Andhera
(0)
Author:
AkhileshPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Short-story-collections₹
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<strong>‘</strong>वजूद’, ‘यक्षगान’, ‘ग्रहण’ और ‘अँधेरा’ महज़ चार लम्बी कहानियाँ नहीं हैं—ये हमारे कथा साहित्य की विरल उपलब्धियाँ हैं। इन्हीं चारों कहानियों से तैयार हुआ है अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कथाकार अखिलेश का नया कहानी-संग्रह ‘अँधेरा’। अखिलेश हिन्दी की ऐसी विशिष्ट प्रतिभा हैं जिनके लेखन को लेकर साहित्य-जगत उत्सुक और प्रतीक्षारत रहता है। अखिलेश की रचनात्मकता के प्रति गहरे भरोसे का ही नतीजा है कि उनकी रचनाएँ साहित्य की दुनिया में ख़ास मुक़ाम हासिल करती हैं। निश्चय ही इस अनोखे विश्वास के निर्माण में ‘अँधेरा’ की कहानियों की अहम भूमिका है। ‘अँधेरा’ में शामिल चारों कहानियाँ लगातार चर्चा के केन्द्र में रही हैं। इन्हें जो ध्यानाकर्षण—जो शोहरत मिली है, वह कम रचनाओं को नसीब होती है। इनके बारे में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ, आलेख, टिप्पणियाँ और विवाद समय-समय पर प्रकट हुए हैं। पर इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि चारों कहानियों पर पाठकों ने भी मुहर लगाई है। हमारे युग की मनुष्य विरोधी शक्तियों से आख्यान की भिड़न्त, भाषा की शक्ति, शिल्प का वैविध्य तथा उत्कर्ष, प्रतिभा की विस्फोटक सामर्थ्य—ये सभी कुछ कोई एक जगह देखना चाहता है तो उसे अखिलेश का कहानी-संग्रह ‘अँधेरा’ अवश्य पढ़ना चाहिए। ‘अँधेरा’ की कहानियों की ताक़त है कि वे अपने कई-कई पाठ के लिए बेचैन करती हैं। यही नहीं, वे प्रत्येक अगले पाठ में नई व्यंजना, नए अर्थ, नए सौन्दर्य से जगमगाने लगती हैं। इसी बिन्दु पर ‘अँधेरा’ की कहानियाँ न केवल पढ़े जाने और एकाधिक बार पढ़े जाने की इच्छा जगाती हैं, बल्कि सहेजकर रखे जाने की ज़रूरत भी पैदा करती हैं।
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<strong>‘</strong>वजूद’, ‘यक्षगान’, ‘ग्रहण’ और ‘अँधेरा’ महज़ चार लम्बी कहानियाँ नहीं हैं—ये हमारे कथा साहित्य की विरल उपलब्धियाँ हैं। इन्हीं चारों कहानियों से तैयार हुआ है अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और बहुचर्चित कथाकार अखिलेश का नया कहानी-संग्रह ‘अँधेरा’। अखिलेश हिन्दी की ऐसी विशिष्ट प्रतिभा हैं जिनके लेखन को लेकर साहित्य-जगत उत्सुक और प्रतीक्षारत रहता है। अखिलेश की रचनात्मकता के प्रति गहरे भरोसे का ही नतीजा है कि उनकी रचनाएँ साहित्य की दुनिया में ख़ास मुक़ाम हासिल करती हैं। निश्चय ही इस अनोखे विश्वास के निर्माण में ‘अँधेरा’ की कहानियों की अहम भूमिका है। ‘अँधेरा’ में शामिल चारों कहानियाँ लगातार चर्चा के केन्द्र में रही हैं। इन्हें जो ध्यानाकर्षण—जो शोहरत मिली है, वह कम रचनाओं को नसीब होती है। इनके बारे में अनेक प्रकार की व्याख्याएँ, आलेख, टिप्पणियाँ और विवाद समय-समय पर प्रकट हुए हैं। पर इन सबसे ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि चारों कहानियों पर पाठकों ने भी मुहर लगाई है। हमारे युग की मनुष्य विरोधी शक्तियों से आख्यान की भिड़न्त, भाषा की शक्ति, शिल्प का वैविध्य तथा उत्कर्ष, प्रतिभा की विस्फोटक सामर्थ्य—ये सभी कुछ कोई एक जगह देखना चाहता है तो उसे अखिलेश का कहानी-संग्रह ‘अँधेरा’ अवश्य पढ़ना चाहिए। ‘अँधेरा’ की कहानियों की ताक़त है कि वे अपने कई-कई पाठ के लिए बेचैन करती हैं। यही नहीं, वे प्रत्येक अगले पाठ में नई व्यंजना, नए अर्थ, नए सौन्दर्य से जगमगाने लगती हैं। इसी बिन्दु पर ‘अँधेरा’ की कहानियाँ न केवल पढ़े जाने और एकाधिक बार पढ़े जाने की इच्छा जगाती हैं, बल्कि सहेजकर रखे जाने की ज़रूरत भी पैदा करती हैं।
