Hawa Bahut Tez Hai
Author:
Kailash BanwasiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 239.2
₹
299
Available
कैलाश बनवासी ऐसे विरल कथाकार हैं जिनकी कहानियों में समाज के हाशिए के लोग बुलंद होकर बोलते हैं। ‘हवा बहुत तेज़ है’ उनका आठवाँ कहानी-संग्रह है जिसमें कुल ग्यारह कहानियाँ संकलित हैं। इन कहानियों के नायक एक तरफ़ मिस्त्री, प्लम्बर, चपरासी, वार्ड ब्वाय और रोज़गार की जद्दोजहद में फँसे युवा हैं तो दूसरी तरफ़ मध्यवर्ग के ऐसे अधेड़ हैं जिन्होंने बाज़ार और भ्रष्टाचार के बीच अपना ईमान और अच्छाइयाँ बचा रखी हैं या कि ऐसे मध्यवर्गीय लोग जो नए ज़माने की हवा के असर में तो हैं पर देश, काल और समाज का यथार्थ उन्हें अपनी तरफ़ खींच रहा है।
‘दाग़ अच्छे हैं’, ‘एक पुराना आदमी’, ‘मथुरा प्रसाद उर्फ़ राहत का एक नाम’, ‘गोपाल का गाना’ जैसी कहानियाँ कामगार वर्ग के बारे में अनेक शहरी मध्यवर्गीय पूर्वाग्रहों को तार-तार करने का काम करती हैं। ‘सब कुछ ठीक-ठाक है’ में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं है। यह पहले से ही तबाह लोगों के कोरोना काल में बर्बाद हो जाने की कहानी है। यह उस लालची विसंगति की भी कहानी है जहाँ बहुतेरे प्लांट मालिकों ने कोरोना के नाम पर कंपनी को दिवालिया घोषित करवा के जनता का धन डकार लिया। दूसरी ओर उनमें काम करने वाले लोग सड़क पर आ गए। रोजगार की स्थितियाँ और उनके लिए संघर्ष दिन पर दिन बदतर ही होते गए हैं। ‘उन आँखों में अब कोई सपना नहीं है’ पढ़ते हुए बरबस अमरकान्त की कालजयी कहानी ‘डिप्टी कलेक्टरी’ याद आती है। ‘ज्ञान-विज्ञान-संज्ञान’ आज की उस उलटबाँसी को मानीख़ेज तरीक़े से रचती है जहाँ चीज़ों को देखने का एक अवैज्ञानिक रवैया सब तरफ़ पसर रहा है और विडम्बना यह है कि उसे विज्ञान के दम पर ही सत्य भी बताने की कोशिश की जा रही है।
इन कहानियों में कुछ लोगों के किसी भी क़ीमत पर बहुत तेज़ आगे बढ़ते जाने के बीच उन लोगों का जीवन-संघर्ष और सुख-दुःख दर्ज हुआ जिन्होंने अपने जीवन-मूल्यों से समझौता नहीं किया और दिशाहीन बदलाव की तेज़ हवा के बीच तनकर खड़े हैं। कैलाश को अमरकान्त और स्वयंप्रकाश जैसे सिद्ध कथाकारों की पंक्ति में रखकर देखा जाना चाहिए। इन कहानियों को पढ़ना अपने आसपास की दुनिया से नए सिरे से परिचित होना है, एक तेज़ भागमभाग में जिसकी तरफ़ से हमने निगाह फेर ली है।
ISBN: 9789360865528
Pages: 200
Avg Reading Time: 7 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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कोई भी विधा जितना कथ्य होती है, उससे कुछ ज़्यादा फ़ॉर्म होती है। फ़ॉर्म से ही पता चलता है कि रचनाकार ने सामाजिक के रूप में अपने समय में ख़ुद को कहाँ स्थित किया है। अवधेश प्रीत का कहानीकार अपने कथ्य को एक सन्तुलित दूरी से देखता और उसका अंकन करता है जिसके बल