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Author:
Purushottam Agrawal, Purushottam AgarwalPublisher:
Rajkamal Prakashan SamuhLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
250
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Available
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धर्म के सामान्य अनुयायी, साधारण आस्थावान लोग हों या धर्म को हिंसक राजनीति में बदलनेवाले चतुर सुजान, धर्म के अध्येता हों या कठोर आलोचक और घोर विरोधी—अपने सारे मतभेदों के बावजूद इनमें से अधिकांश एक बात पर सहमत हैं। वह यह कि धर्म और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। या तो अध्यात्म फिजूल की बात है, या फिर धर्म ही अध्यात्म का एकमात्र आधार और माध्यम है। या तो अध्यात्म का आशय है—समाजनिरपेक्ष आत्मलीनता या अध्यात्म का अर्थ है प्रतिक्रियावादी रहस्यवाद। दोनों में से किसी भी तर्क-पद्धति को अपनाइए, निष्कर्ष पहले से तय है : यदि अध्यात्म के प्रश्नों में आपकी दिलचस्पी है तो आप धर्म को अपनाइए; यदि आप धर्म से असुविधा महसूस करते हैं तो अध्यात्म को भी साथ-साथ खारिज कर दीजिए। परस्पर विरोधी तर्क-पद्धतियों का निष्कर्ष के धरातल पर यह सामंजस्य अद्भुत है। धर्मेतर अध्यात्म की सम्भावनाओं पर विचार का प्रस्ताव इस परिप्रेक्ष्य में ‘निज ब्रह्म विचार’ ही नहीं देती बल्कि विरुद्धों के इस सामंजस्य से टकराने का, और हो सके तो इसके परे जाने का प्रस्ताव भी देती है। दैनिक ‘जनसत्ता’ में लम्बे समय तक प्रकाशित होने वाला, पुरुषोत्तम अग्रवाल का चर्चित कॉलम ‘मुखामुखम’ विवेकसम्मत ढंग से सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करता रहा। सैद्धान्तिक प्रश्नों से जूझने से लेकर अटलांटा, वर्धा और गोपेश्वर के अनुभव-संवेदनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने तक के रूप में ये लेख लगातार उत्सुकता के साथ पढ़े गए। जाने-माने बुद्धिजीवियों से लेकर पाठकों तक सभी ने इनमें विशेष दिलचस्पी जाहिर की। बहसें भी हुईं। शुरुआती एक वर्ष (मई 2003-मई 2004) में प्रकाशित चर्चित लेख यहाँ पुस्तक रूप में प्रस्तुत हैं। लेखक ने इनमें वे आवश्यक पाद-टिप्पणियाँ और सन्दर्भोल्लेख भी जोड़ दिये हैं, जो अखबार में नहीं आ सकते थे, लेकिन जरूरी थे।
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About the Book
धर्म के सामान्य अनुयायी, साधारण आस्थावान लोग हों या धर्म को हिंसक राजनीति में बदलनेवाले चतुर सुजान, धर्म के अध्येता हों या कठोर आलोचक और घोर विरोधी—अपने सारे मतभेदों के बावजूद इनमें से अधिकांश एक बात पर सहमत हैं। वह यह कि धर्म और अध्यात्म एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। या तो अध्यात्म फिजूल की बात है, या फिर धर्म ही अध्यात्म का एकमात्र आधार और माध्यम है। या तो अध्यात्म का आशय है—समाजनिरपेक्ष आत्मलीनता या अध्यात्म का अर्थ है प्रतिक्रियावादी रहस्यवाद। दोनों में से किसी भी तर्क-पद्धति को अपनाइए, निष्कर्ष पहले से तय है : यदि अध्यात्म के प्रश्नों में आपकी दिलचस्पी है तो आप धर्म को अपनाइए; यदि आप धर्म से असुविधा महसूस करते हैं तो अध्यात्म को भी साथ-साथ खारिज कर दीजिए।
