Agar Itane Se
(0)
₹
350
280 (20% off)
Available
Ships within 48 Hours
Free Shipping in India on orders above Rs. 1100
Awating description for this book
Read moreAbout the Book
Awating description for this book
Book Details
-
ISBN9789390971503
-
Pages103
-
Avg Reading Time3 hrs
-
Age18+ yrs
-
Country of OriginIndia
Recommended For You
Udasi Koi Bhav Nahin Hai
- Author Name:
Raj Kumar Singh
- Book Type:

-
Description:
राज कुमार सिंह का कविता-संग्रह ‘उदासी कोई भाव नहीं है’ एक इंसान के भीतर मौजूद भावनाओं के अथाह सागर को समझने और उसे शब्दों में बाँधने का प्रयास है। यह उनकी दूसरी पुस्तक है। इस कविता-संग्रह में जीवन के कठोर यथार्थ, आम आदमी के संघर्ष, निराशा, प्रेम और उम्मीद को नए प्रतीकों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। राज कुमार सिंह जब प्रेम की बात कहते हैं तो परंपरागत प्रेम कविताओं से हटकर वहाँ भी उनका कुछ अलग नजरिया होता है, मसलन—‘जब तुम कहती हो सब ठीक है/तब मुझे लगता है अभी कितना कुछ ठीक होना बाकी है...’ या फिर—‘प्रेम को प्रेम ही खा जाता है...’
बात जब आम आदमी के संघर्ष की हो तो कुछ बेहद सशक्त कविताएँ देखने को मिलती हैं, जैसे—‘युद्ध के मैदान में खड़ा हुआ, प्रत्यंचा पर स्वयं मैं चढ़ा हुआ...’ इन सबके बीच आशा का एक दीपक भी उनकी कई कविताओं में अपने पूरे तेज के साथ रोशन दिखाई देता है। कहते हैं—‘एक बड़े शहर में, जब जब एक अजनबी, एक अजनबी से पूछता है कोई पता, तब तब यह भरोसा बनता है, कि दुनिया में खोई हुई सबकी चीजें, एक दिन उन्हें मिल जाएँगी।’
कविता-संग्रह में महात्मा बुद्ध से लेकर हिरण्यकश्यप तक को प्रतीक बनाकर लिखी कविताएँ हैं जो आज के दौर में भी महत्त्वपूर्ण हैं। पेशे से पत्रकार राज कुमार सिंह की कविताओं की खूबी बिना किसी शोर-शराबे और बिना चीख-चिल्लाहट के अपनी बात कहना है। समाज को नजदीक से देखने का जो अनुभव एक पत्रकार के रूप में उन्हें मिला है, उसका असर भी इस पुस्तक में देखने को मिलता है।
Ghazal Jab Baat Karti Hai
- Author Name:
Dr. Versha Singh
- Book Type:

- Description: This book has no description
Titliyon Ko Udte Dekha Hai
- Author Name:
Madhu Arora
- Book Type:

- Description: Book
Prasad Ka Sampoorna Kavya
- Author Name:
Satyaprakash Mishra
- Book Type:

