Dhyan Aur Iski Vidhiyan "ध्यान और इसकी विधियाँ" | Philosophy Self-Realization & Enlightenment | Swami Vivekananda Book in Hindi
Author:
Swami VivekanandPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality0 Ratings
Price: ₹ 240
₹
300
Available
"स्वामी विवेकानंद की गहन और अंतर्दृष्टि से परिपूर्ण यह पुस्तक ध्यान और इसकी विधियाँ, आत्म-खोज और आध्यात्मिक जागृति के मार्ग पर एक मार्गदर्शक की भाँति प्रकाश डालती है। विश्वविख्यात आध्यात्मिक विभूति एवं दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने ध्यान की परिवर्तनकारी शक्ति को पहचाना और दुनिया में इसके ज्ञान को फैलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। ध्यान पर उनकी शिक्षाएँ अनगिनत लोगों को आत्म- साक्षात्कार की प्रेरणा देती; मार्गदर्शन करती हैं ।
इस पुस्तक में स्वामी विवेकानंद ध्यान के मार्ग पर लोगों के सामने आनेवाली चुनौतियों और गलत धारणाओं के विरुद्ध सच्चा मार्गदर्शन करते हैं । वे एक नियमित ध्यान के अभ्यास का क्रम स्थापित करने, विकर्षणों को दूर करने और गहन एकाग्रता की स्थिति विकसित करने के बारे में व्यावहारिक परामर्श प्रदान करते हैं। इसके अलावा वे ध्यान के परिवर्तनकारी प्रभावों पर मूल्यवान अंतर्टृष्टि प्रदान करते हैं, जिसमें हमारे शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक कल्याण और भावनात्मक संतुलन पर इसका प्रभाव सम्मिलित है।
ध्यान पर स्वामी विवेकानंद की शिक्षाएँ सैद्धांतिक अवधारणाओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि उनके अपने व्यक्तिगत अनुभवों में गहराई से निहित हैं। मानव-मन और अस्तित्व के आध्यात्मिक आयामों की उनकी गहरी समझ इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ में झलकती है।"
ISBN: 9789355621559
Pages: 128
Avg Reading Time: 4 hrs
Age: 18+
Country of Origin: India
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Description:
धर्म के सही चरित्र एवं स्वरूप से परिचित हुए बिना विवेकहीनता, अन्धविश्वासों एवं भ्रान्तियों से मुक़ाबला नहीं किया जा सकता। इस दिशा में यह पुस्तक एक सार्थक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष दृष्टि से बिना किसी पूर्वग्रह के तीन धर्मों—हिन्दू, ईसाई और इस्लाम की पृष्ठभूमि पर प्रकाश डालते हुए हिंसा, नारी और दासत्व के सन्दर्भ में संक्षिप्त पर तथ्यपरक व वस्तुगत विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
धर्म का बीभत्स और बर्बर रूप आज हम देख रहे हैं। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप और अफ़ग़ानिस्तान में धर्म के रक्तरंजित इतिहास को दोहराया जा रहा है। धार्मिक-स्थल अपराधियों के शरण-स्थल बने हुए हैं। धर्म का अपराध के साथ गठजोड़ चिन्तित करता है। भजन-कीर्तन-प्रवचन के आयोजनों और धार्मिक-स्थलों के निर्माण में बेशुमार वृद्धि हुई है, वहीं हत्या, बलात्कार, उत्पीड़न और भ्रष्टाचार बढ़े हैं। स्वयं मनुष्य अपनी नियति तथा भाग्य का निर्माता है। समता, स्वतंत्रता और न्याय प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार है। कोई भी ऐसी व्यवस्था जो मनुष्य को इन अधिकारों से वंचित करती है, वह मानव-विरोधी है, चाहे वह धर्म हो या साम्राज्यवाद या फासीवाद या निजी स्वार्थों पर आधारित विकृत तथा जनविरोधी जनतंत्र। मनुष्य सर्वोपरि है, उसके ऊपर कोई नहीं, न धर्म न ईश्वर।
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