🇮🇳 India’s home-grown full-stack ecosystem for Publishers, Authors, Writers, and Readers. 🎊🎊 Celebrate Your Language, Authors from Your Own Land, with Rachnaye!!! 🎊🎊 Enjoy 🎧 Audiobooks at Rachnaye, download the Rachnaye App from Play Store or App Store

Bahanon Ka Jalsa

Ships within 48 Hours

Free Shipping in India on orders above Rs. 1100


About the book

बहनों का जलसा सूर्यबाला की कहानियों का नया संकलन है। अपनी कहानियों के बारे में उनका कहना है : ‘मनुष्य में से मनुष्यता का खारिज होते जाना ही मेरी कहानियों की दुखती रग है।’ और इसे वे सभ्यता की उस दिशा से जोड़ती हैं, जिधर वह जा रही है, जिधर हम जा रहे हैं। बिना किसी आन्दोलन का हिस्सा हुए, और बिना किसी विमर्श का सायास अनुकरण किए, सूर्यबाला ने अपनी कहानियों में पठनीयता और प्रवाह को बरकरार रखते हुए, सभ्यता की संवेदनहीन यात्रा में असहाय चलते पात्रों के अत्यन्त सजीव चित्र खींचे हैं। बेहद साधारण और जीवन में रचे-बसे मध्यवर्गीय चरित्रों के मनोजगत से वे उन पीड़ाओं का संधान करती रही हैं जिनके दायरे में पूरी मानवता आ जाती है। रिश्तों और भावनात्मक निर्भरता के जो धागे भारतीय समाज को विशिष्ट बनाते हैं, उनकी टूटन खासतौर पर उनका ध्यान खींचती है। इस प्रक्रिया में स्त्री कैसे सबसे ज्यादा खोती है, यह भी क्योंकि वही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द परिवार बसता है, और फिर समाज आकार लेता है। दुखद विसंगतियाँ, विडम्बनाएँ, मन की तहों के भीतर हरदम चलते संघर्ष, इन सबको उनकी कहानियाँ, उनके ही शब्दों में कहें तो, ‘यथासम्भव नेकनीयती के साथ तलाशती और सहेजती रहती है।’ यह नेकनीयती, कह सकते हैं कि उनकी लेखकीय और नागरिक चेतना का सत्व है; और उनकी कहानियों का प्राण भी जिसके चलते वे हर उम्र के पाठकों को प्रिय रही हैं।

Read more

₹ 250

₹ 200 20% off

Unavailable

Rachnaye membership

Pick a membership and see exactly what it gets you

  • 15 Free Deliveries
  • 1 Free Book up to ₹500 MRP

Format

This Book is out of stock
Frequently bought together
Bahanon Ka Jalsa This book ₹200
Katha Saptak - Suryabala Suryabala ₹100
Mere Sandhi-Patra Suryabala ₹150
3 books selected ₹500 ₹450
This Book is out of stock

100% Original

Fast Dispatch

Secure Payment

About the Book

बहनों का जलसा सूर्यबाला की कहानियों का नया संकलन है। अपनी कहानियों के बारे में उनका कहना है : ‘मनुष्य में से मनुष्यता का खारिज होते जाना ही मेरी कहानियों की दुखती रग है।’ और इसे वे सभ्यता की उस दिशा से जोड़ती हैं, जिधर वह जा रही है, जिधर हम जा रहे हैं।

बिना किसी आन्दोलन का हिस्सा हुए, और बिना किसी विमर्श का सायास अनुकरण किए, सूर्यबाला ने अपनी कहानियों में पठनीयता और प्रवाह को बरकरार रखते हुए, सभ्यता की संवेदनहीन यात्रा में असहाय चलते पात्रों के अत्यन्त सजीव चित्र खींचे हैं।

बेहद साधारण और जीवन में रचे-बसे मध्यवर्गीय चरित्रों के मनोजगत से वे उन पीड़ाओं का संधान करती रही हैं जिनके दायरे में पूरी मानवता आ जाती है। रिश्तों और भावनात्मक निर्भरता के जो धागे भारतीय समाज को विशिष्ट बनाते हैं, उनकी टूटन खासतौर पर उनका ध्यान खींचती है। इस प्रक्रिया में स्त्री कैसे सबसे ज्यादा खोती है, यह भी क्योंकि वही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द परिवार बसता है, और फिर समाज आकार लेता है।

दुखद विसंगतियाँ, विडम्बनाएँ, मन की तहों के भीतर हरदम चलते संघर्ष, इन सबको उनकी कहानियाँ, उनके ही शब्दों में कहें तो, ‘यथासम्भव नेकनीयती के साथ तलाशती और सहेजती रहती है।’ यह नेकनीयती, कह सकते हैं कि उनकी लेखकीय और नागरिक चेतना का सत्व है; और उनकी कहानियों का प्राण भी जिसके चलते वे हर उम्र के पाठकों को प्रिय रही हैं।

Book details

Fast dispatchShips within 48 hours
Secure paymentOnline, or cash on delivery on eligible orders
100% OriginalGenuine copy from Rajkamal Prakashan Samuh
Format
Paperback
Publisher
Rajkamal Prakashan Samuh
Edition
1st
Publication year
2023
Weight
135 grams
ISBN-13
9788119028016
Pages
144
Reading time
~5 hrs
Age
18+
Country of origin
India
Dimensions
14 × 22 cm
Language
Hindi

Recommended for you

Customer reviews

Be the first to write a review

Read this one? Tell other readers what you thought about the story, the translation and the print.

Offers

Loading offers…

whatsapp