-
Description:
कवि जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी कविता में 'छायावादी काव्य आन्दोलन' के जनक, प्रवक्ता और उन्नायक हैं। उन्होंने खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में अनिर्णय के प्रथम दौर से मुक्त करके उसे अद्भुत रूप से समृद्ध और अभिव्यक्ति सम्पन्न बनाया। उनकी काव्य भाषा में गहरी अनुभूति सम्पन्नता और रोमांसलता का एक सांस्कारिक तेवर विद्यमान है। गोस्वामी तुलसीदास की तरह ही वे भाषित संक्षिप्तता और बिम्बात्मक क्षमता का मर्म पहचानने वाले कवि हैं।
‘गीति तत्त्व’ प्रसाद की कविता का दूसरा प्रमुख गुण है। अनुभूतियों की भीतरी झनझनाहट उनके गीतों से लेकर उनके महाकाव्य 'कामायनी' तक में समान रूप से विद्यमान हैं। प्रसाद अपनी कविताओं के माध्यम से मनुष्य जाति की उन्हीं अनुभूतियों को चित्रित करते हैं जिनमें एक भीतरी करुणा का आवेश हो और जो शब्द का स्पर्श पाते ही संगीत की प्राणवक्ता से झंकृत हो उठें। ‘झरना’, ‘आँसू’ और ‘लहर’ के गीत इसका प्रमाण तो हैं ही, ‘कामायनी’ की सम्पूर्ण अर्थवत्ता इसी गीत्यात्मक अनुगूँज से भ्री हुई है।
प्रसाद का अपने सारे ऐतिहासिक, दार्शनिक और ‘मिथकीय’ आवरण के बावजूद अपने वर्तमान में ही प्रामाणिक है। इतिहास, दर्शन और पुराण-कथाओं का उपयोग प्रसाद जी ने अपनी संस्कृति धरोहर को पुनरुज्जीवित करने के लिए तो किया ही है, उसके माध्यम से अपने समय के भारतीय राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के मुख्य तेवर को पहचानने का काम भी वे करते हैं। इसीलिए उनकी कविताओं में राष्ट्रीयता का एक गहरा सरोकार विद्यमान है।
Kavitavali (Tulsidass Kart)
- Author Name:
Tulsidas
- Book Type:

-
Description:
गोस्वामी तुलसीदास का सम्पूर्ण जीवन और कृतित्व राम के प्रति समर्पित और राममय था। यद्यपि ‘कवितावली’ तुलसी के मुक्तक पदों का संग्रह है, किन्तु इसमें राम के बालरूप से लेकर राम के सभी रूपों की झाँकी है। तुलसी के अतिप्रिय राम सम्बन्धित मार्मिक प्रसंग भी इन मुक्तकों में मिलते हैं। ‘कवितावली’ तुलसीदास की ऐसी कृति है जिसमें उनका व्यक्तित्व राम-महिमा के साथ देश-काल से तादात्म्य करता हुआ एक संघर्षशील सर्जनात्मक, लोकमंगलाकांक्षी भक्त के रूप में प्रकट होता है। इस काव्य में रामचरित और उनसे सम्बद्ध चरित्रों की तथा उनके चरित्र की महिमा का आख्यान तो है ही, इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन स्थानों, उन तत्त्वों के भी सम्बन्ध में तुलसीदास स्पष्ट प्रकट होते हैं जो उनके जीवन में गुण-धर्म के समान समा गए हैं और जो उनके व्यक्तित्व को प्रकट करते हैं। तुलसीदास के महान व्यक्तित्व के पीछे देश-काल को देखने की उनकी जो सर्जनात्मक दृष्टि है, उसका भी हमें इसमें ज्ञान प्राप्त होता है।
तुलसीदास जी केवल द्रष्टा ही नहीं कर्मजयी स्रष्टा भी हैं और उनकी जीवन-गति में जो अवरोध समाज के सम्मुख आते हैं, उनसे संघर्षकर्ता तथा अजेय योद्धा के रूप में भी ‘कवितावली’ में अपने को प्रकट करते हैं। जाति-पाति के बन्धन से मनुष्य के व्यक्तित्व को ऊँचा उठाने का आह्वान भी ‘कवितावली’ में है। ‘कवितावली’ के भीतर उनकी उन मान्यताओं की भी प्रभा है, जिनके कारण उन्हें लोग समवन्यवादी मानते हैं। लोक में प्रचलित और प्रिय कवित्त, सवैया और छप्पय की पद्धति अपनाकर तुलसी ने राम के विभिन्न रूपों की राममय रचना की है। उनके आदर्श राम थे और उनका सम्पूर्ण कृतित्व राममय था। उन्होंने मुक्तक मणि के रूप में इसे प्रचारित किया। ‘कवितावली’ में रामचरित के स्फुट मुक्तक संगृहीत हैं। इनका संयोजन और सम्पादन तुलसी के समय में ही हो चुका था। बालकांड से लेकर उत्तरकांड तक के रामचरितमानस के अनुरूप सातों कांड कवितावली में भी हैं। इन चार सौ पचीस पदों की विशेषता और रामचरितमानस से इनकी विभिन्नता यही है कि ये सभी मूलक छन्द हैं। कवितावली में ‘हनुमान बाहुक’ स्वतंत्र रूट-रचना है। तुलसी के जीवन से सम्बद्ध अनेक रचनाएँ भी कवितावली में हैं। उन्होंने हनुमान की अपनी आराधना को भी इस रचना में स्थान दिया है।
तुलसी के सम्पूर्ण जीवन-काल की स्फुट रचनाओं को सुधाकर पाण्डेय जी ने इस ग्रन्थ में संगृहीत किया है। छात्रों की सुविधा के लिए शब्दार्थ, भावार्थ और पदों की विशिष्टता और विशेषता को भी उन्होंने इस ग्रन्थ में प्रस्तुत किया है। इससे यह ग्रन्थ छात्रों के लिए अतिमहत्त्वपूर्ण तथा उपयोगी बन गया है।
Daya Nadi : Kaling Yuddha Ki Sakshi
- Author Name:
Gayatribala Panda
- Book Type:

- Description: गायत्रीबाला पंडा की कविताएँ समकालीन काव्य-जगत में अपनी अलग पहचान रखती हैं। अपने ब्योरों और रंग-ढंग में अद्वितीय। दया नदी की कविताएँ इसका प्रमाण हैं। ये कविताएँ इतिहास प्रसिद्ध कलिंग युद्ध पर आधारित हैं, जिनमें दया नदी उस ऐतिहासिक युद्ध के दौरान हुए भीषण रक्तपात के बरअक्स मानवीय करुणा और संवेदना के प्रतीक के रूप में दिखलाई पड़ती है। वस्तुतः ये कविताएँ इतिहास की काव्यात्मक चर्चा नहीं हैं, बल्कि उस काव्यात्मक भावना का प्रतिफल हैं जो इतिहास के माध्यम से यात्रा करती है। इनमें इतिहास को एक अलग और व्यक्तिगत दृष्टिकोण से देखा गया है, लेकिन इनका लक्ष्य मनुष्य मात्र का ऐसा भविष्य है जो युद्ध की सभी भयावहताओं से मुक्त हो।
Pratinidhi Kavitayein: Pawan Karan
- Author Name:
Pawan Karan
- Book Type:

- Description: पवन करण की कविताओं में हमें अपनी जानी-पहचानी दुनिया दिखाई देती है, लेकिन ठीक उसी तरतीब में नहीं, जिस तरतीब में हम उसे देखने के आदी हैं। वे उस दुनिया को भीतर से बदल रहे होते हैं; उसकी आन्तरिक बुनावट को उसके अपने ही औज़ारों से नया रूप देते हुए; और एकदम से इतना भी न बदलते हुए कि वह हमें अनजानी लगने लगे, डराने लगे। वे एक सुलझी हुई दृष्टि के साथ और सहानुभूतिपूर्वक हमारे सामाजिक आत्म को न्याय की एक व्यापक संकल्पना से अनुकूलित करते हैं और हमें अपने अन्यायों को देखने में सक्षम बनाते हैं। स्त्री को उनकी कविता ने एक ऐसी कसौटी के रूप में चीन्हा है जिस पर हमारा वर्तमान और इतिहास, दोनों अपनी मनुष्यता और न्यायबोध को परख सकते हैं। उनकी प्रतिनिधि कविताओं की यह प्रस्तुति उनकी कवि-दृष्टि और काव्य-सामर्थ्य दोनों को समझने में सहायक होगी।
Nai Konplen
- Author Name:
Motilal Alamchandra
- Book Type:

- Description: Book
Naye Patte
- Author Name:
Suryakant Tripathi 'Nirala'
- Book Type:

-
Description:
निराला का दूसरे चरण का काव्य भी दो दौरों से गुज़रा है। उसके पहले दौर में ‘कुकुरमुत्ता’ (प्रथम संस्करण) और ‘अणिमा’ की कविताएँ रची गई हैं और उसके दूसरे दौर में ‘बेला’ और ‘नये पत्ते’ की कविताएँ। निराला के पहले चरण के तीसरे दौर की कविताओं में ही उनका यथार्थवादी रुझान प्रबलतर होता हुआ दिखलाई पड़ता है। उसी का विकास दूसरे चरण के पहले दौर की कविताओं में देखने को मिलता है। निराला बहुत ही संश्लिष्ट भाव-बोध के कवि थे, इसलिए वे इस दौर में भी गीत-रचना करते रहते हैं।
‘अणिमा’ की अनेक रचनाएँ इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करती हैं कि निराला का सामाजिक यथार्थ का ज्ञान प्रौढ़तर हुआ है। इससे उनका यथार्थवाद नये उत्कर्ष को प्राप्त करता है, जिसे हम ‘नये पत्ते’ की नई कविताओं में, जिनका सम्बन्ध किसानों से है, स्पष्टता से देखते हैं। यह निराला-काव्य की नई मंजिल है। इसी कारण हमने ‘बेला’, ‘नये पत्ते’ की कविताओं को उनके दूसरे चरण के काव्य के दूसरे दौर की कविताएँ माना है।
निराला का यथार्थवाद ‘नये पत्ते’ की ‘कुत्ता भौंकने लगा’, ‘झींगुर डटकर बोला’, ‘छलाँग मारता चला गया’, ‘डिप्टी साहब आए’ और ‘महगू महगा रहा’ जैसी कविताओं में बुलन्दी पर पहुँचता है।
—नन्दकिशोर नवल (निराला रचनावली की भूमिका से)।
Praan Mere
- Author Name:
Anil Kumar Pathak
- Book Type:

-
Description:
अनिल कुमार पाठक की नवीनतम काव्य-कृति ‘प्राण मेरे’ उनकी पूर्व काव्य-कृतियों ‘गीत, मीत के नाम’ तथा ‘अप्रतिम’ की परम्परा में मोहक प्रेम-गीतों का एक विलक्षण संग्रह है। पूर्ववर्ती गीत-संग्रहों की ही भाँति इस संग्रह के गीतों में भी प्रेम, संकुचित स्वरूप का परित्याग कर विस्तार के उद्दीप्त शाश्वत भाव के साथ विभिन्न अर्थ-संकेतों तथा अर्थ-सन्दर्भों के रूप में उपस्थित है। भावनाओं की व्यापकता एवं उसमें निहित चेतना-तत्त्व से युक्त प्रेम के स्निग्ध स्वरूप को कवि ने इस सुकृति की भूमिका में अनन्य भाव से परिभाषित किया है।
उन्होंने समाज में व्याप्त प्रेम विषयक विभिन्न भ्रान्तियों, जो प्रेम के शाश्वत स्वरूप को सीमित करती हैं, के सम्बन्ध में निराकरण प्रस्तुत करते हुए अपनी दृष्टि से इनकी गहन व्याख्या भी की है। कवि की यही दृष्टि इस संग्रह के गीतों में प्रतिध्वनित होती है।
Shrikant Verma Sanchayita
- Author Name:
Udyan Vajpeyi
- Book Type:

- Description: श्रीकान्त वर्मा स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी के सम्भवत: सबसे ऊर्जस्वित लेखकों में हैं। वे मूर्धन्य कवि हैं, सटीक कहानीकार हैं, और अनोखे उपन्यासकार। वे उन विरले कवियों में हैं जिन्होंने अपने भीतर से होकर बहती पिघलते लोहे-सी काव्य-धारा को पूरे धीरज से सहा और उसे बिल्कुल नए काव्य-विन्यासों में ढाला। यह भी सच है कि कई बार इस पिघले लोहे के-से काव्य-आवेग ने उन्हें धीरज बरत सकने का अवकाश नहीं दिया या शायद अपने घुमड़ते काव्य-आवेग के आगे कवि का धीरज निष्फल हो गया लेकिन तब यह काव्य-आवेग या काव्य-संवेदन उन्हीं की कविताओं के सुघड़ विन्यासों में आसपास, यहाँ-वहाँ चिनगारियों की तरह बिखर गया। शायद इसीलिए उनकी कविताएँ उनके काव्य-संयम और काव्य-असंयम का विलक्षण साक्ष्य और फलन हैं। उनके धीरज और उनकी हड़बड़ी दोनों का पारदर्शी अंकन। ऊर्जस्वित कवि होने के साथ-साथ श्रीकान्त वर्मा पक्के गद्यकार भी हैं। उनका गद्य गद्य की सारी शर्तों पर खरा उतरता गद्य है। उसमें वाक्य-सौन्दर्य है पर ‘कवितायी’ नहीं, उसमें विवरण हैं पर फिजूल ढीलापन नहीं। शायद इतना कसा हुआ गद्य बहुत कम लेखकों ने लिखा होगा। उन्होंने कहानियाँ, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त और निबन्ध लिखे हैं। श्रीकान्त वर्मा शायद हिन्दी में कविता के सर्वश्रेष्ठ अनुवादक भी रहे हैं। उन्होंने कई रूसी, जर्मन, जापानी, फ्रांसीसी, हंगारी और मैक्सिकन कविताओं के अनुवाद किए। इस संकलन में उनमें से कुछ अनुवादों को भी शामिल किया जा रहा है।
Urvashi : Dinkar Granthmala
- Author Name:
Ramdhari Singh Dinkar
- Book Type:

-
Description:
उर्वशी और पुरूरवा की प्रेम-कथा का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। इस प्राचीनतम आख्यान को अपने युग के नए अर्थ से जोड़ने का सृजनात्मक प्रयास दिनकर की विलक्षण दृष्टि का परिचय है। वे मानते हैं कि उर्वशी सनातन नारी तो पुरूरवा सनातन नर का प्रतीक है। उर्वशी चक्षु, रसना, घ्राण, त्वक् तथा श्रोत्र की कामनाओं तो पुरूरवा रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द से मिलनेवाले सुखों से उद्वेलित मनुष्य का प्रतीक है।
पुरूरवा और उर्वशी का प्रेम मात्र शरीर के धरातल पर आकार नहीं लेता, वह शरीर से जन्म लेकर मन और प्राण के गहन, गुह्य लोकों में प्रवेश करता है। रस के भौतिक आधार से उठकर रहस्य और आत्मा के अन्तरिक्ष में विचरण करता है। पुरूरवा के भीतर देवत्व की तृषा है। इसलिए मर्त्य लोक के नाना सुखों में वह व्याकुल और विषण्ण है। उर्वशी देवलोक से उतरी हुई नारी है। वह सहज, निश्चिन्त भाव से पृथ्वी का सुख भोगना चाहती है। पुरूरवा की वेदना समग्र मानव-जाति की चिरन्तन वेदना से ध्वनित है।
उर्वशी से पुरूरवा के बिछड़ने के बाद विरह को दिनकर एक दार्शनिकता के साथ व्यक्त करते हैं—संन्यास प्रेम को बर्दाश्त नहीं कर सकता, न प्रेम संन्यास को क्योंकि प्रेम प्रकृति और परमेश्वर संन्यास है और मनुष्य को सिखलाया गया है कि एक ही व्यक्ति परमेश्वर और प्रकृति दोनों को प्राप्त नहीं कर सकता। ...और वेदना की भूमि चूँकि पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं हुई, इसलिए औशीनरी की व्यथा ने कविता को वहाँ समाप्त होने नहीं दिया।
निहितार्थ यही कि इन्द्रियों के मार्ग से अतीन्द्रिय धरातल का स्पर्श कर प्रेम की आध्यात्मिक महिमा को एक व्यापक धरातल पर रचती 'उर्वशी' दिनकर की अपने पाठ और प्रभाव में कभी न ख़त्म होनेवाली कृति है, एक दुर्लभ गीति-नाट्य कृति।
Dukh Naye Kapde Badal Kar
- Author Name:
Shariq Kaifi
- Book Type:

-
Description:
शारिक़ कैफ़ी की शाइ’री में, आदमी का इस दुनिया में होना, अपने जिस्म-ओ-जान, चेतना, जज़्बों और महसूस करने की तमामतर ताक़त के साथ, एक घर, एक ख़ानदान, एक मुहल्ले, उसके गली-कूचों और एक सामाजिक और सांस्कृतिक माहौल में होना, और दिल-ओ-दिमाग़ के छोटे-छोटे वाक़िआ’त से बनते-बिगड़ते वाक़िआ’त में, और उनके माध्यम से, होना है। ये वाक़िआ’ती तख़य्युल (घटना आधारित कल्पना) शारिक़ कैफ़ी की बहुत बड़ी ताक़त और पहचान है, और इसमें उनका कोई सानी नहीं। इसकी बदौलत उर्दू की इ’श्क़िया शाइ’री बिलकुल नई, अनोखी, ज़हनी, जज़्बाती और नफ़्सियाती (मनोवैज्ञानिक) बारीकियों से परिचित हुई है, जो उर्दू शाइ’री को उनकी बहुत ख़ास देन है।
शारिक़ का सफ़र अब जिस मर्हले (चरण) में है, वहाँ तक बेरहम हक़ीक़त-पसन्दी (यथार्थ-बोध) की लय तेज़तर होती जा रही है। ये भाव उनकी इ’श्क़ियात शाइ’री में भी जारी है, और ज़िन्दगी और दुनिया के उनके अनुभवों में भी।
ज़िन्दगी, दुनिया और कायनात के बारे में शारिक़ कैफ़ी के तज्रबात में अब बहुत फैलाव और व्यापकता आ गई है। यहाँ हर चीज़, हर शक्ल और हरकत को हर ख़याल और धारणा का उलट-पुलट करके देखा जा रहा है।
DESHPREM, PRAKRITI AUR PAHAD
- Author Name:
Dr. Rama
- Book Type:

- Description: देशप्रेम, प्रकृति और पहाड़ख्यात लेखक-कवि श्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की कविताओं को पढ़कर रखा नहीं जा सकता है। उसके अंदर की सामाजिक, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक चेतना बार-बार आवाज देकर अपनी तरफ बुलाती है। देश प्रेम कवि का मूल भाव है। अपने देश की भाषा, संस्कृति और सभ्यता कवि को विशेष प्रिय है। कवि पहाड़ों से जीवन का संघर्ष सीखता है तो पौराणिक और ऐतिहासिक परंपरा से जीवन को उत्सवधर्मी बनाता है। निशंक राजनीति में रहते हुए लगातार साहित्य सृजन कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात है कि विविध विधाओं में लिख रहे हैं। कविताओं के साथ उपन्यास, कहानी, यात्रा-वृत्तांत आदि विधाओं में उनकी लेखनी यह बताती है कि साहित्य उनका पहला प्रेम है, जिससे वह समाज की नब्ज टटोलते हैं। लगभग डेढ़ दर्जन कविता और गीत संग्रहों का सृजन कर चुके निशंक भारतीय साहित्य के महत्त्वपूर्ण कवियों में शुमार हैं। राष्ट्र की गौरवशाली परंपरा उन्हें आह्लादित करती है। उनकी कविताएँ मजदूर वर्ग का व्याख्यान हैं। वह दलित और असहाय लोगों के लिए सहजता का भाव रखते हैं। उनकी कविताओं में आम जन जीवन की पीड़ा और दर्द को साफ-साफ महसूस किया जा सकता है। वह सामाजिक रिश्तों को बहुत बारीकी से प्रस्तुत करते हैं। प्रकृति और देश प्रेम की अजस्र धारा बहानेवाले लोकप्रिय कवि ‘निशंक’ की कविताओं के बिंब दरशाती एक पठनीय पुस्तक।
Awaaz Mein Jhar KAR
- Author Name:
Prakash
- Book Type:

-
Description:
“प्रकाश एक युवा-कवि आलोचक थे जिन्होंने इस कविता-संग्रह की पाण्डुलिपि स्वयं तैयार की थी और उसे प्रकाशित करने की चेष्टा कर रहे थे। दुर्भाग्य से उन्होंने जनवरी 2016 में आत्महत्या कर ली। यह मरणोपरान्त प्रकाशन इस बात का साक्ष्य है कि प्रकाश एक भाषा-सजग, शिल्प-निपुण कवि थे जिनके लिए भाषा स्वयं खोजने-पाने का एक अनुभव थी, निरा माध्यम भर नहीं। उसमें सूक्ष्म संवेदना है जो आजकल की अधिकतर युवा कविता की तरह सामान्यीकृत अनुभवों से काम नहीं चलाती बल्कि उसे संवेदना को ऐसे अनेक बिम्बों और छवियों से चरितार्थ करती है जो प्राय: परिणति में नहीं प्रक्रिया में होती
है : उसे कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं होती और वह धीरज से रास्ता खोजती, तय करती या ज़रूरी लगे तो उसमें भटकती है। मर्म, दृष्टि और ब्योरों के बीच प्रकाश के यहाँ दूरी नहीं है, न ही अलगाव। वे दरअसल उन सभी के बीच गहरे लगाव के शिल्पकार थे। उनका यह दूसरा संग्रह प्रकाशित हो रहा है जिसे इस पुस्तक माला में स्थान देकर हमें सन्तोष है कि एक अच्छे युवा कवि की कुल रचनाएँ हमें सामने लाने का सुयोग मिल रहा है।”—अशोक वाजपेयी
—‘आमुख’ से
Taash Ke Patte Par Likhi Kavita
- Author Name:
Vaibhav Kothari
- Book Type:

- Description: Book
Neend Mein Ek Gharelu Stri
- Author Name:
Ram Kumar Aatrey
- Book Type:

- Description: Poems
Srishti Par Pahara
- Author Name:
Kedarnath Singh
- Book Type:

- Description: केदारनाथ सिंह का यह नया संग्रह कवि के इस विश्वास का ताज़ा साक्ष्य है कि अपने समय में प्रवेश करने का रास्ता अपने स्थान से होकर जाता है। यहाँ स्थान का सबसे विश्वसनीय भूगोल थोड़ा और विस्तृत हुआ है, जो अनुभव के कई सीमान्तों को छूता है। इन कविताओं में कवि की भाषा और पारदर्शी हुई है—और संवादधर्मी भी। संग्रह की लम्बी कविता ‘मंच और मचान’ इस दृष्टि से उल्लेखनीय है कि यहाँ कटते हुए वृक्ष के विरुद्ध एक व्यक्ति (चीना बाबा) का प्रतिरोध ‘घर’ के लिए आदमी के बुनियादी संघर्ष का रूपक बन जाता है। यहाँ तुच्छ कीचड़ भी दुनिया बचाने के लिए सक्रिय दीखता है और घास की एक छोटी-सी पत्ती भी बैनर उठाए हुए मैदान में खड़ी है। पानी, कपास, लकड़ी और धूल जैसी छोटी-छोटी चीज़ों की बेचैनी से भरी ये कविताएँ कोई दावा नहीं करतीं। वे सिर्फ़ आपसे बोलना-बतियाना चाहती हैं—एक ऐसी भाषा में जो जितनी इनकी है उतनी ही आपकी भी।
Tevar Saptak
- Author Name:
Rameshraaj
- Book Type:

- Description: तेवरी को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में श्री रमेशराज का नाम अनायास ही सम्मानपूर्वक नहीं लिया जाता। इसके लिए उनका अथक परिश्रम और संघर्ष का अनूठा इतिहास उनके द्वारा सम्पादित त्रैमासिक पत्रिका ' तेवरीपक्ष' से प्रारंभ होता है। “ तेवरी एक स्वतंत्र विधा है”, यह सिद्ध करने के लिए वे निरंतर अपने आलेखों के माध्यम से तेवरी के शिल्प पर प्रामाणिक चर्चा करते रहे हैं। तेवरी के पृथक रूप - रसरूप को समझाने के लिए एक नितांत मौलिक रस, ' विरोधरस ' की स्थापना भी उन्होंने की है। छंद के क्षेत्र में नए-नए छंदों के साथ तेवरियों का रचाव अंततः इस भ्रम को तोड़ने में सफल रहता है कि तेवरी ग़ज़ल की नक़ल न होकर अपना एक पृथक अस्तित्व रखती है। तेवरी को स्वतंत्र विधा के रूप में पहचान दिलाने में उनका सद्यः प्रकाशित लंबी-लंबी तेवरियों का संग्रह -तेवर सप्तक उन सारी खूबियों को समाहित किए है, जिनके माध्यम से आसानी से यह सिद्ध किया जा सकता है कि तेवरी का अपना एक अलग नया और मौलिक काव्यशास्त्र है। “सप्तक” साहित्य के क्षेत्र में कोई नया नाम नहीं है। रेख़्ता, हिंदवी शब्दकोशों के अनुसार, सप्तक शब्द के “एक ही प्रकार की सात वस्तुओं” या “कृतियों”, “संगीत में सात स्वरों” के समूह या सात कवियों के एक मंडल द्वारा संकलित कविता के संग्रह को “सप्तक” कहा जाता है। उपरोक्त विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए साहित्य के जाने माने कवि श्री अज्ञेय द्वारा 1943 ईस्वी में नयी कविता के प्रणयन हेतु सात कवियों का एक मंडल बनाकर संकलित किया गया था “तार सप्तक”। यह संग्रह नयी कविता का प्रस्थान बिंदु रेखांकित किया गया। इस “तार सप्तक” के बाद देखते ही देखते, गीत सप्तक, ग़ज़ल सप्तक, कविता सप्तक, ग़ज़ल कविता सप्तक, दोहा सप्तक, सजल सप्तक आदि अनेक सप्तक प्रकाश में आए। जिनमें “गजल कविता सप्तक”, संपादक -जितेंद्र चौहान पार्वती प्रकाशन, इंदौर, तथा “ग़ज़ल सप्तक”, संपादक-राम निहाल गुंजन एवं मथुरा में हिन्दी सजल सर्जना समिति के तत्वावधान में प्रथम हिन्दी सजल महोत्सव, 2017 में पद्मश्री गोपालदास नीरज के कर कमलों से ‘‘सजल सप्तक ’’ का लोकार्पण हुआ। “सप्तक” की इन्हीं मान्यताओं या विशेषताओं को को ध्यान में रखते हुए श्री रमेशराज के इस “तेवर सप्तक” में भी सौ-सौ तेवर वाली सात लंबी तेवरियों को सात शतकों के रूप में एक साथ प्रस्तुत किया है। “तेवर सप्तक” के अंतर्गत शतक के रूप में इन सात लंबी तेवरियों को निम्न नामों से इस प्रकार रखा गया है - 1.घड़ा पाप का भर रहा, 2. अंतर आह अनंत अति, 3. ककड़ी के चोरों को फांसी, 4. मन के घाव नये न ये, 5. रावण कुल के लोग, 6. धन का मद गदगद करे 7. मेरा हाल सोडियम-सा है। सात तेवर शतकों के बना रमेशराज का तेवर सप्तक भी सुधी पाठकों के बीच है। अन्य सप्तकों की तरह इस सप्तक का भी साहित्य जगत में स्वागत होगा, ऐसा विश्वास है। ~विनोद भारती ' व्यग्र'
KASMAI DEVAYA
- Author Name:
Arun Mishra
- Book Type:

- Description: हमारे कवियों की कविता से प्रकृति के विविध अवयव धीरे-धीरे गायब हो गए हैं। ऐसे समय में मिश्रजी की कविताएँ सुखद अनुभूति प्रदान करती हैं। उनके पास भाषा, शिल्प और शब्दों का अद्भुत भंडार है।’’ ‘‘श्री मिश्र प्रकृति से गहराई से जुड़े हैं, वे काव्य सृजन के लिए बार-बार प्रकृति के पास जाते हैं। प्रकृति उनके साथ पूरा सहयोग भी करती है। वे लोप होती हुई संवेदनाओं के कवि हैं।’’ —प्रो. कुँवर पाल सिंह
Customer Reviews
Be the first to write a review...
0 out of 5
Book