Hindutwa Aur Uttar-Aadhunikta
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Author:
Sudhish PachauriPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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किसी दैनिक कमेंट्री की तरह लिखी गई ये टिप्पणियाँ उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का रेखांकन करने और उसके समस्या-बिन्दुओं को खोलने की प्रक्रिया में लिखी जाती रही हैं। उत्तर-आधुनिक विमर्श और उत्तर-संरचनावादी पाठ-प्रविधि के बिना उत्तर-औपनिवेशिकता की इस गुत्थी को नहीं खोला जा सकता। यहाँ हिन्दुत्व के द्वारा चयनित और सक्रिय किए गए नाना प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक चिन्हों को पढ़ा गया है। वे इस लेखक के लिए ‘षड्यंत्र’ नहीं हैं<strong>, </strong>उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे और सत्तामूलक विमर्श के परिणाम हैं जिनकी कुल माँग आधुनिकता का एक सकलतावादी एजेंडा है। सती-दहन से लेकर अणुबम फोड़ने तक<strong>, </strong>मस्जिद के विध्वंस से लेकर मन्दिर निर्माण तक हर बात पर स्वदेशी एजेंडे की वकालत<strong>, </strong>पिछले दशकों के वे राजनीतिक<strong>-</strong>सांस्कृतिक समुच्चय हैं जो प्रचलित सेकुलर समीक्षा की मुठभेड़ों से परे और महफ़ूज़ ही रहे आए हैं। इसका कारण हिन्दुत्व शक्तियों द्वारा पैदा किए गए ‘प्रस्थापना परिवर्तन’ हैं<strong>,</strong> सेकुलर विमर्श जिन्हें समझने में कई बार नाकाम रहता है। उसे अगर कोई प्रस्थापनाएँ समस्याग्रस्त करती हैं तो लेट-कैपिटलिज़्म के द्वारा पैदा की गई उत्तर-आधुनिक प्रस्थापनाएँ हैं। उत्तर-आधुनिकता के समय में हिन्दुत्व एक ‘अ-सम्भावना’ ही है।</p> <p>भारत जैसे समाजों के सन्दर्भ में उत्तर-आधुनिकता की भूमिका नए पूँजीवाद की भूमिका की तरह द्वन्द्वात्मकता से युक्त है क्योंकि उसमें लेट-कैपिटलिज़्म का द्वन्द्ववाद सक्रिय है। यही इस लेखक की उत्तर-आधुनिकता की अपने ढंग की उत्तर-मार्क्सवादी पाठ-प्रविधि है जो उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे के आगे उत्तर-आधुनिकता से फिर<strong>-</strong>फिर टकराती है और हिन्दुत्व के सकलतावाद के एकार्थवादी तत्त्व के बरक्स उत्तर-आधुनिकता के बहुलवाद के तत्त्व को अल्पवाद के हाशियावाद के विमर्श में उपयोगी पाती है और साथ ही एक समकालीन ‘कल्चर टर्न’ को पढ़ते हुए उपभोक्तावाद और पॉपुलर कल्चर में इस उत्तर-औपनिवेशिक तत्त्ववाद के सकंट को गहराता देखती है।</p> <p>यह किताब हिन्दुत्व के अन्तरंग संकटों के इशारे देती है। यह हिन्दुत्व की समकालीन मार्केटिंग में निहित है। यह उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का उत्तर-आधुनिक ग्लोबल मंडली में बैठना भर है। इस मार्केटिंग के खेल को पुराने सेकुलर विमर्श की प्रस्थापनाओं से नहीं समझा जा सकता। बिन लादेनी ब्रांड का इस्लाम पहले इसी बाज़ार के लिए बना था<strong>, </strong>अब उसे उसी बाज़ार ने तोड़ा है। हिन्दुत्व की अन्तिम हद अगर कुछ है तो तालिबानीकरण है और वही उसकी समाधि भी है।
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किसी दैनिक कमेंट्री की तरह लिखी गई ये टिप्पणियाँ उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का रेखांकन करने और उसके समस्या-बिन्दुओं को खोलने की प्रक्रिया में लिखी जाती रही हैं। उत्तर-आधुनिक विमर्श और उत्तर-संरचनावादी पाठ-प्रविधि के बिना उत्तर-औपनिवेशिकता की इस गुत्थी को नहीं खोला जा सकता। यहाँ हिन्दुत्व के द्वारा चयनित और सक्रिय किए गए नाना प्रकार के धार्मिक और सांस्कृतिक चिन्हों को पढ़ा गया है। वे इस लेखक के लिए ‘षड्यंत्र’ नहीं हैं<strong>, </strong>उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे और सत्तामूलक विमर्श के परिणाम हैं जिनकी कुल माँग आधुनिकता का एक सकलतावादी एजेंडा है। सती-दहन से लेकर अणुबम फोड़ने तक<strong>, </strong>मस्जिद के विध्वंस से लेकर मन्दिर निर्माण तक हर बात पर स्वदेशी एजेंडे की वकालत<strong>, </strong>पिछले दशकों के वे राजनीतिक<strong>-</strong>सांस्कृतिक समुच्चय हैं जो प्रचलित सेकुलर समीक्षा की मुठभेड़ों से परे और महफ़ूज़ ही रहे आए हैं। इसका कारण हिन्दुत्व शक्तियों द्वारा पैदा किए गए ‘प्रस्थापना परिवर्तन’ हैं<strong>,</strong> सेकुलर विमर्श जिन्हें समझने में कई बार नाकाम रहता है। उसे अगर कोई प्रस्थापनाएँ समस्याग्रस्त करती हैं तो लेट-कैपिटलिज़्म के द्वारा पैदा की गई उत्तर-आधुनिक प्रस्थापनाएँ हैं। उत्तर-आधुनिकता के समय में हिन्दुत्व एक ‘अ-सम्भावना’ ही है।</p>
<p>भारत जैसे समाजों के सन्दर्भ में उत्तर-आधुनिकता की भूमिका नए पूँजीवाद की भूमिका की तरह द्वन्द्वात्मकता से युक्त है क्योंकि उसमें लेट-कैपिटलिज़्म का द्वन्द्ववाद सक्रिय है। यही इस लेखक की उत्तर-आधुनिकता की अपने ढंग की उत्तर-मार्क्सवादी पाठ-प्रविधि है जो उत्तर-औपनिवेशिक एजेंडे के आगे उत्तर-आधुनिकता से फिर<strong>-</strong>फिर टकराती है और हिन्दुत्व के सकलतावाद के एकार्थवादी तत्त्व के बरक्स उत्तर-आधुनिकता के बहुलवाद के तत्त्व को अल्पवाद के हाशियावाद के विमर्श में उपयोगी पाती है और साथ ही एक समकालीन ‘कल्चर टर्न’ को पढ़ते हुए उपभोक्तावाद और पॉपुलर कल्चर में इस उत्तर-औपनिवेशिक तत्त्ववाद के सकंट को गहराता देखती है।</p>
<p>यह किताब हिन्दुत्व के अन्तरंग संकटों के इशारे देती है। यह हिन्दुत्व की समकालीन मार्केटिंग में निहित है। यह उत्तर-औपनिवेशिक विमर्श का उत्तर-आधुनिक ग्लोबल मंडली में बैठना भर है। इस मार्केटिंग के खेल को पुराने सेकुलर विमर्श की प्रस्थापनाओं से नहीं समझा जा सकता। बिन लादेनी ब्रांड का इस्लाम पहले इसी बाज़ार के लिए बना था<strong>, </strong>अब उसे उसी बाज़ार ने तोड़ा है। हिन्दुत्व की अन्तिम हद अगर कुछ है तो तालिबानीकरण है और वही उसकी समाधि भी है।
Book Details
-
ISBN9788171197750
-
Pages255
-
Avg Reading Time9 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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‘सच्ची रामायण’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' की बहुचर्चित और सबसे विवादास्पद कृति रही है। पेरियार रामायण को एक राजनीतिक ग्रन्थ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज़ ठहराने के लिए लिखा गया और यह ग़ैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का उपकरण है।
‘रामायण’ की मूल अन्तर्वस्तु को उजागर करने के लिए पेरियार ने 'वाल्मीकि रामायण' के अनुवादों सहित; अन्य राम कथाओं, जैसे—'कंब रामायण', 'तुलसीदास की रामायण' (रामचरितमानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों तथा उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों का चालीस वर्षों तक अध्ययन किया और 'रामायण पादीरंगल' (रामायण के पात्र) में उसका निचोड़ प्रस्तुत किया। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' नाम से 1959 में प्रकाशित हुआ।
यह किताब हिन्दी में 1968 में ‘सच्ची रामायण' नाम से प्रकाशित हुई थी, जिसके प्रकाशक लोकप्रिय बहुजन कार्यकर्ता ललई सिंह थे। 9 दिसम्बर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया और पुस्तक की सभी प्रतियों को ज़ब्त कर लिया। ललई सिंह यादव ने इस प्रतिबन्ध और ज़ब्ती को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुक़दमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 16 सितम्बर, 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया।
