Chandrakanta (Santati) Ka Tilism
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Author:
Wagish ShuklaPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है। —अशोक वाजपेयी
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कई बार क्लैसिक कृतियाँ भी आलोचनात्मक ध्यान में गहनता से नहीं आतीं, भले उनकी लोकप्रियता व्यापक और असंदिग्ध हो। 'चन्द्रकान्ता’ और 'चन्द्रकान्ता सन्तति’ ऐसे ही क्लैसिक हैं जिन पर आलोचना और अनुसन्धान का ध्यान ख़ासी देर से, लगभग बीसवीं शताब्दी के अन्त पर, गया। गहरे विद्वान् और अनूठे आलोचक वागीश शुक्ल ने इस छोटी-सी पुस्तक में अध्यवसाय और सूक्ष्मता से इन दो कृतियों का विश्लेषण और आकलन किया है। रज़ा फ़ाउंडेशन उनकी 'मनमानी बातों’ को पुस्तकाकार प्रस्तुत करते हुए आश्वस्त है कि अब योग्य विचार और विश्लेषण की शुरुआत हो रही है।
—अशोक वाजपेयी
Book Details
-
ISBN9789388933858
-
Pages117
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘क्रान्तिकारी कवि निराला’ हिन्दी के महाप्राण कवि निराला के काव्यगत विकास-क्रम को उनके वैयक्तिक संघर्ष के सन्दर्भ में देखते हुए उनके जीवन, तत्कालीन परिस्थितियों और उनकी कविता की विशिष्टताओं का विवेचन करती है। गौरतलब है कि यह पुस्तक उस समय लिखी गई थी, जब हिन्दी आलोचना में निराला के कृतित्व को लेकर कोई सुसंयोजित काम नहीं हुआ था। गिराला और उनके समय के साथ-साथ यह पुस्तक छायावाद तथा उससे पहले की काव्य-प्रवृत्तियों पर भी टिप्पणी करती चलती है, विशेषतया छायावाद पर। डॉ. बच्चन सिंह कहते हैं कि छायावादी काव्य-सर्जना का सम्बन्ध कवि की निजी प्रेरणा से रहा और यह पारम्परिक कवि-प्रतिभा से भिन्न चीज थी। छायावादी या रोमैंटिक कवि के लिए उसके रचनात्मक क्षणों का महत्त्व सर्वोपरि होता है। इसीलिए निराला की कविता को समझने के लिए भी उनके व्यक्ति को जानना जरूरी है। इसी से हम यह जान पाते हैं कि प्रगतिवादी नहीं होते हुए भी उनकी कविता इतनी प्रगतिपरक कैसे है, और प्रयोगवादी न होते हुए भी कविताओं में इतने रूपात्मक प्रयोग वे कैसे कर सके। निराला के परिचय से लेकर यह पुस्तक उनकी कविता के निर्णायक पड़ावों से होती हुई उनकी रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण तक जाती है। संलग्न परिशिष्ट में संकलित ‘राम की शक्तिपूजा’ और निराला की अंतिम कविता की समीक्षा इसे और संग्रहणीय बना देती है। निराला और उनकी कविता को जानने-समझने के लिए इस पुस्तक का विशेष महत्व है।
Kahani Se Samwad
- Author Name:
Rashmi Rawat
- Book Type:

- Description:
कहानी से संवाद शास्त्रीय आलोचना नहीं है। जैसाकि नाम से ही ज़ाहिर है, यह कहानी के साथ चलते हुए, उससे बतियाने और उसे समझने की एक रचनात्मक प्रक्रिया है। रश्मि रावत रचना को उसकी समग्रता में देखती हैं, अपने समय और समाज के आलोड़न से उपजी एक जैविक इकाई के रूप में; जो उन मूल्यों को भी वहन करती है, जिन्हें रचनाकार जान रहा होता है, और उन चीजों को भी जो उसके अदेखे स्वयमेव रचना में आ जाती हैं, और कई बार लेखक की सचेत अभिव्यक्तियों से ज्यादा कुछ बता जाती हैं—कहानी