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Ummid Ki Tarah Lautna Tum

Published by

Shivna Prakashan

In category

Poetry

Language

Hindi

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About the book

इन कविताओं के बारे में मैं किताब की भूमिका या अपनी बात लिखने से हमेशा परहेज़ करता हूँ, मगर इस किताब के बारे में कुछ लिखना मुझे ज़रूरी लगा, सो लिख रहा हूँ। 8 अप्रैल 2025 को मैंने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया। किसी व्यक्ति के हमेशा के लिए चले जाने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं, यह मेरे लिए पहला अनुभव था। मुझे ऐसा लगा कि मेरे अंदर का एक बड़ा हिस्सा टूट कर खो गया है। मैं अपने अंदर एक प्रकार का सूनापन, एक बड़ी ख़ला को महसूस करने लगा। पिता के जाने के ठीक तीसरे दिन मैं सुबह छह बजे अपनी टेबल पर अन्यमनस्क अवस्था में बैठा हुआ था। एक दिन पहले ही पिता की अस्थियों को नर्मदा में विसर्जित कर के आया था। मेरे सामने काग़ज़ और क़लम रखे हुए थे। मैंने क़लम को उठाया और यूँ ही कुछ लिखना शुरू किया, जो लिखा जा रहा था वह एक कविता जैसा था- 'पिता- तीन दिन बीत गये'। अगले दिन जब फिर बैठा तो फिर एक कविता लिखी... बस उसके बाद सिलसिला चलता रहा... दिनों नहीं बल्कि अगले कुछ महीनों तक... प्रारंभ में कविताएँ पिता पर लिखी गयीं... फिर धीरे-धीरे और विषय जुड़ते चले गये। इस प्रकार इन कविताओं का जन्म हुआ। इस किताब में सात कविताएँ- 'रबाब- एक मुसलसल इश्क़', 'गौतम राजऋषि के लिए', 'लिफ़ाफ़ा', 'ताना-बाना', 'तुम', 'पीली और उदास आँखें' तथा 'विश्वास' मेरी पुरानी कविताएँ हैं, बाक़ी सारी कविताएँ उसी तीन से चार माह की अवधि की हैं। उसे मैं 'जुनून-अवधि' भी कह सकता हूँ। मुझे नहीं पता कि ये कविताएँ भी हैं कि नहीं। मुझे नहीं पता कि इनको इस प्रकार सामने भी लाना चाहिए था अथवा नहीं। मगर अब ये कविताएँ आपके सामने हैं। इनको पढ़ें, और अगर ठीक नहीं लगें तो इनको ख़ारिज कर देने का भी पूरा अधिकार आपके पास है।

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About the Book

इन कविताओं के बारे में
मैं किताब की भूमिका या अपनी बात लिखने से हमेशा परहेज़ करता हूँ, मगर इस किताब के बारे में कुछ लिखना मुझे ज़रूरी लगा, सो लिख रहा हूँ। 8 अप्रैल 2025 को मैंने अपने पिता को हमेशा के लिए खो दिया। किसी व्यक्ति के हमेशा के लिए चले जाने के बाद आप कैसा महसूस करते हैं, यह मेरे लिए पहला अनुभव था। मुझे ऐसा लगा कि मेरे अंदर का एक बड़ा हिस्सा टूट कर खो गया है। मैं अपने अंदर एक प्रकार का सूनापन, एक बड़ी ख़ला को महसूस करने लगा। पिता के जाने के ठीक तीसरे दिन मैं सुबह छह बजे अपनी टेबल पर अन्यमनस्क अवस्था में बैठा हुआ था। एक दिन पहले ही पिता की अस्थियों को नर्मदा में विसर्जित कर के आया था। मेरे सामने काग़ज़ और क़लम रखे हुए थे। मैंने क़लम को उठाया और यूँ ही कुछ लिखना शुरू किया, जो लिखा जा रहा था वह एक कविता जैसा था- 'पिता- तीन दिन बीत गये'। अगले दिन जब फिर बैठा तो फिर एक कविता लिखी... बस उसके बाद सिलसिला चलता रहा... दिनों नहीं बल्कि अगले कुछ महीनों तक... प्रारंभ में कविताएँ पिता पर लिखी गयीं... फिर धीरे-धीरे और विषय जुड़ते चले गये। इस प्रकार इन कविताओं का जन्म हुआ। इस किताब में सात कविताएँ- 'रबाब- एक मुसलसल इश्क़', 'गौतम राजऋषि के लिए', 'लिफ़ाफ़ा', 'ताना-बाना', 'तुम', 'पीली और उदास आँखें' तथा 'विश्वास' मेरी पुरानी कविताएँ हैं, बाक़ी सारी कविताएँ उसी तीन से चार माह की अवधि की हैं। उसे मैं 'जुनून-अवधि' भी कह सकता हूँ। मुझे नहीं पता कि ये कविताएँ भी हैं कि नहीं। मुझे नहीं पता कि इनको इस प्रकार सामने भी लाना चाहिए था अथवा नहीं। मगर अब ये कविताएँ आपके सामने हैं। इनको पढ़ें, और अगर ठीक नहीं लगें तो इनको ख़ारिज कर देने का भी पूरा अधिकार आपके पास है।

Book details

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100% OriginalGenuine copy from Shivna Prakashan
Format
Paperback
Publisher
Shivna Prakashan
Weight
200 grams
ISBN-13
9789348636904
Pages
184
Reading time
~6 hrs
Age
18+
Country of origin
IN
Dimensions
1 × 19 cm
Language
Hindi

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