प्रस्तुत किताब में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' का नया, सटीक, सुपाठ्य और अविकल हिन्दी अनुवाद दिया गया है। साथ ही इसमें 'सच्ची रामायण' पर केन्द्रित लेख व पेरियार का जीवनचरित भी दिया गया है, जिससे इसकी महत्ता बहुत बढ़ गई है। यह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के इतिहास को समझने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए एक आवश्यक पुस्तक है।
Prayagraj Aur Kumbh : Sanskritik Vaibhav Ki Abhinav Gatha
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Zilani Bano +1
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यागराज को तीर्थराज कहा गया है। यह भारत का सर्वप्रमुख सांस्कृतिक केन्द्र होने के साथ ही भारतीय सात्त्विकता का सर्वोत्तम प्रतीक भी है। यह हिन्दू-आस्था का एक महान केन्द्र तो है ही, यह हमारे देश की धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का केन्द्रबिन्दु भी है। प्रयागराज के माहात्म्य का विस्तृत वर्णन मत्स्य, पद्म और कूर्म पुराण के कई अध्यायों में मिलता है। कुम्भ के दौरान संगम तीर्थ पर एक स्नान-दिवस पर भक्तिभाव से कई बार इतने लोग जमा हो जाते हैं कि उनकी संख्या दुनिया के कई देशों की कुल जनसंख्या से भी अधिक होती है। उन श्रद्धालुओं को कभी कोई निमंत्रण नहीं देता, वे श्रद्धा और भक्ति की एक अदृश्य डोर में बँधकर वहाँ खिंचे चले आते हैं। हमारी सनातन सस्कृति का यह चुम्बकीय आकर्षण अनादिकाल से यथावत् बना हुआ है। श्रद्धा और आस्था का यह आवेग सदियों से चली आ रही हमारी परम्परा का हिस्सा है। यह परम्परा हमें अपनी मूल संस्कृति से जोड़े रखने के साथ ही सांस्कृतिक एकीकरण का पथ भी प्रशस्त करती है। स्वाभाविक रूप से प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास के बारे में जानना-समझना एक सुखद अनुभूति है। बहरहाल, अभिलेखीय और साहित्यिक स्रोतों के आधार पर प्रयागराज और कुम्भ के गौरवशाली इतिहास को इस पुस्तक में बहुत ही सरस ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसमें प्रामाणिकता और रोचकता का मणि-कांचन संयोग है। यह पुस्तक हमारे देश के सांस्कृतिक वैभव की एक अभिनव गाथा लेकर आई ह
Dr. Kalam : Prerna Ki Udaan
- Author Name:
Dr. Unnat Pandit
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ख्यातिप्राप्त वैज्ञानिक, विचारक, दाशर्निक और शिक्षक के रूप में डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने प्रत्येक भारतीय को सदैव प्रेरित किया है। उनके जीवन, कॅरियर और लेखन ने कोटि-कोटि भारतीयों का मार्गदर्शन किया है, उन्हें प्रोत्साहित किया है। वे हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन हर भारतीय के हृदय में हमेशा उनका स्थान रहेगा। वे समाज और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को लेकर हमारे मन में सदैव ज्ञान की ज्योति जलाते रहेंगे। प्रस्तुत पुस्तक ‘डॉ. कलाम : प्रेरणा की उड़ान’ उनके सहज-सरल, अनुकरणीय जीवन का एक विशद् विवेचन करती है। इस पुस्तक का उद्देश्य भारत के सर्वांगीण विकास के डॉ. कलाम के स्वप्न को साकार करने की प्रबल इच्छाशक्ति जाग्रत् कराना है, ताकि भारत के छात्र-युवा-आमजन प्रेरणा ले सकें। यह पुस्तक पढ़कर छात्रों को भारतीय रक्षा और अनुसंधान विकास में एरोनॉटिकल इंजीनियर, मिसाइल इंजीनियरिंग, उपग्रह प्रक्षेपण यान तकनीक के क्षेत्र में डॉ. कलाम के अनगिनत योगदानों के विषय में और ज्यादा जानने का अवसर मिलेगा। स्वप्न देखकर उन्हें साकार करने की क्षमता प्राप्त करने की उड़ान भरने में यह पुस्तक मील का पत्थर साबित होगी।
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