Jeev Janawar
Author:
Sagar SarhadiPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections0 Ratings
Price: ₹ 128
₹
160
Unavailable
प्रसिद्ध फ़िल्मकार और उर्दू के मशहूर लेखक सागर सरहदी का इन कहानियों की दुनिया जिन किरदारों से बनी है, उनमें फ़िल्मी परिवेश के किरदार तो हैं, पर पूरे संकलन में वे मामूली जगह घेरते हैं। बाक़ी में हैं मुम्बई शहर के तलछट, निम्नवर्गीय, निम्न-मध्यवर्गीय, शिक्षक, वकील और पंजाब के ग्रामीण।</p>
<p>इन कहानियों में एकाकीपन, यथास्थिति के ख़िलाफ़ खीज और ग़ुस्सा है। जहाँ वे अपने किरदारों को सहानुभूति देते हैं, वहीं उनके दोमुँहेपन, निष्क्रियता और सहनशीलता को अपने तंज़ का निशाना बनाते हैं। कई कहानियों में ‘मैं’ अपनी कहानी कहता है। लेकिन यह ‘मैं’ अपने को छिपाता या ढकता नहीं, बल्कि अनावृत करता है। ख़ुद पर बेरहमी से तंज़ करता है। जहाँ यह ‘मैं’ परोक्ष है, वहाँ भी उसकी उपस्थिति प्रभावशाली है।</p>
<p>सागर सरहदी गद्य की भाषा में कविता करने से बाज आते हैं। वे कहानियों में बिम्ब कविता के अन्दाज़ में नहीं लाते, बल्कि वे ज़िन्दगी के क़तरों से बिम्ब का काम लेते हैं। उनके पास कहानियाँ कहने का फ़लसफ़ाई अन्दाज़ है जो आज की कहानियों में कम दीखता है। लेकिन यह अन्दाज़ आसमानी फ़लसफ़े की तरह हवा में नहीं इतराता, बल्कि वे फ़िजिक्स से शुरू होकर मेटाफ़िजिक्स की तरफ़ बढ़ते हैं। पहले वे अपने घने पर्यवेक्षण से हमें क़ायल करते हैं, फिर उस विवरण को फ़लसफ़े की ऊँचाई पर ले जाते हैं। ‘जीव जनावर’ में अमानवीयता के विरुद्ध सघन चीख़ है।
ISBN: 9788126704088
Pages: 144
Avg Reading Time: 5 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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दूसरी कहानी संग्रह की कहानियाँ यथार्थ को तथ्य-सीमित करने की रूढ़ि को ध्वस्त करती हैं। घटनाओं का बोझिल आडंबर छोड़कर वे कहानी विधा की नई मुक्ति का ऐसा संकेत देती हैं कि हम कहानी को गद्य-कथा या कथा-निबंध की तरह पढ़ सकें। वे तथाकथित यथार्थवादी कहानी के ढाँचे को विचलित कर मानव- व्यवहार और प्रकृति के आधे-अधूरे प्रारूप या पाठ की तरह दिख सकती हैं। इसी अधूरेपन, इसी अनहोनी में अलका सरावगी की कहानियों का अर्थ छिपा है।
दूसरी कहानी संग्रह की कहानियाँ (‘पार्टनर’, ‘एक पेड़ की मौत’, ‘दूसरे किष्ले में औरत’, ‘यह रहगुज़र न होती’, ‘रिपन स्ट्रीटेर परवीन अख्तर’, ‘कनफ़ेशन’) संकेत हैं कि शायद जीवन-पूर्णता या सार्थकता की संभावना इसी अपूर्णता या अधूरेपन में है। देखने की चीज़ यह है कि इस कथा-कल्पना में क्रीड़ा-वृत्ति या विनोद-वृत्ति स्थगित नहीं है, पर वह प्रायः एक तरह के जीवन विषाद या अवसाद का ही मार्मिक प्रत्यक्ष है। इस अवसाद को महान बनाने की भावुकता से मुक्त अलका सरावगी का कथा-मार्ग साधारण या मामूली पर भरोसा टिकाता है जो फिर इस ओर इशारा है कि साधारण में ही छिपा है ग़ैर-साधारण या असाधारण का मर्म।
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कई दशकों के बाद राजेन्द्र यादव की कहानियों का यह नया संग्रह सामने आ रहा है। अपने शैली लाघव और जीवन की जटिलताओं को भीतर तक उकेरनेवाली ये कहानियाँ परिपक्व कथाभाषा के कारण भी पाठकों का ध्यान खींचेंगी। लेकिन बहुत सम्भव है कि इन कहानियों के विस्फोटक और विवादास्पद कथ्य ही चर्चा में रहे और बाक़ी बातों की ओर सुधी आलोचकों का ध्यान नहीं जाए। ये कहानियाँ मध्यवर्गीय पाठक ही नहीं, हिन्दी कथालोचना के सामने भी एक बड़ी चुनौती पेश करती हैं।
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