Book Details
-
ISBN9788126713592
-
Pages179
-
Avg Reading Time6 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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एक लड़की है जिसे उसके दीवानों ने और मुहल्ले-भर की भूखी नज़रों ने जवान और चतुर बना दिया; फिर एक चूहा है जो रोज़ रात में गृह-निवासी के सिरहाने तब तक सत्याग्रह करता रहा जब तक कि उसे नियमित खाना नहीं दिया जाने लगा; अकाल का उत्सव है जिसके लिए जमाखोर, मुनाफ़ाखोर और नौकरशाही सालभर अनुष्ठान कराते हैं कि कब अकाल पड़े, कब दिन फिरें...और फिर नाक है, एक नहीं कई-कई तरह की। कुछ कट जाती हैं, फिर बढ़ जाती हैं, कुछ ऐसी कि चाहे जो जतन करो, कटती ही नहीं; फिर एक आदमी है जिसके भीतर दो आदमी हैं; कभी एक ऊपर आ जाता है, कभी दूसरा हावी हो जाता है।
आगे सड़े हुए आलू प्रवेश करते हैं। वे सुबह से टोकरे में पड़े हैं, पर बिक नहीं पाए। उनसे पूछा गया कि अब तुम क्या करोगे तो बोले कि हम विद्रोह करेंगे। चाहे आधी रात तक टोकरे में पड़े रहें, बिकेंगे नहीं। हम भी आत्मसम्मान रखते हैं। देखने में वे कुछ बुद्धिजीवी मालूम पड़ रहे थे लेकिन एक सस्ते होटल वाला आया और उन्हें ख़रीद ले गया।
इनके अलावा भी इस किताब में कई पात्र और परिस्थितियाँ हैं जिन्हें परसाई जी की निर्मम लेखनी ने यहाँ संग्रहीत व्यंग्य-कथाओं में उनकी तमाम विडम्बनाओं और विकृतियों के साथ अंकित किया है।
Anugoonj
- Author Name:
Geetanjali Shree
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‘माई’, ‘हमारा शहर उस बरस’, ‘तिरोहित’, ‘वैराग्य’ एवं ‘ख़ाली जगह’ जैसी विविध व सशक्त कृतियों की मार्फ़त पिछले पन्द्रह सालों में एक विशिष्ट पहचान बनी है गीतांजलि श्री की हिन्दी कथा-जगत में। ‘अनुगूँज’ में संकलित इन दस कहानियों से ही शुरू हुआ था इस पहचान का सिलसिला। एक नई संवेदना जो विद्रोह और प्रतिरोध को उजागर करते वक़्त भी उनको कमज़ोर बनाती हताशा को अनदेखा नहीं करती, इशारों और बिम्बों के सहारे चित्रण करनेवाला शिल्प, और शिक्षित वर्ग की आधुनिक मानसिकता को दिखाती उनकी बोलचाल की भाषा, ऐसे तत्त्वों से बनती है गीतांजलि श्री की लेखकीय पहचान।
यूँ तो इन कहानियों का केन्द्र लगभग हर बार—एक ‘दरार’ को छोड़कर—बनता है शिक्षित मध्यवर्गीय नारियों से, पर इनमें वर्णित होते हैं हमारे आधुनिक नागरिक जीवन के विभिन्न पक्ष। जैसे वैवाहिक तथा विवाहेतर स्त्री-पुरुष सम्बन्ध, पारिवारिक परिस्थितियाँ, सामाजिक रूढ़ियाँ, हिन्दू-मुस्लिम समस्या, स्त्रियों की पारस्परिक मैत्री इत्यादि। यहाँ सीधा, सपाट कुछ भी नहीं है। हर स्थिति, हर सम्बन्ध, हर संघर्ष में व्याप्त रहते हैं परस्पर विरोधी स्वर। यही विरोधी स्वर रचते हैं हरेक कहानी का एक अलग राग।
Katha Saptak - Mamta Kalia
- Author Name:
Mamta Kalia
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- Description:
7 Short Stories
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