Mystery of the Missing Cap and Others - Award Winning Stories
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Mystery of the Missing Cap and Others Stories, originally published as Manoj Dasanka Katha O Kahini was the first collection of short stories in Odia to receive the Sahitya Akademi Award (1972). The collection spans twenty-two years of the writer's contribution to Odia short story. While Sri Das has won wider recognitions through his subsequently written stories, roping into the circle of his admires writers like Graham Greene and H.R.F. Keating, this collection marks a mile stone in the evolution of Odia fiction, infusing into the genre of short stories a neew vitality through a combination of deep psychological insight into characters and situations and a remarkable precision in sytle. The translation is by the author himself whoalso occupies a special places in Indian writing in English.
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Mystery of the Missing Cap and Others Stories, originally published as Manoj Dasanka Katha O Kahini was the first collection of short stories in Odia to receive the Sahitya Akademi Award (1972). The collection spans twenty-two years of the writer's contribution to Odia short story. While Sri Das has won wider recognitions through his subsequently written stories, roping into the circle of his admires writers like Graham Greene and H.R.F. Keating, this collection marks a mile stone in the evolution of Odia fiction, infusing into the genre of short stories a neew vitality through a combination of deep psychological insight into characters and situations and a remarkable precision in sytle. The translation is by the author himself whoalso occupies a special places in Indian writing in English.
Book Details
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ISBN9879390310029
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Pages228
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Avg Reading Time8 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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Description:
राजकमल चौधरी की कहानियाँ परमाणु में पर्वत के समावेश की कहानियाँ हैं, जो मानव-जीवन के अनछुए प्रसंगों से उठाकर लाई गई हैं, जिनमें राजकमल की सारी की सारी कहानी-कला मौजूद है और लगता ऐसा है कि इनमें कोई कला नहीं दिखाई गई है। जनजीवन का सत्य ज्यों का त्यों रख दिया गया है। सच्ची घटनाएँ तो अख़बारी रिपोर्टों में बयान होती हैं, कहानी में घटनाएँ सच की तरह आती हैं। घटनाएँ सच हों, इससे ज़्यादा ज़रूरी है कि वे सच लगें भी। राजकमल की कहानियों की यह ख़ास विशेषता है कि वे सारी घटनाएँ सच हों या न हों, सच लगती अवश्य हैं।
धर्म, साहित्य, नौकरी, व्यापार, फ़िल्म, सामाजिक जीवन-यापन...तमाम क्षेत्रों की विकृतियों का इतनी सूक्ष्मता से यहाँ पर्दाफ़ाश किया गया है कि वे अचानक तार-तार हो जाती हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों की पूर्ति, क्षणिक मनोवेगों की पुष्टि के लिए मनुष्य किस सीमा तक गिर सकता है; संन्यासी और सिद्ध योगी और यहाँ तक कि देवता की छवि रखनेवाला भी पल-भर में कैसा जानवर हो जाता है; ख़ूँख़ार जानवर कैसा गऊ हो जाता है; शेर की दहाड़ और आतंक का मालिक पल-भर में कैसे गीदड़, चूहा, केंचुआ, चींटी हो जाता है और रेंगने लगता है—मानव-जीवन की इसी उठा-पटक का एलबम है—राजकमल की कहानियाँ।
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