Ramkatha Mein Naitik Mulya
(0)
Author:
Dr. Vinod Bala ArunPublisher:
Prabhat PrakashanLanguage:
HindiCategory:
Religion-spirituality₹
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रामकथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक एकता का प्रबल सूत्र रही है। जहाँ भारत की प्राचीन भाषाओं (पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि) में विस्तृत राम-साहित्य अनेक विधाओं में लिखा गया, वहीं यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के लगभग सभी देशों, जैसे जावा, बाली, मलय, हिंद चीन, स्याम, चीन आदि में भी उपलब्ध होता है। चीन का ‘दशरथ कथानम्’, इंडोनेशिया का ‘रामायण काकावीन’, जावा का ‘सेरतराम’ और स्याम का ‘रामकियेन’ आदि इसके कतिपय उदाहरण हैं। रामकथा मानव जीवन को समुन्नत बनाने वाले नैतिक मूल्यों का अक्षय भंडार है। संभवतः विश्व वाङ्मय में वाल्मीकि-रामायण वह प्रथम ग्रंथ है, जिसमें नैतिक मूल्यों का काव्यात्मक, व्यावहारिक और मूर्तिमान् रूप दिखाई देता है। मनुष्य के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए ये मूल्य इतने उपयोगी और महत्त्वपूर्ण हैं कि वाल्मीकीय रामायण के बाद रामकथा की एक लंबी परंपरा बन गई, जिसमें इन नैतिक मूल्यों को जीवन में आचरित और अवतरित होते हुए दिखाया गया। रामचरितमानस में तो इनको दैवी गरिमा दी गई। इस पुस्तक में रामकथा के मूल ग्रंथ वाल्मीकि-रामायण और शिखर ग्रंथ रामचरितमानस में सन्निहित नैतिक मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन करके मानव जीवन में उनकी उपयोगिता का आकलन किया गया है। नैतिक मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन हेतु एक विशिष्ट पुस्तक।
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रामकथा भारतवर्ष की सांस्कृतिक एकता का प्रबल सूत्र रही है। जहाँ भारत की प्राचीन भाषाओं (पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि) में विस्तृत राम-साहित्य अनेक विधाओं में लिखा गया, वहीं यह दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के लगभग सभी देशों, जैसे जावा, बाली, मलय, हिंद चीन, स्याम, चीन आदि में भी उपलब्ध होता है। चीन का ‘दशरथ कथानम्’, इंडोनेशिया का ‘रामायण काकावीन’, जावा का ‘सेरतराम’ और स्याम का ‘रामकियेन’ आदि इसके कतिपय उदाहरण हैं।
रामकथा मानव जीवन को समुन्नत बनाने वाले नैतिक मूल्यों का अक्षय भंडार है। संभवतः विश्व वाङ्मय में वाल्मीकि-रामायण वह प्रथम ग्रंथ है, जिसमें नैतिक मूल्यों का काव्यात्मक, व्यावहारिक और मूर्तिमान् रूप दिखाई देता है। मनुष्य के अभ्युदय और निःश्रेयस के लिए ये मूल्य इतने उपयोगी और महत्त्वपूर्ण हैं कि वाल्मीकीय रामायण के बाद रामकथा की एक लंबी परंपरा बन गई, जिसमें इन नैतिक मूल्यों को जीवन में आचरित और अवतरित होते हुए दिखाया गया। रामचरितमानस में तो इनको दैवी गरिमा दी गई।
इस पुस्तक में रामकथा के मूल ग्रंथ वाल्मीकि-रामायण और शिखर ग्रंथ रामचरितमानस में सन्निहित नैतिक मूल्यों का तुलनात्मक अध्ययन करके मानव जीवन में उनकी उपयोगिता का आकलन किया गया है। नैतिक मूल्यों के संरक्षण-संवर्धन हेतु एक विशिष्ट पुस्तक।
Book Details
-
ISBN9789351861843
-
Pages360
-
Avg Reading Time12 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
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यह किताब ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' (17 सितम्बर, 1879—24 दिसम्बर, 1973) के दार्शनिक व्यक्तित्व से परिचित कराती है। धर्म, ईश्वर और मानव समाज का भविष्य उनके दार्शनिक चिन्तन का केन्द्रीय पहलू रहा है। उन्होंने मानव समाज के सन्दर्भ में धर्म और ईश्वर की भूमिका पर गहन चिन्तन-मनन किया है। इस चिन्तन-मनन के निष्कर्षों को इस किताब के विविध लेखों में प्रस्तुत किया गया है। ये लेख पेरियार के दार्शनिक व्यक्तित्व के विविध आयामों को पाठकों के सामने रखते हैं। इनको पढ़ते हुए कोई भी सहज ही समझ सकता है कि पेरियार जैसे दार्शनिक-चिन्तक को महज़ नास्तिक कहना उनके गहन और बहुआयामी चिन्तन को नकारना है।