के ही बारे में नहीं, लेखक के बारे में भी, और उस सामाजिक-नैतिक पर्यावरण के बारे में भी जिसमें उस रचना ने आकार लिया। यह आलोचना की उस परिपाटी से आगे जाना है जो दी गई कसौटियों पर कहानी या किसी भी रचना को विश्लेषित करके अपने काम को पूरा मान लेती है। इस पुस्तक में शामिल कथा-समीक्षाएँ, हर कहानी को पढ़ते हुए अपनी कुछ कसौटियाँ बनाती हैं; जिनकी जड़ें केवल साहित्य-चिन्तन में नहीं होतीं, बल्कि समाज और उन मूल्यों से जुड़ी चिन्ताओं में होती हैं, जिनकी खोज वे कहानी के घोषित उद्देश्यों के अलावा पात्रों की गठन, लेखकीय भाषा की बुनावट और उसके शब्द-चयन तक में करती हैं। यही वह विशेषता है जिसके चलते ये समीक्षाएँ सिर्फ सम्बद्ध कहानियों की समीक्षाएँ नहीं रह जातीं, बल्कि वृहत्तर पैमाने पर अपने समय, समाज और संस्कृति की समीक्षा हो जाती हैं।
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
- Author Name:
Garima Shrivastava
- Book Type:

- Description:
Literary Criticism on Feminism ‘चुप्पियाँ और दरारें’ भारत की अनेक भाषाओं में लिखी गई स्त्री आत्मकथाओं की न सिर्फ शिनाख्त करती है बल्कि इन आत्मकथाओं में विन्यस्त वैचारिकी का गहन विश्लेषण भी प्रस्तुत करती है। यह न सिर्फ हिन्दी बल्कि किसी भी भारतीय भाषा में अभूतपूर्व कही जाएगी। एक सर्वथा अनूठी पुस्तक। - अशोक वाजपेयी ध्वनि प्रदूषण पर तो आज बहुत चर्चा होती है, लेकिन चुप्पी के प्रदूषण पर नहीं। सच यह है कि जाति, लिंग और धर्म की बंदिशों से घिरे अवर्ण समाज और स्त्रियों की आत्माभिव्यक्ति बहुत कम सामने आती है। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तक में गरिमा श्रीवास्तव ने यह तथ्य पहचाना है और चुप्पी की कारा तोड़ते हुए लिखी गई विभिन्न वर्गों और जातियों से निकली औरतों की आपबीती के मर्म को एक गम्भीर अन्तर्दृष्टि से परखा है। पठनीय और सरस। —मृणाल पांडेय गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब ‘चुप्पियाँ और दरारें’ हमारा ध्यान स्त्री आत्मकथाओं की ओर ले जाती है, जहाँ मनुष्य जाति के स्त्री पक्ष के तनिक भिन्न अनुभव से हमारा साक्षात्कार होता है। यह स्त्रियों की अपनी अनुभूति है, उनकी अपनी आत्मस्वीकृतियाँ, पीड़ा और उल्लास है। कभी सिमोन द बोउआर ने ‘द सेकंड सेक्स’ के माध्यम से जेंडर का हाल सुनाया था, कुछ उसी अन्दाज में गरिमा श्रीवास्तव की यह किताब हमें भारतीय स्त्रियों की अनसुनी कहानी बताती है। निःसंदेह पठनीय और संग्रहणीय। —प्रेमकुमार मणि >गरिमा श्रीवास्तव की निगाह हिन्दी पर तो है ही, वे इस बहुभाषी, बहुधार्मिक, बहुजातीय और बहुसामुदायिक महादेश में हिन्दू, मुसलमान, दलित, सवर्ण, बांग्ला, मलयालम और कन्नड़ दायरों में स्त्री आत्मकथाओं के एक ऐसे बहुलतावादी संसार में प्रवेश करती हैं जिसका संधान अभी तक एक साथ एक जगह नहीं किया गया है। अश्वेत स्त्री-आत्मकथाओं पर उनका काम इस बृहद कृति में पाठकों को बोनस की तरह उपलब्ध है। —अभय कुमार दुबे
Chuppiyaan Aur Daraarein : Stree Aatmakatha : Paath Aur Saiddhantiki
Garima Shrivastava
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