परस्पर विरोधी तर्क-पद्धतियों का निष्कर्ष के धरातल पर यह सामंजस्य अद्भुत है। धर्मेतर अध्यात्म की सम्भावनाओं पर विचार का प्रस्ताव इस परिप्रेक्ष्य में ‘निज ब्रह्म विचार’ ही नहीं देती बल्कि विरुद्धों के इस सामंजस्य से टकराने का, और हो सके तो इसके परे जाने का प्रस्ताव भी देती है।
दैनिक ‘जनसत्ता’ में लम्बे समय तक प्रकाशित होने वाला, पुरुषोत्तम अग्रवाल का चर्चित कॉलम ‘मुखामुखम’ विवेकसम्मत ढंग से सोचने-विचारने के लिए प्रेरित करता रहा। सैद्धान्तिक प्रश्नों से जूझने से लेकर अटलांटा, वर्धा और गोपेश्वर के अनुभव-संवेदनों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने तक के रूप में ये लेख लगातार उत्सुकता के साथ पढ़े गए। जाने-माने बुद्धिजीवियों से लेकर पाठकों तक सभी ने इनमें विशेष दिलचस्पी जाहिर की। बहसें भी हुईं। शुरुआती एक वर्ष (मई 2003-मई 2004) में प्रकाशित चर्चित लेख यहाँ पुस्तक रूप में प्रस्तुत हैं। लेखक ने इनमें वे आवश्यक पाद-टिप्पणियाँ और सन्दर्भोल्लेख भी जोड़ दिये हैं, जो अखबार में नहीं आ सकते थे, लेकिन जरूरी थे।
Book Details
-
ISBN9789360862725
-
Pages132
-
Avg Reading Time4 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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कबीर-पंथियों में जो स्थान ‘बीजक’ का है, अकादमिक हलक़ों में वही स्थान श्यामसुन्दर दास द्वारा सम्पादित ‘कबीर-ग्रंथावली’ का है। तमाम विवादों और असहमतियों के बावजूद आज भी कबीर के प्रामाणिक पाठ के लिए अध्येता ‘ग्रंथावली’ का ही सहारा लेते हैं। ऐसे में अगर यह पता चले कि ‘ग्रंथावली’ में संकलित कबीर भले ही अन्य संग्रहों के मुक़ाबले ज़्यादा पूरे हों, लेकिन जो पाठ यहाँ प्रकाशित है, उसमें अनेक ऐसी भूलें हैं, जो अर्थ का अनर्थ ही नहीं कर रहीं, बल्कि कवि के मंतव्य को ही उलट दे रही हैं, तो क्या हो... आश्चर्य नहीं कि लगभग एक सदी से अनेक संस्करणों में व्यवहृत ‘ग्रंथावली’ के इस पक्ष पर प्रो. पुरुषोत्तम अग्रवाल की निगाह रुकी और उन्होंने अपने विशद अध्ययन और कबीर के प्रति अपने असाधारण प्रेम के चलते इसके परिमार्जन का बीड़ा उठाया। यह संस्करण उसी परिमार्जित एवं शुद्धतम पाठ की प्रस्तुति है जिसका आरम्भ उनकी एक सुदीर्घ भूमिका से होता है। इस भूमिका में प्रो. अग्रवाल ने पाठ-परिमार्जन की इस पूरी श्रम-साध्य प्रक्रिया पर तो प्रकाश डाला ही है, कबीर पर अपने अब तक के अध्ययन से प्राप्त अद्यतन धारणाओं को भी सूत्र रूप में दे दिया है। पाठकों को ज्ञात ही है कि ‘अकथ कहानी प्रेम की : कबीर की कविता और उनका समय’ (2009) में उन्होंने कबीर के बहाने उस मध्यकाल में भारत की आधुनिकता की पहचान की थी, जो औपनिवेशिक आधुनिकता से पहले ही भारत के लोकवृत्त में प्रकट हो चुकी थी। ‘कबीर-ग्रंथावली’ की इस प्रस्तुति में वे न सिर्फ़ कबीर की वाणी को शुद्धतम रूप में हमें दे रहे हैं, बल्कि कबीर-अध्ययन के इतिहास की गुत्थियों को सुलझाते हुए उन्हें ठीक से पढ़ने-जानने की समझ भी हमें प्रदान कर रहे हैं।