यह किताब दो खंडों में विभाजित है। पहले हिस्से में समाहित वी. गीता और ब्रजरंजन मणि के लेख पेरियार के चिन्तन के विविध आयामों को पाठकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। इसी खंड में पेरियार के ईश्वर और धर्म-सम्बन्धी मूल लेख भी समाहित हैं जो पेरियार की ईश्वर और धर्म-सम्बन्धी अवधारणा को स्पष्ट करते हैं।
दूसरे खंड में पेरियार की विश्वदृष्टि से सम्बन्धित लेखों को संगृहीत किया गया है जिसमें उन्होंने दर्शन, वर्चस्ववादी साहित्य और भविष्य की दुनिया कैसी होगी जैसे सवालों पर विचार किया है। इन लेखों में पेरियार विस्तार से बताते हैं कि दर्शन क्या है और समाज में उसकी भूमिका क्या है? इस खंड में वह ऐतिहासिक लेख भी शामिल है जिसमें पेरियार ने विस्तार से विचार भी किया है कि भविष्य की दुनिया कैसी होगी?
Sachchi Ramayan
- Author Name:
Periyar E.V. Ramasamy
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‘सच्ची रामायण’ ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' की बहुचर्चित और सबसे विवादास्पद कृति रही है। पेरियार रामायण को एक राजनीतिक ग्रन्थ मानते थे। उनका कहना था कि इसे दक्षिणवासी अनार्यों पर उत्तर के आर्यों की विजय और प्रभुत्व को जायज़ ठहराने के लिए लिखा गया और यह ग़ैर-ब्राह्मणों पर ब्राह्मणों और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व का उपकरण है।
‘रामायण’ की मूल अन्तर्वस्तु को उजागर करने के लिए पेरियार ने 'वाल्मीकि रामायण' के अनुवादों सहित; अन्य राम कथाओं, जैसे—'कंब रामायण', 'तुलसीदास की रामायण' (रामचरितमानस), ‘बौद्ध रामायण’, ‘जैन रामायण’ आदि के अनुवादों तथा उनसे सम्बन्धित ग्रन्थों का चालीस वर्षों तक अध्ययन किया और 'रामायण पादीरंगल' (रामायण के पात्र) में उसका निचोड़ प्रस्तुत किया। यह पुस्तक 1944 में तमिल भाषा में प्रकाशित हुई। इसका अंग्रेज़ी अनुवाद ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' नाम से 1959 में प्रकाशित हुआ।
यह किताब हिन्दी में 1968 में ‘सच्ची रामायण' नाम से प्रकाशित हुई थी, जिसके प्रकाशक लोकप्रिय बहुजन कार्यकर्ता ललई सिंह थे। 9 दिसम्बर, 1969 को तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया और पुस्तक की सभी प्रतियों को ज़ब्त कर लिया। ललई सिंह यादव ने इस प्रतिबन्ध और ज़ब्ती को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। वे हाईकोर्ट में मुक़दमा जीत गए। सरकार ने हाईकोर्ट के निर्णय के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। 16 सितम्बर, 1976 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर सर्वसम्मति से फ़ैसला देते हुए राज्य सरकार की अपील को ख़ारिज कर दिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में निर्णय सुनाया।
प्रस्तुत किताब में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग' का नया, सटीक, सुपाठ्य और अविकल हिन्दी अनुवाद दिया गया है। साथ ही इसमें 'सच्ची रामायण' पर केन्द्रित लेख व पेरियार का जीवनचरित भी दिया गया है, जिससे इसकी महत्ता बहुत बढ़ गई है। यह भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन के इतिहास को समझने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए एक आवश्यक पुस्तक है।
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