Katha Saptak - Dheerendra Asthana
Author:
Dhirendra AsthanaPublisher:
Shivna PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 140
₹
175
Available
collection of seven brilliant stories
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- पराधीन
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- उस रात की गंध
- मुहिम
- और आदमी रोया
- चीख
ISBN: 9788119018178
Pages: 72
Avg Reading Time: 2 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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ज़िन्दगी से प्यार और अन्य कहानियाँ जैक लण्डन की कुछ चुनी हुई कहानियों का यह संकलन हिन्दी पाठकों के समक्ष उनकी मौलिक और प्रयोगशील सर्जनात्मकता की एक बानगी पेश करेगा।
उत्तरी इलाक़ों की अपनी कहानियों में जैक लण्डन ने बुर्जुआ सभ्यता को अनछुई प्रकृति के सामने खड़ा करने की कोशिश की। अनछुई, शुद्ध बना देनेवाली प्रकृति के प्रति सम्मोहन और बुर्जुआ सभ्यता की तकनीकी-सांस्कृतिक उपलब्धियों के प्रति आस्था के बीच सतत द्वन्द्व उसकी कहानियों में आद्यन्त एक क़िस्म के तनाव का निर्माण करता रहा।
प्रकृति के साथ जैक लण्डन ने अपनी प्रारम्भिक रचनाओं से ही जो जटिल द्वन्द्वात्मक रिश्ता क़ायम करना शुरू किया था, वह अन्त तक बना रहा। एक धरातल पर वे मनुष्य और प्रकृति के इस शाश्वत द्वन्द्व को दिखलाते हैं, जहाँ प्रकृति का अंग होने के साथ ही उत्पादक शक्तियों को अपने विकास के लिए उससे जूझना भी होता है। दूसरे धरातल पर, भीषण प्रकृति से ज़िन्दगी की हिफ़ाज़त के लिए इनसान की लड़ाई में वे सामाजिक संघर्ष में जूझ रहे नर्क़ की ज़िन्दगी बितानेवाले लोगों की जिजीविषा और युयुत्सा का रूपक तलाशते और गढ़ते दिखाई देते हैं। एक तीसरे धरातल पर उनकी रचनाओं में प्रकृति हमें घोर मानवद्रोही बुर्जुआ समाज से दूर एक आत्मीय-आदिम शरण्य के रूप में दिखती है और अलगाव के निषेध का समग्र प्रभाव उत्पन्न होता है।
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Surang
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Sanjay Sahay
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90 के दशक में बड़ी तेज़ी से बदल रही थी हिन्दी कहानी और उतनी ही तेज़ी से बदल रहा यह हमारा देश। वह एक खौलते हुए यथार्थ का समय था जिसे कथा साहित्य में दक्षता के साथ प्रस्तुत करनेवाले लेखकों में संजय सहाय बेहद महत्त्वपूर्ण हैं। संजय सहाय की कहानियों का पहला संग्रह था—‘सुरंग’। ‘सुरंग’ को एक तरह से बेहतरीन कहानियों का निवास भी कहा जा सकता है जहाँ हर कहानी में मनुष्य जाति का कोई न कोई ज़ख़्म और कोहराम है। अच्छी कथाओं का मोक्ष यह होता है कि उन्हें कभी मोक्ष नहीं मिलता, हमेशा इसी दुनिया में जीना-मरना उनकी नियति और सिद्धि है। इसीलिए ‘सुरंग’ की कहानियाँ अपने प्रकाशन के क़रीब दो दशक बाद आज भी प्रासंगिक और समकालीन हैं, बल्कि कई अर्थ में पहले से भी अधिक। वे मौजूदा समाज के प्रातिनिधिक चरित्र उस हिंसा का प्रत्याख्यान करती हैं जो सर्वाधिक बेबस और मुफ़लिस का आखेट करती है। संजय सूक्ष्मता में जाकर हिंसा की सत्ता-संरचना का विखंडन करते हैं; यह अनायास नहीं है कि संजय की कहानियों में ख़ून, हथियार, प्रहार, वर्दी आदि बार-बार आते हैं। इन्हीं के समानान्तर सिर उठाती देखी जा सकती है, साधारण इनसान की रुलाई, चीख़ और प्रतिरोध की आवाज़।
‘सुरंग’ की कहानियों में देखा जा सकता है कि दृश्यान्तर बहुत हैं। ‘शेषान्त’, ‘मध्यान्तर’, सरीखी कहानियों में बहुत सारे लोग मिलकर विविध दृश्य रचते हैं तो ‘खेल’, ‘सुरंग’, ‘टोपी’ जैसी कहानियों में एक-दो पात्रों की आँख के सामने अनेक अपने-अपने क़िस्सों के दृश्यों के साथ प्रकट होते हैं। यूँ भी कह सकते हैं, संजय के यहाँ जीवन अनोखेपन और चाक्षुषता के साथ है। ‘अविश्वसनीय’ और ‘सुरंग’ में जहाँ लोग-बाग ज़्यादा नहीं हैं, वहाँ उनकी जगह समय का विस्तृत फलक है। ‘अविश्वसनीय’ में संजय ने स्त्री के दु:ख तथा उसके प्रति पुरुष-सत्ता के नज़रिए को शान्त, बढ़ा, बाजिरह कहा है। ‘सुरंग’ की सुरंग इतिहास के रक्तपात से भरी हुई है। यह सुरंग अतीत से चलकर बरास्ते वर्तमान होते हुए भविष्य तक का उद्घाटन करती है जिसमें शक्तियों की बेरहमी, अन्याय और बेदखली गश्त कर रही है।
संक्षेप में कहें, ‘सुरंग’ की कहानियाँ ऐसी हैं जो कभी-कभी रची जा पाती हैं लेकिन लम्बे वक़्त के लिए साथ रह जाती हैं।
—अखिलेश
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