Khidki
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Author:
Sheela Roy SharmaPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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"विदेश में लंबे समय से रह रही युवती जब स्त्री के रूप में माता-पिता के घर लौटती है तो पुराने नक्श खोजती है, लेकिन अब तो उसके लिए वह खिड़की भी नहीं खुलती जिसके इंद्रधनुषी पारदर्शी शीशे कभी उसके अपने थे। हमारे सांप्रदायिक संस्कार शिक्षा और सभ्यता पर अकसर ही भारी पड़ते हैं। भाषा के महीन रेशों से बुनी जानेवाली कहानी के लिए लेखिका को मेरा साधुवाद। —मैत्रेयी पुष्पा शीला राय शर्मा की कहानियों का पर्यावरण सामाजिक होकर भी अधिकतर पारिवारिक है। कहानियाँ ‘सौतेली माँ’ और ‘चिल्लर बहू’ दो भिन्न वातावरण से जनमती हैं लेकिन दोनों के जीवन-मूल्य जैसे विवाह संस्था और धर्म के आधार पर संचालित हैं। इस जंजीर की कड़ी ही कहानी ‘खिड़की’ है। इसमें मनोविज्ञान की भीतरी तहों का कार्य-व्यापार है। सूक्ष्म मनोभावों का अंकन यहाँ गौरतलब है। कहन की ऐसी विशेषता भी द्रष्टव्य है जो अन्य कथा-कथन से अप्रभावित है। यही पाठ में विश्वसनीयता पैदा करता है। यह कहानीकार का अपना संवेदना, कथ्य और कहन का संसार है। यह निजता का ऐसा हस्ताक्षर है जो मौलिक है। —लीलाधर मंडलोई
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"विदेश में लंबे समय से रह रही युवती जब स्त्री के रूप में माता-पिता के घर लौटती है तो पुराने नक्श खोजती है, लेकिन अब तो उसके लिए वह खिड़की भी नहीं खुलती जिसके इंद्रधनुषी पारदर्शी शीशे कभी उसके अपने थे। हमारे सांप्रदायिक संस्कार शिक्षा और सभ्यता पर अकसर ही भारी पड़ते हैं। भाषा के महीन रेशों से बुनी जानेवाली कहानी के लिए लेखिका को मेरा साधुवाद।
—मैत्रेयी पुष्पा
शीला राय शर्मा की कहानियों का पर्यावरण सामाजिक होकर भी अधिकतर पारिवारिक है। कहानियाँ ‘सौतेली माँ’ और ‘चिल्लर बहू’ दो भिन्न वातावरण से जनमती हैं लेकिन दोनों के जीवन-मूल्य जैसे विवाह संस्था और धर्म के आधार पर संचालित हैं। इस जंजीर की कड़ी ही कहानी ‘खिड़की’ है। इसमें मनोविज्ञान की भीतरी तहों का कार्य-व्यापार है। सूक्ष्म मनोभावों का अंकन यहाँ गौरतलब है। कहन की ऐसी विशेषता भी द्रष्टव्य है जो अन्य कथा-कथन से अप्रभावित है। यही पाठ में विश्वसनीयता पैदा करता है। यह कहानीकार का अपना संवेदना, कथ्य और कहन का संसार है। यह निजता का ऐसा हस्ताक्षर है जो मौलिक है।
—लीलाधर मंडलोई
Book Details
-
ISBN9789389471298
-
Pages216
-
Avg Reading Time7 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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अलका सरावगी अपनी कहानी अकसर जीवन और अस्तित्व के उस बिन्दु से उठाती हैं, जहाँ सामान्यत: कोई कहानी दिखाई नहीं देती। यह उनका कौशल है कि ऐसे ही किसी अनदीखते से दृश्य को वे एक सम्पूर्ण कहानी में खोल देती हैं। अपने पात्रों की मन:स्थिति, समाज का अध्ययन और मनुष्य के अन्तर्जगत की उनकी बारीक समझ इस रचना-यात्रा में उनके साथ रहती है, जिसके परिणामस्वरूप न सिर्फ एक पठनीय कथा हमारे सामने होती है, बल्कि जीवन का भी एक अछूता पक्ष हम देख पाते हैं।
यह उनकी सम्पूर्ण कहानियों का संकलन है जिसमें उनकी अब तक की सभी कहानियों को शामिल कर लिया गया है; वे भी जो अभी तक किसी संकलन में नहीं आ पाई थीं। अपनी कहानियों के बारे में उनका कहना है कि इन कहानियों ने ‘मुझे अपने चारों ओर, और व्यापक समाज में फैली हुईं असमानताओं और उनसे जूझते आदमी व उसके आन्तरिक और बाहरी विस्थापन को समझने की दृष्टि दी।’
इन कहानियों से गुजरना एक नई तरह की दुनिया से गुजरना है, ख़ासतौर पर संरचना के स्तर पर अलका जी की कहानियों को पढ़ना एक भिन्न अनुभव है। यहाँ हम न सिर्फ कहानी पढ़ते हैं, बल्कि उसके बनने की प्रक्रिया से भी साक्षात्कार करते हैं।
एक संग्रहणीय संचयन!
Dear Mrs. Naidu (Hindi)
- Author Name:
Mathangi Subramanian
- Book Type:

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Description:
बारह साल की सरोजिनी का पक्का दोस्त आमिर अब उसका पक्का दोस्त नहीं रहा. जब से वह उसकी बस्ती से बाहर रहने गया और मँहगे निजी स्कूल में पढ़ने जाने लगा तब से उसके और सरोजिनी के बीच कुछ भी तो एक-सा नहीं रह गया.
तभी सरोजिनी को ‘शिक्षा का अधिकार’ क़ानून के बारे में पता चला, जिसकी मदद से उसे आमिर के स्कूल में निःशुक्ल प्रवेश मिल सकता है- या यह भी हो सकता है कि वह अपने सरकारी स्कूल में इस तरह के सुधार ला सके कि आमिर को ही वापस अपने स्कूल में बुला ले, जहाँ वे साथ-साथ पढ़ने जाते थे.
अपने पक्के दोस्त से दोस्ती बचाने की इस कोशिश में सरोजिनी को कुछ ऐसे लोगों से मदद मिलती है, जिनके बारे में उसने कभी सोचा भी नहीं था. जैसे मज़दूर बस्ती में रहने वाली उसकी दबंग सहपाठी दीप्ति, दुष्ट होशियार मानवाधिकार वकील विमला मैडम, वर्षों पहले दिवंगत हो चुकी स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू, जो सरोजिनी की राज़दार पत्र-मित्र हैं.
मिसेज सरोजिनी नायडू को लिखे पत्रों के ज़रिए सरोजिनी की यह कहानी बताती है कि कैसे उसने ख़ुद अपनी दोस्ती, अपने परिवार और अपने भविष्य के लिए जूझना सीखा.
Manto : Pandrah Kahaniyan
- Author Name:
Saadat Hasan Manto
- Book Type:

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Description:
‘अगर आप मेरी कहानियाँ बरदाश्त नहीं कर सकते, तो दरअसल ज़माना ही नाक़ाबिले-बरदाश्त है।’ यह कहना था मंटो का जो अपनी कहानियों में वह लिखते थे जो सब आवरणों को हटाने के बाद ज़माने के चेहरे पर नज़र आता है।
उन्होंने मज़लूमों, ग़रीब-गुरबा और उन औरतों की कहानियाँ लिखीं जिन्हें समाज ने हाशिए पर धकेलकर छोड़ दिया था। उन्होंने उन भावनाओं को लेकर भी कहानियाँ लिखीं जिन्हें सफ़ेदपोश समाज खुली रोशनी में स्वीकार नहीं कर पाता। उन्होंने ऐसे-ऐसे अहसासात को ज़बान बख़्शी जिन्हें हम कभी अपनी चालाकी और कभी अल्फ़ाज़ की कमी की वजह से यूँ ही ग़ायब हो जाने देते हैं।
इसलिए आज भी उनकी कहानियाँ हमें अपनी कहानियाँ लगती हैं; वे अपने वक़्त से इतना आगे चल रहे थे कि आज भी हमें अपने आगे ही चलते दिखाई देते हैं।
यह संकलन उनकी कुछ बहुत चर्चित और कुछ ऐसी कहानियों को लेकर बनाया गया है जिनका ज़िक्र बहुत ज़्यादा नहीं होता। संकलन किया है जानी-पहचानी सिने-अभिनेत्री और निर्देशक नंदिता दास ने। उनकी चर्चित फ़िल्म ‘मंटो’ के साथ-साथ प्रकाशित यह किताब क़िस्सागो मंटो की पूरी शख़्सियत को सामने ले आती है। बकौल नंदिता : ‘उनकी कहानियों के पात्र अक्सर वे लोग होते हैं जो समाज के कोनों में रहते हैं और औरतों के लिए सहानुभूति भरी नज़र रखते हैं। यही बात उन्हें और लेखकों से अलग करती है।’
Jalsaghar
- Author Name:
Shri Naresh Mehta
- Book Type:

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Description:
...गोमती में जो लयात्मकता कभी-कभी विलीन हो जाती है, उसे कुमार गन्धर्व और बेगम अख़्तर बारम्बार आवाज़ देते हैं। ठाकुर ओंकारनाथ विद्यापति के पदों की भाँति, बीजों की भाँति धरती पर लोट-पोट जाते हैं...पर इस पिपासा-यात्रा का कहीं अन्त नहीं होता। विलास मुरझा जाता है, शृंगार बासी हो जाता है, कीन कंठों में ही विलीन हो जाता है और तब केवल गायक तथा वादक में से एक अनासक्त संन्यासी जन्म लेता दिखाई देता है...। ...मैं वादक को देख रहा था या उसके टेराकोटा को। किस काल का, युग का वह टेराकोटा था, मैं नहीं जानता। टेराकोटा की कोई लिपि नहीं होती और यदि कोई लिपि होती भी तो मेरे लिए वह व्यर्थ ही होती। मेरा उस संन्यासी से भाषाहीन अबाध परिचय हो चुका था। वीणा थी, सिद्ध वादक था, वादन की अप्रतिमता नि:सन्देह थी और था फाल्गुन रात्रि का वह जलसाघर, पर सब कुछ अपनी निर्मम यथार्थता में वैसा अविश्वसनीय था।... ...जीप भागती चली जा रही थी। जब हम बाँध पर चढ़ रहे थे तब भी वह वादन स्पष्ट था, यद्यपि अब उसकी परिसमाप्ति होने ही जा रही थी। मैं ऐसे वादन की परिसमाप्ति का साक्षात् नहीं कर सकता था। समाप्ति वैसे भी साक्षात् करने के लिए होती भी नहीं। मैं उस विहाग, उस वादन और उस संन्यासी वादक को गंगा-क्षेत्र के उस जलसाघर में छोड़ आया था, परन्तु मेरे साथ उसका टेराकोटा सदा के लिए चला आया। मुझमें निश्चय ही अपराध भाव था कि मैं बहुत बड़ा अपमान करके आ रहा हूँ। मैं इस अग्नितपे टेराकोटा को सम्भव है, जीवन-भर वहन कर सकूँ, पर उस वादन के बाद उस वादक का यदि साक्षात् करना पड़ता तो—तो कौन पार्थसारथी मुझे बचाता?
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