Pratinidhi Kavitayen : Kunwar Narain
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Kunwar Narayan +1
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शुरू से लेकर अब तक की कविताएँ सिलसिलेवार पढ़ी जाएँ तो कुँवर नारायण की भाषा में बदलते मिज़ाज को लक्ष्य किया जा सकता है। आरम्भिक कविताओं पर नई कविता के दौर की काव्य-भाषा की स्वाभाविक छाप स्पष्ट है। इस छाप के बावजूद छटपटाहट है—कविता के वाक्य-विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य-विन्यास के निकट लाने की। आगे चलकर यह वाक्य-विन्यास कुँवर नारायण की कविता के लिए स्वभाव-सिद्ध हो गया है। लेकिन उनकी विशेषता यह है कि उन्होंने सहज वाक्य-विन्यास को बोध के सरलीकरण का पर्याय अधिकांशत: नहीं बनने दिया। सहज रहते हुए सरलीकरण से बचे रहना, साधना के कठिन अभ्यास की माँग करता है। 'सहज-सहज सब कोई कहै—सहज न चीन्हे कोय!' बाल-भाषा में 'प्रौढ़ व्यक्तित्व को अभिव्यक्ति' देने की चुनौती को कुँवर नारायण ने बहुत गहरे में लिया और जिया है। परम्परा की स्मृति और 'सैकड़ों नए-नए' पहलुओं को धारण करनेवाली काव्य-भाषा सम्भव करने के लिए जो साधना उन्होंने की होगी, उसका अनुमान ही किया जा सकता है। कुँवर नारायण इस महत्त्वपूर्ण सचाई के प्रति सजग हैं कि ‘कलाकार-वैज्ञानिक के लिए कुछ भी असाध्य नहीं।’ वे इस गहरी सचाई से भी वाक़िफ़ हैं कि चिन्तन चाहे दार्शनिक प्रश्नों पर किया जाए चाहे वैज्ञानिक तथ्यों पर, काव्यात्मक भाषा ही प्रत्यक्ष दिखने वाले विरोधों के परे जाकर मूलभूत सत्यों को धारण करने का हौसला कर पाती है। —पुरुषोत्तम अग्रवाल
Gorakh-Vijay
- Author Name:
Brajendra Kumar Singhal +1
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‘गोरख विजय' नाथपंथ के महान योगी गुरु गोरखनाथ से सम्बन्धित पुरातन बाग्रा काव्य ग्रन्थ ‘गोर्ख विजय’ का हिन्दी अनुवाद और समीक्षात्मक पर्यालोचन प्रस्तुत करनेवाली कृति है। गोरखनाथ ने अपने साधनामय जीवन और कल्याणमय दर्शन से तत्कालीन जन-समाज को अत्यन्त प्रभावित-प्रेरित किया था। उन्होंने द्वैताद्वैत-विलक्षण अद्वैतवाद का समर्थन किया लेकिन संसार को मिथ्या मानने से इनकार किया। उन्होंने मोक्ष का साधन योग को माना और योग को अष्टांग न मानकर षडंग माना। वस्तुतः यम-नियम को उन्होंने, साधक हो या सामान्य-जन, मनुष्य मात्र का कर्तव्य और दायित्व बताया जिनमें परिपक्वता के बाद ही आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की सिद्धि सम्भव है। ऐसी अनेकानेक बातों को जानने-समझने के लिए ‘गोरख विजय’ एक अत्यन्य उपयोगी ग्रन्थ है। प्रस्तुत पुस्तक का एक और उल्लेखनीय पक्ष यह है कि इसमें बंगाल के लोक समाज में प्रचलित गोरखनाथ सम्बन्धी कई लोकगाथाएँ और कुछ अन्य प्रासंगिक सामग्री भी दी गई हैं जिनसे गोरखपंथी साधना के नये आयाम खुलते हैं। वस्तुतः साधक हो या साहित्यिक, विद्वान हो या सामान्य पाठक, गोरखनाथ में दिलचस्पी रखनेवाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए यह पुस्तक अवश्य पठनीय है।
