Devki Ka Athwa Beta
(0)
Author:
Yogendra Pratap SinghPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Literary-fiction₹
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Book Details
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ISBN9789389742251
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Pages104
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Avg Reading Time3 hrs
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Age18+ yrs
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Country of OriginIndia
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उपन्यास के केन्द्र में है ‘मिनी चम्बल’ के नाम से जाना जानेवाला पश्चिमी चम्पारण, जहाँ अपराध पहाड़ की तरह नंगा खड़ा है, जंगल की तरह फैला हुआ है, नदियों में दूर-दूर तक बह रहा है, इतिहास के रंध्रों से हवा में घुल रहा है, भूगोल की भूल-भुलैया में डोल रहा है। जनजातियों और जंगली जीवों के बिन्दु से शुरू होकर यह जंगल फैलता ही चला गया है—पटना, लखनऊ, दिल्ली, नेपाल और देश—देशान्तर तक। उपन्यासकार ने बारह वर्षों के निरन्तर श्रमसाध्य शोध से जो अरण्यगाथा पेश की है, वह सर्वथा नई है—जितनी मनोरम, उतनी ही भयावह, और जुगुप्साकारी भी।
Dil
- Author Name:
Jaydeep Khot
- Book Type:

- Description: Hindi Poetry Book
Peeth Pichhe Ka Aangan
- Author Name:
Anirudh Umat
- Book Type:

- Description: ठ पीछे का आँगन' आज दिन-भर रुक-रुक कर, चाव और प्यार से, पढ़ता रहा और तुम्हारी कलाकारी से अभिभूत होता रहा। पिछले तीन-चार सालों में शायद ही किसी उपन्यास को मैंने इतने प्यार से पढ़ा हो। पहले वाक्य ने ही मुझे जकड़ लिया : 'अन्तहीन काली ऊन'। अँधेरे को ऐसी अनूठी उपमा शायद ही किसी और ने दी हो। मैंने पढ़ते हुए इतने निशान लगाए हैं, इतने वाक्य के नीचे लकीरें खींची हैं कि कोई देखे तो हैरान हो। ज़ाहिर है कि मैं तुम्हारे इस उपन्यास से बहुत प्रभावित, बहुत आश्वस्त, बहुत चमत्कृत हुआ हूँ। पहले उपन्यास (‘अँधेरी खिड़कियाँ’) में जो सम्भावनाएँ थीं, इसमें वे साकार हो गई हैं। सबसे अधिक मैं इस बात से प्रभावित हूँ कि तुम सारे उपन्यास में बहुत संयत हो—और तुमने एक तरह से (फिर) स्थापित कर दिया है कि उपन्यास में अमूर्तन सम्भव ही नहीं, सुन्दर भी हो सकता है, कि प्रयोग अराजकता का पर्याय नहीं, कि 'प्रयोगवादी' उपन्यास भी उपन्यास ही है—साधारण यथार्थ के बग़ैर, भाषा और शिल्प के सहारे, आन्तरिकता के सहारे, मानवीय लाचारियों के सहारे... कहने का मतलब यह कि तुमने अपने इस काम से मुझे प्रभावित ही नहीं किया, मोह भी लिया। —कृष्ण बलदेव व
Irawati
- Author Name:
Jaishankar Prasad
- Book Type:

-
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शुंगकालीन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखा गया यह अधूरा उपन्यास ‘इरावती’ कौतूहल, जिज्ञासा, रोमांस और मनोरंजन आदि तत्त्वों के कथात्मक इस्तेमाल की दृष्टि से ही महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि मनुष्य की जैविक आवश्यकताओं की निरुद्धि से उत्पन्न विकृतियों और कुंठाओं के परिणामों की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है। इरावती, कालिन्दी, अग्निमित्र, पुष्यमित्र, वृहस्पति मित्र और ब्रह्मचारी आदि चरित्र केवल कथा की वृद्धि नहीं करते हैं या केवल रहस्य को घना करके उपन्यास को रोमांचक ही नहीं बनाते हैं, बल्कि मानव मन का उद्घाटन करके यथार्थ के चरणों की ओर संकेत भी करते हैं।
बौद्ध धर्म की जड़ता और रसहीनता के साथ ही साथ इसमें अहिंसा और करुणा की प्रतिवादिता से उत्पन्न उन समस्याओं की ओर संकेत किया गया है, जो सत्याग्रह आन्दोलन से पैदा हो रही थीं। मूल्यों के रूढ़ि में बदलने की प्रक्रिया के संकेत के साथ प्रसाद जी इसमें सामाजिक रूढ़ियों और विकृतियों के प्रति विद्रोह को रेखांकित करते हैं। सामन्ती मूल्यों के साथ ही साथ इसमें उस सामाजिक परिवर्तन का संकेत किया गया है जो वर्ग और जाति की दीवारों को तोड़कर उपजता है और नए समाज में रूपान्तरित हो जाता है।
उपन्यास इतिहास और कल्पना, आदर्श और यथार्थ, अतीत और वर्तमान, आन्तरिक और बाह्यता की द्विभाजिकताओं के बीच से मनुष्य की रसधारा को सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है।
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