ही शायद उनकी कहानी भी पाठक को अपने आनन्द में डुबो लेने के बजाय एक ख़ास दूरी पर खड़ा रखकर अपने कथ्य को वस्तुगत ढंग से देखने को बाध्य करती है। इसी संग्रह में शामिल शीर्षक कहानी 'चाँद के पार एक चाभी' जाति की जड़ और विकट संरचना, उसके सम्मुख प्रेम की असहायता और असम्भवता, और साथ ही आधुनिकता के साथ जगती उम्मीदों के नए अंकुरों की कहानी है। यह कहानी आँसुओं की बाढ़ ला सकती थी, लेकिन अगर नहीं लाती और पढ़ने के बाद डूबने के बजाय चिन्ता में डाल देती तो यह उसके शिल्प के चलते है।
शिल्प का यह जादू वे भाषा के प्रयोग में ख़ास तौर पर साधते हैं। उनका क़िस्सागो दृश्य को बखानने की प्रक्रिया में चीज़ों को देखने का एक नज़रिया पाठक को देता चलता है जो गुदगुदाता भी है और कहानी के साथ-साथ पात्रों के चरित्र की रेखाओं को भी उभारना चलता है।
अवधेश प्रीत जाने-माने कथाकार हैं। लगातार पढ़े जाते रहे हैं। मनुष्यता के हामी किसी भी लेखक को समाज में जिन चीज़ों से विचलित होना चाहिए, उन सबको ईमानदारी से देखने के साक्ष्य इन कहानियों में भरे पड़े हैं।
Mulakaat
- Author Name:
Sanjay Sahay
- Book Type:

-
Description:
नई कहानी के पारम्परिक ढाँचे को लगभग तोड़कर उदय प्रकाश, संजीव और शिवमूर्ति जैसे कथाकारों ने जो नई ज़मीन बनाई, उसे नब्बे के दशक में जिन कथाकारों ने विस्तार और गहराई देने का काम किया, उनमें संजय सहाय भी एक रहे। 1994 में ‘हंस’ में प्रकाशित अपनी कहानी ‘शेषान्त’ के साथ उन्होंने हिन्दी कथा-साहित्य में जैसे एक नई लकीर खींच दी थी। बेशक, उन्होंने कहानियाँ कम लिखीं। लेकिन जब भी लिखीं, पाठकों को एक नया आस्वाद, एक नया अनुभव दिया। अब लगभग दो दशक बाद उनका यह नया कहानी-संग्रह ‘मुलाक़ात’ नए सिरे से याद दिलाता है कि ज़िन्दगी की तरह कहानी में भी कितनी परतें हो सकती हैं। यह दरअसल शिल्प का कमाल नहीं, संवेदना की पकड़ है जो कथाकार को यह देखने की क्षमता देती है कि एक मुठभेड़ के भीतर कितनी मुठभेड़ें चलती रहती हैं, कि जब हम दूसरे को मारने निकलते हैं तो पहले कितना ख़ुद को मारते हैं, कि जीवन कितना निरीह और फिर भी कितना मूल्यवान हो सकता है, कि एक पछतावा उम्र-भर किसी का इस तरह पीछा कर सकता है कि वह अपनी देह के खोल से निकलकर उस शख़्स को खोजना चाहे जिसके साथ बचपन में कभी उसने अन्याय किया था, कि उसे एहसास हो कि यह अन्याय व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक था और इस वजह से कहीं ज़्यादा मार्मिक और मारक हो गया था।
ये कहानियाँ आपको तनाव से भर सकती हैं, आपको स्तब्ध कर सकती हैं और आपको इस तनाव से मुक्ति भी दिला सकती हैं, इस स्तब्धता से उबार भी सकती हैं। क़िस्सागोई की तरलता और जीवन के स्पन्दन से भरी इन कहानियों को पढ़ना एक विलक्षण अनुभव है जो आपको कुछ और बना देता है।
—प्रियदर्शन
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