Main Ram Bol Raha Hoon
- Author Name:
Pramod Kumar Agrawal
- Book Type:

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राम का जीवन भारतीयों के लिए एक आदर्श जीवन है। जन्म से लेकर अंत तक राम का चरित्र एक दीप-स्तंभ है। ऐसे सार्वकालिक राष्ट्रीय नायक का कथानक किसी भी कृति को गौरवान्वित करता है। ‘रामचरितमानस’ के धीरोदात्त नायक राम कथनी से अधिक करनी में विश्वास रखते थे। अतः उनके जो भी कथन उपलब्ध हैं, वे भारतीय संस्कृति की महत्त्वपूर्ण धरोहर हैं। राम के प्रस्तुत उद्घोष तुलसीकृत रामचरितमानस एवं लेखक की समांतर कृति ‘रामचरितमानस: नाट्य रूप’ से उद्धृत किए गए हैं। विश्वास है, सुधी पाठक प्रस्तुत कृति से प्रेरणा ग्रहण करके अपने जीवन को सफल बनाएँगे और भारतीय तथा विश्व-समाज को समुन्नत करने में योगदान देंगे।
Ramdoot : Hanuman Ka Aatmakhyan
- Author Name:
Trilok Nath Pandey
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प्रभु श्रीराम अपने अनुज लक्ष्मण सहित ऋष्यमूक पर्वत की एक दूसरी सुरम्य चोटी, जिसका नाम प्रस्रवण था, पर चले गए और वहाँ एक गुफा में निवास करने लगे। मैंने उनसे आग्रह किया कि मैं दास-रूप में उनके निकट रहकर उनकी सेवा करना चाहता हूँ। इस सम्बन्ध में मैंने सुग्रीव जी से भी अनुमति ले ली थी, किन्तु प्रभु श्रीराम ने मेरे आग्रह को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि, “मैं आपके अतिशय स्नेह एवं सत्कार की भावना से अनुगृहीत हूँ, हनुमान। किन्तु, आपका प्रस्ताव मैं स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मैं और मेरे अनुज लक्ष्मण तपस्वी रूप में हैं और तपस्वियों को किसी दास से सेवा लेने का अधिकार नहीं है। आपकी सेवा नहीं, आपकी सहायता की मुझे आवश्यकता है। इसके अनेक अवसर आगे आएँगे। अभी वर्षा ऋतु प्रारम्भ हो गई है। इस काल में यात्रा एवं उद्योग सम्बन्धित सारे कार्य स्थगित हो जाते हैं। वर्षा ऋतु के इन चार महीनों आप किष्किन्धापुरी में विश्राम करें और मैं लक्ष्मण सहित प्रस्रवण पर्वत पर। वर्षा ऋतु समाप्त होते ही सीता की खोज शुरू कर दी जाएगी।”
Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg
- Author Name:
Vishen Lakhiani
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Buddh Se Seekhen Safalta Ka Marg Hindi Translation of The Buddha and The Badass: The Secret Spiritual Art of Succeeding at Work. क्या आपने गौर किया है कि कैसे कुछ लोग नौकरी में कमाल के भाग्यशाली होते हैं! वे बड़ी आसानी से समाधान सुझा देते हैं। वे सही लोगों को आकर्षित करते हैं। लोग उनके अभियानों, कंपनियों, उनकी टीमों का हिस्सा बनना चाहते हैं। वे बड़े-बड़े काम मुसकराते हुए पूरा कर लेते हैं और वेतन में अच्छी वृद्धि के साथ ही प्रमोशन भी पा लेते हैं। ये सुपरस्टार कमाल की एकाग्रता और रचनात्मकता का प्रदर्शन कर खास दायरे का हिस्सा बन जाते हैं।