के तमाम सत्ता-संस्थानों में शिक्षित, आत्मनिर्भर, साधन-सम्पन्न, शहरी स्त्रियों की भूमिका और भागीदारी अप्रत्याशित रूप से बढ़ेगी। समान अधिकारों के लिए सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष तेज़ होंगे और भविष्य की स्त्री हर क्षेत्र में हाशिये के बजाय केन्द्र में दिखाई देने लगेगी। समानता और न्याय की तलाश में निकली स्त्री अपना सबकुछ दाँव पर लगा रही है। सो भविष्य की स्त्री इन्साफ माँगेगी। सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक इन्साफ़। देह और धरती पर ही नहीं सबकुछ पर बराबर अधिकार।
Aurat : Astitva Aur Asmita
- Author Name:
Arvind jain
- Book Type:

- Description:
महिला लेखन पर साहित्य की यह ऐसी महत्त्वपूर्ण पुस्तक है, जिसे लौन्घकर समकालीन साहित्य-जगत में स्त्री-विमर्श के सन्दर्भ में कुछ कहना असंभव नहीं तो कठिन जरूर साबित होगा । आपकी दृष्टि भविष्य की उस स्त्री पर है, जो संघर्ष करते हुए समग्र पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध एक चुनौती बनकर कड़ी हो सके । एक मनोवैज्ञानिक की भांति अप स्त्री के अतीत के लौटकर उसके मानस का विश्लेषण करते हुए, उसके सामाजिक परिवेश को तौलते हैं । शायद यही कारण है कि आपकी विश्लेषण पद्धति, भाषा और वर्णन शैली में मुझे न केवल एक नयापन लगा बल्कि एक गहरी अन्तदृष्टि का भी परिचय मिला । ऐसा लगा मनो इस विमर्श के द्वारा आप आलोचना के कुछ नए प्रतिमानों को भी निर्मित कर पाएँगे । आपके लेखन में इस नई स्त्री=चेतना को देखने-समझने का जितना आग्रह्हाई, उतना ही आपकी आलोच्य अभिव्यकिमे पाठकीय अनुभव का एक ताजा स्पंदन भी । वकील होने की वजह से आप स्थापित सिद्धान्तों के विश्लेषण के दौरान आप जो जिरह करते हैं, वह न केवल पाठक को आंदोलित करती है बल्कि उन्हें भी आलोचना का नया दृष्टिकोण देती है । प्रस्तुत पुस्तक में आपकी बहस का केन्द्रीय मुद्दा उपन्यासों में वर्णित घटनाओं की कानूनी एवं सामाजिक प्रमाणिकता को लेकर है तथा इसके माध्यम से आपने उस व्यापक सांस्कृतिक परिवेश का अध्ययन करना चाह है, जो स्त्री-लेखन का स्रोत रहा है । किसी भी अध्ययन के इस आंतरिक अनुशासन पक्ष पर आपने संतुलन बनाए रखा है । आपके लेखन की सबसे बड़ी विशिष्टता यही है कि आपने स्त्री-संस्कृति तथा उसके संघर्ष के इतिहास को समेटने व् समझने का और उस समझ को साहित्यिक अभिव्यक्ति देने का प्रयास किया है ।
Uttradhikar Banam Putradhikar
- Author Name:
Arvind jain
- Book Type:

- Description:
“यह पुस्तक पितृसत्ता की लगभग सभी वैधानिक और संवैधानिक अभिव्यक्तियों पर लिपटे आवरणों को तार-तार करती जाती है। विधि सम्बन्धी स्त्री-विमर्श दीर्घकालीन संघर्ष में महत्त्वपूर्ण औज़ार की तरह इस्तेमाल हो सकता है।” —(‘हंस’; जून, 2000) “‘उत्तराधिकार बनाम पुत्राधिकार’ पढ़कर स्वयं को एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की आधुनिक नारी समझने का नशा हिरण हो जाता है। विश्वसुन्दरी, अधिकारी, प्रबन्धक, वर्किंग वूमेन या घर की लक्ष्मी, जो भी हो, तुम होश में आओ...इस किताब को पढ़ो; आधुनिक, आज़ादी और बराबरी के सारे दावों की हवा निकल जाएगी। यह किताब ख़ौफ़नाक तथ्यों की तह तक उजागर करती है।” -(‘नई दुनिया’, इन्दौर; 8 जुलाई, 2000) “इस पूरी पुस्तक को पढ़ने पर अरविन्द की यह बात सही मालूम होती है कि बीसवीं सदी के आरम्भ से लेकर अब तक अदालत, क़ानून और न्याय की भाषा-परिभाषा मूलत: स्त्री के प्रति अविश्वास, घृणा और अपमान से उपजी भाषा है।”—(‘साक्षात्कार’, अगस्त, 2000) “इस पुस्तक ने औरत की पक्षधर लोकतंत्र की चार सत्ताओं को बेनक़ाब कर दिया। इसने इस तथ्य को पुन: स्थापित किया कि पुरुष नि:स्वार्थ भाव से, पुरुष दमन से मुक़ाबले के लिए, औरत का रक्षाकवच और उसके दमन के विरुद्ध लावा बन सकता है। —(‘दैनिक नवज्योति’, जयपुर; 16 सितम्बर, 2000)
Aurat Hone Ki Saza
- Author Name:
Arvind jain
- Book Type:

- Description:
पाठकों को यह पढ़कर बेहद आश्चर्य होगा कि भारतीय क़ानून के किसी भी अधिनियम में माँ, माता, जननी, यानी मदर को परिभाषित नहीं किया गया है। द जेनेरल क्लासेस एक्ट की धारा 3, अप-धारा 20 में बाप, पिता यानी ‘फादर’ को तो परिभाषित किया गया है, लेकिन माँ को नहीं। माँ को परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं थी या क़ानून निर्माता पुरुषों ने जानबूझकर इसे भुला दिया? ऐसा क्यों और कैसे हुआ—कहना कठिन है। शायद इसलिए कि माँ एक निश्चित सत्य है और पिता मात्र अनुमान या अनिश्चित तथ्य, जिसे परिभाषित करना अनिवार्य है। कुछ समय पहले सर्वोच्च न्यायालय के माननीय न्यायमूर्ति डॉ. ए.एस. आनन्द और फसौद्दीन के सामने यह गम्भीर प्रश्न आ खड़ा हुआ कि माँ शब्द की परिभाषा में, सौतेली माँ भी शामिल है? क्या आपराधिक प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 125 के अन्तर्गत सौतेली माँ को भी अपने सौतेले बेटे से गुज़ारा भत्ता पाने का अधिकार है या नहीं?
Bachapan Se Balatkar
- Author Name:
Arvind jain
- Book Type:

- Description:
महिला क़ानूनों के जानकार और समाज तथा अदालत दोनों जगह स्त्री-सम्मान की सुरक्षा पर पैनी और सतर्क निगाह रखनेवाले लेखक व न्यायविद् अरविन्द जैन की यह पुस्तक बलात्कार के सामाजिक, वैधानिक और नैतिक पहलुओं को गहरी और मुखर न्याय-संवेदना के साथ देखती है। इस किताब की मुख्य चिन्ता यह है कि समाज के सांस्कृतिक चौखटे में जड़ी स्त्री-देह घरों और घरों से बाहर जितनी वध्य है, दुर्भाग्य से बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद क़ानून की हिफ़ाज़त में भी उससे कुछ ज़्यादा सुरक्षित नहीं है। न सिर्फ़ यह कि समाज के पुरुष-वर्चस्व की छाया क़ानूनी प्रावधानों में भी न्यस्त है, बल्कि उनको कार्यान्वित करनेवाले न्यायालयों, जजों, वकीलों आदि की मनो-सांस्कृतिक संरचना में भी जस की तस काम करती दिखाई देती है। पुस्तक में पन्द्रह आलेख हैं। परिशिष्ट में कुछ ज़रूरी जानकारियाँ हैं। विशेषता यह है कि अरविन्द जैन ने पूरी सामग्री को व्यापक स्त्री-विमर्श से जोड़ा है। न्याय और अस्मिता रक्षा के लिए प्रतिबद्ध उनकी विचारधारा भाषा को नया तेवर देती है।
Kamre Aur Anya Kahaniyan
- Author Name:
Olga Tokarczuk +1
- Book Type:

- Description:
इस संग्रह में तीन कहानियाँ संकलित हैं—‘अलमारी’, ‘कमरे’ और ‘ऊपरवाले का हाथ’। तीनों कहानियाँ अपने पात्रों के रहस्यमय आन्तरिक मनोजगत का दिलकश उद्घाटन करती हैं। अपने लिए एक सुरक्षित जगह तलाश करने की मनुष्य की आदिम इच्छा का वर्णन ‘अलमारी’ में बेहद ख़ूबसूरती के साथ किया गया है। वहीं ‘कमरे’ कहानी में एक होटल के विभिन्न कमरों के बहाने इनसानी जीवन के स्याह-सफ़ेद को बहुत दिलचस्प ढंग से रेखांकित किया गया है। ‘ऊपरवाले का हाथ’ में कम्प्यूटर का माहिर नायक मनुष्य और सभ्यता की कुछ नियतिबद्ध अपरिहार्यताओं की तरफ इशारा करता है। अत्यन्त पठनीय कहानियाँ।
Bhoole-Bisre Chitra
- Author Name:
Bhagwaticharan Verma
- Book Type:

- Description:
एक महान् कृति, भारतीय समाज और परिवार के विकास की विविध दिशाओं और रूपों का एक विराट एवं प्रभावोत्पादक चित्र। -डॉ. एस.एन. गणेशन निकट अतीत के चित्रों का एक एलबम—वह अतीत जिसे वर्तमान पीढ़ी को न भूलना चाहिए और न जिससे विमुख ही होना चाहिए, क्योंकि उसी में हमारे नए जीवन का बीजारोपण हुआ था। परिवार के चित्रों के एलबम के विपरीत इस एलबम के चित्र धुँधले नहीं पड़े हैं, क्योंकि कैमरा एक ही रहा है। लैंसों का प्रयोग इस कुशलता से किया गया है कि चित्र बिल्कुल साफ़ और हूबहू अंकित हुए हैं, दूरी ने उन्हें धुँधला नहीं किया है, भावातिरेक या दुःख ने विकृत नहीं किया है। —जगदीशचन्द्र माथुर
Aamne-Saamne
- Author Name:
Namvar Singh +2
- Book Type:

- Description:
नामवर सिंह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनका बोला-बताया अब भी ऐसा बहुत कुछ है जो सामने आना बाकी है। लम्बे समय तक उन्होंने व्यवस्थित ढंग से कुछ नहीं लिखा था; व्याख्यानों और वक्तव्यों के रूप में ही उन्होंने आलोचना के नए-नए पैमाने तोड़े और बनाए। युवाओं, वरिष्ठों, छात्रों-पत्रकारों और समकालीन रचनाकारों को दिए साक्षात्कारों में भी उन्होंने सदैव एक उत्तरदायी आलेचकीय चेतना को अभिव्यक्ति दी। उनकी आश्चर्यजनक स्मृति, वैचारिक स्पष्टता और आस्वादपरक समीक्षा के चलते व्याख्यानों की तरह उनके साक्षात्कार भी सदैव चर्चित रहे। इस पुस्तक में उनके ऐसे साक्षात्कारों को संकलित किया गया है जो अब तक किसी और पुस्तक में नहीं आए थे। कई वरिष्ठ और कनिष्ठ रचनाकारों और सम्पादकों के साथ हुए ये वार्तालाप उनकी आलोचना-दृष्टि, समकालीन रचनात्मकता पर उनके विचारों और सरोकारों को रेखांकित करते हैं। इनमें से कुछ साक्षात्कार इसलिए और भी दिलचस्प है कि इनमें उन्होंने किसी एक ही रचनाकार या कृति पर केन्द्रित प्रश्नों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं। मसलन स्वयं प्रकाश, त्रिलोचन, काशीनाथ सिंह का ‘काशी का अस्सी’ आदि पर केन्द्रित बातचीत। साक्षात्कारकर्ताओं में भी अलग-अलग पीढ़ियों के लोग हैं; जिन्होंने अपने-अपने ढंग से उनसे अपनी जिज्ञासाओं पर विचार-विनिमय किया है।
Cinema Ke Baare Mein
- Author Name:
Naseer Munni Kabir +3
- Book Type:

- Description:
इस पुस्तक में नसरीन मुन्नी कबीर ने जावेद अख़्तर जैसे बहुआयामी रचनाधर्मी से लम्बी बातचीत की है, जिसके अन्तर्गत जावेद की प्रारम्भिक रचनाओं पर पड़े प्रभावों, उनके पारिवारिक जीवन और फ़िल्म-जगत के महत्त्वपूर्ण पक्षों को उद्घाटित किया गया है, जहाँ जावेद ने सन् ’65 के आसपास ‘कैपलर-ब्वाय’ के तौर पर अपना करियर शुरू किया था। इस बातचीत में सलीम ख़ाँ के साथ उनके सफल साझे-लेखन पर भी पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इस पुस्तक में मौलिक विचारक जावेद अख़्तर ने विश्लेषणात्मक ढंग से हिन्दी सिनेमा की परम्परा, गीत-लेखन और कथा-तत्त्व के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया है और फ़िल्म-लेखन के कई पक्षों की सारगर्भित चर्चा की है। पटकथा-लेखन और फ़िल्मी शायरी के बारे में अपनी मौलिक मान्यताओं और रचना-प्रक्रिया के विभिन्न आयामों पर टिप्पणियाँ करने के साथ-साथ जावेद ने यह भी बताया है कि श्रेष्ठ पटकथाएँ और गीत कैसे लिखे जाते हैं? जावेद ने सफ़ाई और ईमानदारी से अपनी शायरी और राजनैतिक जागरूकता की विकास-यात्रा पर भी महत्त्वपूर्ण चर्चा की है। जावेद के हास्य-व्यंग्य, उनकी प्रखर बौद्धिकता, पटकथा-लेखन की तकनीक पर उनकी गहरी पकड़ और सोदाहरण बातचीत ने इस पुस्तक को उन सबके लिए महत्त्वपूर्ण बना दिया है, जिनकी फ़िल्म और कला में रुचि है।
Dhara Ankurai
- Author Name:
Asghar Wajahat
- Book Type:

- Description:
प्रतिष्ठित कथाकार असगर वजाहत की उपन्यास-त्रयी का अन्तिम भाग 'धरा अँकुराई' एक बहुआयामी कथानक को जीवन की सच्चाइयों तक पहुँचाता है। ‘कैसी आगी लगाई’ और ‘बरखा रचाई’ शीर्षक से त्रयी के दो भाग पूर्व में प्रकाशित होकर पर्याप्त प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। अनेक विवरणों, वृत्तान्तों, परिस्थितियों और अन्त:संघर्षों से गुज़रती यह कथा-यात्रा ‘जीवन के अर्थ’ का आईना बन जाती है। एक दीगर प्रसंग में आया वाक्य है, ‘...यह यात्रा संसार के हर आदमी को जीवन में एक बार तो करनी ही चाहिए।’ यह अन्त:यात्रा है। इससे व्यक्ति जहाँ पहुँचता है, वहाँ एक प्रश्न गूँज रहा है कि आख़िर इस जीवन की सार्थकता व प्रासंगिकता क्या है? उपन्यास-त्रयी के तीन प्रमुख पात्रों में से एक सैयद साजिद अली, जिन्होंने पत्रकारिता की कामयाब ज़िन्दगी जी है, महसूस करते हैं कि उनके भीतर एक ख़ालीपन फैलता जा रहा है। लगता है कि अब तक जिया सब बेमक़सद रहा। सैयद साजिद अली ‘ज़िन्दगी का अर्थ’ समझने के लिए उसी छोटी-सी जगह लौटते हैं, जहाँ से निकलकर वे जाने कहाँ-कहाँ गए थे। उपन्यासकार ने छोटी-छोटी घटनाओं के ज़रिए व्यक्ति और समाज की कशमकश को शब्द दिए हैं। प्रवाहपूर्ण भाषा ने पठनीयता में इज़ाफ़ा किया है। मौक़े-ब-मौक़े उपन्यास में वर्तमान की समीक्षा भी है, ‘‘जनता का पैसा किसी का पैसा नहीं है। यह माले-मुफ़्त है जो हमारे देश में बेदर्दी से बहाया जाता है और इसकी बारिश में अफ़सर, नेता और ठेकेदार नहाते हैं। हमने लोकतंत्र के साथ-साथ ‘विकास’ का भी एक विरला स्वरूप विकसित किया है जो कम ही देशों में देखने को मिलेगा। एक पठनीय व संग्रहणीय उपन्यास।
Bhasha Ka Samajshastra
- Author Name:
Rajendra Prasad Singh
- Book Type:

- Description:
वेदों में ‘मनुष्य’ और ‘मानुष’ एक साथ कैसे चलते हैं? कौन किसका अपभ्रंश है? अगर मनुष्य में षष्ठी विभक्ति है तो मानुष में कौन-सी विभक्ति है जिसके बलबूते पहले की व्युत्पत्ति मनु की सन्तति की जाती है? वैदिक ‘मान’ का अर्थ है घर, जो घर में रहता है, वह ‘मानुष’ है और जो वन में रहता है, वह ‘वनमानुष’ है; इसीलिए ‘वनमनुष्य’ पद नहीं चलता है। हिन्दी भाषी क्षेत्र की लोकबोलियों में मानुस शब्द चलता है, मनुष्य नहीं। इसलिए यह दावा करना कि लोकबोलियों के सभी शब्द संस्कृत के अपभ्रंश हैं, ग़लत होगा। भोजपुरी में जानवरों की माँद को आज भी मान/मनान कहा जाता है। लोकबोलियों में मनुष्य को ‘मनई’ भी कहा जाता है यानी मान (घर) में रहनेवाला जैसे कि मान (घर) में रहनेवाले को खड़ी बोली में ‘मानव’ कहा जाता है। ‘मान’ का क्रियामूल ‘मा’ है जिसका अर्थ होता है—निर्माण करना। यह क्रियामूल मठ, मण्डप, मन्दिर, माँद, मान, मनान, माड़ो—सभी में मौजूद है। ‘मानुष’ तत्सम है, ‘मनुष्य’ तद्भव है। संस्कृत में बहुत सारे शब्द मिलेंगे जो लोकबोलियों के आधार पर गढ़े गए हैं परन्तु ग़लती से उसे तत्सम मान लिया जाता है। कारण कि हमारी भाषावैज्ञानिक स्थापना रही है कि संस्कृत पुरानी भाषा है, इसलिए लोकबोलियों के शब्द तद्भव हैं जबकि संस्कृत का पहला लम्बा अभिलेख 150 ई. में पश्चिमी भारत के जूनागढ़ से मिलता है। प्राकृत के अभिलेख भारत में सबसे पुराने हैं। वैदिक भाषा पुरानी है, वैदिक संस्कृति भी पुरानी है तब इस तथ्य की भी पड़ताल की जानी चाहिए कि वैदिक युग के तथाकथित सोने के सिक्के ‘निष्क’ कहाँ गए जबकि धातु के सिक्के सबसे पहले गौतम बुद्ध के युग में मिलते हैं। भाषा का समाजशास्त्र इस बात का जवाब देगा कि मागधी प्राकृत के साथ संस्कृत के आचार्यों ने दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों किया है।
Digant Ki Oar
- Author Name:
Bipin Bihari Mishra +1
- Book Type:

- Description:
उम्र की ढलती साँझ में अपने गाँव में, अपने लोगों के बीच, अपने घर में रहने की इच्छा हरेक मनुष्य की होती है। ‘अपना घर’! कितना प्यारा शब्द है यह। लेकिन क्या सबको नसीब होता है। घर बनाने और बसाने में कितनी मुश्किलें आती हैं, यह किसी भी मध्यवित्त व्यक्ति का सबसे तल्ख़ और संजीदा अनुभव होता है।
‘दिगन्त की ओर’ इन्हीं अनुभवों का प्रवाहपूर्ण भाषा में औपन्यासिक विस्तार है। यह जीवन और समाज की विडम्बनाओं और विद्रूपताओं पर तो प्रकाश डालता ही है, जीवन–संध्या में बुजुर्गों की उपेक्षाओं और उम्मीदों को भी रेखांकित करता है। ओड़िया भाषा के इस महत्त्वपूर्ण उपन्यास का सुजाता शिवेन द्वारा किया सर्जनात्मक अनुवाद निश्चय ही हिन्दी पाठकों को रुचिकर और पठनीय लगेगा, ऐसा हमारा विश्वास है।
Katha Satisar
- Author Name:
Chandrakanta
- Book Type:

- Description:
शैव, बौद्ध और इस्लाम की साँझी विरासतों से रची कश्मीर वादी में पहले भी कई कठिन दौर आ चुके हैं। कभी औरंगजेब के समय, तो कभी अफ़ग़ान-काल में। लेकिन वे दौर आकर गुज़र गए। कभी धर्म की रक्षा के लिए गुरु तेगबहादुर मसीहा बनकर आए, कभी कोई और। तभी ललद्यद और नुन्दऋषि की धरती पर लोग भिन्न धर्मों के बावजूद, आपसी सौहार्द और समन्वय की लोक-संस्कृति में रचे-बसे जीते रहे। आज वही आतंक, हत्या और निष्कासन का कठिन सिकन्दरी दौर फिर आ गया है, तब सिकन्दर के आतंक से वादी में पंडितों के कुल ग्यारह घर बचे रह गए थे। गो कि नई शक्ल में नए कारणों के साथ, पर व्यथा-कथा वही है—मानवीय यंत्रणा और त्रास की चिरन्तन दु:ख-गाथा। लोकतंत्र के इस गरिमामय समय में, स्वर्ग को नरक बनाने के लिए कौन ज़िम्मेदार हैं? छोटे-बड़े नेताओं, शासकों, बिचौलियों की कौन-सी महत्त्वाकांक्षाओं, कैसी भूलों, असावधानियों और ढुलमुल नीतियों का परिणाम है—आज का रक्त-रँगा कश्मीर? पाकिस्तान तो आतंकवाद के लिए ज़िम्मेदार है ही, पर हमारे नेतागण समय रहते चेत क्यों न गए? ऐसा क्यों हुआ कि जो औसत कश्मीरी, ग़ुस्से में, ज़्यादा-से-ज़्यादा, एक-दूसरे पर काँगड़ी उछाल देता था, वही कलिशनिकोव और एके सैंतालीसों से अपने ही हमवतनों के ख़ून से हाथ रँगने लगा? ‘ऐलान गली ज़िन्दा है’ तथा ‘यहाँ वितस्ता बहती है’ के बाद कश्मीर की पृष्ठभूमि पर लिखा गया चर्चित लेखिका चन्द्रकान्ता का बृहद् उपन्यास है—‘कथा सतीसर’। लेखिका ने अपने इस उपन्यास में पात्रों के माध्यम से मानवीय अधिकार और अस्मिता से जुड़े प्रश्नों को उठाया है। इस पुस्तक में सन् 1931 से लेकर 2000 के शुरुआती समय के बीच बनते-बिगड़ते कश्मीर की कथा को संवेदना का ऐसा पुट दिया गया है कि सारे पात्र सजीव हो उठते हैं । सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य में घटे हादसों से जन-जीवन के आपसी रिश्तों पर पड़े प्रभावों का संवेदनात्मक परीक्षण ही नहीं है यह पुस्तक, वर्तमान के जवाबदेह तथ्यों को साहित्य में दर्ज करने से एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ भी बन गई है।
Ek Zameen Apni
- Author Name:
Chitra Mudgal
- Book Type:

- Description:
विज्ञापन की चकाचौंध दुनिया में जितना हिस्सा पूँजी का है, शायद उससे कम हिस्सेदारी स्त्री की नहीं है। इस नए सत्ता-प्रतिष्ठान में स्त्री अपनी देह और प्रकृति के माध्यम से बाज़ार के सन्देश को ही उपभोक्ता तक नहीं पहुँचाती, बल्कि इस उद्योग में पर्दे के पीछे एक बड़ी ‘वर्क फ़ोर्स’ भी स्त्रिायों से ही बनती है। ‘एक ज़मीन अपनी’ विज्ञापन की उस दुनिया की कहानी भी है जहाँ समाज की इच्छाओं को पैना करने के औज़ार तैयार किए जाते हैं और स्त्री के उस संघर्ष की भी जो वह इस दुनिया में अपनी रचनात्मक क्षमता की पहचान अर्जित करने और सिर्फ़ देह-भर न रहने के लिए करती है। आठवें दशक की बहुचर्चित कथाकार चित्रा मुद्गल ने इस उपन्यास में उसके इस संघर्ष को निष्पक्षता के साथ उकेरते हुए इस बात का भी पूरा ध्यान रखा है कि वे सवाल भी अछूते न रह जाएँ जो विज्ञापन-जगत की अपेक्षाकृत नई संघर्ष-भूमि में नारी-स्वातंत्र्य को लेकर उठते हैं, उठ सकते हैं।
Katha Shakuntala Ki
- Author Name:
Radhavallabh Tripathi
- Book Type:

- Description:
शकुंतला-दुष्षंत की कथा की इस नाट्य-प्रस्तुति को जो चीज़ विशिष्ट बनाती है, वह है इसका काल-बोध और तत्कालीन परिवेश का तथ्यपरक निरूपण। ‘महाभारत’ में किंचित् परिष्कृत रूप में सबसे पहले आनेवाली यह कथा वास्तव में वैदिक काल की है। इसके पात्र वेदों के समय से सम्बन्ध रखते हैं। दुष्यंत के पुत्र भरत का ज़िक्र भी वेदों में मिलता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ‘महाभारत’ में यह कथा जिस रूप में आई, उसके बजाय यह नाटक इस कथा के उस रूप को आधार बनाता है जो वैदिक काल में रहा होगा। ‘महाभारत’ में, और उसके बाद हम जिस भी रूप में इस कथा को देखते हैं, उसकी जड़ें सामन्ती मूल्य-संरचना में हैं। वैदिक संस्करण निश्चय ही कुछ भिन्न रहा होगा और उसका परिप्रेक्ष्य आदिम मूल्यबोध से रहा होगा। इस नाटक में कथा के उसी रूप को पकड़ने का प्रयास किया गया है। इसीलिए यहाँ ‘दुष्यंत’ को ‘दुष्षंत’ कहा गया है जो ‘महाभारत’ तथा वैदिक साहित्य में आता है। यह प्रचलित कथा मूलत: मातृसत्तात्मक समाज से ताल्लुक़ रखती है जहाँ लड़कियों को अपना जीवन साथी चुनने की पूरी छूट है, जैसाकि शकुंतला भी करती है। नाटक में भूख और अकाल की भी चर्चा है जिन्हें वेदों के ही कुछ प्रसंगों के आधार पर पुन:सृजित किया गया है। भाषा, संवाद-रचना और प्रसंगानुकूल दृश्य-रचना के चलते यह नाटक शकुंतला की जानी-पहचानी कथा को हमारे सामने नए और भावप्रवण रूप में प्रस्तुत करता है; जो मंच के लिए जितना अनुकूल है, साधारण पाठ के लिए भी उतना ही रुचिकर है।
Jab Jyoti Jagi
- Author Name:
Sukhdev Raj +1
- Book Type:

- Description:
भारतीय स्वाधीनता-आन्दोलन में बिना किसी प्रकार की सुयश-प्राप्ति की कामना किए हँसते-हँसते फाँसी के तख़्ते पर झूल जानेवाले मृत्युंजयी वीरों के बलिदान का सर्वाधिक महत्त्व रहा है। उन वीरों को जितनी प्रतिष्ठा और सम्मान प्राप्त होना चाहिए था, उसकी उपेक्षा एवं अवहेलना सत्ता-लोलुप स्वार्थियों ने सदैव ही की है। यदि उन वीरों की नि:स्वार्थ मातृ-भूमि-सेवा का अनुकरण किया गया होता तो भारतीय जनता आज स्वर्ग-सुख का उपभोग निस्सन्देह करती होती। पराधीनता के समय जो भी क्रान्तिकारी साहित्य उपलब्ध था उसे भारतीय युवक बड़े उत्साह से पढ़ते थे; इसीलिए तत्कालीन युवकों में देश के प्रति नि:स्वार्थ सेवा की सच्ची लगन थी। आज भारतीय जनता, विशेषतः युवकों में सुषुप्त त्याग और सेवा की भावना को जाग्रत करने के लिए उन क्रान्तिकारी वीरों के इतिहास के पठन-पाठन की अत्यधिक आवश्यकता है। भारतीय क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में अभी तक बहुत कम लिखा गया है। इन क्रान्तिकारियों के सम्बन्ध में पुस्तक लिखने का कार्य अत्यन्त कठिन है क्योंकि सभी क्रान्तिकारी अपने कार्य-कलापों को एकदम गुप्त रखते थे, उनके निकटतम सहयोगी भी उनकी बहुत सी बातों से अपरिचित रहते थे। प्रस्तुत पुस्तक अमर शहीद स्व. चन्द्रशेखर आज़ाद और भगवतीचरण बोहरा के अत्यन्त विश्वासपात्र, क्रान्तिकारी आन्दोलन में निरन्तर कार्य करनेवाले भाई सुखदेव राज जी ने लिखी है। अस्तु, पुस्तक की उपादेयता निर्विवाद है।
Kamayani-Lochan : Vols. 1-2
- Author Name:
Uday Bhanu Singh
- Book Type:

- Description:
डॉ. उदयभानु सिंह भारतीय दर्शन और संस्कृत काव्यशास्त्र के गहन अध्येता थे। तुलसीदास पर उनके ग्रन्थ अपने प्रकाशन-काल से ही निरन्तर तुलसी काव्य के रसग्राही पाठकों और शोधार्थियों के लिए प्रामाणिक स्रोत-सामग्री की भूमिका निबाह रहे हैं। ‘कामायनी-लोचन’ उसी परम्परा को आगे बढ़ानेवाली रचना है। विद्वान लेखक ने प्राक्कथन में इस तथ्य का उल्लेख किया है कि कामायनी आधुनिक काव्य का “ऐसा गौरवग्रन्थ है जिस पर सबसे अधिक आलोचनात्मक पुस्तकें तथा लेख लिखे गए हैं; सबसे अधिक टीकाएँ लिखी गई हैं, सबसे अधिक शोधपरक निबन्ध एवं प्रबन्ध प्रणीत हुए हैं, और सर्वाधिक विवाद भी हुआ है।” यह कथन इस सामग्री से उनके बाख़बर होने का प्रमाण है। इस सामग्री की ख़ूबियों या ख़ामियों पर उन्होंने कोई टिप्पणी नहीं की। विनम्रतापूर्वक बस इतना जोड़ा कि “ ‘कामायनी’ के विषय में बहुत-कुछ कहा जा चुका है, परन्तु बहुत-कुछ अनकहा भी रह गया है। अतएव उनके अध्ययन की शृंखला को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। ‘कामायनी-लोचन’ उसी शृंखला की एक कड़ी है।’’ कहना न होगा कि ‘कामायनी-लोचन’ हिन्दी में कामायनी की टीका-व्याख्याओं की किसी चली आती अधूरी परम्परा की पूरक कड़ी-भर नहीं है। उसमें जो कहने से रह गया उसे कहकर रिक्त स्थान की पूर्ति का दायित्व निर्वाह भर करने का प्रयास नहीं है। उसका आदर्श तो संस्कृत-आचार्यों की वह समृद्ध टीका-व्याख्या परम्परा है जिसके आधार पर लेखक ने इसका नामकरण किया है। दो खंडों में विभाजित इस ग्रन्थ में ‘कामायनी’ के सर्गों की व्याख्या-समीक्षा के साथ इसकी शब्द-सूची प्रस्तुत की गई है। प्रस्तुति की एक निश्चित प्रविधि है। ऐसा ढाँचाबद्ध पैटर्न जिससे एकरूपता और एकरसता एक साथ पैदा होती है। एक ऐसा अकादमिक अनुशासन जिसका पालन वे शिक्षक के रूप में अपनी कक्षाओं में भी करते थे। वे पहले सर्ग-वार कथा-सूत्र प्रस्तुत करते हैं, उसके बाद एक संक्षिप्त समीक्षात्मक टिप्पणी जोड़कर अन्त में शब्दार्थ देते हैं—जिसे उन्होंने शब्द-सूची कहा है। इस प्रकार ‘लोचन’ कामायनी का शब्दकोश भी है। अकादमिक अनुशासन के विरोधियों को इसकी विधिबद्धता से रसज्ञता और सर्जनात्मकता की कमी की शिकायत हो सकती है। भूलना नहीं चाहिए कि इसका रचयिता दर्शन, व्याकरण और काव्यशास्त्र का अध्येता विद्वान तो था, अभिनवगुप्त की तरह कवि नहीं। उनकी यह कृति भले ही पाठकों को गहरी रसमग्नता का संतोष न दे पर ‘कामायनी’ की समझ में अनेक भ्रान्तियों का निवारण करेगी और उसकी गहन अर्थ-व्यंजनाओं के उद्घाटन में मददगार होगी—व्युत्पत्यर्थ और दार्शनिक अनुषंगों की दृष्टि से। —निर्मला जैन
Manak Hindi Ka Vyavharparak Vyakaran
- Author Name:
Ramesh Chandra Mahrotra
- Book Type:

- Description:
हिन्दी भाषा हिन्दी की समस्त बोलियों के समुच्चय की बोधक है। जिस तरह नदी की सहायिकाएँ अपनी अलग सत्ता रखते हुए भी नदी की मुख्यधारा से अपना नित्य सम्बन्ध निभाती हैं, उसी तरह भाषा की बोलियाँ भी अपना पृथक् अस्तित्व बनाए रखकर भाषा की अन्तर्धारा से अपना सम्बन्ध सजीव किए रहती हैं। भाषा का मानक रूप एक बहुग्राही सम्मिश्रण रूप होता है। उसकी सैर दूर-दूर तक और गलियारों तक में होती है, इसलिए वह हर जगह से कुछ न कुछ ग्रहण करती चलती है। अनेक क्षेत्रों के शब्दादि और विशिष्ट अर्थ प्राय: उसमें प्रविष्ट होते रहते हैं। जिन रूपों और प्रयोगों को सभी लोग शुद्ध मानते हुए उनका केवल एक रूप स्वीकार करते हैं, उनके बारे में कोई भी कह देगा कि वे मानक हैं। लेकिन नए-पुराने तर्कों और रूपों के आधार पर कभी-कभी एकाधिक रूप या प्रयोग भी चलन में होते हैं। विख्यात भाषा वैज्ञानिक रमेश चंद्र महरोत्रा की यह पुस्तक भाषा प्रयोग की ऐसी ही व्यावहारिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए आम पाठक से लेकर भाषा को माध्यम के रूप में प्रयोग करनेवाले बुद्धिजीवियों तक के लिए एक निर्देशिका के रूप में काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
Agyeya Ke Uddharan
- Author Name:
Sachchidananda Hirananda Vatsyayan 'Ajneya' +1
- Book Type:

- Description:
अज्ञेय का लेखन इतना विपुल और वैविध्यपूर्ण है कि उसमें से उद्धरणों के एक चयन की बात सोचते ही पहला सवाल तो उसकी क्रम-प्रक्रिया को लेकर ही सामने आया। लगभग सभी साहित्यिक विधाओं में उत्कृष्ट लेखन के साथ-साथ अज्ञेय ने मानव-जीवन और समाज से जुड़ी सभी समस्याओं पर भी स्वतन्त्र रूप से सम्यक् विचार किया है। अज्ञेय के लिए न केवल साहित्य बल्कि पूरा मानव-जीवन ही मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है। इस क्रम से आरम्भ करने पर सहज ही केन्द्रीय मूल्य स्वतन्त्रता और उनसे जुड़े सवालों को अलगे चरण में रख पाना उचित लगा और साहित्य क्योंकि मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है, अत: भाषा, साहित्य आदि से जुड़े चिन्तन से चयन किये जाने वाले उद्धरणों का क्रम भी तय हो गया। इस चयन से गुज़रते हुए पाठक को यह महसूस हो सकता है कि अज्ञेय जब किसी दार्शनिक या तर्कशास्त्रीय गुत्थी पर भी विचार करते हैं तो उनका चिन्तन अधिकांशत: किसी अकादेमिक दार्शनिक की तरह का नहीं, बल्कि एक संवेदनात्मक दृष्टि, या कहें कि कवि-दृष्टि से किया गया चिन्तन होता है। अज्ञेय का चिन्तन कवि-दृष्टि का चिन्तन है, अकादेमिक नहीं। शायद, इसलिए इस कवि-दृष्टि के विमर्शात्मक चिन्तन और कविताओं के बीज-संवेदन का अहसास भी सुधी पाठकों को हो सकेगा। पाठक यदि चयन की इन मोटी रेखाओं के सहारे अज्ञेय के चिन्तन और कवि-कर्म की विपुलता, विविधता और सूक्ष्मता में प्रवेश करने की प्रेरणा पा सकें, तो यही इस चयन की सार्थकता होगी। अज्ञेय के कवि-कर्म और चिन्तन के द्वन्द्वों-समाधानों और प्रक्रियाओं-निष्कर्षों में ऐसा बहुत कुछ है जो किसी भी समय के लेखक-पाठक के लिए सदैव प्रासंगिक रहेगा। —प्रस्तावना से
Aklant Kaurav
- Author Name:
Mahashweta Devi +1
- Book Type:

- Description:
यह उपन्यास सामयिक वाम राजनीति के परस्पर विरोधी पक्षों के संघर्ष की प्रामाणिक दस्तावेज़ है और इतनी परिपक्व राजनीतिक सूझ-बूझ और प्रखर सामाजिक चेतना से ओतप्रोत कि वाम राजनीति की विचारधाराओं के घटाटोप आकाश के स्पष्ट दिशा-संकेत देता है। संथालों के जागुला गाँव में द्वैपायन सरकार का आगमन एक ऐसी थीसिस लिखने के लिए होता है, जिसका उद्देश्य संथालों की ताक़त और उनकी एकता को छिन्न-भिन्न करना है। वाम राजनीति के दक्षिणी छोर के स्थायी निवासी द्वैपायन सरकार किन्हीं अदृश्य शक्तियों से चालित होकर अक्सर इसी तरह के विषयों के अनुसन्धानकर्ता के रूप में प्रख्यात हैं, किन्तु अब उन्हें पहचान लिया गया है। युवा इन्द्र प्रामाणिक कलकत्ता के यूनियन फ़्रंट पर बड़े नेताओं के बदलते तेवर देखकर ईमानदारी से गाँव में काम करने के लिए आया है, किन्तु नवीन बाबू और मोती बाबू जैसे सजे-धजे काडरों का उसे नक्सल सिद्ध करने में कौन-सा मक़सद है? ईमानदार काडर और बेईमान काडर तथा छुटभैये कॉमरेडों के इस संघर्ष में संथालों को अपना विश्वसनीय पक्ष ढूँढ़ने में कोई कठिनाई नहीं होती। यह उपन्यास पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा खेतिहर भूमि के बँटवारे के लिए चलाए गए ‘ऑपरेशन बर्गा’ के लाभों से वंचित आदिवासी जातियों की संघर्ष-गाथा है। न्याय की लड़ाई का प्रामाणिक दस्तावेज़ है।
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book