यह पुस्तक बताती है कि उनके साथ कैसे जुड़ें। आप जहाँ भी हों, आप में अनोखी शक्तियाँ हैं। यह आधुनिक युग का भ्रम है कि कठिन परिश्रम और संघर्ष से ही सफलता मिलती है। आपके भीतर एक आत्मा है और एक बार आपने काम के क्षेत्र में इसकी पूरी शक्ति का प्रयोग किया, तो बस कमाल हो जाता है। अपने भीतर के बुद्ध और निर्भीक योद्धा को जगाना एक ऐसी प्रक्रिया है, जो आपके काम करने के तरीके को बदलकर रख देगी। आप उन तरीकों को जान लेंगे, जो वास्तविकता के हर नियम को आपके पक्ष में ला देंगे।
Rumi: Rooh-E-Kainat
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Desc awaiting from Publisher
Shri Hanuman Chalisa | Devotional & Spirituality Prayer of Lord Hanuman Book in Hindi
- Author Name:
Kishor Makwana::Rasikba Kesariya
- Book Type:

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श्री हनुमान चालीसा भगवान् श्रीराम तक पहुँचने का एक मार्ग है। जन-मानस में व्याप्त श्रीहनुमान चालीसा कोई सिद्ध कर ले, नित्य सौ बार पठन करे तो हनुमानजी उसकी सब इच्छा-आकांक्षा पूर्ण करते हैं, ऐसी मान्यता है। मनुष्य के जीवन को सफल बनानेवाली ये रत्नमणिकाएँ हैं। श्रीहनुमानजी का संपूर्ण चरित्र हम सबमें श्रद्धा, विश्वास, ज्ञान, शक्ति, पुरुषार्थ, भक्ति, सत्य, प्रामाणिक प्रयत्न, समर्पण भाव, पराक्रम, संस्कार- संपन्न वाणी, विवेक और निष्काम कर्म जीवन में सफलता प्राप्ति के लिए अनेक गुणों का सिंचन करता है।
Gita-Mata
- Author Name:
Mahatma Gandhi
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महात्मा गांधीजी ने गीता को ‘माता’ की संज्ञा दी थी। उसके प्रति उनका असीम अनुराग और भक्ति थी। उन्होंने गीता के श्लोकों का सरल-सुबोध भाषा में तात्पर्य दिया, जो ‘गीता-बोध’ के नाम से प्रकाशित हुआ। उन्होंने सारे श्लोकों की टीका की और उसे ‘अनासक्तियोग’ का नाम दिया। कुछ भक्ति-प्रधान श्लोकों को चुनकर ‘गीता-प्रवेशिका’ पुस्तिका निकलवाई। इतने से भी उन्हें संतोष नहीं हुआ तो उन्होंने ‘गीता-पदार्थ-कोश’ तैयार करके न केवल शब्दों का सुगम अर्थ दिया, अपितु उन शब्दों के प्रयोग-स्थलों का निर्देश भी किया। गीता के मूल पाठ के साथ वह संपूर्ण सामग्री प्रस्तुत पुस्तक में संकलित है। गीता को हमारे देश में ही नहीं, सारे संसार में असाधारण लोकप्रियता प्राप्त है। असंख्य व्यक्ति गहरी भावना से उसे पढ़ते हैं और उससे प्रेरणा लेते हैं। जीवन की कोई भी ऐसी समस्या नहीं, जिसके समाधान में गीता सहायक न होती हो। उसमें ज्ञान, भक्ति तथा कर्म का अद्भुत समन्वय है और मानव-जीवन इन्हीं तीन अधिष्ठानों पर आधारित है। महात्मा गांधी की कलम से प्रसूत गीता पर एक संपूर्ण पुस्तक, जो जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर प्रकाश डालकर पाठक की कर्मशीलता को गतिमान करेगी।
Shri Hanuman Chalisa Rahasy
- Author Name:
Shailesh Tiwari
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